विश्वंविष्णु -भागवतदर्शनआध्यात्मिक आमुखपटल

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विश्वंविष्णु -भागवतदर्शनआध्यात्मिक आमुखपटल आचार्य कीर्तिनारायण रामानुज वैष्णवदास

जय श्रीमन्नारायण मित्रों आत्मीय बंधुओं सुधी पाठकों
24/06/2026

जय श्रीमन्नारायण मित्रों आत्मीय बंधुओं सुधी पाठकों

हिन्दू कौन है ? "हिन्दू" शब्द की खोज -"हीनं दुष्यति इति हिन्दूः से हुई है।”अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे ...
24/06/2026

हिन्दू कौन है ?

"हिन्दू" शब्द की खोज -
"हीनं दुष्यति इति हिन्दूः से हुई है।”

अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।

'हिन्दू' शब्द, करोड़ों वर्ष प्राचीन, संस्कृत शब्द से है!

यदि संस्कृत के इस शब्द का सन्धि विछेदन करें तो पायेंगे ....

हीन+दू = हीन भावना + से दूर

अर्थात जो हीन भावना या दुर्भावना से दूर रहे, मुक्त रहे, वो हिन्दू है !

हमें बार-बार, सदा झूठ ही बतलाया जाता है कि हिन्दू शब्द मुगलों ने हमें दिया, जो "सिंधु" से "हिन्दू" हुआ l

हिन्दू शब्द की वेद से ही उत्पत्ति है !

जानिए, कहाँ से आया हिन्दू शब्द, और कैसे हुई इसकी उत्पत्ति ?

कुछ लोग यह कहते हैं कि हिन्दू शब्द सिंधु से बना है औऱ यह फारसी शब्द है। परंतु ऐसा कुछ नहीं है!
ये केवल झुठ फ़ैलाया जाता है।

हमारे "वेदों" और "पुराणों" में हिन्दू शब्द का उल्लेख मिलता है। आज हम आपको बता रहे हैं कि हमें हिन्दू शब्द कहाँ से मिला है!

"ऋग्वेद" के "ब्रहस्पति अग्यम" में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार आया हैं :-

“हिमालयं समारभ्य
यावद् इन्दुसरोवरं ।
तं देवनिर्मितं देशं
हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।"

अर्थात : हिमालय से इंदु सरोवर तक, देव निर्मित देश को हिंदुस्तान कहते हैं!

केवल "वेद" ही नहीं, बल्कि "शैव" ग्रन्थ में हिन्दू शब्द का उल्लेख इस प्रकार किया गया हैं:-

"हीनं च दूष्यतेव् हिन्दुरित्युच्च ते प्रिये ।”

अर्थात :- जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं!

इससे मिलता जुलता लगभग यही श्लोक "कल्पद्रुम" में भी दोहराया गया है :

"हीनं दुष्यति इति हिन्दूः।”

अर्थात जो अज्ञानता और हीनता का त्याग करे उसे हिन्दू कहते हैं।

"पारिजात हरण" में हिन्दू को कुछ इस प्रकार कहा गया है :-

”हिनस्ति तपसा पापां
दैहिकां दुष्टं ।
हेतिभिः श्त्रुवर्गं च
स हिन्दुर्भिधियते।”

अर्थात :- जो अपने तप से शत्रुओं का, दुष्टों का, और पाप का नाश कर देता है, वही हिन्दू है !

"माधव दिग्विजय" में भी हिन्दू शब्द को कुछ इस प्रकार उल्लेखित किया गया है :-

“ओंकारमन्त्रमूलाढ्य
पुनर्जन्म द्रढ़ाश्य:।
गौभक्तो भारत:
गरुर्हिन्दुर्हिंसन दूषकः।

अर्थात : वो जो "ओमकार" को ईश्वरीय धुन माने, कर्मों पर विश्वास करे, गौपालक रहे, तथा बुराइयों को दूर रखे, वो हिन्दू है!

