18/10/2021
जब इस देश की जनता को खुद इन नेताओं के पास जाकर जाकर अपनी समस्याओं को बताना पडता है तब भी उसकी सुनवाई नहीं होती ना ही समाधान होता है तो क्या मतलब इतने गधों और नीलशृंगालों को इतने पदों पर आसीन करने की???
मैं तो आजतक नहीं समझ पाया हूं कि इस देश के इस सिस्टम का मतलब क्या है?
वास्तव में इस देश के सिस्टम को चलाने के लिए कोई सिस्टम ही नहीं है...
जिसतरह से ये नेता लोग विधायक सांसद लोग मंत्री लोग चुनाव के समय वोट मांगने के लिए सडक पर आ जाते हैं...
वैसे चुनाव के बाद नजर नहीं आते...
कुम्भ मेले के बाद नागा साधु तो फिर भी नजर आ जाते हैं?
पर चुनाव समाप्ति के बाद पता नहीं ये नेता लोग कौन से पर्वत की कन्दराओं में या स्वर्ग के परिजात वृक्ष के पास चले जाते हैं कि फिर ये वापस आने का मन नहीं करते...
अगर जिस प्रकार ये चुनाव के समय व्यक्ति के दरवाजे गरवाजे जाकर वोट मांगते हैं उस प्रकार अगर चुनाव के बाद भी इसी तरह हफ्ते में एक एक दिन भी , अपने शहर नगर मुहल्लों में लोगों से मिलकर ये जानने का प्रयास करें कि आपके मुहल्ले या शहर का फलाना काम पूरा हुआ या नहीं?
आपकी क्या समस्या है? आपकी बेटी का एडमिशन हो जायेगा चिन्ता मत कीजिए.. तो यकीन मानिए करोडों रूपये बर्बाद करके इनको चुनावी रैलियां निकालकर लम्बे चौडे भाषण या वादे करने की आवश्यकता नहीं पडती (पडेगी)...
पर ये यह सब तो करते नहीं...
हां...ं
तो ..क्या मतलब है इतने प्रधान, सचिव, सांसद, विधायक, बीडीओ, जिला धिकारी, इत्यादि पद बनाकर इतने खच्चोरो को भरने की? जब इन सबसे मिलकर भी एक जिले१का भी काम ठीक से नहीं होता...
एक जिला छोडिये एक गांव..
गांव जिला... देश और शहरों के विकास के बदले केवल इन नेताओं की सम्पत्ति का ही विकास क्यों होता है?
अगर इस देश की राजशाही का वास्तव में अन्त हो गया है और प्रदातन्त्र हो गया तो आजादी के इतने दशकों बाद भी क्यों प्रजा परेशान और लाचार है?
क्यों हजारों लोग जिनको एक वक्त का खाना खाकर ही सोना पडता है?
और इन सबके विपरीत क्यों सत्ता में बे
बैठे लोग और ताकतवर और समृद्ध हो जाते हैं?
ये सब हो रहा है क्योंकि इस देश की जनता को आदत हो गई है गुलामी की... फिर चाहे वो मानसिक हो या शारीरिक.. .. सब काम हो जाएं अगर ये अपना दायित्व ठीक तरह से इमानदारी और मानवता के साथ निभायें..
जारी है.....