नाचीज़ लखनवी

नाचीज़ लखनवी A page for my personal poetry and write ups

12/07/2026

तुम्हारे वास्ते खुद को भी गिराया हमने

अपने शेरों में तुम्हें आप बुलाया हमने ।

नाचीज़ लखनवी

निगाहों का तेरी करम चाहते हैं,सितमगर, जरा सा सितम चाहते हैं ।हमारे हो तुम, और हमेशा रहोगे,बस इतना सा दिल का भरम चाहते है...
11/04/2026

निगाहों का तेरी करम चाहते हैं,
सितमगर, जरा सा सितम चाहते हैं ।
हमारे हो तुम, और हमेशा रहोगे,
बस इतना सा दिल का भरम चाहते हैं ।
उमर भर निभा न सको, तो बताओ,
ये किस्सा इसी दम खतम चाहते हैं ।
वो कहते हैं, दस्तार बख्शेंगे, लेकिन,
वो बदले में गर्दन को खम चाहते हैं ।
जो सर को झुकाने से होती हो हासिल
नहीं ऐसी दस्तार हम चाहते हैं ।
मुझे छोड़ो, अब पांव के आबले भी,
खुदा तेरा रहमो करम चाहते हैं ।
जरा हाल नाचीज़ का देखिये तो,
वो दुश्मन भी अब मोहतरम चाहते हैं ।

नाचीज़ लखनवी

वृन्द त्रैमासिक ई पत्रिका के नवीन संस्करण के प्रकाशन की आदरणीया संपादिका विनीता सिंह विनी  जी को अनंत बधाइयां व शुभकामना...
25/03/2026

वृन्द त्रैमासिक ई पत्रिका के नवीन संस्करण के प्रकाशन की आदरणीया संपादिका विनीता सिंह विनी जी को अनंत बधाइयां व शुभकामनाएँ

इस संस्करण में मेरी ग़ज़ल को स्थान देने के लिए आदरणीया संपादिका जी को कोटि कोटि आभार

22/03/2026

लोग
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दुनिया को, न ही खुद को ही बहला रहे हैं लोग,
रोने की आरज़ू है, हंसे जा रहे हैं लोग ।
एक अलहदा किरदार हुए जा रहे हैं लोग,
जीने की तमन्ना है, मरे जा रहे हैं लोग ।
किस्मत का छलावा है, या है वक़्त का मिज़ाज़,
छलने की ख्वाहिशें हैं, छले जा रहे हैं लोग ।
दुनिया के मसलहात से, न दैरो हरम से,
हर फ़िक्र से बेफ़िक्र हुए जा रहे हैं लोग ।
लड़ने में सुकूं है, न मुहब्बत में मजा है,
बस नफरतों के साथ दिल लगा रहे हैं लोग ।
ज़ख्मी हर एक सर, हर एक जिस्म है घायल,
शैतान पे पत्थर, मगर बरसा रहे हैं लोग ।
ये दौर, कि बेहाल है हर एक जिंदगी,
हिम्मत सराहिये, कि जिये जा रहे हैं लोग ।
नाचीज़ लखनवी

18/03/2026

खूब कस के कूटिये, है चोट से रिश्ता घना,
ओखली के धान हैं, उजले ही होते जायेंगें ।
तोड़िये जी भर के, हर घर, गांव, कस्बे, शहर, देश,
आपके हिस्से में ही सारे ये टुकड़े आएंगे ।
बादशाही,चाकरी, चारागरी, पैगम्बरी,
किस तरह से और कितनी तरह से भरमायेंगें ।
क़ौम की एक हद्द तक ही आजमाइश कीजिये,
कौम ने अजमा लिया गर, आप बस पछतायेंगे ।
थूकिये सूरज पे, अपना शौक़ पूरा कीजिये,
पर रहे ये याद, छींटे आप पर ही आएंगें ।
आखिरी मौका मिला है, कुछ तो कर जाएं अलग,
वरना औरों की तरह बस नाम ही रह जाएंगें ।
भाग्य तो अक्सर सफर में छोड़ जाता है नाचीज़,
कर्म पर दें ध्यान, मंज़िल तक वही ले जायेंगें ।

नाचीज़ लखनवी

( दूसरी पंक्ति व्हाट्स एप की एक अनाम पोस्ट में किसी के द्वारा उल्लिखित की गई थी । मुझे नहीं पता किसकी है । उसी को मिसरा बना कर ये लिखी गई है । जिसका भी है उन अज्ञात बन्धु को प्रणाम, आभार , नमन, वंदन )

05/03/2026

वक़्त को देखिये जरा साहब,

खेल इसने अलग रचा साहब ।

रंग होली का था सुबह को जो,

शाम को दाग बन गया साहब ।

नाचीज़ लखनवी

02/03/2026

आसमान टेसू हुआ, धरती हुई गुलाल,

मन कान्हा के रंग रंगा, तन रंग अबीर गुलाल ।

आप सभी को सपरिवार होली की शुभकामनाएं

खूब रंग खेलें

नाचीज़ लखनवी उर्फ राहुल सांकृत्यायन

20/02/2026

जो केवल खुशी से गुजरती दिखे,

कहीं भी कोई जिंदगानी नहीं ।

नहीं जिसमें आंसू, हंसी साथ साथ ,

किसी की भी ऐसी कहानी नहीं ।

जहां दोस्त ही सारे दुश्मन बनें,

हमें ऐसी बस्ती बसानी नहीं ।

खुदा ऐसा दुश्मन न देना मुझे,

मिले जिसकी आंखों में पानी नहीं ।

तेरे बाद कोई न दिल में बसा,

लगा कोई चेहरा नूरानी नहीं ।

नाचीज़ लखनवी

जिसने बीमार तक नहीं देखा,शिद्दत ए दर्द भला क्या जाने ।नाचीज़ लखनवी
19/02/2026

जिसने बीमार तक नहीं देखा,

शिद्दत ए दर्द भला क्या जाने ।

नाचीज़ लखनवी

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243/43 Bagh Lal Ji, Nadan Mahal Road
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