केवल इतना ही नहीं, हमारे "ऋग्वेद" (8:2:41) में हिन्दू नाम के बहुत ही पराक्रमी और दानी राजा का वर्णन मिलता है, जिन्होंने 46,000 गौमाता दान में दी थी! और "ऋग्वेद मंडल" में भी उनका वर्णन मिलता है l

बुराइयों को दूर करने के लिए सतत प्रयासरत रहनेवाले, सनातन धर्म के पोषक व पालन करने वाले हिन्दू हैं।
" हिनस्तु दुरिताम "
जयतु जयतु हिन्दूराष्ट्रम्

जय श्रीमन्नारायण मित्रों।।
12/03/2026

जय श्रीमन्नारायण मित्रों।।

पीपल की पूजा क्यों और कैसे की जाती है ‘अश्वत्थ: पूजितो यत्र पूजिता: सर्वदेवता:’ अर्थात् पीपल वृक्ष की पूजा करने से समस्त...
12/03/2026

पीपल की पूजा क्यों और कैसे की जाती है

‘अश्वत्थ: पूजितो यत्र पूजिता: सर्वदेवता:’
अर्थात् पीपल वृक्ष की पूजा करने से समस्त देवता पूजित हो जाते हैं; इसीलिए हिन्दू धर्म में पीपल की पूजा अनादि काल से होती आई है ।

पीपल वृक्ष की पूजा क्यों की जाती है ?
पीपल भूलोक का कल्पवृक्ष है । इसकी हम कितनी भी पूजा करें; इसके उपकारों को मानव जाति भुला नहीं सकती है । दिव्य वृक्ष पीपल की पूजा इन कारणों से की जाती है—

प्राचीन काल में दैत्यों से पीड़ित देवता भगवान विष्णु की शरण में गए और उनसे प्रार्थना करते हुए कहा—‘भगवन् ! हम राक्षसों से पीड़ित हैं । हमारे दु:खों की शान्ति किस प्रकार हो सकती है ?’

तब भगवान विष्णु ने कहा—‘मैं अश्वत्थ वृक्ष के रूप में भूतल पर विद्यमान हूँ । तुम लोग अश्वत्थ वृक्ष की सेवा-पूजा करो ।’

माना जाता है कि पीपल के मूल में भगवान विष्णु, तने में केशव, शाखाओं में नारायण, पत्तों में श्रीहरि और फलों में सब देवताओं के साथ भगवान अच्युत सदा निवास करते हैं; इसलिए पीपल वृक्ष की पूजा की जाती है ।

पीपल वृक्ष को ‘अश्वत्थ’ भी कहते हैं।

श्रीमद्भगवद्गीता ( १०।२६) में भगवान श्रीकृष्ण पीपल वृक्ष को अपनी विभूति बताते हुए कहते हैं—‘अश्वत्थ: सर्ववृक्षाणाम्’ अर्थात् ‘मैं वृक्षों में पीपल हूँ ।’ भगवान श्रीकृष्ण का विभूतिस्वरूप होने के कारण पीपल दिव्य वृक्ष है; इसलिए इसकी पूजा की जाती है । श्रीकृष्ण की तरह यह संसार को कर्मयोग की शिक्षा देता है । पीपल के पत्ते तब भी हिलते रहते हैं, जब अन्य पेड़ों के पत्ते नहीं हिलते हैं । इसी कारण पीपल को ‘चल-पत्र’ भी कहते हैं । प्रकृति में एकमात्र यही वृक्ष है जो बराबर प्राणवायु ‘ऑक्सीजन’ छोड़ता रहता है; इसलिए यह पर्यावरण को निरन्तर शुद्ध करता रहता है ।

द्वापरयुग में परमधाम गमन से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण इस पवित्र अश्वत्थ वृक्ष के नीचे बैठ कर ध्यानावस्थित हुए थे; इसलिए मृत आत्मा की शान्ति के लिए पीपल वृक्ष के मूल में जल चढ़ाते हैं ।

पीपल के मूल (जड़) की सेवा (सीचने) से मनुष्य के पापों का नाश व सभी कामनाओं की पूर्ति होती है । वैशाख मास में पीपल वृक्ष को सींचने का महान फल बतलाया गया है । पीपल वृक्ष के नित्य दर्शन करने व प्रणाम करने से मनुष्य की धन-सम्पत्ति बढ़ती है और दीर्घायुष्य की प्राप्ति होती है ।

