06/09/2022
भाजपा के सबसे बड़े बयानवीर #सुशील_मोदी और मुख्यमंत्री #नीतीश_कुमार दो जिस्म एक जान।।
समझ लीजिए कि #साजिश_के_बेहतरीन_सरताज सुशील मोदी एक ऐसे व्यक्तित्व का नाम है कि __
"जिसका खाता है ,उसका भी नहीं गाता है"!!
इन्होंने जीवनोपर्यंत उसी पार्टी को खाया, जिसने इन्हें सबकुछ दिया ।।
जरा समझिए कि आखिर ऐसा क्यों है ??
सुशील मोदी भाजपा के एक ऐसे जनाधार विहीन चेहरा हैं, जिसे भाजपा ने बिहार में शिखर तक पहुंचाया।
साल 1995 में जनाब #गोविंदाचार्य जी की कृपा से #कैलाश_पति_मिश्र को हटाकर पार्टी के राष्ट्रीय मंत्री बने। और उसके तुरंत बाद 1996 के लोकसभा चुनाव के पश्चात महाशय को पार्टी ने नेता प्रतिपक्ष बनाया।
नेता विरोधी दल रहते ही 2004 में साहब भागलपुर से सांसद बने, और फिर 2005 में बिहार में एनडीए की सरकार बनते ही सांसद रहते इन्हें बिहार का उप मुख्यमंत्री बनाया गया। उसके बाद एमएलसी कोटे से इनका चुनाव हुआ और इनके लिए #भाजपा ने बिहार में एक नया ताकतवर पद का गठन किया। जिसका नाम दिया गया #बिहार_विधान_मंडल दल। जो की दोनों सदनों के नेताओं को मिलाकर बनाया गया। और ये जनाब उसके नेता बने। मतलब यह समझिए कि भाजपा ने एक जनाधार विहीन नेता को कहां से कहां तक पहुंचा दिया।।
गौरतलब है कि 1990 में सुशील मोदी ने भाजपा से बागी होकर अपना नामांकन भरा था। तब शायद #इंदर_सिंह_नामधारी पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष हुआ करते थे। क्योंकि तब बिहार और झारखंड एक ही था और इन्होंने पार्टी की ओर से किसी अन्य उम्मीदवार की घोषणा कर दी थी। बाद में कैलाश जी की कृपा से निर्णय बदलकर इनको भाजपा का सिंबल मिला और ये चुनाव जीते।
लेकिन जिस पार्टी ने इनको फर्श से अर्श तक पहुंचाया। उसकी लुटिया डुबोने में इन्होंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ा।।
साजिश की बानगी .......................
दरअसल, इसकी बानगी 2015 के विधानसभा चुनाव में ही दिखने को मिल गई थी।
वर्ष 2013 में भाजपा और नरेंद्र भाई मोदी से नफरत की आग ने नीतीश जी की राहें जुदा कर दी। लेकिन सुशील मोदी जी नीतीश कुमार जी के बी टीम की तरह भाजपा में काम कर रहे थे। तब भी इनकी बयानबाजी आज की तरह ही तीखी थी। या तो कुछ यूं कहिए कि आज से भी ज्यादा। आम लोगों को और यहां तक की इनकी पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को भी इनके अंदर की केमिस्ट्री की समझ नहीं थी। येन केन प्रकारेन 2015 का विधानसभा चुनाव आ गया। और जो नीतीश जी चाहे सुशील मोदी ने भाजपा में वही किया।
केंद्रीय नेतृत्व को गुमराह करते हुए चूंकि बिहार भाजपा के ये सर्वोच्च नेता थे, लिहाजा इन्होंने नीतीश कुमार के इशारे पर अपनी ही पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को आईना दिखाने का फैसला कर लिया। 2015 के विधानसभा चुनाव के टिकट बंटवारे में अधिकतम जगहों पर उन्होंने ऐसे उम्मीदवारों को चयनित किया जिन्हें भाजपा कार्यकर्ताओं का भी सहयोग न मिल सके। मसलन, परिणाम सब के सामने था।
बड़ी आसानी से एक सोची समझी साजिश के तहत इस हार का ठीकरा #आरएसएस के सर संघचालक #मोहन_भागवत के बयानों पर फोड़ा गया।
यह सब कुछ #सुशील_मोदी,नीतीश जी के इशारे पर कर रहे थे। और इसका परिणाम यह हुआ कि जब 2017 में नीतीश जी ने फिर से पलटी मारा तो सुशील मोदी अपनी योजना के अनुसार बिहार के उप मुख्यमंत्री बन गए।
संगठन में भी साजिश...........................
