My words my pain

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it has some teachings of our society and it gives you a way to Happy Life

23/11/2024

आप गुलाब कहते हैं जिन्हें
वे उग ही आती हैं हर बार

बिन खाद-पानी और देखभाल के
वे बचा लेती हैं ख़ुद को

अल्ट्रासाउंड की पराबैंगनी किरणों से
गर्भपात के तमाम हथकंडे झुठला कर

वे जन्म ले ही लेती हैं
समूची-सही-सलामत

हाँ, वे ही
आप गुलाब देते हैं जिन्हें

प्रेमिका कहकर
फिर प्रेम-प्रेम कहते-करते

चाहते हैं मसल देना
स्लीपवेल के गद्दों पर

आटे की तरह गूँथे जाने के बाद भी
सख़्त मर्दानी बाँहों में

वे कर ही लेती हैं भरपूर नींद की तलाश
हाँ, वे ही

जो लिखती हैं सूई से
रंग-बिरंगे रेशम से

'गुड नाइट' तकियों पर
उन्हीं तकियों पर मुँह गड़ा कर

दहाड़ें सारी दफ़ना कर
सिसक-सिसक कर गुज़ार देती हैं सारी रात

हाँ, वे ही
ऊनी कपड़ों के साथ जो

दबा देती हैं अपनी सारी क़ाबिलियत
बक्से तले

फ़िनायल की गोलियों की तरह
और बहा देती हैं शौचालय में

बच्चे की शौच के साथ
अपनी सारी हँसी

कि मासूमियत से कभी गृहस्थी नहीं चली
वे ढूँढ़-ढूँढ़ कर

उचक-उचक कर
छुड़ाती हैं जाले

साफ़ करती हैं बेसिन-पाख़ाने
रसोई की नालियाँ

वहाँ सड़क पर फाड़ दी जाती है उनकी इज़्ज़त
मर्दों के बहाने पड़ती हैं उन्हें ही गालियाँ

फिर भी वे ओढ़े रहती हैं होंठों पर
ठंड की धूप-सी झूठी मुस्कान

या लू-सी तीखी हँसी
शायद सब पेट से ही

सीख कर आती हैं ऐसी जादूगरी
अपनी तमाम चालाकियाँ भिड़ा कर

वे जीत लेती हैं आपका दिल
आप कह उठते हैं गुलाब उन्हें

लेकिन मैं बेहया कहूँगी!
स्रोत :रचनाकार : नाज़िश अंसारी

08/06/2022

पेड़—पौधे हैं बहुत बौने तुम्हारे

रास्तों में एक भी बरगद नहीं है

मैकदे का रास्ता अब भी खुला है

सिर्फ़ आमद—रफ़्त ही ज़ायद नहीं

इस चमन को देख कर किसने कहा था

एक पंछी भी यहाँ शायद नहीं है.

05/02/2022
रुतबा बढाने को शहर गया ,वो छोड़ गाँव पाँव जले धुप से, न पानी मिले  ना मिले छाव      Read my thoughts on                 ...
31/07/2021

रुतबा बढाने को शहर गया ,वो छोड़ गाँव
पाँव जले धुप से, न पानी मिले ना मिले छाव






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In Lakhimpur Kheri
05/12/2020

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12/09/2020



गुजर गया एक दौर अब दूसरा आ गया है
10/09/2020

गुजर गया एक दौर अब दूसरा आ गया है








वृद्धावस्था , मानव जीवन का वो दौर है जहां से व्यक्ति पुनः अपने बाल्यकाल में वापस चला जाता है एक वृद्ध का जीवन बिल्कुल एक...
09/09/2020

वृद्धावस्था , मानव जीवन का वो दौर है जहां से व्यक्ति पुनः अपने बाल्यकाल में वापस चला जाता है
एक वृद्ध का जीवन बिल्कुल एक तीन साल के शिशु की तरह होता है
ऐसी अवस्था में वो ना तो खुद उठा सकता है न खुद से भोजन कर सकता है ।
यहां तक कि अधिकांश स्थितियों में सोचने समझने की शक्ति भी क्षीण हो जाती है
और किसी व्यक्ति ने अपने जीवन में कितना धन कमाया यह उस वक़्त कोई मायने नहीं रखता
उस वक़्त मायने रखता है आपने अपने जीवन में अपने परिवार के साथ कितना शुखद समय बिताया , अपने परिवाजनों को कितना स्नेह किया
क्योंकि ऐसी स्थिति में आपको अपने परिवार के सदस्य रूपी बैसाखी की आवश्यकता पड़ती है
और उस वक़्त वहीं आपकी जीवन भर की कमाई होती हैं
और प्रकृति की अन्य नियमो की तरह यह भी उतना ही सच है की आप अपने जीवन में कितने अच्छे कार्य करते है अगर आपके आसपास कोई वृद्ध है जो चलने में या सोचने समझने में असमर्थ है तो आप उसकी उस अवस्था से अनुमान लगा सकते है कि जीवन की वास्तविक कमाई क्या होती है
परिवार क्या होता है

#वृद्धावस्था
#परिवार_ही_सँसार_है




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