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भारत के महान चिकित्सक और सर्जरी के जनक महर्षि सुश्रुत को ब्रिटेन के प्रतिष्ठित रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग में सम्...
23/06/2026

भारत के महान चिकित्सक और सर्जरी के जनक महर्षि सुश्रुत को ब्रिटेन के प्रतिष्ठित रॉयल कॉलेज ऑफ सर्जन्स ऑफ एडिनबर्ग में सम्मानित किया गया है। 19 जून 2026 को उनकी कांस्य प्रतिमा का अनावरण किया गया, जो चिकित्सा विज्ञान में भारत के 2600 वर्ष पुराने योगदान की वैश्विक मान्यता का प्रतीक है। महर्षि सुश्रुत ने अपनी कृति सुश्रुत संहिता के माध्यम से शल्य चिकित्सा, चिकित्सा नैतिकता और सर्जिकल उपकरणों का विस्तृत ज्ञान दुनिया को दिया था।

के सब खेने छी ई तारफल(तरकुन)
09/06/2026

के सब खेने छी ई तारफल(तरकुन)

गच्छपक्कू आम (,की बिचार कहु😊)फोटो राजू मंडल #मिथिला
31/05/2026

गच्छपक्कू आम (,की बिचार कहु😊)
फोटो राजू मंडल
#मिथिला

28/05/2026
28/05/2026
CBSE मे मैथिली भाषा सम्मिलित भेल,मैथिली भाषा आ मिथिला संस्कृति लेल बहुत गर्व आ खुशी केँ बात अछि😊जय मिथिला जय मैथली 🙏🚩
25/05/2026

CBSE मे मैथिली भाषा सम्मिलित भेल,
मैथिली भाषा आ मिथिला संस्कृति लेल बहुत गर्व आ खुशी केँ बात अछि😊
जय मिथिला जय मैथली 🙏🚩

प्राचीन काल में, जब धरती का यौवन अपने चरम पर था, राजा ककुद्मी (जिन्हें रैवत भी कहा जाता था) अपनी राजधानी 'कुशस्थली' पर श...
24/05/2026

प्राचीन काल में, जब धरती का यौवन अपने चरम पर था, राजा ककुद्मी (जिन्हें रैवत भी कहा जाता था) अपनी राजधानी 'कुशस्थली' पर शासन करते थे। उनकी पुत्री रेवती इतनी गुणवान थी कि राजा को लगने लगा कि इस पूरी धरती पर ऐसा कोई पुरुष नहीं जन्मा जो उसके तेज को सह सके।
राजा ने सोचा, "जब मृत्युलोक में कोई योग्य नहीं, तो क्यों न सृष्टिकर्ता ब्रह्मा जी से ही परामर्श लिया जाए?"

अपनी योगशक्ति से राजा ककुद्मी पुत्री रेवती का हाथ थामे हुए सीधे सत्यलोक (ब्रह्मलोक) जा पहुँचे। वहां का दृश्य अकल्पनीय था। वहां न सूर्य का प्रकाश था, न चंद्रमा का भय; वहां केवल ब्रह्म-तेज था।
जब वे पहुंचे, ब्रह्मा जी गंधर्वों के मधुर गायन में लीन थे। ककुद्मी ने सोचा कि विघ्न डालना उचित नहीं होगा। वे अपनी पुत्री के साथ वहीं एक कोने में खड़े होकर संगीत सुनने लगे। उन्हें लगा कि केवल कुछ ही मिनट बीते हैं। संगीत समाप्त हुआ, तो ब्रह्मा जी ने मुस्कुराते हुए राजा की ओर देखा।

राजा ने झुककर प्रणाम किया और अपनी पुत्री के लिए उन राजकुमारों की सूची पढ़नी शुरू की, जिन्हें उन्होंने वर के रूप में चुना था।
ब्रह्मा जी खिलखिलाकर हँस पड़े और बोले—
"हे राजन्! जिन राजकुमारों, उनके पुत्रों, पौत्रों और उनके वंशजों के नाम तुम ले रहे हो, उनका तो अब नामोनिशान भी नहीं बचा। उनकी हड्डियाँ तक धूल बनकर हवा में उड़ चुकी हैं।"

