26/04/2026
रंगयुग, उसके नाटक!' और अब 'एक था गधा'
-कुंवर शक्ति सिंह
एक था गधा उर्फ़ अलादाद खाँ एक ऐसा नाटक है, जो समय के साथ पुराना नहीं होता, बल्कि हर दौर में और अधिक प्रासंगिक हो उठता है। 18 अप्रैल को अभिनव थिएटर जम्मू में रंगयुग नाट्य संस्थान द्वारा दीपक कुमार के निर्देशन में इसकी प्रस्तुति ने दर्शकों को हँसी के साथ-साथ गहरी सोच में डुबो दिया।
इस बार की प्रस्तुति की विशेषता रही इसका सशक्त और व्यापक रंगकर्मी/कलाकार समूह। नवाब की भूमिका में राज कुमार बहरूपिया, कोतवाल के रूप में सोहम कश्यप, चिंतक की भूमिका में प्रदीप शर्मा, अक्षर वशिष्ठ और अनंदिता दत्ता, सूत्रधार के रूप में विवेक संगोत्रा, देवीलाल में सुमित कुमार, जुग्गन में आशीष शर्मा, नाथू में साहिल बजाज, रामकली में इशा अंकुर बांबा, अलादाद के रूप में शिवान गुप्ता तथा नागरिकों की सामूहिक भूमिका में अनेक कलाकारों—सुरिंदर शर्मा, गौरव शर्मा, रविंदर मनहास, मनोज धामीर, सक्षम चिब, कुलदीप चौहान, आलाप शर्मा, गीतांजलि शर्मा, सोनिया शर्मा, मुस्कान बंगोत्रा, निहारिका, रुतेश्वर चौहान, कुनाल सिंह चिब आदि, हवलदार की भूमिका में गुरमीत संधु, न्यूज़कास्टर अमिआरा गुप्ता ने अपनी प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराई। नवाब का पात्र अजीब है, जो अजीब अजीब सी बातें और हरकतें करता है, लेकिन फिर भी नवाब समझदार और चालाक है। राजकुमार बहरूपिया ने यह भूमिका मन लगाकर निभाई है। कोतवाल भी कोई कम नहीं है, इस पात्र को निभाना बॉडी थिएटर का बेमिसाल उदाहरण है, सोहम कश्यप ने नाटक का कसाव ढीला नहीं होने दिया। अलादात सच में अलादात लग रहा था।
पर्दे के पीछे की टीम भी उतनी ही सशक्त रही—संगीत में सूरज सिंह, गायन में सूरज सिंह, राज कुमार बहुरूपिया, पंकज खजूरिया, रोहित गुप्ता और विक्रांत शर्मा, कॉस्ट्यूम एवं साउंड में आरजे जुही, मेकअप में मनोज धामीर, प्रॉप्स में शिवान गुप्ता, सेट्स में डॉ. विजय पुरी और अश्विनी कुमार, लाइट्स में पंकज शर्मा, ग्राफिक्स में शेखर, हॉल प्रबंधन में मोहित सिंह चिब, ऋषि कुमार, साहिल शर्मा, सहायक निर्देशन में आरजे जुही, तथा डिज़ाइन एवं निर्देशन में स्वयं दीपक कुमार का योगदान उल्लेखनीय रहा। मीडिया पार्टनर के रूप में दैनिक स्टेट समाचार भी इस प्रस्तुति का हिस्सा बना।
यदि नाटक के इतिहास की बात करें, तो इसके लेखक शरद जोशी हिंदी साहित्य के महान व्यंग्यकारों में गिने जाते हैं। उनका जन्म 1931 में हुआ और उन्होंने सामाजिक, राजनीतिक और सांस्कृतिक विसंगतियों पर तीखे व्यंग्य लिखे। एक था गधा उर्फ़ अलादाद खाँ उनकी सबसे चर्चित नाट्य कृतियों में से एक है, जिसमें हास्य के माध्यम से सत्ता और व्यवस्था की खोखली मानसिकता पर प्रहार किया गया है।
इस नाटक की मूल कथा एक साधारण गधे ‘अलादाद खाँ’ की मृत्यु से शुरू होती है, जिसे अचानक राजनीतिक प्रतिष्ठा और दिखावे का मुद्दा बना दिया जाता है। पूरा प्रशासन और समाज एक निरर्थक घटना को इतना बड़ा बना देता है कि सच्चाई कहीं पीछे छूट जाती है। यही व्यंग्य इसे कालजयी बनाता है, क्योंकि यह केवल कहानी नहीं, बल्कि व्यवस्था की मानसिकता का चित्रण है।
अभिनव थिएटर में उस दिन की प्रस्तुति ने यह साबित कर दिया कि रंगमंच आज भी समाज की आत्मा को झकझोरने की ताकत रखता है। दर्शकों की हँसी के बीच छिपा हुआ दर्द, तालियों के बीच उठते सवाल, और अंत में छा जाने वाली खामोशी—ये सब इस बात के प्रमाण थे कि नाटक अपने उद्देश्य में पूरी तरह सफल रहा।
हाल ही में रंगयुग ने मराठी नाटक 'सक्कुबाई' के डोगरी रूपांतरण 'चैंचलो' ने दर्शकों में इक गहरी-शांत टीस-सी छोड़ दी थी। मुझे लगता है 'चैंचलो' को जितनी बार भी देखा जाए वह पहली बार देखने जैसा होगा। रंगयुग से मेरा नाता 'शहीदसाज़', 'सलाम' या 'आले' के समय से रहा है। यह एक नाट्य संस्थान तो है ही बल्कि बुद्धिजीवियों या संवेदनशील लोगों के लिए एक तीरथ जैसा भी है, जहां हम आत्मा और मन से हल्के होने लगते हैं।
एक था गधा का मंचन एक नाटक की प्रस्तुति तो थी ही, बल्कि एक विचार था, एक ऐसा विचार, जो हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि कहीं हम भी तो उस भीड़ का हिस्सा नहीं बन रहे, जो सच्चाई से अधिक दिखावे को महत्व देती है। यही “एक था गधा” की असली ताकत है, वह हँसाकर भी भीतर तक चुभता है।