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‘हिन्दी और हिन्दी रंगमंच के अभिनेता’ विषयक शृंखला के अन्तर्गत पिछले वर्ष फ़ेसबुक पर लिखी गयीं अलग-अलग टिप्पणियों के कुछ ...
30/04/2018

‘हिन्दी और हिन्दी रंगमंच के अभिनेता’ विषयक शृंखला के अन्तर्गत पिछले वर्ष फ़ेसबुक पर लिखी गयीं अलग-अलग टिप्पणियों के कुछ उद्धरण :

(1) हिन्दी में रंगमंच से जुड़े अधिकतर अभिनेता, हिन्दी भाषा और उसकी जातीय-परम्परा से बिल्कुल ही नावाकिफ़ होते हैं। इनमें ऐसे अभिनेताओं की संख्या आश्चर्यजनकरूप से बहुत होती है, जिन्हें देवनागरी (हिन्दी) वर्णमाला का भी सही-सही ज्ञान नहीं होता है।

घोष-अघोष और अल्पप्राण-महाप्राण ध्वनियों की वैज्ञानिकता की समझ की बात न भी करें, तो मात्रा के सूक्ष्म अन्तर को न तो वे लिख सकते हैं, न बोलने में 'ह्रस्व' और 'दीर्घ' मात्राओं का सही उच्चारण ही करते हैं।

सबसे बड़ी दिक़्क़त तो हिन्दी के ही संयुक्ताक्षर के उच्चारण को लेकर होती है। वैसी संयुक्त-ध्वनियाँ, जिन्हें एक अक्षर के रूप में लिखा जाता है - जैसे 'क्ष', 'ज्ञ', 'श्र', 'द्य', 'द्म', 'ह्म' आदि; किन ध्वनियों से निर्मित हैं, इससे बहुत-से अभिनेता अनभिज्ञ हैं। तभी वे 'क्ष' को 'छ' या 'क्छ'; 'ज्ञ' को 'ग्य' अथवा 'ग्यं' कहते हैं। क्योंकि उन्हें पता नहीं होता कि क + ष के मेल से 'क्ष' और 'ज्ञ', ज + ञ की संयुक्त-ध्वनियों से बनता है (संस्कृत उच्चारण-पद्धति के अनुसार 'ज्ञ' को 'ज + ञ' उच्चारित किया जाता है; वैसे अब बोलने में हिन्दी में 'ज्ञ' सामान्यतः 'ग्य' ही उच्चारित किया जाने लगा है)। उसी प्रकार, बहुत को नहीं पता होता कि 'ब्राह्मण' के 'ह' में हलन्त है, तब 'म' की ध्वनि; यानि ब्रा + ह् + म + ण ('ब्राम्हण' नहीं)। 'चिह्न' का उच्चारण चि + ह् + न होना चाहिए, 'चिन्ह' नहीं। 'विद्या' दरअसल वि + द् + या है; न कि वि + ध् + या (विध्या)। 'एवं' का उच्चारण ए + व + म् है; 'एवंग' या 'एवँ' नहीं।

(2) आइए, देवनागरी (हिन्दी) लिपि की वर्णमाला के बारे में बात करते हैं :

स्वर (vowel)
वैसे वर्ण, जिनके उच्चारण में वायु बिना किसी रोक-टोक या अवरोध के निकलती है :

अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः ऋ।
कंठ्य : अ आ, तालव्य : इ ई, ओष्ठ्य : उ ऊ, मूर्धन्य : ऋ,
कंठ्य-तालव्य : ए ऐ, कंठ-ओष्ठ्य : ओ औ।
ह्रस्व स्वर : अ इ उ ऋ, दीर्घ स्वर : आ ई ए ऐ ओ औ।

व्यंजन (consonant)
जिन वर्णों के उच्चारण में; साँस - मुँह (माउथ कैविटी), कंठ, तालु आदि अंग-उपांगों से बाधित होकर निकलती है:

कंठ्य : क ख ग घ ङ
तालव्य : च छ ज झ ञ
मूर्धन्य : ट ठ ड ढ ण
दंतव्य : त थ द ध न
ओष्ठ्य : प फ ब भ म
अन्य व्यंजन : य र ल व श ष स ह
ड़ ढ़
क्ष त्र ज्ञ (संयुक्त व्यंजन)।

(3) देवनागरी (हिन्दी) के स्वर और व्यंजन के बारे में कुछ और जानते हैं : हिन्दी की वर्णमाला को, भाषा-शास्त्र के वैज्ञानिक सिद्धान्त के अनुसार क्रमबद्ध किया गया है। हिन्दी जैसी लिखी जाती है, बिलकुल वैसी ही पढ़ी या बोली जाती है तथा जैसी सुनी जाती है, वैसी ही लिखी जाती है। यह स्वयं-सिद्ध है - अलग से उदाहरण की आवश्यकता नहीं है।
इसी प्रकार, स्वर और व्यंजन ध्वनियों को 'उच्चारण-के-स्थान' (कंठ, तालु, मूर्धा, दन्त, ओष्ठ) के आधार पर वर्गीकृत किया गया। इससे सटीक उच्चारण सरल हो जाता है, अगर हम उस वैज्ञानिक वर्गीकरण के प्रति सचेत होते हैं।
स्वर : वैसे वर्ण, जिनके उच्चारण में वायु बिना किसी रोक-टोक या अवरोध के निकलती है -
अ आ इ ई उ ऊ ए ऐ ओ औ अं अः ऋ।

व्यंजन : जिन वर्णों के उच्चारण में; मुँह (माउथ कैविटी), कंठ, तालु आदि अंग-उपांगों से साँस बाधित होकर निकलती है -
क ख ग घ ङ च छ ज झ ञ ट ठ ड ढ ण त थ द ध न प फ ब भ म र ल व श ष स ह

ध्वनि के उद्गम-स्थल के अनुसार वर्गीकरण का आधार समझकर, हम अपना उच्चारण सटीक और दोष-रहित कर सकेंगे।
कंठ्य ध्वनियाँ : अ आ (स्वर), क ख ग घ ङ (व्यंजन);
तालव्य ध्वनियाँ : इ ई (स्वर), च छ ज झ ञ य श (व्यंजन);
मूर्धन्य ध्वनियाँ : ट ठ ड ढ ण र ष (सभी व्यंजन);
दन्त-वर्त्स्य ध्वनियाँ : त थ द ध न (सभी व्यंजन);
वर्त्स्य ध्वनियाँ : र ल स (सभी व्यंजन);
ओष्ठ्य ध्वनियाँ : प फ ब भ म (सभी व्यंजन);
दंत्योष्ठ ध्वनियाँ : व फ (व्यंजन);
कंठ्य-तालव्य ध्वनियाँ : ए ऐ (स्वर);
कंठ-ओष्ठ्य ध्वनियाँ : ओ औ (स्वर);
काकल ध्वनि : ह

(कंठ्य : कंठ से, तालव्य : कोमल तालु से, मूर्धन्य : मूर्धा अर्थात कठोर तालु से, दन्त-वर्त्स्य : दाँत और मसूड़ों से, वर्त्स्य : मसूड़ों से, ओष्ठ्य : होंठों से, दंत्योष्ठ : दाँत-होंठों से, कंठ्य-तालव्य : कंठ और तालु के सहयोग से, कंठ-ओष्ठ्य : कंठ और होंठों से, काकल्य : कंठ के कौआ से उच्चारित) ।