राजा सन्न रह गए। ब्रह्मा जी ने आगे कहा, "तुम्हें आभास नहीं है, लेकिन यहाँ के कुछ क्षणों में पृथ्वी पर 27 चतुर्युगी (सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलयुग के 27 चक्र) बीत चुके हैं। तुम्हारा राज्य, तुम्हारी प्रजा और तुम्हारा काल—सब 'महाकाल' के उदर में समा चुके हैं।"

राजा ककुद्मी घबरा गए। उन्होंने पूछा, "प्रभो! अब इस अजनबी दुनिया में मेरी पुत्री का रक्षक कौन होगा?"
ब्रह्मा जी ने शांत स्वर में कहा, "चिंता मत करो। इस समय पृथ्वी का भार हरण करने के लिए स्वयं भगवान विष्णु के अंश 'बलराम' और 'कृष्ण' अवतरित हुए हैं। तुम द्वारका जाओ, शेषनाग के अवतार बलराम ही रेवती के योग्य पति हैं।"

जब ककुद्मी और रेवती पृथ्वी पर उतरे, तो वे हतप्रभ थे। लोग छोटे थे, उनकी बुद्धि कम थी और प्रकृति बदल चुकी थी। रेवती, जो सतयुग के कद-काठी की थी, वह द्वापर के मनुष्यों के सामने एक विशाल पर्वत जैसी दिख रही थी।
द्वारका पहुँचकर जब राजा ने बलराम जी से विवाह का प्रस्ताव रखा, तो वहां उपस्थित लोग रेवती की लंबाई देखकर चकित रह गए। तब अंतर्यामी बलराम जी मुस्कुराए। उन्होंने अपना 'हल'उठाया और खेल-ही-खेल में उसके अग्रभाग से रेवती के कंधों को छुआ।
चमत्कार हुआ! बलराम जी के दिव्य स्पर्श से रेवती का कद और तेज द्वापर युग के अनुरूप संकुचित हो गया। वे एक अत्यंत सुंदर और सुडौल वधू बन गईं।

इसके बाद ककुद्मी ने अपनी पुत्री का कन्यादान किया और स्वयं तपस्या करने बदरिकाश्रम चले गए। यह कथा हमें सिखाती है कि:

अहंकार का त्याग: राजा को गर्व था कि वह ब्रह्मलोक जा सकते हैं, पर समय ने पल भर में सब छीन लिया।

अनुकूलन : बलराम जी द्वारा रेवती का कद छोटा करना यह दर्शाता है कि ईश्वर हमें नए युग और नई परिस्थितियों के अनुसार ढलना सिखाते हैं।

"शेषनाग कौन है उनके जन्म की कथा" जानिए कैसे बने वे पृथ्वी के आधार शास्त्रसम्मत सत्य 🙏🚩सनातन धर्म में भगवान विष्णु के परम...
24/05/2026

