Vivechana Theater Group jabalpur

Vivechana Theater Group jabalpur Vivechana is a theatre group established in 1975 in Jabalpur M P. Vivechana has earned a name in the

विवेचना
जबलपुर में सन् 1960 के आसपास का समय सांस्कृतिक रूप से सक्रियता का समय था। शहर में युवकों और प्रौढ़ों की एक बहुत बड़ी संख्या ऐसी थी जो राजनैतिक रूप से बहुत सजग थे और लगातार साहित्यिक, राजनैतिक गतिविधियों पर आलोचक की नजर रखते थे। निरंतर चर्चाओं और गोष्ठियों का क्रम चला करता था। कुछ अड्डे भी थे जहां लोग जमा होते थे और बातचीत हुआ करती थी। प्रोफेसर ताम्हनकर ने इन्हीं दिनों एक ऐसे मंच की जरूरत मह

सूस की जो विभिन्न ज्वलंत विषयों पर परिसंवाद आयोजित करे। विशिष्ट वक्ताओं को बुलाकर व्याख्यान आयोजित किये जा सकें। इसी विचार के साथ विवेचना का जन्म हुआ। उस समय विवेचना में सक्रिय हुए सर्वश्री हरिशंकर परसाई, मायाराम सुरजन, शेषनारायण राय, डा रमन, महेन्द्र वाजपेयी, हनुमान वर्मा, ज्ञानरंजन, डा के के वर्मा, डा ए पी सिंह आदि।
विवेचना के गठन के बाद परिसंवादों का लंबा सिलसिला शुरू हुआ। भारत को अणुबम बनाना चाहिये या नहीं, चेकोस्लाविया प्रकरण, खाद्यान्न व्यापार का अधिग्रहण, बैंकों का राष्ट्रीयकरण, जैसे अनेक प्रश्नों पर गंभीर परिसंवाद आयोजित किये गये। चेकोस्लाविया प्रकरण पर बोलने के लिये उड़ीसा के तत्कालीन राज्यपाल विशंभरनाथ पांडे आये थे।
प्रो ताम्हनकर विवेचना के जन्मदाता और प्रमुख संयोजक थे। प्रायः व्याख्यान नगर निगम के वर्तमान बैठक कक्ष में आयोजित होते थे जो उस समय सार्वजनिक बैठकों के लिये इस्तेमाल किया जाता था। गोष्ठियां लगातार जारी रहीं यद्यपि पुराने लोग कम होते गए पर नए सक्रिय लोगों का आना भी जारी रहा। सन् 1974-75 के आसपास विवेचना में प्राध्यापकों का एक नया समूह सक्रिय हुआ। एक नया विचार उठा कि बात को कहने के लिये सभागार से बाहर निकल कर बाहर सड़क पर आया जाए। इस विचार से शुरूआत हुई नाटकों की। विवेचना में कुछ युवा और छात्र जुडे़। अलखनंदन विवेचना में आए और उनने नाटकों के निर्देशन का बीड़ा उठाया। उस समय एम ए के छात्र शशांक ने एक रात में नुक्कड़ नाटक लिखा ’जैसे हम लोग’ और 1 मई 1975 को इस नाटक का प्रदर्शन नगर की सड़कों चौराहों पर किया गया। जबलपुर शहर में पहला अवसर था जब नुक्कड़ नाटक मंचित हुआ। यही समय था जब संस्कृति विभाग ने मध्यप्रदेश कला परिषद ( राज्य संगीत नाटक अकादमी ) के अंतर्गत गतिविधियां शुरू की थीं। पहले नाट्य समारोह से विवेचना के नाटक कला परिषद के समारोहों के अनिवार्य अंग बन गये। उसके बाद विवेचना में प्रतिवर्ष कम से कम एक नया नाटक तैयार हुआ। पहला मंच नाटक गिनी पिग (1976) था। इसका मंचन सतना में भी हुआ। फिर तैयार हुआ फज्ल ताबिश का नाटक डरा हुआ आदमी (1977) इसके शो रायपुर व लखनऊ में भी हुए। गोदो के इंतजार में (1978) विवेचना की महत्वपूर्ण प्रस्तुति रही जिससे अलखनंदन एक प्रतिभाशाली निर्देशक के रूप में सामने आए। इसका भोपाल मंचन आज भी याद किया जाता है। लखनऊ से आए चितरंजन दास के निर्देशन में हमीदुल्ला का नाटक दरिन्दे(1978) तैयार हुआ। यह नाटक बहुत लोकप्रिय हुआ और इसके मंचन सागर शहडोल अमलाई आदि में हुए और बहुत चर्चित हुआ। दुलारी बाईे(1979) का मंचन भी विवेचना की उपलब्धि रहा। मणिमधुकर के कम चर्चित नाटक ’इकतारे की आंख’ े(1979) का प्रथम मंचन विवेचना ने किया। इसका शो श्रीराम सेंटर दिल्ली के राष्ट्रीय नाट्य समारोह (1979)में किया गया। फज्ल ताबिश का दूसरा महत्वपूर्ण नाटक अखाड़े से बाहर (1980) तैयार हुआ जिसका मंचन ग्वालियर, भोपाल, रायपुर आदि में भी हुआ। इसी समय भोपाल में भारत भवन रंगमंडल बना जिसमें जबलपुर से अलखनंदन, गंगा मिश्रा और राजकुमार कामले चुने गये। अलखनंदन के भारत भवन चले जाने के बाद विवेचना के नाटकों निर्देशन अरूण पांडेय ने किया। इस दौरान बादल सरकार का नाटक जुलूस(1981) तैयार किया गया। इसके मंचन बहुत हुए। उज्जैन, रीवां मंे इसके यादगार मंचन हुए। इसी समय 1983 में बंसी कौल जबलपुर आए और कालिदास अकादमी के लिये आचार्य दण्डी का नाटक ’दशकुमार चरित’ तैयार कराया। इसका मंचन कालिदास समारोह उज्जैन में हुआ। इसमें प्रमुख भूमिका हिमांशु राय की थी। सन् 1983 मंे अलखनंदन ने ’बकरी’ नाटक तैयार करवाया। इसके मंचन बहुत सराहे गये। 