(4) अब अनुस्वार और अनुनासिक ध्वनियों की चर्चा।

स्वर-वर्णमाला में ‘अं’ को अनुस्वार कहते हैं। जिन ध्वनियों के उच्चारण में श्वास को सप्रयास, किन्तु सहज रूप से नाक से निकाला जाता है, यथा - ङ, ञ, ण, न, म; उन्हें नासिक्य या अनुनासिक व्यंजन कहा जाता है। लिखने में प्रायः ङ, ञ, ण, न, म के नासिक्य ध्वनियों के लिए ‘अं’ यानि अनुस्वार का प्रयोग किया जाता है, जिसका चिह्न – शिरोरेख के ऊपर एक बिन्दी (ॱ) है। बोलने के अभ्यास और अनुभव के आधार पर अभिनेता इन अनुनासिक ध्वनियों का उच्चारण करते हैं; जैसे - गंगा (गङ्गा : ग + ङ् + गा), व्यंजन (व्यञ्जन : व् + य + ञ् + ज + न), कंठ (कण्ठ : क + ण् + ठ), परंपरा (परम्परा : प + र + म् + प + रा), संबंध (सम्बन्ध : स + म् + ब + न् + ध) ।

अब समस्या कहाँ आती है ? जब हम हर नासिक्य ध्वनि को अनुस्वार (ॱ) के ज़रिए लिखते हैं; तो बोलने में कई बार द्विविधा होती है। 'गंगा' - गम्गा है या गन्गा या गङ्गा ? 'परंपरा' - परन्परा या परम्परा। इसी तरह संबंध - सन्बन्ध होगा या सम्बम्ध अथवा सम्बन्ध होगा। ऐसी कई अनुनासिक ध्वनियाँ हैं, जिनके उच्चारण में अहिन्दी भाषी को ही दिक़्क़त नहीं होती, जो हिन्दी सीख रहा होता है; बल्कि हिन्दी अभिनेता की भी प्रायः इस सम्बन्ध में स्पष्ट अवधारणा नहीं होती है। वे मात्र अपने अनुभव के आधार पर इसे उच्चारित करते हैं। उर्दू (नस्तालिक) और रोमन आदि लिपियों में यह अस्पष्टता होती है, पाठकर्ता अपने रियाज़ और अनुभव से यह तय करता है कि अमुक शब्द 'ख़ुदा' (خدا) है अथवा 'ख़िदा' (خدا)। या फिर अपने अभ्यास से वह, put या but को पुट और बट उच्चारित करता है, 'पुट-बुट' या 'पट-बट' नहीं।

हिन्दी (देवनागरी) की यह प्रकृति नहीं है। हिन्दी में जो सुना जाता है, वही लिखा जाता है और जो लिखा जाता है, वही बोला भी जाता है।वैयाकरणों के अनुसार, अनुस्वार (ॱ) का प्रयोग सामान्यतः य, र, ल, व, श, ष, स और ह के साथ किया जाना चाहिए; हालाँकि अब लिखने में प्रत्येक अक्षर के साथ इसका प्रयोग किया जाने लगा है और साहित्य में इसे मान्यता भी मिल गयी है। लेकिन अभिनेताओं को इसको लेकर द्विविधा हमेशा बनी रहती है कि वे 'परंपरा' को परम्परा क्यों बोलें, परन्परा क्यों नहीं ? इसी तरह कई अनुभवी अभिनेता 'बूँद' (ब् + ऊँ + द) को 'बून्द' (बू न् द) कहते सुने जाते हैं। या फिर उन्हें 'हंस' और 'हँस' में अन्तर नहीं समझ में आता है ! इसलिए ज़रूरी है कि अभिनेता लिखित पाठ का अपने लिए एक अलग 'परफॉर्मेन्स-टेक्स्ट' तैयार करे।

आइए जानते हैं, हिन्दी और उसकी लिपि देवनागरी में अनुस्वार और नासिक्य ध्वनियों के संयोजन की क्या और कैसी व्यवस्था है ?