प्रत्येक मनुष्य की जन्मकुण्डली में कोई-न-कोई दोष अवश्य होता है । पूरी श्रद्धा और विश्वास के साथ पीपल की पूजा करने से कुण्डली के दोष—ग्रह पीड़ा, पितृदोष, कालसर्पयोग, विष योग आदि दूर हो जाते हैं ।

पीपल की सेवा प्रत्येक शनिवार करने से शनि देव प्रसन्न होते हैं । शनि की साढ़ेसाती और ढैया के प्रभाव से बचने के लिए हर शनिवार को व शनिश्चरी अमावस्या को पीपल वृक्ष की पूजा और 7 परिक्रमा करके काले तिल से युक्त सरसों के तेल के दीपक को जला कर छाया-दान करने से शनि की पीड़ा से मुक्ति मिलती है ।

पीपल से निरन्तर ऑक्सीजन का निकलना तथा पत्तों की मधुर आवाज एकाग्रचित्तता में सहायक होती है जो कि साधना की आवश्यक शर्त है । पीपल वृक्ष के आस-पास ही ऋषि-मुनि, ज्ञानी-ध्यानी रहते थे । अत: ऐसा माना जाता है कि पीपल ज्ञान प्रदान करने में सहायता करता है । भगवान बुद्ध को गया में पीपल वृक्ष के नीचे ही ज्ञान प्राप्त हुआ था ।

पीपल की छाया और पत्तों से छनी हुई हवा मानसिक चेतनता तथा स्फूर्ति प्रदान करती है। अत: यह नीरोग रखने में सहायता करता है ।

वेद में कहा गया है कि कुष्ठ से मुक्ति के लिए पीपल की उपासना करनी चाहिए

पीपल की पूजा विधि ...

पीपल की पूजा प्राय: शनिवार को की जाती है ।

शनिवार को प्रात:काल तेल का आड़ी बत्ती वाला दीपक जला कर पीपल वृक्ष के पास रखें।

फिर तांबे के लोटे में जल लेकर पीपल की जड़ में चढ़ाएं ।

जिस प्रकार भगवान विष्णु की उपासना की जाती है; उसी प्रकार नारायणमय पीपल वृक्ष को सफेद चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप व भोग अर्पित करना चाहिए ।

इसके बाद पीपल की पांच, सात या ग्यारह जितनी बार कर सकें, परिक्रमा करनी चाहिए।

फिर इस मंत्र से प्रार्थना करते हुए नमस्कार करे

अश्वत्थ सुमहाभाग सुभग प्रियदर्शन ।
इष्टकामांश्च मे देहि शत्रुभ्यस्तु पराभवम् ।।
आयु: प्रजां धनं धान्यं सौभाग्यं सर्वसम्पदम् ।
देहि देव महावृक्ष त्वामहं शरणं गत: ।। (अश्वत्थ स्तोत्र १८-१९)

अर्थात्—महाभाग अश्वत्थ ! आप सुन्दर तथा प्रियदर्शन हो । आप मेरी मनोकामनाओं को पूर्ण करें । मेरे काम आदि शत्रुओं को हराएं । मुझे दीर्घ आयु, संतान, धन-धान्य, सौभाग्य तथा सभी प्रकार का ऐश्वर्य प्रदान करें । हे महावृक्ष मैं आपकी शरण में हूँ ।

—अंत में पीपल की जड़ का स्पर्श कर मस्तक से हाथ लगाएं ।

—पीपल के नीचे बैठकर मंत्र जप करना स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक है ।

—जिस कन्या की कुण्डली में ‘वैधव्य योग’ हो उसे ‘अश्वत्थ व्रत’ का पालन करना चाहिए ।

—अनुष्ठान आदि में और विशेष पर्वों जैसे—सोमवती अमावस्या, वट सावित्री अमावस्या आदि में पीपल वृक्ष की सूत्र (कलावा) लपेटते हुए १०८ परिक्रमा की जाती हैं ।