1984 में अलखनंदन ने भोपाल से आकर दो नुक्कड़ नाटक तैयार कराये। ’राजा का बाजा’ और ’मशीन’। तपन बैनर्जी ने ’इंस्पेक्टर मातादीन चांद पर’ का नाट्य रूपांतर किया और उन्हीं के निर्देशन में यह नाटक तैयार हुआ। इन तीन नुक्कड़ नाटकों के सैकड़ों प्रदर्शन जबलपुर व पूरे मध्यप्रदेश के विभिन्न जिलों के साथ ही देश में अनेक शहरों में हुए। इससे विवेचना को राष्ट्रीय पहचान मिली। सन् 1985 में वसंत काशीकर के निर्देशन में ’पोस्टर’ तैयार हुआ। तपन बैनर्जी के निर्देशन में ’राम रचि राखा’ (1986) और ’एक अराजक की अचानक मौत’ (1987)तैयार किये गये और बहुत पसंद किये गये। इसी बीच आलोक चटर्जी जो राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में छात्र थे कई बार जबलपुर आए। उन्होंने तीन कहानियों के मंचन किए। विवेचना के कलाकारों के साथ ’सगीना महतो’ (1984) नाटक तैयार कराया। बाद में ’इडीपस’ और संस्कृत नाटक ’उरूभंगम’ तैयार कराया। इसी दौर में विवेचना ने ’लोककथा’, ’हरदौल’, ’भोले भड़या’, ’दूर देश की कथा’, जैसे नाटक भी तैयार किये जिनके बहुत मंचन प्रदेश के अनेक शहरों में हुए। 1989 में विवेचना को संगीत नाटक अकादमी की यंग डायरेक्टर्स योजना के अंतर्गत अरूण पांडेय के निर्देशन में ’ईसुरी’ नाटक करने का मौका मिला। इसे बाद में ’हंसा उड़ चल देस बिराने’ नाम दिया गया। यह नाटक बहुत प्रसि़द्ध हुआ और पूरे देश में इसके तीस से अधिक के लगभग मंचन हुए। इस नाटक के मंचन दिल्ली, चंडीगढ़, जम्मू, शिमला, पटियाला, कुरूक्षेत्र, हुबली, सागर, भोपाल, रायगढ़, बिलासपुर, जयपुर, आदि शहरों में हुए। विवेचना ने सन् 1990 में ’रामलीला’ और ’सैंया भये कोतवाल’ आलोक चटर्जी के निर्देशन में तैयार किये। ’रामलीला’ के अनेक मंचन हुए। ’हानूश’ (1991) और ’थैंक यू मिस्टर ग्लाड’ (1993) विवेचना की अनूठी प्रस्तुति साबित हुए और इनके बहुत से मंचन हुए। ’हानूश’ में प्रमुख भूमिका नवीन चौबे ने और ’थेंक यू मि ग्लाड’ में प्रमुख भूमिका हिमांशु राय ने निबाही। इस दौरान हुए नाट्य शिविरों में ’मखना के बापू’, ’मोटेराम का सत्याग्रह’ आदि की भी प्रस्तुतियां हुईं। विवेचना का चर्चित नाटक ’निठल्ले की डायरी’ परसाई जी की रचनाओं का कोलाज है जो 1996 में तैयार हुआ और आज तक इसके सर्वाधिक मंचन हुए हैं। नवीन चौबे के निर्देशन में परसाई जी की रचनाओं पर ’मैं नर्क से बोल रहा हूं’ (1998) तैयार हुआ जिसके मंचन लोकप्रिय हुए। सन् 1999 में उदयप्रकाश की कहानी पर अरूण पांडेय के निर्देशन में ’और अंत में प्रार्थना’ तैयार हुआ। सन् 2000 में अरूण पांडेय के निर्देशन में ’चौक परसाई’ जो परसाई जी की रचनाओं का था कोलाज तैयार किया गया। जावेद जैदी, भोपाल के निर्देशन में 2002 में ’मुआवजे’ नाटक तैयार होकर मंचित हुआ।
विवेचना ने अरूण पांडेय के निर्देशन में मुक्तिबोध की रचनाओं पर ’तुम निर्भय ज्यों सूर्य गगन में’ कविता मंचन तैयार किया जिसपर दूरदर्शन ने फिल्म भी बनाई। अनेक कवियों की कविताओं के मंचन किये गये।
सन् 2002 तक एक साथ काम करने के बाद सन् 2003 से अरूण पांडेय और नवीन चौबे ने ’विवेचना रंगमंडल’ के नाम से मूल संस्था ’विवेचना’ से अलग होकर काम करना शुरू कर दिया। उनका 2006 का अलग पंजीयन है। नामों के साम्य के कारण इस कारण मूल विवेचना संस्था के बारे में गलतफहमी होती रहती है। हिमांशु राय व बांकेबिहारी ब्यौहार ने इस स्थिति से उबरकर विवेचना को सम्हाला और आज भी मूल संस्था विवेचना अपने श्रेष्ठ नाट्य मंचनों और श्रेष्ठ आयोजनों के कारण भारत में सम्मान के साथ जानी जाती है।