य, र, ल, व, श, ष, स और ह के साथ अनुस्वार (ॱ) का प्रयोग व्याकरण-सम्मत है। शेष व्यञ्जन, यथा - 'क' से लेकर 'म' तक; 25 व्यञ्जन-ध्वनियाँ, उच्चारण-स्थल के आधार पर 5 वर्गों में विभाजित हैं - कंठ्य : क ख ग घ ङ, तालव्य : च छ ज झ ञ, मूर्धन्य : ट ठ ड ढ ण, दन्त्य : त थ द ध न और ओष्ठ्य : प फ ब भ म। हर वर्ग का अन्तिम अक्षर या उसकी अन्तिम ध्वनि नासिक्य है। अब अगर कंठ्य वर्ग (क ख ग घ) के साथ अनुस्वार का प्रयोग करना है, तो उसके साथ 'ङ' का प्रयोग होगा, जैसे - गङ्गा, जङ्घा, पङ्खा। इसी तरह तालव्य (च छ ज झ) के लिए ञ, मूर्धन्य (ट ठ ड ढ) लिए ण, दन्त्य (त थ द ध) लिए न और ओष्ठ्य (प फ ब भ) के लिए म का प्रयोग किया जाना चाहिए। इस व्यवस्था का अनुसरण करने पर अभिनेता को गङ्गा और 'गन्गा'; किञ्चित और 'किन्चित'; दण्ड और 'दन्ड' आदि शब्दों को लेकर कोई द्विविधा नहीं रहेगी। सामान्यतः अनुस्वार (ॱ) को हम आधा 'न' (न्) की ध्वनि मान लेते हैं, जबकि यह नासिक्य ध्वनि है और अलग-अलग अक्षरों के साथ इसका भिन्न उच्चारण होता है। इस अवधारणा के स्पष्ट होजाने पर हम यह समझ सकते हैं कि संबंध, दरअसल सम्बन्ध क्यों है और पंत (पन्त), दंभ (दम्भ) का उच्चारण क्या होगा।

थोड़ी चर्चा चन्द्र-बिन्दु की भी कर लेते हैं। हिन्दी में अनुनासिकता को चन्द्र-बिन्दु के माध्यम से व्यक्त किया जाता है। जिस ध्वनि-अक्षर के साथ इसका प्रयोग किया जाता है, उस ध्वनि के साथ ही अनुनासिक का उच्चारण होगा, जैसे - चाँद, यहाँ च् + आँ + द का उच्चारण होता है, न कि 'चान्द', उसी तरह बूँद का उच्चारण ब् + ऊँ + द होता है, 'बून्द' नहीं। 'हंस' एक प्रकार का पक्षी है, तो 'हँस' का सम्बन्ध हँसने से है।

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(क्रमशः)

Gopal was a attendee of Acting Workshop of StageArt held in Apr16, workshop director: Ravi Kumar SharmaHe was very hardw...
31/05/2017

Gopal was a attendee of Acting Workshop of StageArt held in Apr16, workshop director: Ravi Kumar Sharma
He was very hardworking from beginning of the workshop.
He has proved that if your goal is fixed nobody can stop you by riding that journey. He is currently active in Theatre plays & short films.
StageArt wishesh you a great career ahead.

https://www.youtube.com/attribution_link?a=n41koKvz9IA&u=%2Fwatch%3Fv%3DXJ9dlRGavuM%26feature%3Dshare

This video is entertainment purpose only, my promise that feel good and enjoy my video during watching this Artist;- gopal ram rana location;- jaipur , rajst...

Yadhu is a attendee of StageArt acting workshop held in DEC 2016, workshop Director: Ravi Kumar Sharma.He is now running...
30/05/2017

Yadhu is a attendee of StageArt acting workshop held in DEC
2016, workshop Director: Ravi Kumar Sharma.
He is now running a YouTube channel named KAAMKAZI, in which he is helping out people in getting their achivements.
Share & subscribe this talent of Jaipur.
We wish him a great career ahead.

