Sanjay Gupta, Author / Poet

Sanjay Gupta, Author / Poet This page contains creative content created by Sanjay Gupta, writer, poet, shayar.

02/03/2026
तुम अगर साथ हो, हर डे ही है वैलेंटाइन।गर नहीं तुम हो तो तन्हाई है वैलेंटाइन।मेहरबाँ तुम हो तो जलसा है ये जीवन मेरा,तुम ह...
15/02/2026

तुम अगर साथ हो, हर डे ही है वैलेंटाइन।
गर नहीं तुम हो तो तन्हाई है वैलेंटाइन।

मेहरबाँ तुम हो तो जलसा है ये जीवन मेरा,
तुम हो नाराज़ तो वीरानी है वैलेंटाइन।

जिनको इक़रार मिला, प्यार मिला आज के दिन,
ऐसे लोगों को तो लाफ़ानी* है वैलेंटाइन।

कुछ हैं बर्बादे मोहब्बत भी तेरी दुनिया में,
उनको तो चाक गरेबानी* है वैलेंटाइन।

याद रहती नहीं है सालगिरह तक जिनको,
उनकी ख़ातिर तो पशेमानी* है वैलेंटाइन।

काम पर जाना भी है, प्यार निभाना भी है,
ऐसे में एक परेशानी है वैलेंटाइन।

जिनको ये प्यार मोहब्बत हैं किताबी बातें,
ऐसे लोगों को तो बेमानी* है वेलेंटाइन।

शादी के अगले बरस से तो मनाओ हर साल,
पहला है साल तो हर इक दिन ही है वेलेंटाइन।

हम तो हर दिन ही मोहब्बत की ग़ज़ल कहते हैं,
हमको तो महज़ ग़ज़ल ख़्वानी है वैलेंटाइन।

लाफ़ानी= अमर, कभी नष्ट न होने वाला, immortal
चाक गरेबानी= गिरेबान फाड़ना, दुख में पागल हो जाना
पशेमानी= शर्मिंदगी
बेमानी= अर्थहीन, meaningless
-संजय गुप्ता