सन् 2006 में विवेचना के पुराने साथी वसंत काशीकर ने मूल विवेचना संस्था के कलाकारों को जोड़कर नाटकों की तैयारी शुरू की। सन् 2006 में वसंत काशीकर के निर्देशन में विवेचना ने ’मायाजाल’ नाटक तैयार किया। सन् 2007 में वसंत काशीकर के निर्देशन में ’मानबोध बाबू’ तैयार हुआ। सन् 2008 में वसंत काशीकर के निर्देशन में ’सूपना का सपना’ तैयार हुआ। सन् 2009 में ’मित्र’ नाटक मंचित हुआ। सन् 2010 में ’मौसाजी जैहिन्द’ नाटक मंचित हुआ। सन् 2011 में नाटक ’दस दिन का अनशन’ मंचित हुआ। सन् 2012 में नाटक ’सवाल अपना अपना’ का मंचन हुआ। सन् 2013 में बादल सरकार के नाटक ’बड़ी बुआ जी’ का मंचन जबलपुर व इंदौर में हुआ। सन् 2014 में तपन बैनर्जी के निर्देशन में ’कंजूस’ का मंचन हुआ। मायाजाल, मानबोध बाबू, सूपना का सपना, दस दिन का अनशन मंे प्रमुख भूमिकाएं संजय गर्ग और सीताराम सोनी ने निबाहीं। मित्र, मौसाजी जैहिन्द में प्रमुख भूमिका वसंत काशीकर ने निबाहीं। विवेचना के नाटकों के मंचन भोपाल, मंडला, नरसिंहपुर, रायपुर, भिलाई, इलाहाबाद, बनारस, नागपुर, जयपुर, जोधपुर, उदयपुर, कलकत्ता, मुम्बई, दिल्ली, लखनऊ आदि शहरों में हुए हैं। विवेचना को मुम्बई के सुप्रसिद्ध ’काला घोउ़ा फेस्टीवल’ में 2014 व 2015 में लगातार आमंत्रित किया गया जहां विवेचना के नाटक ’मानबोध बाबू’, ’दस दिन का अनशन’ और ’मौसाजी जैहिन्द’ बहुत पसंद किए गए।
विवेचना द्वारा सन् 1983 में पहला नाट्य शिविर आयोजित किया गया। इसमें शहर के 80 युवा शामिल हुए। तब से प्रतिवर्ष नाट्य शिविर का आयोजन एक अनिवार्यता बन गयी। आज जबलपुर में जो लोग रंगकर्म में सक्रिय हैं या पिछले कुछ सालों तक सक्रिय रहे हैं वो सभी विवेचना के किसी न किसी वर्कशाप की देन हैं। वर्ष 2008 में राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के सहयोग से विवेचना ने सुनील सिन्हा के निर्देशन में थियेटर वर्कशाप आयोजित किया। विवेचना द्वारा महाविद्यालयों में एक दिवसीय नाट्य कार्यशाला का आयोजन बहुत लोकप्रिय रहा है। विवेचना द्वारा मेकअप, लाइट सैट आदि तकनीकी विषयों पर कार्यशालाऐं आयोजित की गई हैं। बच्चों की कार्यशालाएं व स्कूलों में बच्चों के लिये कार्यशालाएं नियमित रूप से आयोजित होती हैं।
विवेचना द्वारा सन् 1994 से राष्ट्रीय नाट्य समारोह का आयोजन शुरू किया गया है। सन् 1994 से अब तक बाइस राष्ट्रीय नाट्य समारोहों में अब तक अबतक सर्वश्री हबीब तनवीर, बा.व.कारंत, बंसी कौल, सतीश आलेकर, राज बिसारिया, जुगल किशोर, तनवीर अख्तर, दिनेश खन्ना, नादिरा बब्बर, के एस राजेन्द्रन, उषा गांगुली, अरविंद गौड़, सुरेश भारद्वाज, अशोक बांठिया, पियूष मिश्रा, रंजीत कपूर, अनिलरंजन भौमिक, संजय उपाध्याय, इप्टा भिलाई, वेदा राकेश, नजीर कुरैशी, बलवंत ठाकुर, जावेद जैदी व श्रीमती गुलबर्धन, अलखनंदन, लईक हुसैन, विजय कुमार, अजय कुमार, विवेक मिश्रा, अशोक राही, वसंत काशीकर, दिनेश ठाकुर, अजित चौधरी, रवि तनेजा, जे पी सिंह मानव कौल,डा एम सईद आलम, रमेश तलवार, अनूप जोशी, इमरान राशिद, त्रिपुरारी शर्मा, महमूद फारूखी, मनीष जोशी, अनूप जोशी, अर्जुनदेव चारण, सुदेश शर्मा, अवनीश मिश्रा, दानिश इकबाल, इश्तियाक आरिफ खान, द्वारा निर्देशित 115 नाटक मंचित हो चुके हैं। जबलपुर का यह नाट्य समारोह अब पूरे देश में रंगकर्मियों को आकर्षित करता है। विवेचना का नाट्य समारोह बहुत सुनियोजित और सुव्यवस्थित आयोजन है जिसके कारण आज विवेचना के समारोह का आकर्षण पूरे देश में है। विवेचना के समारोह में प्रतिदिन 800 दर्शक आते हैं। विवेचना ने नाटकों के लिए एक बड़ा दर्शक वर्ग विकसित किया है।
विवेचना द्वारा समय समय पर सामयिक विषयों पर संगोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। सन् 1982 में विवेचना ने साम्प्रदायिकता पर राष्ट्रीय गोष्ठी का आयोजन किया। सन् 1986 में ’हिन्दी का जातीय गद्य’ पर राष्ट्रीय गोष्ठी आयोजित की गई। सन् 1996 में ’साक्षरता’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। सन् 1998 में ’हिन्दी थियेटर’ पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित की गई। सन् 2005 में ’सामाजिक आन्दोलनों में रंगकर्म की भूमिका’ विषय पर राष्ट्रीय संगोष्ठी आयोजित हुई। स्थानीय स्तर पर विवेचना द्वारा प्रतिमाह गोष्ठियों का आयोजन किया जाता है। विश्व रंगमंच दिवस, 23 मार्च भगतसिंह