पीपल वृक्ष लगाने का पुण्य

पीपल वृक्ष लगाने की बड़ी महिमा है । इसका पुण्य अक्षय होता है—

—ऐसा कहा जाता है कि जिस प्रकार मनुष्य पीपल की छाया में बैठ कर अत्यंत सुखी होता है, उसी प्रकार पीपल वृक्ष लगाने वाला मृत्यु के बाद परमात्मा के निकट निवास करता हुआ अत्यंत सुखी होता है । उसे न तो यमलोक की यंत्रणा सहनी पड़ती है और न ही दारुण संताप।

—इससे मनुष्य की वंश-परम्परा अक्षुण्ण रहती है और समस्त ऐश्वर्य और दीर्घायु की प्राप्ति होती है । यदि किसी शुभ दिन मनुष्य पीपल वृक्ष को लगा कर आठ वर्षों तक निरन्तर सींचे, उसका पुत्र के समान पालन करे, पूजन करे तो अक्षय लक्ष्मी की प्राप्ति होती है ।

—पीपल वृक्ष को लगाने वाले के पितृगण मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं ।

पीपल के वृक्ष को काटना है निषेध!

पीपल के वृक्ष को बिना प्रयोजन काटना अपने पितरों को काट देने के समान है । ऐसा करने से वंश की हानि होती है । यज्ञ आदि की समिधा के लिए इसको काटने पर कोई दोष नहीं लगता; बल्कि अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है । अगर कभी पीपल वृक्ष को हटाना या काटना पड़ जाए तो उसकी शास्त्रों में अलग से विधि दी गयी है ।

जय श्रीमन्नारायण।।
23/10/2025

जय श्रीमन्नारायण।।

06/09/2025
जय  #श्रीमन्नारायण।।*★★ पितृ-पक्ष - श्राद्ध *•• इस सृष्टि में हर चीज का अथवा प्राणी का जोड़ा है । जैसे - रात और दिन, अँधे...
06/09/2025

जय #श्रीमन्नारायण।।
*★★ पितृ-पक्ष - श्राद्ध *
•• इस सृष्टि में हर चीज का अथवा प्राणी का जोड़ा है । जैसे - रात और दिन, अँधेरा और उजाला, सफ़ेद और काला, अमीर और गरीब अथवा नर और नारी इत्यादि बहुत गिनवाये जा सकते हैं । सभी चीजें अपने जोड़े से सार्थक है अथवा एक-दूसरे के पूरक है । दोनों एक-दूसरे पर निर्भर होते हैं । इसी तरह दृश्य और अदृश्य जगत का भी जोड़ा है । दृश्य जगत वो है जो हमें दिखता है और अदृश्य जगत वो है जो हमें नहीं दिखता । ये भी एक-दूसरे पर निर्भर है और एक-दूसरे के पूरक हैं । पितृ-लोक भी अदृश्य-जगत का हिस्सा है और अपनी सक्रियता के लिये दृश्य जगत के श्राद्ध पर निर्भर है ।
•• धर्म ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध के सोलह दिनों में लोग अपने पितरों को जल देते हैं तथा उनकी मृत्युतिथि पर श्राद्ध करते हैं। ऐसी मान्यता है कि पितरों का ऋण श्राद्ध द्वारा चुकाया जाता है। वर्ष के किसी भी मास तथा तिथि में स्वर्गवासी हुए पितरों के लिए पितृपक्ष की उसी तिथि को श्राद्ध किया जाता है
•• पूर्णिमा पर देहांत होने से भाद्रपद शुक्ल पूर्णिमा को श्राद्ध करने का विधान है। इसी दिन से महालय (श्राद्ध) का प्रारंभ भी माना जाता है। श्राद्ध का अर्थ है श्रद्धा से जो कुछ दिया जाए। पितृपक्ष में श्राद्ध करने से पितृगण वर्षभर तक प्रसन्न रहते हैं। धर्म शास्त्रों में कहा गया है कि पितरों का पिण्ड दान करने वाला गृहस्थ दीर्घायु, पुत्र-पौत्रादि, यश, स्वर्ग, पुष्टि, बल, लक्ष्मी, पशु, सुख-साधन तथा धन-धान्य आदि की प्राप्ति करता है।
•• श्राद्ध में पितरों को आशा रहती है कि हमारे पुत्र-पौत्रादि हमें पिण्ड दान तथा तिलांजलि प्रदान कर संतुष्ट करेंगे। इसी आशा के साथ वे पितृलोक से पृथ्वीलोक पर आते हैं। यही कारण है कि हिंदू धर्म शास्त्रों में प्रत्येक हिंदू गृहस्थ को पितृपक्ष में श्राद्ध अवश्य रूप से करने के लिए कहा गया है।
•• श्राद्ध से जुड़ी कई ऐसी बातें हैं जो बहुत कम लोग जानते हैं। मगर ये बातें श्राद्ध करने से पूर्व जान लेना बहुत जरूरी है क्योंकि कई बार विधिपूर्वक श्राद्ध न करने से पितृ श्राप भी दे देते हैं। आज हम आपको श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष बातें बता रहे हैं, जो इस प्रकार हैं--

