06/06/2026
नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास भारत के गौरवशाली और स्वर्णिम अतीत का एक ऐसा प्रतीक है, जिसने पूरी दुनिया को ज्ञान की रोशनी दिखाई। यह दुनिया के सबसे पहले आवासीय (Residential) विश्वविद्यालयों में से एक था।
यहाँ नालंदा विश्वविद्यालय के इतिहास का एक विस्तृत और व्यवस्थित विवरण दिया गया है:
1. स्थापना और स्वर्ण काल (5वीं से 7वीं शताब्दी)
स्थापना: नालंदा की स्थापना 5वीं शताब्दी (लगभग 427 ईस्वी) में गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने की थी। इसके बाद आने वाले गुप्त राजाओं, कन्नौज के राजा हर्षवर्धन और पाल शासकों ने इसे लगातार संरक्षण दिया।
वैश्विक केंद्र: अपने चरम पर यहाँ 10,000 से अधिक छात्र और लगभग 2,000 शिक्षक रहते थे। यहाँ न केवल भारत, बल्कि चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, मंगोलिया, श्रीलंका और मध्य एशिया से लोग पढ़ने आते थे।
कठिन प्रवेश परीक्षा: नालंदा में दाखिला लेना आसान नहीं था। विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर 'द्वार पंडित' (Gatekeepers) कठिन परीक्षा लेते थे, और केवल 20-30% छात्र ही प्रवेश पा पाते थे।
निःशुल्क शिक्षा: यहाँ शिक्षा, रहना, खाना और दवाइयाँ सब कुछ पूरी तरह से मुफ्त था। इसका खर्च राजाओं और स्थानीय लोगों द्वारा दान किए गए 100 से अधिक गाँवों के राजस्व से चलता था।
2. समृद्ध पुस्तकालय: 'धर्मगंज'
नालंदा की सबसे बड़ी विशेषता उसका विशाल पुस्तकालय था, जिसे 'धर्मगंज' (सत्य का पर्वत) कहा जाता था। यह तीन बड़ी इमारतों में बंटा हुआ था:
रत्नोदधि (नौ मंजिला भव्य इमारत)
रत्नसागर
रत्नरंजक
यहाँ खगोल विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन, व्याकरण, तर्कशास्त्र और बौद्ध धर्म से जुड़ी लाखों दुर्लभ पांडुलिपियाँ (Manuscripts) मौजूद थीं।
3. पतन और विनाश (12वीं शताब्दी)
नालंदा का अंत इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक है:
बख्तियार खिलजी का आक्रमण: 1193 ईस्वी में तुर्क शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के सेनापति इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने नालंदा पर आक्रमण किया।
पुस्तकालय को आग लगाना: खिलजी ने यहाँ के भिक्षुओं और विद्वानों की सामूहिक हत्या कर दी और विशाल पुस्तकालय में आग लगा दी। ऐसा कहा जाता है कि पुस्तकालय में इतनी किताबें थीं कि वह तीन महीने तक जलती रहीं।
विनाश की वजह: खिलजी की इस बर्बरता के पीछे जलन, धार्मिक कट्टरता और भारत की ज्ञान परंपरा को नष्ट करने की मानसिकता थी। इस घटना ने प्राचीन
नालंदा विश्वविद्यालय का इतिहास भारत के गौरवशाली और स्वर्णिम अतीत का एक ऐसा प्रतीक है, जिसने पूरी दुनिया को ज्ञान की रोशनी दिखाई। यह दुनिया के सबसे पहले आवासीय (Residential) विश्वविद्यालयों में से एक था।
यहाँ नालंदा विश्वविद्यालय के इतिहास का एक विस्तृत और व्यवस्थित विवरण दिया गया है:
1. स्थापना और स्वर्ण काल (5वीं से 7वीं शताब्दी)
स्थापना: नालंदा की स्थापना 5वीं शताब्दी (लगभग 427 ईस्वी) में गुप्त वंश के सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने की थी। इसके बाद आने वाले गुप्त राजाओं, कन्नौज के राजा हर्षवर्धन और पाल शासकों ने इसे लगातार संरक्षण दिया।
वैश्विक केंद्र: अपने चरम पर यहाँ 10,000 से अधिक छात्र और लगभग 2,000 शिक्षक रहते थे। यहाँ न केवल भारत, बल्कि चीन, कोरिया, जापान, तिब्बत, मंगोलिया, श्रीलंका और मध्य एशिया से लोग पढ़ने आते थे।
कठिन प्रवेश परीक्षा: नालंदा में दाखिला लेना आसान नहीं था। विश्वविद्यालय के मुख्य द्वार पर 'द्वार पंडित' (Gatekeepers) कठिन परीक्षा लेते थे, और केवल 20-30% छात्र ही प्रवेश पा पाते थे।
निःशुल्क शिक्षा: यहाँ शिक्षा, रहना, खाना और दवाइयाँ सब कुछ पूरी तरह से मुफ्त था। इसका खर्च राजाओं और स्थानीय लोगों द्वारा दान किए गए 100 से अधिक गाँवों के राजस्व से चलता था।
2. समृद्ध पुस्तकालय: 'धर्मगंज'
नालंदा की सबसे बड़ी विशेषता उसका विशाल पुस्तकालय था, जिसे 'धर्मगंज' (सत्य का पर्वत) कहा जाता था। यह तीन बड़ी इमारतों में बंटा हुआ था:
रत्नोदधि (नौ मंजिला भव्य इमारत)
रत्नसागर
रत्नरंजक
यहाँ खगोल विज्ञान, चिकित्सा, दर्शन, व्याकरण, तर्कशास्त्र और बौद्ध धर्म से जुड़ी लाखों दुर्लभ पांडुलिपियाँ (Manuscripts) मौजूद थीं।
3. पतन और विनाश (12वीं शताब्दी)
नालंदा का अंत इतिहास की सबसे दुखद घटनाओं में से एक है:
बख्तियार खिलजी का आक्रमण: 1193 ईस्वी में तुर्क शासक कुतुबुद्दीन ऐबक के सेनापति इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने नालंदा पर आक्रमण किया।
पुस्तकालय को आग लगाना: खिलजी ने यहाँ के भिक्षुओं और विद्वानों की सामूहिक हत्या कर दी और विशाल पुस्तकालय में आग लगा दी। ऐसा कहा जाता है कि पुस्तकालय में इतनी किताबें थीं कि वह तीन महीने तक जलती रहीं।
विनाश की वजह: खिलजी की इस बर्बरता के पीछे जलन, धार्मिक कट्टरता और भारत की ज्ञान परंपरा को नष्ट करने की मानसिकता थी। इस घटना ने प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान की रीढ़ तोड़ दी।