05/06/2026

विवेचना की बाल रंग कार्यशाला का शानदार समापन

ये कुत्ता किसका है नाटक से दर्शक हुए प्रभावित

कार्यशाला में तैयार गीतों और चित्रों में झलकी बाल प्रतिभाएं

विवेचना थियेटर ग्रुप द्वारा 1 मई 2026 से 8 साल से 16 साल के बच्चों का नाट्य शिविर आयोजित किया गया। इस शिविर में 18 बच्चों ने हिस्सा लिया। शिविर का निर्देशन युवा रंगकर्मी आदित्य रूसिया ने किया। शिविर में बच्चों को रंगमंच की बारीकियों की जानकारी दी गई। उन्हें थियेटर गेम्स और थियेटर इम्प्रोवाईजेशन के माध्यम से रंगमंच से परिचित कराया। शिविर में बच्चों को संगीत की प्रारंभिक शिक्षा दी गई। उन्हें सुरों का ज्ञान कराया गया। बच्चों को चित्रकला और क्राफ्ट की कलाओं से परिचित कराया गया। शिविर में आदित्य रूसिया और शाश्वत कांड्या ने थियेटर का प्रशिक्षण दिया। आदित्य रूसिया, बालकृष्ण राय व निर्मल खंपरिया, जगदीश धर्मक ने संगीत और गायन का प्रशिक्षण दिया। अवधेश बाजपेयी ने चित्रकला के बारे में बच्चों को जानकारी दी। शैली धोपे ने बच्चों को नृत्य विधा के बारे में बताया। पल्लव शुक्ला ने बच्चों को क्राफ्ट का काम सिखाया। बच्चों को शिविर में कलाओं की विविध विधाओं से परिचय मिला। पूरे माह बच्चों ने नाटक की रिहर्सल की। उन्हें पता चला कि नाटक में सैट, कास्ट्यूम, मेकअप, लाइट साउंड का क्या महत्व है।
एक माह के सघन प्रशिक्षण के बाद 4 जून की संध्या जाॅय हायर सेकेण्डरी स्कूल विजयनगर के आडीटोरियम में बच्चों ने एक हास्य व्यंग्य नाटक ’ये कुत्ता किसका है ?’ नाटक का मंचन का दर्शकों को भावविभोर कर दिया। इस नाटक के लेखक नरेश जैन हैं और निर्देशन आदित्य रूसिया ने किया है। नाटक गांव के परिवेश में है और गांवों में छुआछूत और ग्रामीणों की चालाकियों पर कटु प्रहार करता है। राधे और उसकी पत्नी गांव में नए नए आए स्कूल मास्टर के घर के सामने अपना मरा कुत्ता चुपचाप फेंक देते हैं और उस पर मरे कुत्ते को उठवाने का दबाव डालते हैं। मास्टर एक बच्चे से कुत्ता फिकवा देता है तो पूरा गांव बच्चे पर किए गए अत्याचार के लिए मास्टर के पीछे पड़ जाता है। पंचायत में इंस्पेक्टर आकर सबकी पोल खोल देता है और मास्टर को बचाता है।
नाटक में प्रिंसिपल, राधे - ईहान,स्त्री व हुल्कर की पत्नी - रिद्धि उपाध्याय, मद्दू - राघवी, सरपंच - शाश्वत, हुल्कर व मलोट मियां - आयुष, भीखम नाई ,उद्घोषक - अग्रिमा, मास्टर जी - भव्य जैन, खुशाल - रिद्धिमा, ग्रामीण - अर्पिता, पर्व, आरोही, शरण्या, याशिका, पुलिस इंस्पेक्टर - अरहम जैन, खुमान सिंह - हृदयांश चैकसे,पंडित जी - समीर दास, सूत्रधार - अक्षदा तोमर बने थे। सभी बच्चों ने अपने अभिनय और भोलेपन से दर्शकों का मन जीत लिया।
बच्चों द्वारा शंकर शैलेन्द्र का गीत - ’तू जिन्दा है तू जिन्दगी की जीत पर यकीन कर, जीवन यदु का गीत - जब तक रोटी के प्रश्नों पर रखा रहेगा भारी पत्थर, और दुष्यंत कुमार का गीत - ले मशालें चल पड़े हैं लोग मेरे गांव के’ प्रस्तुत किए गए।
कार्यक्रम के अंत में बच्चों का पात्र परिचय हुआ। फिर बच्चों के अभिभावकों के साथ फोटो और प्रमाण पत्र वितरण हुआ।
इस कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण था आर्या और अनाया नाम की दो छोटी बालिकाओं द्वारा भरतनाट्यम की एक छोटी मगर सुंदर प्रस्तुति जिसने मन मोह लिया।
इस अवसर पर बड़ी संख्या में दर्शक और बच्चों के परिजन एकत्रित हुए। दर्शकों ने बच्चों के अभिनय व प्रशिक्षण और आदित्य रूसिया की मेहनत व लगन की भूरि भूरि प्रशंसा की।
अतिथि के रूप में जाॅय स्कूल के श्री तनय मेबिन, यशभारत के संपादक आशीष शुक्ला व समाजसेविका श्रीमती गीता तिवारी, अनामिका तिवारी, रॉयल हायर सेकेंडरी स्कूल के राघवेंद्र सिंह चौहान, वर्षा चौहान , डॉ बी के गुहा, लेखक राजेंद्र दानी,नरेश जैन, युवा निर्देशक अक्षय ठाकुर , मुरलीधर नागराज आदि अतिथि के रूप में उपस्थित थे।
विवेचना की ओर से मंच संचालन बद्रीश पांडेय ने किया। इस अवसर पर हिमांशु राय, बांकेबिहारी ब्यौहार, अजय धाबर्डे, चिन्टू स्वामी, भावना दीक्षित आदि उपस्थित थे। विवेचना द्वारा घोषित किया गया कि बच्चों का यह वर्कशाॅप हर गर्मी में आयोजित होगा। बच्चों का संडे थिएटर क्लब शुरू किया जा रहा है।
हिमांशु राय See less

*विवेचना थिएटर ग्रुप, जबलपुर, मध्य प्रदेश*  *Workshop का आज 17वां दिन*आज हमारी workshop का सत्रहवाँ दिन था।  _अवदेश वाजप...
19/05/2026

*विवेचना थिएटर ग्रुप, जबलपुर, मध्य प्रदेश*
*Workshop का आज 17वां दिन*

आज हमारी workshop का सत्रहवाँ दिन था।
_अवदेश वाजपेयी जी_ के मार्गदर्शन में बच्चों के साथ कला पर बहुत ही रोचक चर्चा हुई।

सेशन की शुरुआत में वाजपेयी जी ने बच्चों से हिंदी में परिचय लिया, और फिर बच्चों की रुचियों के बारे में जाना। ज्यादातर बच्चों ने बताया कि उन्हें पेंटिंग, स्केचिंग और कला पसंद है।

इसके बाद उन्होंने हर बच्चे से ऐसे पाँच पेड़ों के नाम पूछे जो उन्होंने देखे हों। बातचीत धीरे-धीरे रोज़मर्रा की चीज़ों तक पहुँच गई, जैसे गेहूँ से रोटी कैसे बनती है, चावल की खेती कैसे होती है, और खेती-बाड़ी कैसे काम करती है।

अवदेश वाजपेयी जी ने यह भी बताया कि आने वाली प्रदर्शनी के लिए बच्चों द्वारा बनाई गई पेंटिंग्स को वेस्ट मटेरियल से फ्रेम किया जाएगा।

सेशन बहुत ही शानदार रहा। हम अवदेश वाजपेयी जी का दिल से धन्यवाद करते हैं। वे आगे भी हमारा मार्गदर्शन करते रहेंगे, और पेंटिंग वर्कशॉप उन्हीं के निर्देशन में चल रही है।

*19 मई की दोपहर, विवेचना का हॉल फिर रौनक से भर गया था।*आज वर्कशॉप का 19वां दिन था। बच्चों ने आते ही सबसे पहले नाटक के से...
19/05/2026