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Dinesh A***n a dedicated & punctual plus a hard working attendee of Acting workshop by StageArt Cultural Society held in...
28/05/2017

Dinesh A***n a dedicated & punctual plus a hard working attendee of Acting workshop by StageArt Cultural Society held in December 2016, Workshop director Ravi Kumar Sharma. From the starting of workshop he was very serious about his learning and that made him a good attendee in out of 12 other participants. He is from punjab.
Right now he is Active in short films, latest we can see him here in Movie: Sabak by Mr. Sandeep singh. He is now all set to chase his dreams.
StageArt wish you a great luck ahead.
share his talent as much as you can.

https://m.youtube.com/watch?v=EIEbj5p2lRs

Sabak: As the title itself says that it is a lesson for someone. It is a lesson for those who don’t believe in God. We should always believe in him. In this ...

Akash, a attendee of Acting Workshop by StageArt Cultural Society held in May 2016. Workshop Director Mr. Ravi Kumar Sha...
26/05/2017

Akash, a attendee of Acting Workshop by StageArt Cultural Society held in May 2016. Workshop Director Mr. Ravi Kumar Sharma.
Akash is doing good these days by actively participating in Theatre Plays & Short movies.
A Video of his short film by Director Mohsin Khan is below.
Share & Support him.
Lets grow the talent from Jaipur.

https://youtu.be/krPoM-dGJxc

Watch the most tragic love story of social media : Sonam Gupta Bewafa Hai- A fiction story of a boy and girl,they met at bust stop and fall in love and one t...

40 दीवसीय एक्टिन्ग र्कशॉप शुरू 40 Days Acting workshop starts on Ravindra Manch.Registration starts. SIGN UP Call 9587 9...
03/04/2017

40 दीवसीय एक्टिन्ग र्कशॉप शुरू
40 Days Acting workshop starts on Ravindra Manch.
Registration starts. SIGN UP
Call 9587 938 938 for more information

40 Days Acting workshop registration starts. SIGN UP for registration
01/04/2017

40 Days Acting workshop registration starts. SIGN UP for registration

Last date to apply for Acting workshop starting from tomorrow.

“The theatre is a spiritual and social x-ray of its time.” - Stella AdlerStageArt Cultural Society wishes all a very Hap...
27/03/2017

“The theatre is a spiritual and social x-ray of its time.”
- Stella Adler

StageArt Cultural Society wishes all a very Happy Theatre Day.

20/02/2017

ACTING Workshop starts:

40 Days Acting workshop on Ravindra Manch, Jaipur.
Time: Morning batch 10-12 pm
Basics of Acting and learning oriented drama play.

Limited seats.
SIGN UP or Contact 9587 938 938

Auditions for reality show by John Barry film's
08/02/2017

Auditions for reality show by John Barry film's

09/01/2017

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𝗦𝘁𝗮𝗴𝗲 𝗔𝗿𝘁 𝗖𝘂𝗹𝘁𝘂𝗿𝗮𝗹 𝗖𝗼𝗰𝗶𝗲𝘁𝘆 (𝗦𝗔𝗖𝗦)

𝗦𝘁𝗮𝗴𝗲 𝗔𝗿𝘁 𝗖𝘂𝗹𝘁𝘂𝗿𝗮𝗹 𝗖𝗼𝗰𝗶𝗲𝘁𝘆 (𝗦𝗔𝗖𝗦) is a organization formed in 2016. It is the artist junction devoted to training of actors for stage, film and television. Participant goals include individual self-improvement, enhanced communication skills, honing existing theatrical abilities and preparation for future. At stage art we seek out and train exceptional dramatic artists. Our workshop ensures that every generation can have the most extraordinary impact on the world through their work in theater, film, television. We also offer a comprehensive range of workshops to suit students and other professionals of all abilities. The workshop will be based on the principles of experiential learning. Our workshops weave role-playing, interactive group activities, hands-on experiences, simulation activities, group discussions, visual aids, games, and quiz. The aim is to address problems, challenges and real-life situations with practical and concrete solutions. Our activities are designed to make learning easier for the participants by fostering interaction so they can create something unique and better.