08/08/2025
व्यंग्य-कहानी
मनुष्य और राक्षस
-संजय गुप्ता
चार युगों में से एक युग की बात है।
एक दादा और पोता बातें कर रहे थे। पोता बहुत जिज्ञासु था। ढेर सारे प्रश्न कर रहा था। अपने दादा जी से बहुत सारी बातें पूछना चाह रहा था। और उसके दादा उसे हर बात का, अपनी सर्वोत्तम जानकारी के अनुसार यथोचित उत्तर दे रहे थे।
पोता एक तरफ इशारा करते हुए पूछ रहा था, “दादाजी, हमारे जैसे दिखने वाले ये लोग कौन प्रजाति के हैं? हममें और इनमें क्या अंतर है?”
दादाजी: मेरे बच्चे, ये लोग असुर हैं, जिन्हें हम लोग दैत्य, दानव या राक्षस भी कहते हैं।
पोता: दादाजी, ये लोग देखने में काफी हद तक तो हमारे जैसे ही हैं। फिर हम से विरत क्यों रहते हैं? हमें परेशान क्यों करते हैं? हमसे चिढ़ते क्यों हैं?
दादाजी: दरअसल इनकी प्रजाति और हमारी प्रजाति एक ही पिता के वंशज हैं। लाखो वर्ष पूर्व हम लोग बिल्कुल एक जैसे ही थे। कालांतर में इन लोगों ने अनेक शक्तियां हासिल कर लीं। मांस और मदिरा का सेवन करने लगे। इन्हें अपनी शक्ति का नशा होता गया और ये हमारे दुश्मन होते गए।
पोता:: दादाजी, मैं अभी बालक हूं किंतु देख सकता हूं कि ये राक्षस गण अपने आप को अत्यधिक शक्तिशाली समझते हैं। इनके पास अनेकों प्रकार के हथियार भी हैं। इन्हीं हथियारों की मदद से ये हमें सताते रहते हैं, कभी-कभी जान से भी मार देते हैं। इनके पास पुष्पक विमान जैसे उड़ने वाले वाहन हैं, जिसमें बैठकर ये संपूर्ण पृथ्वी पर घूमते रहते हैं।
दादाजी: ये लोग अत्यंत महत्वाकांक्षी हैं। संपूर्ण मही पर अपना राज्य चाहते हैं। ये ऐसे सभी काम करते हैं जिससे हम जैसे लोगों को परेशानी हो। न जाने इस प्रकार के कार्य करने से इन्हें क्या हासिल होता है!
पोता: ये नाहक ही पेड़ों को भी गिराते रहते हैं। पेड़, जो कि हमारे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं, और शायद इन लोगों के लिए भी उतना ही! पर पता नहीं क्यों, इस बात को ये समझते नहीं हैं और अपनी नादानी में इस तरह की हरकतें करते रहते हैं? क्या इन्हें ज़रा भी एहसास नहीं है कि इन वृक्षों के बिना इनका और हमारा दोनों का जीवन नष्ट हो जाएगा? यह बात अलग है कि हमारा जीवन पहले नष्ट होगा, इनका बाद में। दादाजी, क्या ये लोग आपस में भी लूट-पाट करते हैं?
दादाजी: हाँ मेरे बच्चे, ये सिर्फ हमारी ही नहीं, बल्कि आपस में भी एक दूसरे की वस्तुएं छीन लेते हैं। अपने ही समूह वालों के साथ भी बुरा बर्ताव, लड़ाई-झगड़ा करते हैं। ये हम लोगों की तरह नहीं हैं जो प्रेम और एकता से रहते हैं और अपने राजा का सम्मान करते हैं। ये अपना राजा तो चुनते हैं किंतु उसी की बुराई करते रहते हैं।
पोता: दादा जी, क्या यह सच है कि यह लोग पराई स्त्री का हरण भी कर लेते हैं?
दादा जी: हां बेटे, यह सच है। इनमें मूल्यों की निहायत कमी है। ये पराई स्त्रियों का हरण करते हैं और उनके साथ दुष्कर्म भी करते हैं।
पोता: दादाजी, ये लोग हमेशा व्यस्त और परेशान क्यों दिखाई पड़ते हैं?
दादाजी: आश्चर्य की बात तो यह है कि इतने पर भी ये लोग अपने आप को पृथ्वी पर उपस्थित समस्त जीवों में सर्वश्रेष्ठ समझते हैं। इन्हें समझना चाहिए कि सर्वश्रेष्ठ प्राणी तो पृथ्वी पर हम लोग हैं जो वस्तुओं का नाश नहीं करते। हमें जितनी आवश्यकता होती है, उतने का ही हम उपभोग करते हैं। हमको इस बात की समझ है कि पृथ्वी पर उपस्थित सभी वस्तुएं सबके लिए हैं, पर इन्हें यह समझ नहीं है।
पोता: दादा जी, ये लोग शक्तिशाली हैं। इनके पास बड़े-बड़े और आकर्षक भवन हैं। ये धनवान हैं। तो फिर ये लोग सर्वश्रेष्ठ क्यों नहीं है?
दादाजी: पहली बात तो यह कि मात्र शक्तिशाली और धनवान होना श्रेष्ठता की पहचान नहीं है। न यह सुखी होने की पहचान है। श्रेष्ठता की पहचान है कि हम समाज के लिए एवं अन्य जीवो के लिए कितने सहृदय हैं, कितना त्याग कर सकते हैं? इस अर्थ में ये लोग एकदम शून्य हैं। इनके अंदर करुणा, सहनशीलता एवं त्याग की निहायत कमी है। हां, दिखावे के लिए इनके पास करुणा, सहनशीलता एवं त्याग की कोई कमी नहीं है। ये लोग पाखंडी हैं। ये दान भी या तो दिखावे के लिए करते हैं या लालच में करते हैं कि इसके बदले इन्हें कुछ फल मिलेगा। तो ऐसे लोग सर्वश्रेष्ठ कैसे हो सकते हैं? दूसरी बात यह, कि ये पृथ्वी पर उपस्थित जीवो में सब से असंतुष्ट प्रजाति है, जो कितना भी प्राप्त कर ले पर इनकी और प्राप्त करने की चाह कभी समाप्त नहीं होती। तो फिर ये सुखी कैसे हो सकते हैं? दूसरी तरफ हम लोग हैं जो इस सिद्धांत पर चलते हैं, “ज़्यादा का नहीं लालच हमको, थोड़े में गुज़ारा होता है।”
दादाजी बोलते गए, "हमें तो इन राक्षसों से इसलिए लड़ना पड़ता है क्योंकि इन्होंने हमारे भोजन पर कब्जा कर रखा है। सबसे सुखी प्राणी तो पृथ्वी पर हम लोग ही हैं, क्योंकि हम लोग पेट भरने के बाद अपने आप में मस्त हो जाते हैं, खेलते-कूदते हैं, कल की नहीं सोचते, चिंता नहीं करते, मस्त रहते हैं। हमें कल की परवाह नहीं। हम आज में जीते हैं।"
पाठक गण सोच रहे होंगे कि यह कहानी सतयुग की है, लेकिन नहीं, यह कहानी कलयुग की है। ये जो दादाजी हैं, यह एक बंदर हैं और अपने बंदर पोते से बातें कर रहे हैं। और जिनको ये राक्षस कह रहे हैं वो असल में कलयुग के मनुष्य हैं। अब आप इस कहानी को फिर से पढ़िए।