25/12/2023
मैं कभी कभी इस सोच में गुम हो जाती हूं कि सही मायने में सफलता प्राप्त करने का क्या पैमाना है?कितना और कब तक चलते रहना पड़ता है समाज की नजरों में ख़ुद को सफल साबित करने के लिए??वो कौन सा पायदान है जहां पहुंच कर सब कुछ सरल और सहज लगने लगता है...फिर अचानक ही दिमाग में बिजली सी कौंधती है कि ..ये समाज ...?ये समाज तो स्वयं ईश्वर से भी संतुष्ट नहीं तो फिर हमारे जैसे तुच्छ प्राणियों से कैसे ही संतुष्टि प्राप्त कर सकेगा?
और फिर विचारों की इस उधेड़बुन से एक बात निकल कर आती है कि जीवन में लोगों द्वारा किए गए सवाल तो यूं ही चलते रहेंगे.. कहीं न कहीं,कभी न कभी कोई अगर - मगर और काश रह ही जाएगा और इन सवालों के जवाब तलाशते हुए जीवन न जाने कब अपने अंतिम पड़ाव पर आ जाएगा...। इसीलिए अंत में ख़ुद को इस निष्कर्ष पर पाती हूं कि ये जीवन एक है पर इसे सार्थक बनाए रखने के मौके अनेक और ऐसे ही जीवन को निरंतर सार्थक बनाते हुए आगे बढ़ते रहना ही असल मायनों में सफलता की प्राप्ति होगी।
- Anamika Asthana