30/01/2026
गोरख पांडेय (1945-1989) हिंदी साहित्य के एक ऐसे क्रांतिकारी कवि थे, जिन्होंने अपनी लेखनी को सीधे तौर पर व्यवस्था और सत्ता के खिलाफ संघर्ष का हथियार बनाया। उत्तर प्रदेश के बलिया में जन्मे गोरख ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय और जेएनयू से शिक्षा प्राप्त की। वे मार्क्सवादी विचारधारा और उस दौर की सशस्त्र क्रांति के प्रबल समर्थक थे, जो समाज के सबसे दबे-कुचले वर्ग को न्याय दिलाना चाहती थी।
उनका साहित्य लोक और शास्त्र के बीच का एक अद्भुत पुल है। एक तरफ उन्होंने 'डर' जैसी कविताओं के माध्यम से सत्ता के मनोविज्ञान को उजागर किया, जहाँ वे लिखते हैं कि शासक सबसे ज्यादा आम जनता के 'निडर' होने से डरते हैं। वहीं दूसरी तरफ, उन्होंने भोजपुरी गीतों के जरिए क्रांति को गाँव की पगडंडियों तक पहुँचाया। उनका प्रसिद्ध गीत 'जनता के आवे पलटनिया' आज भी जन-आंदोलनों का प्रतीक है, जो यह संदेश देता है कि जब शोषित वर्ग संगठित होकर खड़ा होगा, तब जुल्म के बड़े-बड़े किले ढह जाएँगे।
गोरख का जीवन जितना विद्रोही था, उनका अंत उतना ही त्रासद रहा। एक संवेदनशील कवि हृदय और समाज की कठोर जड़ता के बीच उपजे अंतर्द्वंद्व के कारण, 29 जनवरी 1989 को उन्होंने जेएनयू के झेलम हॉस्टल में आत्महत्या कर ली। भले ही उनका जीवन संक्षिप्त रहा, लेकिन उनकी कविताएँ आज भी अन्याय के विरुद्ध लड़ने वालों को प्रेरणा देती हैं।