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18/04/2022

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ये चल क्या रहा है इस देश में... कहीं कोई दंगा हो जाता है तो .. हमारी शोभायात्रा और त्योहार मनाने को मना कर दिया जाता है ... ...

08/04/2022

#नवरात्रि ॐ नमश्चन्डिकायै

16/03/2022
09/01/2022

संस्कृत से इतनी दिक्कत क्यों है?
परम्परागत संस्कृत पढने वाले विद्यार्थी जहां भी रोजगार के लिए जाते हैं उनकी डिग्री अमान्य घोषित किया जा रहा है.. ऐसा क्यों भाई? संस्कृत से इतनी दिक्कत क्यों है?
एक मदरसा में पढने वाला कोई व्यक्ति धर्मगुरू बन सकता है..
लेकिन एक परम्परागत संस्कृत पढकर शास्त्री या आचार्य की डिग्री प्राप्त करने वाला विद्यार्थी धर्मगुरू या सेना में भर्ती नहीं हो सकता... ये नया नियम रक्षा विभाग और सेना ने निकाला है... जबकि इसी देश की केन्द्र और राज्य सरकारों ने संस्कृत के नाम पर विश्वविद्यालय खोल रखे हैं.. तो क्या वहां से पढा लिखा व्यक्ति अमान्य है... उसे आप अनपढ घोषित कर देंगे.. ये केवल साजिस हे और कुछ नहीं हमारा धर्म और हमारी संस्कृति नष्ट करने के लिए... और ये साजिस आज से नहीं बहुत पहले से की जा रही है... आजादी के बाद जिस तरह से हमारे देश में केवल मुस्लिम तुष्टिकरण का ही कार्य हुआ है.. वह किसी से छुपा नहीं है... इस देश का इतिहास के लेखन का कार्य परम लेफेचिस्च के हाथों में रहा तो वहीं ज्यादातर शिक्षामंत्री मुस्लिम रहे... फिर आप क्या ही उम्मीद कर सकते हैं... खैर पिछली बातों को फिलहाल के लिए एक तरफ रख दें और वर्तमान में देखें तो जो कार्य इस देश की सरकारें और जिम्मेदार लोग कर रहे हैं उसे देख कर आंखों से खून निकल आता है.. समाज की इस बुद्ध्हीनता पर कहने के लिए हमें शब्द नहीं मिलते...
हम कहां तक संघर्ष करते रहेंगे... अपने अस्तित्व के लिए .. अपनी संस्कृति के लिए... वो भी तब जब इस देशकी सरकारें तथाकथित सर्वधर्म समभाव का ढिंढोरा पीटती हैं... अपने वोटबैंक को आकर्षित करने के लिए... धर्म की जयजयकार तो करेंगे... आप दिखावा भी करेंगे कि मैं पक्का सनातनी हूं.. पर हकीकत कुछ और ही होती है... आप कब तक हमारी आंखों में धूल झोंकने का कार्य करते रहेंगे...
आपके संस्कृत जगत के लिए किये गये सारे कार्य छलावा मात्र हैं... कई विद्यालयों और विश्वविद्यालयों के शिक्षकों को कई महीने सालों से वेतन भी प्राप्त नहीं हुआ.. सैकडों संस्कृत विद्यालय केवल शासकीय संरक्षण के अभाव और उपेक्षा के कारण नष्ट हो चुके हैं... ...
जब आप किसी से किसी की भाषा छीन लेते हैं तब आप उससे सब कुछ छीन लेते हैं।
और संस्कृत जो कि हमारी भारतीय सनातन संस्कृति एवं ज्ञान का मूल आधार है नींव है, उसको नष्ट करके हमारे ज्ञान एवं संस्कृति को नष्ट करने का षडयंत्र कर रहे हैं।
याद कीजिये श्रीलंका में क्या हुआ था.. जब वहां के सम्पूर्ण निवासियों पर केवल सिंहली भाषा को थोप दिया था.. जिसका विरोध वहां के अल्पसंख्यक तमिलभाषियौं ने किया था। जो श्रीलंका में गृहयुद्ध का कारण बना था।