"शेषनाग कौन है उनके जन्म की कथा" जानिए कैसे बने वे पृथ्वी के आधार शास्त्रसम्मत सत्य 🙏🚩
सनातन धर्म में भगवान विष्णु के परम सेवक और अनंत काल के प्रतीक 'शेषनाग' (अनंत) का स्थान अत्यंत पूजनीय है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि उनका जन्म कैसे हुआ? वे अपने अन्य सर्प भाइयों की तरह क्रूर और कपटी क्यों नहीं बने? आज Ajay Kumar आपको शास्त्रों और श्लोकों के प्रमाण के साथ शेषनाग के जन्म और उनकी महान तपस्या की अनसुनी गाथा बताएंगे।
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​📜 शास्त्रसम्मत प्रमाण (Scriptural Proof)
​शेषनाग के जन्म और उनके भू-भार धारण करने की विस्तृत कथा 'महाभारत' के आदिपर्व के अंतर्गत आस्तिक पर्व में मिलती है। इसके अलावा 'श्रीमद्भागवत पुराण' के पंचम स्कंध में भी इनका वर्णन है।।Ajay Kumar
​मुख्य ग्रंथ: महाभारत (Mahabharata)
​पर्व का नाम: आदिपर्व (आस्तिक पर्व के अंतर्गत)
​अध्याय संख्या: अध्याय 36 से 39 तक
​मूल श्लोक संदर्भ (महाभारत, आदिपर्व, 36.3):
​शेषो नागेश्‍वरो देवो महाबलपराक्रमः।‌
तपस्तेपे महाभागो नियतो नियतेन्द्रियः॥
(अर्थ: नागों के ईश्वर, महान बल और पराक्रम से संपन्न महाभाग शेषनाग अपनी इंद्रियों को वश में करके कठिन तपस्या में लीन हो गए।)
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​📖 सम्पूर्ण पौराणिक कथा (The Detailed Narrative)
​1. कद्रू और विनता की प्रतिस्पर्धा:
कथा की शुरुआत प्रजापति कश्यप की दो पत्नियों, कद्रू और विनता से होती है। कद्रू ने नागवंश को जन्म दिया, जिनमें शेषनाग सबसे ज्येष्ठ (बड़े) पुत्र थे। उनके बाद वासुकि, ऐरावत और तक्षक जैसे हजारों नाग पैदा हुए। कद्रू स्वभाव से ईर्ष्यालु थी।
​2. भाइयों के छल से शेषनाग की विरक्ति:
Ajay Kumar द्वारा शोधित महाभारत के प्रसंगों के अनुसार, कद्रू और उसके अन्य नाग पुत्र अत्यंत क्रूर, कपटी और अधर्मी थे। अपने भाइयों के इस नीच और छल-कपट से भरे व्यवहार को देखकर शेषनाग का मन ग्लानि और विरक्ति से भर गया। उन्होंने अपनी माता और भाइयों का साथ छोड़ने का दृढ़ निश्चय किया। Ajay Kumar
​3. शेषनाग की कठोर तपस्या:
अपने भाइयों के पापों का प्रायश्चित करने के लिए शेषनाग घर छोड़कर तपस्या में लीन हो गए। उन्होंने गंधमादन पर्वत, बदरिकाश्रम, गोकर्ण और पुष्कर जैसे अत्यंत पवित्र स्थानों पर वायु भक्षण करके (निराहार रहकर) हजारों वर्षों तक घोर तप किया। उनकी इंद्रिय-निग्रह और तपस्या की तीव्रता को देखकर स्वयं ब्रह्मा जी प्रकट हुए। Ajay Kumar
​4. ब्रह्मा जी का वरदान और पृथ्वी का भार:
जब ब्रह्मा जी ने उनसे वरदान मांगने को कहा, तो शेषनाग ने केवल यही मांगा कि उनका मन कभी अधर्म में न लगे और वे हमेशा शांत रहें। ब्रह्मा जी उनकी धर्मपरायणता से अत्यंत प्रसन्न हुए। Ajay Kumar के अनुसार, ब्रह्मा जी ने उन्हें एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य सौंपा और कहा— "हे शेष! तुम्हारी माता के श्राप और तुम्हारे भाइयों के कुकर्मों के कारण यह पृथ्वी निरंतर डगमगा रही है और अस्थिर हो गई है। तुम अपनी कुंडली पर इस पूरी पृथ्वी को धारण करो ताकि यह स्थिर हो सके।"
​ब्रह्मा जी की आज्ञा पाकर शेषनाग ने पाताल लोक में जाकर पूरी पृथ्वी को अपने मस्तक पर धारण कर लिया। तब से लेकर आज तक वे पृथ्वी को संभाले हुए हैं।
​💬 Ajay Kumar | कमेंट में 'जय अनंत शेषनाग' अवश्य लिखें! 💬
​🎯 निष्कर्ष (Conclusion)
​शेषनाग की यह कथा हमें सिखाती है कि चाहे हमारा जन्म कैसे भी माहौल में क्यों न हुआ हो, यदि हमारे विचार धर्म और सत्य के मार्ग पर हैं, तो स्वयं विधाता हमारा मार्ग दर्शन करते हैं। अपने भाइयों के कुकर्मों को त्याग कर शेषनाग पूजनीय बने, जबकि उनके भाई जनमेजय के सर्पसत्र यज्ञ में भस्म हो गए।

जब श्रीराम ने अपनी अंगूठी पाताल में गिरा दी! 💍 आखिर क्या था अंगूठियों के उस विशाल पर्वत का रहस्य और क्यों श्रीराम ने हनु...
23/05/2026