*19 मई की दोपहर, विवेचना का हॉल फिर रौनक से भर गया था।*

आज वर्कशॉप का 19वां दिन था। बच्चों ने आते ही सबसे पहले नाटक के सेट पर काम शुरू किया। हथौड़ी, रंग, परदे - सब बच्चे खुद संभाल रहे थे। सेट जमाते-जमाते ही दूसरे सीन की रीडिंग भी शुरू हो गई। डायलॉग पर डायलॉग, एक-एक शब्द पर मेहनत।

आज का दिन खास मेहमानों के नाम रहा।

सबसे पहले आए विवेचना के वरिष्ठ साथी *खम्परिया जी*। बांसुरी के जादूगर, संगीत के जानकार। उनके साथ उनकी बड़ी बेटी भी मुंबई से खास वर्कशॉप देखने आई थीं। उन्होंने बच्चों का काम देखा, हौसला बढ़ाया। हमने उन्हें समापन समारोह का न्योता भी दे दिया।

फिर आईं *शैली धोपे जी*। उन्होंने पूरा सेशन देखा, बच्चों के बीच बैठीं, उनसे खूब बातें कीं, इंटरैक्ट किया। बच्चों के सवाल, उनकी हंसी, उनका कॉन्फिडेंस - सब देखकर वो भी खुश हो गईं।

दिन का सबसे सुरमई हिस्सा आया जब जबलपुर के मशहूर हारमोनियम वादक और संगीतकार *बालकिशन राय जी* हॉल में दाखिल हुए। उन्होंने बच्चों से गीत सुने। एक-एक बच्चे को सुना, समझाया, और फिर जो कहा वो सबके दिल में घर कर गया - _"ये बच्चे मंच तक पहुँचने की हिम्मत कर रहे हैं। और जिस उत्साह, जिस कॉन्फिडेंस के साथ कर रहे हैं, वो काबिल-ए-तारीफ है।"_

बच्चों की आँखें चमक उठीं।

हम विवेचना परिवार की तरफ से खम्परिया जी, शैली डुपे जी, बालकिशन राय जी और आए हुए सभी मेहमानों का दिल से शुक्रिया अदा करते हैं। आप लोगों का साथ मिला तो बच्चों का हौसला दोगुना हो गया।

19 दिन पूरे। अब समापन की तरफ बढ़ रहे हैं। काम इसी जोश के साथ जारी रहेगा।

---

विवेचना का बच्चों का थियेटर वर्कशॉप मध्यप्रदेश की सक्रिय नाट्य संस्था विवेचना थियेटर ग्रुप का स्कूली बच्चों का वर्कशॉप म...
28/04/2026

विवेचना का बच्चों का थियेटर वर्कशॉप

मध्यप्रदेश की सक्रिय नाट्य संस्था विवेचना थियेटर ग्रुप का स्कूली बच्चों का वर्कशॉप

मध्यप्रदेश की सक्रिय नाट्य संस्था विवेचना थियेटर ग्रुप द्वारा जबलपुर में स्कूली बच्चों की वर्कशॉप का आयोजन आगामी 1 मई से 25 मई 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। इस वर्कशॉप में 8 वर्ष से 16 वर्ष तक के बच्चे भाग ले सकते हैं।
बच्चों का यह कला मेला विंग्स ऑफ जॉय स्कूल, एम आर 4, विजय नगर, आदि प्लाजा बिल्डिंग के पास में प्रतिदिन सुबह 9.30 बजे से 12.30 बजे तक संचालित होगा। इस कला मेले में गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को नाटक, संगीत, नृत्य, गायन, क्राफ्ट और ड्राइंग-पेंटिंग सिखाई जाएगी। बच्चों को खेल खेल में विभिन्न कलाओं का ज्ञान दिया जाएगा।
मोबाइल-कम्प्यूटर गेम्स से दूर रखकर उन्हें अपने मन के मुताबिक खेलने और कलाओं को सीखने का अवसर मिलेगा। बड़े बच्चों को थियेटर गेम्स, चरित्र अध्ययन, मूवमेन्ट, नृत्य और संगीत के माध्यम से नाटक से जुड़ने और व्यक्तित्व विकास का अवसर मिलेगा। आज के
स्पर्धा के युग में बच्चों में इन गुणों का विकास होना बहुत आवश्यक है। विवेचना के स्कूली बच्चों के वर्कशॉप को आदित्य रूसिया व अन्य विशेषज्ञ संचालित करेंगे।
विवेचना के बच्चों के कला मेले और थियेटर वर्कशॉप हेतु रजिस्ट्रेशन 30 अप्रैल तक विंग्स आफ जाय में शाम 6 बजे से 8 बजे तक किया जा सकता है। बच्चों के वर्कशॉप हेतु विवेचना के हिमांशु राय मो 9425387580 बांकेबिहारी ब्यौहार 9827215749 अजय धाबर्डे 7770805826 व आदित्य रूसिया 9617529960 से संपर्क किया जा सकता है।

हिमांशु राय,
सचिव, विवेचना
9425387580

विवेचना का बच्चों का थियेटर वर्कशॉप मध्यप्रदेश की सक्रिय नाट्य संस्था विवेचना थियेटर ग्रुप का स्कूली बच्चों का वर्कशॉप  ...
23/04/2026

विवेचना का बच्चों का थियेटर वर्कशॉप

मध्यप्रदेश की सक्रिय नाट्य संस्था विवेचना थियेटर ग्रुप का स्कूली बच्चों का वर्कशॉप