कई लोगों को यह सरकारों के संस्कृतविरोधी कार्य आश्चार्यचकित करते होंगे किन्तु मुझे नहीं... क्योंकि मुझे ज्ञात है कि इनकी यही वास्तविकता है । ये हमसे हमारी संस्कृति के मूल को छीन रहे हैं.. क्योंकि भले ही हमें आजादी मिल गई हो पर हमारी संस्कृति को नष्ट करने का ख्वाब देखने वाली विचारधारायें अभी भी इस देश में फलफूल रही हैं...
और कई संवैधानिक पदों पर मजबूती से कायम हैं.. एवं उसी का आज यह परिणाम उपस्थित हुआ है ... कि कई सरकारी गैर सरकारी पदों के लिए एवं सेना में हमारी शास्त्री एवं आचार्य की डिग्री अमान्य की गई है...
तब मेरा विश्वास और गहरा हो जाता है कि या तो शासन प्रशासन में बैठे लोग हमारी संस्कृति और सभ्यता के बारे में किंचित् मात्र भी ज्ञान नहीं ऱखते या फिर वो वास्तव में धर्मविरोधी हैं और केवल षडयंत्र कर रहे हैं।
जब कोई पाश्चात्य विद्वान संस्कृत में धाराप्रवाह संवाद करता है तो इस देश के लोगों को बडा गर्व होता है... तीव्रगति से सोशल मीडिया में उनके चलचित्र प्रसारित हो जाते हैं...
और भव्य टीका टिप्पणियों की प्रतिस्पर्धा प्रारम्भ हो जाती है.... मुझे गर्व होता है अपनी सनातन संस्कृति पर... देखो कितनी प्राचीन और उन्नत है हमारी संस्कृत भाषा जिसको विदेशी भी ग्रहण कर रहेे हैं.. ऐसे ऐसे मनतव्य हमारे देशवास्यों के मन के उद्गार व्यक्त होते हैं..
वहीं इन महानुभावों से कोई दो चार श्लोकों का अर्थ ही पूछ लो तो अपनी दंतपंक्तियां प्रदर्शित कर देंगे....
अरे इनसे शुद्ध हिन्दी में ही वार्तालाप आरम्भ करेंगे तो ये छद्मवेशी जीव थोडी देर तक शब्दों के अर्थ का अन्वेषण करते हुए दीख जायेंगे।।।
तब मुझे एक हिंदी के प्रसिद्ध कवि की पंक्तियां स्मरण हो आती हैं ..
कि सर्वसु लिए जात अॉगरेज।
हम केवल लेक्चर के तेजे।।
लिखने को तो बहुत लिख सकता हूं पर समय व्यर्थ करने सेे क्या लाभ.. मेरे मित्र बगल में अध्ययन कर रहे हैं और मैं यहां
निरर्थक प्रयास कर रहा हूं.. यह तभी सार्थक है जब आप भी हमारा सहयोग करें...
मैं तो बातों से अपनी बात का सार स्पष्ट करूंगा..
कि
यद्यपि अंगरेजी पढि पढि कै, सब गुन होत प्रवीण ।
पै निज भाषा ज्ञान बिनु रहत हीन के हीन।।
भारतस्य प्रतिष्ठद्वयं संस्कृतं संस्कृतिस्तथा।।


जारी....

-----ब्रजकिशोर

जर्रे जर्रे में निशां तेरा 🙏🙏🚩🚩
01/11/2021

जर्रे जर्रे में निशां तेरा 🙏🙏🚩🚩

18/10/2021

जब इस देश की जनता को खुद इन नेताओं के पास जाकर जाकर अपनी समस्याओं को बताना पडता है तब भी उसकी सुनवाई नहीं होती ना ही समाधान होता है तो क्या मतलब इतने गधों और नीलशृंगालों को इतने पदों पर आसीन करने की???
मैं तो आजतक नहीं समझ पाया हूं कि इस देश के इस सिस्टम का मतलब क्या है?
वास्तव में इस देश के सिस्टम को चलाने के लिए कोई सिस्टम ही नहीं है...
जिसतरह से ये नेता लोग विधायक सांसद लोग मंत्री लोग चुनाव के समय वोट मांगने के लिए सडक पर आ जाते हैं...
वैसे चुनाव के बाद नजर नहीं आते...
कुम्भ मेले के बाद नागा साधु तो फिर भी नजर आ जाते हैं?
पर चुनाव समाप्ति के बाद पता नहीं ये नेता लोग कौन से पर्वत की कन्दराओं में या स्वर्ग के परिजात वृक्ष के पास चले जाते हैं कि फिर ये वापस आने का मन नहीं करते...
अगर जिस प्रकार ये चुनाव के समय व्यक्ति के दरवाजे गरवाजे जाकर वोट मांगते हैं उस प्रकार अगर चुनाव के बाद भी इसी तरह हफ्ते में एक एक दिन भी , अपने शहर नगर मुहल्लों में लोगों से मिलकर ये जानने का प्रयास करें कि आपके मुहल्ले या शहर का फलाना काम पूरा हुआ या नहीं?
आपकी क्या समस्या है? आपकी बेटी का एडमिशन हो जायेगा चिन्ता मत कीजिए.. तो यकीन मानिए करोडों रूपये बर्बाद करके इनको चुनावी रैलियां निकालकर लम्बे चौडे भाषण या वादे करने की आवश्यकता नहीं पडती (पडेगी)...

पर ये यह सब तो करते नहीं...
हां...ं
तो ..क्या मतलब है इतने प्रधान, सचिव, सांसद, विधायक, बीडीओ, जिला धिकारी, इत्यादि पद बनाकर इतने खच्चोरो को भरने की? जब इन सबसे मिलकर भी एक जिले१का भी काम ठीक से नहीं होता...
एक जिला छोडिये एक गांव..
गांव जिला... देश और शहरों के विकास के बदले केवल इन नेताओं की सम्पत्ति का ही विकास क्यों होता है?
अगर इस देश की राजशाही का वास्तव में अन्त हो गया है और प्रदातन्त्र हो गया तो आजादी के इतने दशकों बाद भी क्यों प्रजा परेशान और लाचार है?
क्यों हजारों लोग जिनको एक वक्त का खाना खाकर ही सोना पडता है?
और इन सबके विपरीत क्यों सत्ता में बे
बैठे लोग और ताकतवर और समृद्ध हो जाते हैं?
ये सब हो रहा है क्योंकि इस देश की जनता को आदत हो गई है गुलामी की... फिर चाहे वो मानसिक हो या शारीरिक.. .. सब काम हो जाएं अगर ये अपना दायित्व ठीक तरह से इमानदारी और मानवता के साथ निभायें..

जारी है.....

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