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27/02/2022
Happy Mothers DayA Painting by me....
09/05/2021

Happy Mothers Day
A Painting by me....

बंगाल में चल रहे नग्न खेल से व्यथित हु!"बंगाल में काली छाया"अपने अपवित्र पैर पसारते जा रही हैं।बंगाल की व्यथा पे आधारित ...
05/05/2021

बंगाल में चल रहे नग्न खेल से व्यथित हु!"बंगाल में काली छाया"अपने अपवित्र पैर पसारते जा रही हैं।बंगाल की व्यथा पे आधारित मेरी एक रचना :

मनुष्यता खो रही हैं !..........

(१)

नियति

आधुनिकता के निरंतर कृष्ण प्रवाह में,
कण-कण गंगा मैया मैली हो रही है,
क्षण-क्षण प्रकृति विहल रो रही है,
रे मन ! आज फिर, मनुष्यता खो रही हैI


चारों तरफ शोर है; राहें सभी अंधी है,
'बाहर कुछ भीतर कुछ' मृत जीवन है ,
जन-जन की आत्मा अंतिम साँस ले रही है,
रे मन ! आज फिर, मनुष्यता खो रही हैI

इन जंगलों में अजगरों का काला साया है,
आहट सुन कँपकँपाती कोमल काया है,
पग-पग पशुता नग्न खेल, खेल रही है;
रे मन ! आज फिर, मनुष्यता खो रही हैI

दानव बन मानव घोटे खुद का गला है,
क्या नीति ? क्या अनीति ? बुने कैसा यह जाला है,
घर-घर काली छाया काले बीज बो रही है;
रे मन ! आज फिर, मनुष्यता खो रही हैI

पशु और मनुष्य का एक हो रहा चेहरा है,
मनुजता के गहनों को हमने जो तोड़ा है,
पल-पल मानवता सिसकियाँ ले रही है;
रे मन ! आज फिर, मनुष्यता खो रही हैI

(२)

निर्धार

रे मन!बबूल में कभी मिठे फल नहीं लगते है!
निःसत्व मरुभूमी में कभी बीज नहीं उगते है!
माँस, रक्त के प्यासे दैत्य; दुग्ध नही पीते हैं !
अँधकार में लिप्त जिव; प्रकाश में नहीं जिते हैं!

रे मन!कुविचारों का सामना तुम कदयपि---
कोमल,पवित्र, सुविचारो से नहीं कर सकते !
असंस्कृत, हिंस्र, निशाचर दैत्यों का हृदय तुम
संस्कृति के पावन जल से नहीं भर सकते !

रे मन!"काली छाया" अपने पैर पसार रही हैं!
निष्पाप, निर्बल, अबलाओं का पी कर रक्त
घूँट-घूँट,अपनी "राक्षसी तृष्णा"मिटा रही हैं !
"माँ-माटी-मानुष"का कर्ज आज चुका रही हैं !

रे मन!सुन कोमल तनुओं कीअसहाय पुकार
हो महाकाल घोर अँधकार तुम्हे मिटाना है !
इतिहास साक्षी है;हर युग की यह अमर,प्रेरक
चली आ रही, जाज्वल्य, प्रेरक गाथा हैं -----
मानवता, धर्म,संस्कृति, प्रकृति की रक्षा हेतू
धारण कर शस्त्र करों मे देवो ने दानवों का
हर एक युग मे सुनिश्चित संहार ही किया हैं!

©कवि:उमेश नारायण चव्हाण "उमेशचंद्र"
संपर्क:७०३८१२९६५६
पता:
मानस कॉम्प्लेक्स, ए-२०१,
अमराई,कर्जत,तहसील-कर्जत
जि. रायगढ़, महाराष्ट्र-४१०२०१.

04/05/2021
01/05/2021

महान पथ

हे प्रिय पथिक;तुम अपना पवित्र पथ भूल चुके हो!
अपने मनुष्य होने के सारे संदर्भ जैसे खो चुके हो !
कुटिल, कृत्रिम,विचित्र विचारधाराओं की दलदल में;
तुम असहाय पशू की तरह आकंठ जो धस चुके हो!
महान, चिरंतन, पवित्र लक्ष्य से तुम भटक चुके हो!

हे प्रिय पथिक !
क्या कभी पूत बन कपूत अपनी जननी को कही छलता है?
निज विफलता का दोष, कुकर्मों का काला मल माँ माथे मलता है?
देख जरा प्रकृति का हृदय; संताप से कैसे पल-पल जलता है!
देख 'चरित्र अपने पुत्र'का;मन उसका क्षण-क्षण विव्हल रोता है!

हे प्रिय पथिक !
संध्या की निर्मोही, निरलस, निर्मल, निरवता की धारा में;
उषा के मंगलमय तुदीन कोमल, मृदु, मनमोही मौन में----
माता की करून युग पीड़ा को तुम्हें पुनः ध्यानपूर्वक सुनना है!
अपने सुपुत्र होने के दायित्व को जीवनभर जो निभाना है!
जन-जन के मन में जन्म लेती विकृति के काले बिजों को;
संस्कृति के पावन प्रेम जल से कर शुद्ध पुनः जो बोना है!

हे प्रिय पथिक !
'असत्य को मान सत्य' तुमने, प्रकृति चक्र को पल-पल छला हैं!
सत्यता के अलख अलंकारों को, तुमने तार-तार कर तोड़ा है!
वटवृक्ष की जिस पवित्र शाख पें तुम बैठें हो, उसीको तुमने काटा हौ!
मातृ-द्रोही, मानव-द्रोही विचारधारा ने तुम्हें विनाश की ओर मोड़ा हैं!