मध्यप्रदेश की सक्रिय नाट्य संस्था विवेचना थियेटर ग्रुप द्वारा जबलपुर में स्कूली बच्चों की वर्कशॉप का आयोजन आगामी 1 मई से 25 मई 2026 तक आयोजित किया जा रहा है। इस वर्कशॉप में 8 वर्ष से 16 वर्ष तक के बच्चे भाग ले सकते हैं।
बच्चों का यह कला मेला विंग्स ऑफ जॉय स्कूल, एम आर 4, विजय नगर, आदि प्लाजा बिल्डिंग के पास में प्रतिदिन सुबह 8.30 बजे से 12 बजे तक संचालित होगा। इस कला मेले में गर्मी की छुट्टियों में बच्चों को नाटक, संगीत, नृत्य, गायन, क्राफ्ट और ड्राइंग-पेंटिंग सिखाई जाएगी। बच्चों को खेल खेल में विभिन्न कलाओं का ज्ञान दिया जाएगा।
मोबाइल-कम्प्यूटर गेम्स से दूर रखकर उन्हें अपने मन के मुताबिक खेलने और कलाओं को सीखने का अवसर मिलेगा। बड़े बच्चों को थियेटर गेम्स, चरित्र अध्ययन, मूवमेन्ट, नृत्य और संगीत के माध्यम से नाटक से जुड़ने और व्यक्तित्व विकास का अवसर मिलेगा। आज के स्पर्धा के युग में बच्चों में इन गुणों का विकास होना बहुत आवश्यक है। विवेचना के स्कूली बच्चों के वर्कशॉप को आदित्य रूसिया व अन्य विशेषज्ञ संचालित करेंगे।
विवेचना के बच्चों के कला मेले और थियेटर वर्कशॉप हेतु रजिस्ट्रेशन 30 अप्रैल तक विंग्स आफ जाय में शाम 6 बजे से 8 बजे तक किया जा सकता है। बच्चों के वर्कशॉप हेतु विवेचना के हिमांशु राय मो 9425387580 बांकेबिहारी ब्यौहार 9827215749 अजय धाबर्डे 7770805826 व आदित्य रूसिया 9617529960 से संपर्क किया जा सकता है।

हिमांशु राय,
सचिव, विवेचना
9425387580

22 04 2026

10/03/2026
09/03/2026

नमूना सार्थक दोपहर
दीपा के घर हुई रिहर्सल
आज की दोपहर बहुत यादगार रही। कल संजय गर्ग ने फोन करके कहा था कि भैया आपको कल दीपा के घर आना है। सब लोग जमा हो रहे हैं। आज दोपहर पंहुचा तो दीपा का घर ढूंढने में थोड़ा समय लगा। फिर संजय लेने आ गए और पंहुचे तो पता चला कि रेलवे का नाटक मुम्बई में होना है। उसकी रिहर्सल वैसे तो रोज कार्यालय में होती ही है पर आज दीपा ने अपने घर पर रखी और साथ में शहर के सभी मित्रों को भी निमंत्रित किया। दीपा सिंह बहुत प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं। साथ ही बहुत अच्छी प्रबंधक और व्यवस्थापक हैं। अपने कार्यालय के कार्य में बहुत कुशल हैं।

रेलवे में सांस्कृतिक कोटे से कलाकार भरती होते हैं साथ ही रेलवे में काम करने वाले कर्मचारी-कलाकार भी रेलवे के द्वारा आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं में नाटक, गीत, संगीत की प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं। जबलपुर इस मायने में सौभाग्यशाली रहा है कि जबलपुर के रेलवे के कल्चरल सैल में हमेशा बहुत श्रेष्ठ कलाकार रहे जो शहर की कला संस्थाओं में भी महत्वपूर्ण योगदान देते रहे हैं। स्व महेश गुरू, स्व सीताराम सोनी, स्व हेमंत कुलकर्णी, स्व संजय खन्ना, पृथ्वीराज, विजय पसेरिया, देश के वरिष्ठ स्टैंडअप कामेडियन के के नायकर, प्रकाश कुलकर्णी और न जाने कितने लोग रेलवे में रहे और रेलवे की सांस्कृतिक गतिविधियों का हिस्सा रहे। रेलवे की टीम का मुम्बई जाना एक उत्सव होता था। ऐसी यात्रा जिसमें न जाने कितने तीर्थयात्री तर जाते थे।

कलाकारी से बढ़ते बढ़ते संजय गर्ग अब निर्देशक की जिम्मेदारी बखूबी सम्हाल रहे हैं। अलखनंदन के साथ भोपाल से रंगयात्रा शुरू करने वाले संजय ने अभिनय में खूब झंडे गाडे़ हैं। विशेष रूप से बच्चों के नाटकों में वो सिद्ध हैं। बहरहाल अभी संजय गर्ग ने आशुतोष की कहानी ’पिता का नाच’ का नाट्य रूपांतर ’सखी सुहाग राम मोहे दीन्हा ’ के नाम से किया है। उसी का शो होना है। नाट्य रूपांतर में संजय की मास्टरी है।

उसी की रिहर्सल आज दीपा के घर की छत पर हुई। धूप के लिए शामियाना लगाया गया था। पूरा साउंड सिस्टम था। सारे वाद्ययंत्र थे। बहुत हंसी खुशी और पारिवारिक माहौल था। चाय नाश्ते के बाद रिहर्सल शुरू हुई। पूरा नाटक मुख्य पात्र नचनिया पर आधारित है। इसे रिज़वान अली ख़ान निभा रहे हैं और क्या खूब निभा रहे हैं। रिजवान रेलवे के बहुत वरिष्ठ कलाकार हैं। उन्हें बहुत सालों से देख रहा हूं। बहुत अ़च्छे अभिनेता हैं और उतने ही अच्छे गायक वादक हैं। आज की रिहर्सल में उनका अभिनय के प्रति समपर्ण और लगन देखकर मन प्रसन्न हो गया। नाटक में 15 लोगों की टीम है। दीपा, तरनजीत, करूणा, कविता जैसी महिलाएं भी हैं। नए पुराने बहुत से पुरूष कलाकार रिज़वान, अजय, मयंक अग्निहोत्री भी हैं। मगर ये देखकर खुशी हुई कि कोई भी कच्चा नहीं है। सब अच्छे और सिद्ध कलाकार हैं। ये भी लगा कि सब लोग नाटक को, रिहर्सल को बहुत उन्मुक्तता और आनंद से कर रहे हैं। गायन वादन मंडली में कंचन पसेरिया, अरविंद, पैड पर दिलीप और हारमोनियम पर अजय गंगोलिया मोर्चा सम्हाले थे और क्या खूब सम्हाले थे। पूरी टीम एक ट्यून में बंधी थी।

रिहर्सल खत्म होने पर गाना बजाना हुआ। अजय गंगोलिया उज्जैन से आए हैं। वो संगीत के परिवार से ही हैं। उन्होंने कबीर सुनाया - जरा धीरे धीरे गाड़ी हांको मेरे राम गाड़ी वाले। रिजवान और कंचन ने बहुत मधुर फिल्मी गीत सुनाया। और भी लोगों ने गाया। हंसी ठिठोली चलती रही। फिर खाना शुरू हुआ। इस बीच आत्मानंद भी आ गये। वो इस नाटक में नहीं है मगर बहुत अच्छे कलाकार हैं और रेलवे के कार्यक्रमों महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दीपा ने बहुत से लोगों को निमंत्रित किया था। ऐसा लग रहा था कि एक कुटुंब के सारे लोग जमा हैं। सबका स्नेह बरस रहा था। भोजन बहुत अच्छा था। खाकर कुछ देर बैठकर मैं आत्मानंद के साथ वापस आया।

