24/12/2020
जो मिट्टी में यहाँ तहज़ीब की फ़सलें उगाते हैं,
कभी तारीख़ बन पाते नहीं है मारे जाते हैं।
हमें उस आग में भी रोशनी मालूम होती है,
जब दंगाई आकर के हमारा घर जलाते है।
फ़िजा में उनकी नफ़रत की सियासत का धुँआ भी है,
चमन में फूल खिलते हैं परिंदे चहचहाते हैं।
कोई हिटलर हमेशा बन के कातिल आ ही जाता है,
हमारी कौम के बच्चे कभी जब मुस्कुराते हैं।
हमारी कौम का मज़हब मोहब्बत की रवायत है,
जहाँ दरिया की बाहों में समंदर डूब जाते हैं।
जनम लेने के पहले क़त्ल जिनका कर दिया तुमने,
वो नग़्मे भी श्रमिक तेरी जुबाँ से गाये जाते हैं।