दरअसल, इनकी साजिश का दौर केवल सत्ता के इर्द गिर्द ही नहीं चला। बल्कि संगठन में भी ये जनाब साजिश के सरताज रहे।
इन्होंने अपनी साजिश से पार्टी में उभर रहे सभी जातियों के मजबूत नेतृत्व को एक एक करके ठिकाने लगा दिया।
स्वामीनाथ तिवारी, यशोदा नंद सिंह, जनार्दन यादव ,कामेश्वर पासवान, लालमुनि चौबे, सुधीर शर्मा, जनार्दन शर्मा,चंद्रमोहन राय, चोखर बाबा, कैलाश पति मिश्र की बहु दिलमणि मिश्र , प्रेम कुमार, सी पी ठाकुर, संजय पासवान, गोपाल नारायण सिंह सरीखे नेताओं को इन्होंने टारगेट कर ठिकाने लगाया। यहां तक कि प्रांत से लेकर जिले तक के भाजपा के ज्यादातर समर्पित कार्यकर्ताओं को ठिकाने लगाने में इन्होंने कोई कोर कसर नहीं छोड़ा। इसमें इन्हें नीतीश कुमार जी का भी भरपूर सहयोग मिला। क्योंकि ये जनाब तब भी और आज भी नीतीश जी के ही प्रतिनिधि हैं।
इनकी साजिश की पटकथा यहीं आकर खत्म नहीं होती। साल 1996 में भाजपा की ओर से एमएलसी के उम्मीदवार #यशोदा_नंद_सिंह थे। इनके खिलाफ सुशील मोदी ने इन्हें हराने के लिए पार्टी लाइन के विरुद्ध जाकर #प्रवीण_सिंह को एमएलसी का उम्मीदवार बना दिया। और करीब भाजपा के बारह विधायकों ने सुशील मोदी के कहने पर प्रवीण सिंह को वोट दिया। वो तो गनीमत मनाइए कि यशोदा नंद सिंह को कांग्रेस के #राजो_सिंह ,और #आदित्य_सिंह जैसे नेताओं का सहयोग मिला और कुछ अन्य कांग्रेस विधायकों के द्वितीय वरीयता के वोट से इन्हें किसी तरह जीत हासिल हुई। लेकिन भाजपा के उन बारह विधायकों पर पार्टी ने कोई कार्रवाई नहीं की। क्योंकि उन पर सुशील मोदी की विशेष कृपा बरस रही थी। बाद में श्री सुशील मोदी ने प्रवीण सिंह को पार्टी में लाकर सीधे एमएलसी बनाया।
इनकी साजिश के कारनामें और भी हैं। मसलन,साहब ने नीतीश कुमार जी के सहयोग से #भूमिहार_बाहुल्य #लोकसभा और #विधानसभा को भी चुन चुनकर छीना। जैसे मुजफ्फरपुर, वैशाली , महाराजगंज, मोतिहारी,पाटलिपुत्र, जहानाबाद आदि आदि।।
यह सब साजिश इनकी इसलिए भी थी कि जिस #मारवाड़ी समाज से ये जनाब आते हैं ,उनका आधार वोट बिहार में बिलकुल नगण्य है। अब ये साहब इस भय से हमेशा ही ग्रसित रहते हैं कि कहीं इनके इंद्रासन पर कोई खतरा न आ जाए। लिहाजा, चुन चुनकर इन्होंने हर एक जाति के मजबूत नेतृत्व को पार्टी से किनारा लगाया। और यही वजह है कि आज बिहार भाजपा नेतृत्व विहीन नजर आती है।
जब केंद्रीय नेतृत्व को यह सब माजरा समझ आया तो इन्हें बिहार से हटाया तो जरूर गया लेकिन तबतक बहुत देर हो चुकी थी।
अब पुनः मौके की नजाकत को भांपते हुए ये जनाब बिहार में एक बार फिर से स्थापित होने के लिए बयानवीर बने हैं। अगर भूल से भी भाजपा ने बिहार की कमान इन्हें सौंपी तो आने वाले दिनों में पार्टी का हश्र 2015 से भी बुरा होने वाला है।
क्योंकि यह सबको पता चल गया है कि गंगाधर ही शक्तिमान है।
, , , , ,