24/05/2026
प्राचीन काल में, जब धरती का यौवन अपने चरम पर था, राजा ककुद्मी (जिन्हें रैवत भी कहा जाता था) अपनी राजधानी 'कुशस्थली' पर शासन करते थे। उनकी पुत्री रेवती इतनी गुणवान थी कि राजा को लगने लगा कि इस पूरी धरती पर ऐसा कोई पुरुष नहीं जन्मा जो उसके तेज को सह सके।
राजा ने सोचा, "जब मृत्युलोक में कोई योग्य नहीं, तो क्यों न सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी से ही परामर्श लिया जाए?"
अपनी योगशक्ति से राजा ककुद्मी पुत्री रेवती का हाथ थामे हुए सीधे सत्यलोक (ब्रह्मलोक) जा पहुँचे। वहां का दृश्य अकल्पनीय था। वहां न सूर्य का प्रकाश था, न चंद्रमा का भय; वहां केवल ब्रह्म-तेज था।
जब वे पहुंचे, ब्रह्मा जी गंधर्वों के मधुर गायन में लीन थे। ककुद्मी ने सोचा कि विघ्न डालना उचित नहीं होगा। वे अपनी पुत्री के साथ वहीं एक कोने में खड़े होकर संगीत सुनने लगे। उन्हें लगा कि केवल कुछ ही मिनट बीते हैं। संगीत समाप्त हुआ, तो ब्रह्मा जी ने मुस्कुराते हुए राजा की ओर देखा।
राजा ने झुककर प्रणाम किया और अपनी पुत्री के लिए उन राजकुमारों की सूची पढ़नी शुरू की, जिन्हें उन्होंने वर के रूप में चुना था।
ब्रह्मा जी खिलखिलाकर हँस पड़े और बोले—
"हे राजन्! जिन राजकुमारों, उनके पुत्रों, पौत्रों और उनके वंशजों के नाम तुम ले रहे हो, उनका तो अब नामोनिशान भी नहीं बचा। उनकी हड्डियाँ तक धूल बनकर हवा में उड़ चुकी हैं।"
राजा सन्न रह गए। ब्रह्मा जी ने आगे कहा, "तुम्हें आभास नहीं है, लेकिन यहाँ के कुछ क्षणों में पृथ्वी पर 27 चतुर्युगी (सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग के 27 चक्र) बीत चुके हैं। तुम्हारा राज्य, तुम्हारी प्रजा और तुम्हारा काल—सब 'महाकाल' के उदर में समा चुके हैं।"
राजा ककुद्मी घबरा गए। उन्होंने पूछा, "प्रभो! अब इस अजनबी दुनिया में मेरी पुत्री का रक्षक कौन होगा?"
ब्रह्मा जी ने शांत स्वर में कहा, "चिंता मत करो। इस समय पृथ्वी का भार हरण करने के लिए स्वयं भगवान विष्णु के अंश 'बलराम' और 'कृष्ण' अवतरित हुए हैं। तुम द्वारका जाओ, शेषनाग के अवतार बलराम ही रेवती के योग्य पति हैं।"
जब ककुद्मी और रेवती पृथ्वी पर उतरे, तो वे हतप्रभ थे। लोग छोटे थे, उनकी बुद्धि कम थी और प्रकृति बदल चुकी थी। रेवती, जो सतयुग के कद-काठी की थी, वह द्वापर के मनुष्यों के सामने एक विशाल पर्वत जैसी दिख रही थी।
द्वारका पहुँचकर जब राजा ने बलराम जी से विवाह का प्रस्ताव रखा, तो वहां उपस्थित लोग रेवती की लंबाई देखकर चकित रह गए। तब अंतर्यामी बलराम जी मुस्कुराए। उन्होंने अपना 'हल'उठाया और खेल-ही-खेल में उसके अग्रभाग से रेवती के कंधों को छुआ।
चमत्कार हुआ! बलराम जी के दिव्य स्पर्श से रेवती का कद और तेज द्वापर युग के अनुरूप संकुचित हो गया। वे एक अत्यंत सुंदर और सुडौल वधू बन गईं।
इसके बाद ककुद्मी ने अपनी पुत्री का कन्यादान किया और स्वयं तपस्या करने बदरिकाश्रम चले गए। यह कथा हमें सिखाती है कि:
अहंकार का त्याग: राजा को गर्व था कि वह ब्रह्मलोक जा सकते हैं, पर समय ने पल भर में सब छीन लिया।
अनुकूलन : बलराम जी द्वारा रेवती का कद छोटा करना यह दर्शाता है कि ईश्वर हमें नए युग और नई परिस्थितियों के अनुसार ढलना सिखाते हैं।