इस दोपहर ने पचास सालों में रिहर्सल वाले बीते इतवार याद दिला दिए। नाटक की रिहर्सल इतवार को करना सबसे कठिन होता है। सोचा जाता है कि सुबह से शाम तक काम करेंगे और पूरा नाटक खड़ा हो जाएगा। कास्ट्ूम की पेटी भी जम जाएगी। गानों की प्रक्टिस भी हो जाएगी। सैट प्रापर्टी का काम भी हो जाएगा। मगर शायद ही किसी इतवार का ऐसा उपयोग हो पाता है। धीरे धीरे करके दोपहर तक लोग इकठ्ठे होते हैं। उसमें भी कुछ नहीं आते। सबसे अहम दो तीन कलाकार गायब हो जाते हैं। पूरा दिन उनके इंतजार में और उनको गाली देते गुजर जाता है। इस बीच चाय नाश्ता आता रहता है। इतवार होने के कारण सबमें एक सुस्ती छाई रहती है।

इतवार की दोपहर एक शांति चारों ओर छाई रहती है। चाहे गर्मी हो या ठंड एक वीराना सा छाया रहता है। घर के अंदर, सड़कों पर। सब कुछ ठहरा सा लगता है। मैं याद करता रहा कि जहां जहां विवेचना की रिहर्सल हुआ करती थी चाहे जी एस कॉलेज हो या केसरवानी कालेज या भातखंडे, या चंचलाबाई कालेज या नूतन मराठी स्कूल या डिसल्वा स्कूल या न जाने कहां कहां। हमेशा दोपहर की रिहर्सल फेल हो जाया करती थी। रिहर्सल हमेशा शाम को होती रही है। बस इतवार को दोपहर रखी जाती है। यही हाल त्यौहारों पर होने वाली छुट्टी के दिन की रिहर्सल का हुआ करता है।

आज की रिहर्सल देखकर पुराने पचास साल और रिहर्सल और शोज़ सब याद आ गये। एक फिल्म सी घूमती रही यादों में, रिहर्सल की जगहें, सैकड़ों चेहरे याद आते रहे जो रहे इन नाटकों में साथ, गर्मी की लू के थपेड़ों और पतझड़ो वाली दोपहर, धूप सेकते हुए ठंड की दोपहरें, बरसात की गीली दोपहरी। उम्र के इस पड़ाव में मन बार बार अतीत की ओर दौड़ता है।

कैसा पागलपन है कलाकारों में। जीवन के सारे काम नौकरी, घर परिवार सम्हालते हुए जुटे रहते हैं संवाद याद करने में, रिहर्सल करने में, शो करने में। कठिन कठिन यात्राएं करते हैं। शो करने के लिए। पूरे देश में और दुनिया में भी नाटक करने वालों की एक सी ज़िन्दगानी होती है। एक सा फ़साना होता है। अपने आप में गुम। न जाने क्या मिल जाता है जो खींचता रहता है नए नाटक तलाशने, उसकी रिहर्सल करने , उसका शो करने में। ये एक अलग बिरादरी है। इसके सुख और दुख बिलकुल अलग हैं। मगर इस सबमें जो आनंद है वो वही जान सकता है जिसने आज दीपा के घर दोपहरी में रिहर्सल देखी। गाना बजाना किया और खाना खाया।
आज के आनंद की जय, टीम को शुभकामनाएं

हिमांशु राय
08 03 2026 रविवार
रात 11 बजे

नमूना सार्थक दोपहरदीपा के घर हुई रिहर्सल          आज की दोपहर बहुत यादगार रही। कल संजय गर्ग ने फोन करके कहा था कि भैया आ...
09/03/2026

नमूना सार्थक दोपहर
दीपा के घर हुई रिहर्सल
आज की दोपहर बहुत यादगार रही। कल संजय गर्ग ने फोन करके कहा था कि भैया आपको कल दीपा के घर आना है। सब लोग जमा हो रहे हैं। आज दोपहर पंहुचा तो दीपा का घर ढूंढने में थोड़ा समय लगा। फिर संजय लेने आ गए और पंहुचे तो पता चला कि रेलवे का नाटक मुम्बई में होना है। उसकी रिहर्सल वैसे तो रोज कार्यालय में होती ही है पर आज दीपा ने अपने घर पर रखी और साथ में शहर के सभी मित्रों को भी निमंत्रित किया। दीपा सिंह बहुत प्रतिभाशाली अभिनेत्री हैं। साथ ही बहुत अच्छी प्रबंधक और व्यवस्थापक हैं। अपने कार्यालय के कार्य में बहुत कुशल हैं।

रेलवे में सांस्कृतिक कोटे से कलाकार भरती होते हैं साथ ही रेलवे में काम करने वाले कर्मचारी-कलाकार भी रेलवे के द्वारा आयोजित विभिन्न प्रतियोगिताओं में नाटक, गीत, संगीत की प्रतियोगिताओं में भाग लेते हैं। जबलपुर इस मायने में सौभाग्यशाली रहा है कि जबलपुर के रेलवे के कल्चरल सैल में हमेशा बहुत श्रेष्ठ कलाकार रहे जो शहर की कला संस्थाओं में भी महत्वपूर्ण योगदान देते रहे हैं। स्व महेश गुरू, स्व सीताराम सोनी, स्व हेमंत कुलकर्णी, स्व संजय खन्ना, पृथ्वीराज, विजय पसेरिया, देश के वरिष्ठ स्टैंडअप कामेडियन के के नायकर, प्रकाश कुलकर्णी और न जाने कितने लोग रेलवे में रहे और रेलवे की सांस्कृतिक गतिविधियों का हिस्सा रहे। रेलवे की टीम का मुम्बई जाना एक उत्सव होता था। ऐसी यात्रा जिसमें न जाने कितने तीर्थयात्री तर जाते थे।