1- श्राद्धकर्म में गाय का घी, दूध या दही काम में लेना चाहिए। यह ध्यान रखें कि गाय को बच्चा हुए दस दिन से अधिक हो चुके हैं। दस दिन के अंदर बछड़े को जन्म देने वाली गाय के दूध का उपयोग श्राद्ध कर्म में नहीं करना चाहिए।
2- श्राद्ध में चांदी के बर्तनों का उपयोग व दान पुण्यदायक तो है ही राक्षसों का नाश करने वाला भी माना गया है। पितरों के लिए चांदी के बर्तन में सिर्फ पानी ही दिए जाए तो वह अक्षय तृप्तिकारक होता है। पितरों के लिए अर्घ्य, पिण्ड और भोजन के बर्तन भी चांदी के हों तो और भी श्रेष्ठ माना जाता है।
3- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाते समय परोसने के बर्तन दोनों हाथों से पकड़ कर लाने चाहिए, एक हाथ से लाए अन्न पात्र से परोसा हुआ भोजन राक्षस छीन लेते हैं।
4- ब्राह्मण को भोजन मौन रहकर एवं व्यंजनों की प्रशंसा किए बगैर करना चाहिए क्योंकि पितर तब तक ही भोजन ग्रहण करते हैं जब तक ब्राह्मण मौन रह कर भोजन करें।
5- जो पितृ शस्त्र आदि से मारे गए हों उनका श्राद्ध मुख्य तिथि के अतिरिक्त चतुर्दशी को भी करना चाहिए। इससे वे प्रसन्न होते हैं। श्राद्ध गुप्त रूप से करना चाहिए। पिंडदान पर साधारण या नीच मनुष्यों की दृष्टि पडने से वह पितरों को नहीं पहुंचता।
6- श्राद्ध में ब्राह्मण को भोजन करवाना आवश्यक है, जो व्यक्ति बिना ब्राह्मण के श्राद्ध कर्म करता है, उसके घर में पितर भोजन नहीं करते, श्राप देकर लौट जाते हैं। ब्राह्मण हीन श्राद्ध से मनुष्य महापापी होता है।
7- श्राद्ध में जौ, कांगनी, मटरसरसों का उपयोग श्रेष्ठ रहता है। तिल की मात्रा अधिक होने पर श्राद्ध अक्षय हो जाता है। वास्तव में तिल पिशाचों से श्राद्ध की रक्षा करते हैं। कुशा (एक प्रकार की घास) राक्षसों से बचाते हैं।
8- दूसरे की भूमि पर श्राद्ध नहीं करना चाहिए। वन, पर्वत, पुण्यतीर्थ एवं मंदिर दूसरे की भूमि नहीं माने जाते क्योंकि इन पर किसी का स्वामित्व नहीं माना गया है। अत: इन स्थानों पर श्राद्ध किया जा सकता है।
9- चाहे मनुष्य देवकार्य में ब्राह्मण का चयन करते समय न सोचे, लेकिन पितृ कार्य में योग्य ब्राह्मण का ही चयन करना चाहिए क्योंकि श्राद्ध में पितरों की तृप्ति ब्राह्मणों द्वारा ही होती है।
10- जो व्यक्ति किसी कारणवश एक ही नगर में रहनी वाली अपनी बहिन, जमाई और भानजे को श्राद्ध में भोजन नहीं कराता, उसके यहां पितर के साथ ही देवता भी अन्न ग्रहण नहीं करते।
11- श्राद्ध करते समय यदि कोई भिखारी आ जाए तो उसे आदरपूर्वक भोजन करवाना चाहिए। जो व्यक्ति ऐसे समय में घर आए याचक को भगा देता है उसका श्राद्ध कर्म पूर्ण नहीं माना जाता और उसका फल भी नष्ट हो जाता है।
12- शुक्लपक्ष में, रात्रि में, युग्म दिनों (एक ही दिन दो तिथियों का योग)में तथा अपने जन्मदिन पर कभी श्राद्ध नहीं करना चाहिए। धर्म ग्रंथों के अनुसार सायंकाल का समय राक्षसों के लिए होता है, यह समय सभी कार्यों के लिए निंदित है। अत: शाम के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए।
13- श्राद्ध में प्रसन्न पितृगण मनुष्यों को पुत्र, धन, विद्या, आयु, आरोग्य, लौकिक सुख, मोक्ष और स्वर्ग प्रदान करते हैं। श्राद्ध के लिए शुक्लपक्ष की अपेक्षा कृष्णपक्ष श्रेष्ठ माना गया है।