जब श्रीराम ने अपनी अंगूठी पाताल में गिरा दी! 💍 आखिर क्या था अंगूठियों के उस विशाल पर्वत का रहस्य और क्यों श्रीराम ने हनुमान जी को खुद से दूर भेजा? जानिए इस रोचक कथा में। 🛕👇
क्या आप जानते हैं श्रीराम ने अपनी अंगूठी पाताल में क्यों गिराई थी? 🛕✨
हम सभी जानते हैं कि रावण वध के बाद श्रीराम ने ११,००० वर्षों तक अयोध्या पर राज किया। लेकिन रामायण के कुछ संस्करणों में उनके महाप्रयाण (पृथ्वी लोक छोड़ने) की एक बेहद रोचक और रहस्यमयी कथा मिलती है।
जब माता सीता और भ्राता लक्ष्मण अपने शरीर का त्याग कर चुके थे, तब श्रीराम ने भी अपनी मानवीय लीला समाप्त करने का निर्णय लिया। उन्होंने मृत्यु के देवता यमराज को आमंत्रित किया। लेकिन एक बड़ी समस्या थी—अयोध्या के द्वार पर महाबली हनुमान जी का पहरा था! 🚩
यमराज जानते थे कि जब तक पवनपुत्र द्वार पर हैं, वे अंदर कदम भी नहीं रख सकते। यमराज ने अपनी यह विवशता श्रीराम को बताई। श्रीराम जानते थे कि हनुमान उनके परम भक्त हैं और वे कभी भी अपने प्रभु को मृत्यु लोक से जाने नहीं देंगे। तब श्रीराम ने एक अद्भुत लीला रची...
अंगूठी का रहस्य 💍
श्रीराम ने जान-बूझकर अपनी सबसे प्रिय अंगूठी (जो माता सीता ने दी थी) फर्श के एक छोटे से छिद्र में गिरा दी और हनुमान जी से उसे ढूंढ लाने को कहा। अपने प्रभु की आज्ञा पाकर हनुमान जी ने सूक्ष्म रूप धरा और उस छिद्र से होते हुए सीधे पाताल लोक (नागलोक) पहुँच गए।
वहाँ उनकी भेंट नागराज वासुकि से हुई। जब हनुमान जी ने अंगूठी की बात बताई, तो वासुकि मुस्कुराए और उन्हें एक ऐसे स्थान पर ले गए जहाँ हूबहू एक जैसी अंगूठियों का विशाल पर्वत खड़ा था!
काल चक्र का ज्ञान ⏳
हनुमान जी हैरान रह गए जब उन्होंने देखा कि हर अंगूठी पर श्रीराम का चित्र अंकित था। तब नागराज वासुकि ने उन्हें सृष्टि का सबसे बड़ा सत्य बताया:
"क्या आपको लगता है कि आज तक केवल एक ही श्रीराम अवतरित हुए हैं? यह ब्रह्मा जी का सृजन और विनाश का चक्र है। हर कल्प में श्रीराम आते हैं, लीला करते हैं और ठीक इसी तरह अपनी अंगूठी गिराकर आपको पाताल भेजते हैं... ताकि आपके पीछे से वे अपने लोक वापस लौट सकें!"
यह सुनकर हनुमान जी को काल-चक्र और मृत्यु के शाश्वत सत्य का भान हुआ। वे समझ गए कि स्वयं नारायण को भी प्रकृति के नियमों का पालन करना पड़ता है।
जब वे वापस अयोध्या लौटे, तब तक श्रीराम, यमराज के साथ साकेत धाम लौट चुके थे। श्रीराम के बिना धरती सूनी थी, लेकिन हनुमान जी समझ गए कि प्रभु ने उन्हें 'चिरंजीवी' होने का वरदान क्यों दिया था—ताकि सृष्टि के अंत तक वे पृथ्वी पर राम-कथा का प्रचार-प्रसार करते रहें। 🙏
जय श्रीराम! 🚩 यदि आपको यह कथा अद्भुत लगी हो, तो इसे अपने मित्रों और परिवार के साथ अवश्य शेयर करें।

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