05/07/2024
गुर्जराधिपति क्षत्रिय सम्राट #नागभट्ट (805-833), अपने पिता #वत्सराज से गद्दी प्राप्त कर गुर्जर-प्रतिहार राजपूत राजवंश के चौथे राजा बने। उनकी माता का नाम सुन्दरीदेवी था। नागभट्ट द्वितीय को परमभट्टारक, महाराजाधिराज और कन्नौज विजय के बाद 'परमेश्वर' की उपाधि दी गई थी।भारतीय इतिहास में "गुर्जर-प्रतिहार" वंश का महत्वपूर्ण स्थान है, इन प्रतिहार वंश के क्षत्रिय (राजपूत) बहुत कुशन प्रशासक थे, इन्होंने गुर्जर क्षेत्र पर विजय प्राप्त किया था, इस विजय के पश्चात इन्हें गुर्जर प्रदेश विजेता अर्थात गुर्जराधिपति उपाधि मिला ! मध्यकाल से पहले इन्होंने 500 वर्ष तक अरबी आक्रमणकारियों का सामना किया वह, समय सर्वाधिक प्रसिद्ध गुर्जर प्रतिहार राजपूत वंश ही था !!प्रतिहार वंश' को #गुर्जर_प्रतिहार वंश (छठी शताब्दी से 1036 ई.) इसलिए कहा गया, क्योंकि प्रतिहार राजपूतो ने गुर्जर क्षेत्र पर विजय प्राप्त किया था, गुजरात व दक्षिण-पश्चिम राजस्थान के क्षेत्र को गुर्जर क्षेत्र कहा जाता था। प्रतिहारों के अभिलेखों में उन्हें श्रीराम के अनुज लक्ष्मण का वंशज बताया गया है, जो श्रीराम के लिए प्रतिहार (द्वारपाल) का कार्य करता था। कन्नड़ कवि 'पम्प' ने महिपाल को 'गुर्जर क्षेत्र विजेता'' कहा है। 'स्मिथ' ह्वेनसांग के वर्णन के आधार पर उनका मूल स्थान आबू पर्वत के उत्तर-पश्चिम में स्थित भीनमल को मानते हैं। कुछ अन्य विद्वानों के अनुसार उनका मूल स्थान अवन्ति था।