On Sunday and Monday in Mumbai University, kalina
31/01/2026

On Sunday and Monday in Mumbai University, kalina

08/08/2025

व्यंग्य-कहानी
मनुष्य और राक्षस
-संजय गुप्ता

चार युगों में से एक युग की बात है।
एक दादा और पोता बातें कर रहे थे। पोता बहुत जिज्ञासु था। ढेर सारे प्रश्न कर रहा था। अपने दादा जी से बहुत सारी बातें पूछना चाह रहा था। और उसके दादा उसे हर बात का, अपनी सर्वोत्तम जानकारी के अनुसार यथोचित उत्तर दे रहे थे।
पोता एक तरफ इशारा करते हुए पूछ रहा था, “दादाजी, हमारे जैसे दिखने वाले ये लोग कौन प्रजाति के हैं? हममें और इनमें क्या अंतर है?”
दादाजी: मेरे बच्चे, ये लोग असुर हैं, जिन्हें हम लोग दैत्य, दानव या राक्षस भी कहते हैं।
पोता: दादाजी, ये लोग देखने में काफी हद तक तो हमारे जैसे ही हैं। फिर हम से विरत क्यों रहते हैं? हमें परेशान क्यों करते हैं? हमसे चिढ़ते क्यों हैं?
दादाजी: दरअसल इनकी प्रजाति और हमारी प्रजाति एक ही पिता के वंशज हैं। लाखो वर्ष पूर्व हम लोग बिल्कुल एक जैसे ही थे। कालांतर में इन लोगों ने अनेक शक्तियां हासिल कर लीं। मांस और मदिरा का सेवन करने लगे। इन्हें अपनी शक्ति का नशा होता गया और ये हमारे दुश्मन होते गए।
पोता:: दादाजी, मैं अभी बालक हूं किंतु देख सकता हूं कि ये राक्षस गण अपने आप को अत्यधिक शक्तिशाली समझते हैं। इनके पास अनेकों प्रकार के हथियार भी हैं। इन्हीं हथियारों की मदद से ये हमें सताते रहते हैं, कभी-कभी जान से भी मार देते हैं। इनके पास पुष्पक विमान जैसे उड़ने वाले वाहन हैं, जिसमें बैठकर ये संपूर्ण पृथ्वी पर घूमते रहते हैं।
दादाजी: ये लोग अत्यंत महत्वाकांक्षी हैं। संपूर्ण मही पर अपना राज्य चाहते हैं। ये ऐसे सभी काम करते हैं जिससे हम जैसे लोगों को परेशानी हो। न जाने इस प्रकार के कार्य करने से इन्हें क्या हासिल होता है!
पोता: ये नाहक ही पेड़ों को भी गिराते रहते हैं। पेड़, जो कि हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और शायद इन लोगों के लिए भी उतना ही! पर पता नहीं क्यों, इस बात को ये समझते नहीं हैं और अपनी नादानी में इस तरह की हरकतें करते रहते हैं? क्या इन्हें ज़रा भी एहसास नहीं है कि इन वृक्षों के बिना इनका और हमारा दोनों का जीवन नष्ट हो जाएगा? यह बात अलग है कि हमारा जीवन पहले नष्ट होगा, इनका बाद में। दादाजी, क्या ये लोग आपस में भी लूट-पाट करते हैं?
दादाजी: हाँ मेरे बच्चे, ये सिर्फ हमारी ही नहीं, बल्कि आपस में भी एक दूसरे की वस्तुएं छीन लेते हैं। अपने ही समूह वालों के साथ भी बुरा बर्ताव, लड़ाई-झगड़ा करते हैं। ये हम लोगों की तरह नहीं हैं जो प्रेम और एकता से रहते हैं और अपने राजा का सम्मान करते हैं। ये अपना राजा तो चुनते हैं किंतु उसी की बुराई करते रहते हैं।
पोता: दादा जी, क्या यह सच है कि यह लोग पराई स्त्री का हरण भी कर लेते हैं?
दादा जी: हां बेटे, यह सच है। इनमें मूल्यों की निहायत कमी है। ये पराई स्त्रियों का हरण करते हैं और उनके साथ दुष्कर्म भी करते हैं।
पोता: दादाजी, ये लोग हमेशा व्यस्त और परेशान क्यों दिखाई पड़ते हैं?
दादाजी: आश्चर्य की बात तो यह है कि इतने पर भी ये लोग अपने आप को पृथ्वी पर उपस्थित समस्त जीवों में सर्वश्रेष्ठ समझते हैं। इन्हें समझना चाहिए कि सर्वश्रेष्ठ प्राणी तो पृथ्वी पर हम लोग हैं जो वस्तुओं का नाश नहीं करते। हमें जितनी आवश्यकता होती है, उतने का ही हम उपभोग करते हैं। हमको इस बात की समझ है कि पृथ्वी पर उपस्थित सभी वस्तुएं सबके लिए हैं, पर इन्हें यह समझ नहीं है।
पोता: दादा जी, ये लोग शक्तिशाली हैं। इनके पास बड़े-बड़े और आकर्षक भवन हैं। ये धनवान हैं। तो फिर ये लोग सर्वश्रेष्ठ क्यों नहीं है?
दादाजी: पहली बात तो यह कि मात्र शक्तिशाली और धनवान होना श्रेष्ठता की पहचान नहीं है। न यह सुखी होने की पहचान है। श्रेष्ठता की पहचान है कि हम समाज के लिए एवं अन्य जीवो के लिए कितने सहृदय हैं, कितना त्याग कर सकते हैं? इस अर्थ में ये लोग एकदम शून्य हैं। इनके अंदर करुणा, सहनशीलता एवं त्याग की निहायत कमी है। हां, दिखावे के लिए इनके पास करुणा, सहनशीलता एवं त्याग की कोई कमी नहीं है। ये लोग पाखंडी हैं। ये दान भी या तो दिखावे के लिए करते हैं या लालच में करते हैं कि इसके बदले इन्हें कुछ फल मिलेगा। तो ऐसे लोग सर्वश्रेष्ठ कैसे हो सकते हैं? दूसरी बात यह, कि ये पृथ्वी पर उपस्थित जीवो में सब से असंतुष्ट प्रजाति है, जो कितना भी प्राप्त कर ले पर इनकी और प्राप्त करने की चाह कभी समाप्त नहीं होती। तो फिर ये सुखी कैसे हो सकते हैं? दूसरी तरफ हम लोग हैं जो इस सिद्धांत पर चलते हैं, “ज़्यादा का नहीं लालच हमको, थोड़े में गुज़ारा होता है।”
दादाजी बोलते गए, "हमें तो इन राक्षसों से इसलिए लड़ना पड़ता है क्योंकि इन्होंने हमारे भोजन पर कब्जा कर रखा है। सबसे सुखी प्राणी तो पृथ्वी पर हम लोग ही हैं, क्योंकि हम लोग पेट भरने के बाद अपने आप में मस्त हो जाते हैं, खेलते-कूदते हैं, कल की नहीं सोचते, चिंता नहीं करते, मस्त रहते हैं। हमें कल की परवाह नहीं। हम आज में जीते हैं।"
पाठक गण सोच रहे होंगे कि यह कहानी सतयुग की है, लेकिन नहीं, यह कहानी कलयुग की है। ये जो दादाजी हैं, यह एक बंदर हैं और अपने बंदर पोते से बातें कर रहे हैं। और जिनको ये राक्षस कह रहे हैं वो असल में कलयुग के मनुष्य हैं। अब आप इस कहानी को फिर से पढ़िए।

बच्चे करे हैं बहस कि “हमको भी अक़्ल है।”होकर बड़े ये कहते हैं, “अब आई अक़्ल है।”जीते सदा भरम में हैं समझाये इन्हें कौन,भ...
12/07/2025

बच्चे करे हैं बहस कि “हमको भी अक़्ल है।”
होकर बड़े ये कहते हैं, “अब आई अक़्ल है।”

जीते सदा भरम में हैं समझाये इन्हें कौन,
भर ज़िंदगी बशर को नहीं आती अक़्ल है।
बशर = मनुष्य
-संजय गुप्ता की क़लम से

Dear Friends,Video of one more poetic performance by Sanjay Gupta is ready now. I am sure every sher (शेर) of this video...
15/06/2025

Dear Friends,
Video of one more poetic performance by Sanjay Gupta is ready now. I am sure every sher (शेर) of this video will touch your heart. In fact, I can bet. If you like, please encourage by clicking ‘like’ and ‘subscribe’ and share in your other groups and friends. Thanks.
https://youtu.be/T7wBCxnlawQ

हैं सजाते तिनका-तिनका जोड़कर हम आशियां, इसमें बच्चों को ज़मीं मिलती है, मिलता आसमां।और इसी में हम सिखाते हैं उन्हें पर त...
11/05/2025

हैं सजाते तिनका-तिनका जोड़कर हम आशियां,
इसमें बच्चों को ज़मीं मिलती है, मिलता आसमां।
और इसी में हम सिखाते हैं उन्हें पर तोलना,
फिर वो उड़ जाते हैं रह जाता है ख़ाली घोंसला।
तोलना = खोलना
-संजय गुप्ता की क़लम से

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