14- रात्रि को राक्षसी समय माना गया है। अत: रात में श्राद्ध कर्म नहीं करना चाहिए। दोनों संध्याओं के समय भी श्राद्धकर्म नहीं करना चाहिए। दिन के आठवें मुहूर्त (कुतपकाल) में पितरों के लिए दिया गया दान अक्षय होता है।
15- श्राद्ध में ये चीजें होना महत्वपूर्ण हैं- गंगाजल, दूध, शहद, दौहित्र, कुश और तिल। केले के पत्ते पर श्राद्ध भोजन निषेध है। सोने, चांदी, कांसे, तांबे के पात्र उत्तम हैं। इनके अभाव में पत्तल उपयोग की जा सकती है।
16- तुलसी से पितृगण प्रसन्न होते हैं। ऐसी धार्मिक मान्यता है कि पितृगण गरुड़ पर सवार होकर विष्णु लोक को चले जाते हैं। तुलसी से पिंड की पूजा करने से पितर लोग प्रलयकाल तक संतुष्ट रहते हैं।
17- रेशमी, कंबल, ऊन, लकड़ी, तृण, पर्ण, कुश आदि के आसन श्रेष्ठ हैं। आसन में लोहा किसी भी रूप में प्रयुक्त नहीं होना चाहिए।
18- चना, मसूर, उड़द, कुलथी, सत्तू, मूली, काला जीरा, कचनार, खीरा, काला उड़द, काला नमक, लौकी, बड़ी सरसों, काले सरसों की पत्ती और बासी, अपवित्र फल या अन्न श्राद्ध में निषेध हैं।
19- भविष्य पुराण के अनुसार श्राद्ध 12 प्रकार के होते हैं, जो इस प्रकार हैं-
1- नित्य, 2- नैमित्तिक, 3- काम्य, 4- वृद्धि, 5- सपिण्डन, 6- पार्वण, 7- गोष्ठी, 8- शुद्धर्थ, 9- कर्मांग, 10- दैविक, 11- यात्रार्थ, 12- पुष्टयर्थ
20- श्राद्ध के प्रमुख अंग इस प्रकार :
तर्पण- इसमें दूध, तिल, कुशा, पुष्प, गंध मिश्रित जल पितरों को तृप्त करने हेतु दिया जाता है। श्राद्ध पक्ष में इसे नित्य करने का विधान है।
भोजन व पिण्ड दान-- पितरों के निमित्त ब्राह्मणों को भोजन दिया जाता है। श्राद्ध करते समय चावल या जौ के पिण्ड दान भी किए जाते हैं।
वस्त्रदान-- वस्त्र दान देना श्राद्ध का मुख्य लक्ष्य भी है।
दक्षिणा दान-- यज्ञ की पत्नी दक्षिणा है जब तक भोजन कराकर वस्त्र और दक्षिणा नहीं दी जाती उसका फल नहीं मिलता।
21 - श्राद्ध तिथि के पूर्व ही यथाशक्ति विद्वान ब्राह्मणों को भोजन के लिए बुलावा दें। श्राद्ध के दिन भोजन के लिए आए ब्राह्मणों को दक्षिण दिशा में बैठाएं।
22- पितरों की पसंद का भोजन दूध, दही, घी और शहद के साथ अन्न से बनाए गए पकवान जैसे खीर आदि है। इसलिए ब्राह्मणों को ऐसे भोजन कराने का विशेष ध्यान रखें।
23- तैयार भोजन में से गाय, कुत्ते, कौए, देवता और चींटी के लिए थोड़ा सा भाग निकालें। इसके बाद हाथ जल, अक्षत यानी चावल, चन्दन, फूल और तिल लेकर ब्राह्मणों से संकल्प लें।
24- कुत्ते और कौए के निमित्त निकाला भोजन कुत्ते और कौए को ही कराएं किंतु देवता और चींटी का भोजन गाय को खिला सकते हैं। इसके बाद ही ब्राह्मणों को भोजन कराएं। पूरी तृप्ति से भोजन कराने के बाद ब्राह्मणों के मस्तक पर तिलक लगाकर यथाशक्ति कपड़े, अन्न और दक्षिणा दान कर आशीर्वाद पाएं।
25- ब्राह्मणों को भोजन के बाद घर के द्वार तक पूरे सम्मान के साथ विदा करके आएं। क्योंकि ऐसा माना जाता है कि ब्राह्मणों के साथ-साथ पितर लोग भी चलते हैं। ब्राह्मणों के भोजन के बाद ही अपने परिजनों, दोस्तों और रिश्तेदारों को भोजन कराएं।
26- पिता का श्राद्ध पुत्र को ही करना चाहिए। पुत्र के न होने पर पत्नी श्राद्ध कर सकती है। पत्नी न होने पर सगा भाई और उसके भी अभाव में सपिंडो (परिवार के) को श्राद्ध करना चाहिए । एक से अधिक पुत्र होने पर सबसे बड़ा पुत्र श्राध्दकर्म करें या सबसे छोटा

