08/08/2026
वीर धनुर्धर एकलव्य महाभारत काल के एक महान धनुर्धर, आदर्श शिष्य और त्याग की प्रतिमूर्ति माने जाते हैं। वे निषादराज हिरण्यधनु के पुत्र थे। एकलव्य बचपन से ही धनुर्विद्या सीखने के इच्छुक थे और गुरु द्रोणाचार्य को अपना गुरु मानते थे।
जब वे गुरु द्रोणाचार्य के पास शिक्षा लेने पहुँचे, तो द्रोणाचार्य ने उन्हें राजकुमार न होने के कारण शिष्य बनाने से मना कर दिया। इसके बाद भी एकलव्य ने हार नहीं मानी। उन्होंने जंगल में गुरु द्रोणाचार्य की मिट्टी की प्रतिमा बनाकर उसे अपना गुरु मान लिया और निरंतर अभ्यास करते हुए अद्भुत धनुर्धर बन गए।
एक दिन जब द्रोणाचार्य ने उनकी विलक्षण प्रतिभा देखी, तो उन्होंने गुरु-दक्षिणा के रूप में एकलव्य से उनके दाएँ हाथ का अंगूठा माँग लिया। गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा और सम्मान के कारण एकलव्य ने बिना किसी संकोच के अपना अंगूठा काटकर अर्पित कर दिया।