हे प्रिय पथिक !
हे मेरे मित्र; तुम भूल चुके हो,जीवन का एक महानतम सूत्र है!
नित्य, निर्विघ्न जीवनधारा की गती का एक महानतम तंत्र है!
छाँट कर अपनी संवेदनाओं की जड़ो को मनुष्य आज एक यंत्र है!
'पवित्र प्रकृति, पावन संस्कृति की रक्षा करो'यही सनातन महामंत्र है!

हे प्रिय पथिक !
वन, उपवन, जीवों के निवास तुमनें एक-एक कर सब उजाड़ डालें!
विशुद्ध, निर्मल धाराओके कंठ निर्लज्जता से निरुद्ध कर डाले!
दे तिलांजली करुणा को;कर 'अभक्ष्य का भक्षण'आज तुमनें----
महाविनाश के सारे सुप्त महाद्वार एक-एक कर खोल डाले!
ज्ञात हो;जीवनदायी प्राणवायु के बिना यह जीवन हे निःसार!
पीपल, बरगद, बेल, आम, निम काट कर रचा तुमनें कैसा घृणित संसार!

हे प्रिय पथिक !
कोलाहल चहूँ ओर है; हर व्यक्ति परायो से,अपनो से----
निज छाया से, अपनी साँसों से अजीब सा भयभीत हैं!
आधुनिकता की अघोरी दौड़ में; श्रेष्ठता,सत्ता के उग्र मद में
अब मनुष्य नरभक्षी विकराल मायावी दानव बन गया है!
रक्त पिशाची विचारधाराओं के विचित्र, कृत्रिम विलाप के-
अजगरी चक्रवात में मनुष्य आज मतिभ्रष्ट,अंध हो गया है!
हे प्रिय पथिक ! क्या यही तुम्हारा सुफल, श्रेष्ठ जीवन है ?

हे प्रिय पथिक !
अधिकारों की निरंतर मांग से तुम्हें;
मिलता केवल निरंतर संताप ही हैं !
कर्तव्यों के निरंतर बोध से मिटता;
निरंतर निश्चित तुम्हारा अभिशाप है!
घर-घर काले पैर पसारती काली छाया को तुम्हें मिटाना हैं!
क्षण-क्षण बुझते दीपक तुम्हें आज पुनः एक-एक जलाना हैं!

हे प्रिय पथिक !
दश दिशाओँ में आज पुनः महान मंगलध्वनि गूँजने दो!
नगर-नगर,घर-घर 'दीव्य औषधियों का पवित्र यज्ञ'सजने दो!
शिव की जटाओं से बहती पावन ज्ञान गंगा को विरल बहने दो!
'शिव-शक्ति के एकत्व'का डमरु नाद, धरती से अंबर तक उठने दो!

हे प्रिय पथिक !
खंडित, भग्न, निद्रिस्त शिवालयों में ;
पुनः शिवज्ञान का लगे शुद्ध महाभोग!
वन-उपवन,घट-घट,तन-मन में आज---
पुनः जागे महाकाल का वह महाजोग!
तभी तो जन-जन के जीवन में नित्य---
जागेगा'सत्यम शिवम सुंदरम'जीवन योग!
निश्चित ही तब मिटेगा घोर अँधकार, भ्रम
और विकराल संक्रामक महाहठी हर रोग!

हे प्रिय पथिक !
तुम अमृत के पुत्र हो ! हो महाकाल हालाहल को पीना है!
महान हिमाद्री तुंग से गूँजति अविनाशी स्वरधारा को साधना हैं!
मनुष्य होने के सारे संदर्भों को तुम्हें प्रयत्नरत हो आज---
पुनः प्राप्त करना है!महान पथ की ओर बढ़ते जाना है !
धर्म, संस्कृति, प्रकृति, मानवता का महान गान गाना हैं !
हे प्रिय पथिक!महान सत्य पथ की ओर अग्रसर होंना है!

©कवि:उमेश नारायण चव्हाण
संपर्क:७०३८१२९६५६
ईमेल:[email protected]

प्रेमवेडी                                 हे सहस्त्ररश्मी                                 आवर ते-----                   ...
25/04/2021

प्रेमवेडी

हे सहस्त्ररश्मी
आवर ते-----
अतिनील किरण;
नकोस असा ग्रासू
श्वास पृथेचे .
भेदलेस तू रे
निलशरांनी----
"ओझोन हृदय"!
आणि तरीही--
प्रेमवेडी ही पृथा
करिते तुझेच पूजन
अंतरी नित्य निष्ठेने!

●सन:२००३

©कवी:उमेश नारायण चव्हाण
संपर्क:७०३८१२९६५६
ई-मेल:[email protected]

मुखवटा                 हा प्रत्येक चेहरा अनोळखी; वाटतो आहे!                 चेहऱ्यामागचा ओळखीचा; वाटतो आहे !            ...
22/04/2021

मुखवटा

हा प्रत्येक चेहरा अनोळखी; वाटतो आहे!
चेहऱ्यामागचा ओळखीचा; वाटतो आहे !

सावली सुद्धा अंग चोरु; लागलीच आहे!
लाचार तुकडयांसाठी जो-तो,भुंकतो आहे!

पाण्यालाही आज रक्ताचा; वास येत आहे!
माणूस माणसाला खाऊन, वाढतो आहे !

खायचे आणि दाखवायचे;वेगळे आहेत !
तो मुखवटाच चेहरा असली, झाकतो आहे!

●सन-२००७

©कवी-उमेश नारायण चव्हाण
संपर्क:७०३८१२९६५६
ई-मेल[email protected]

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Karjat
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