मनुष्यजीवने अस्माभिः आर्जनीयाः बहवो गुणाः सन्ति। तेषु गुणेषु दया, स्नेहः, क्षमा, धीरता, मैत्री, नीतिबोधः इत्यादयः प्रमुख...
22/04/2025

मनुष्यजीवने अस्माभिः आर्जनीयाः बहवो गुणाः सन्ति। तेषु गुणेषु दया, स्नेहः, क्षमा, धीरता, मैत्री, नीतिबोधः इत्यादयः प्रमुखाः भवन्ति। इमे गुणाः मानवं संस्कुर्वन्ति। तदा एव मानवः वसुधैव कुटुम्बकम् इति भावनामाप्नोति ।
In human life, we must cultivate many virtues. Among these virtues, compassion, love, forgiveness, patience, friendship, and moral wisdom are the most important. These virtues refine a human being. Only then does a person attain the feeling of '*Vasudhaiva Kutumbakam*' (the world as one family)."
विश्वमखिलं जेतुमचिरात्
मित्रकाणि यतामहै।
विश्वसोदरभावनां हृदि
शाश्वतं कलयाम रे।।
आर्जनीयाः – To be acquired / to be cultivated
विश्वम् – The universe
संस्कुर्वन्ति। – Refine / cultivate
अखिलम् – Entire
नीतिबोधः – Moral wisdom / ethical understanding
जेतुम् – To conquer
अचिरात् – Soon
मित्रकाणि – Friendships
यतामहै – Let us strive
विश्वसोदरभावनाम् – The feeling of universal brotherhood (विश्व - world, सोदर - brother, भावना - sentiment/feeling)
हृदि – In the heart
शाश्वतम् – everlasting
कलयाम – Let us cultivate
रे – O (a form of calling someone with affection or encouragement)
अन्वयः
अचिरात् विश्वम् अखिलं जेतुम्, वयम् मित्रकाणि यतामहै। हृदि विश्वसोदरभावनां शाश्वतं कलयाम रे।
In order to conquer the whole world soon, let us strive to form bonds of friendship. Let us cultivate the eternal feeling of universal brotherhood in our hearts, O dear ones!

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