कलाकारी से बढ़ते बढ़ते संजय गर्ग अब निर्देशक की जिम्मेदारी बखूबी सम्हाल रहे हैं। अलखनंदन के साथ भोपाल से रंगयात्रा शुरू करने वाले संजय ने अभिनय में खूब झंडे गाडे़ हैं। विशेष रूप से बच्चों के नाटकों में वो सिद्ध हैं। बहरहाल अभी संजय गर्ग ने आशुतोष की कहानी ’पिता का नाच’ का नाट्य रूपांतर ’सखी सुहाग राम मोहे दीन्हा ’ के नाम से किया है। उसी का शो होना है। नाट्य रूपांतर में संजय की मास्टरी है।

उसी की रिहर्सल आज दीपा के घर की छत पर हुई। धूप के लिए शामियाना लगाया गया था। पूरा साउंड सिस्टम था। सारे वाद्ययंत्र थे। बहुत हंसी खुशी और पारिवारिक माहौल था। चाय नाश्ते के बाद रिहर्सल शुरू हुई। पूरा नाटक मुख्य पात्र नचनिया पर आधारित है। इसे रिज़वान अली ख़ान निभा रहे हैं और क्या खूब निभा रहे हैं। रिजवान रेलवे के बहुत वरिष्ठ कलाकार हैं। उन्हें बहुत सालों से देख रहा हूं। बहुत अ़च्छे अभिनेता हैं और उतने ही अच्छे गायक वादक हैं। आज की रिहर्सल में उनका अभिनय के प्रति समपर्ण और लगन देखकर मन प्रसन्न हो गया। नाटक में 15 लोगों की टीम है। दीपा, तरनजीत, करूणा, कविता जैसी महिलाएं भी हैं। नए पुराने बहुत से पुरूष कलाकार रिज़वान, अजय, मयंक अग्निहोत्री भी हैं। मगर ये देखकर खुशी हुई कि कोई भी कच्चा नहीं है। सब अच्छे और सिद्ध कलाकार हैं। ये भी लगा कि सब लोग नाटक को, रिहर्सल को बहुत उन्मुक्तता और आनंद से कर रहे हैं। गायन वादन मंडली में कंचन पसेरिया, अरविंद, पैड पर दिलीप और हारमोनियम पर अजय गंगोलिया मोर्चा सम्हाले थे और क्या खूब सम्हाले थे। पूरी टीम एक ट्यून में बंधी थी।

रिहर्सल खत्म होने पर गाना बजाना हुआ। अजय गंगोलिया उज्जैन से आए हैं। वो संगीत के परिवार से ही हैं। उन्होंने कबीर सुनाया - जरा धीरे धीरे गाड़ी हांको मेरे राम गाड़ी वाले। रिजवान और कंचन ने बहुत मधुर फिल्मी गीत सुनाया। और भी लोगों ने गाया। हंसी ठिठोली चलती रही। फिर खाना शुरू हुआ। इस बीच आत्मानंद भी आ गये। वो इस नाटक में नहीं है मगर बहुत अच्छे कलाकार हैं और रेलवे के कार्यक्रमों महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। दीपा ने बहुत से लोगों को निमंत्रित किया था। ऐसा लग रहा था कि एक कुटुंब के सारे लोग जमा हैं। सबका स्नेह बरस रहा था। भोजन बहुत अच्छा था। खाकर कुछ देर बैठकर मैं आत्मानंद के साथ वापस आया।

इस दोपहर ने पचास सालों में रिहर्सल वाले बीते इतवार याद दिला दिए। नाटक की रिहर्सल इतवार को करना सबसे कठिन होता है। सोचा जाता है कि सुबह से शाम तक काम करेंगे और पूरा नाटक खड़ा हो जाएगा। कास्ट्ूम की पेटी भी जम जाएगी। गानों की प्रक्टिस भी हो जाएगी। सैट प्रापर्टी का काम भी हो जाएगा। मगर शायद ही किसी इतवार का ऐसा उपयोग हो पाता है। धीरे धीरे करके दोपहर तक लोग इकठ्ठे होते हैं। उसमें भी कुछ नहीं आते। सबसे अहम दो तीन कलाकार गायब हो जाते हैं। पूरा दिन उनके इंतजार में और उनको गाली देते गुजर जाता है। इस बीच चाय नाश्ता आता रहता है। इतवार होने के कारण सबमें एक सुस्ती छाई रहती है।

इतवार की दोपहर एक शांति चारों ओर छाई रहती है। चाहे गर्मी हो या ठंड एक वीराना सा छाया रहता है। घर के अंदर, सड़कों पर। सब कुछ ठहरा सा लगता है। मैं याद करता रहा कि जहां जहां विवेचना की रिहर्सल हुआ करती थी चाहे जी एस कॉलेज हो या केसरवानी कालेज या भातखंडे, या चंचलाबाई कालेज या नूतन मराठी स्कूल या डिसल्वा स्कूल या न जाने कहां कहां। हमेशा दोपहर की रिहर्सल फेल हो जाया करती थी। रिहर्सल हमेशा शाम को होती रही है। बस इतवार को दोपहर रखी जाती है। यही हाल त्यौहारों पर होने वाली छुट्टी के दिन की रिहर्सल का हुआ करता है।

आज की रिहर्सल देखकर पुराने पचास साल और रिहर्सल और शोज़ सब याद आ गये। एक फिल्म सी घूमती रही यादों में, रिहर्सल की जगहें, सैकड़ों चेहरे याद आते रहे जो रहे इन नाटकों में साथ, गर्मी की लू के थपेड़ों और पतझड़ो वाली दोपहर, धूप सेकते हुए ठंड की दोपहरें, बरसात की गीली दोपहरी। उम्र के इस पड़ाव में मन बार बार अतीत की ओर दौड़ता है।

कैसा पागलपन है कलाकारों में। जीवन के सारे काम नौकरी, घर परिवार सम्हालते हुए जुटे रहते हैं संवाद याद करने में, रिहर्सल करने में, शो करने में। कठिन कठिन यात्राएं करते हैं। शो करने के लिए। पूरे देश में और दुनिया में भी नाटक करने वालों की एक सी ज़िन्दगानी होती है। एक सा फ़साना होता है। अपने आप में गुम। न जाने क्या मिल जाता है जो खींचता रहता है नए नाटक तलाशने, उसकी रिहर्सल करने , उसका शो करने में। ये एक अलग बिरादरी है। इसके सुख और दुख बिलकुल अलग हैं। मगर इस सबमें जो आनंद है वो वही जान सकता है जिसने आज दीपा के घर दोपहरी में रिहर्सल देखी। गाना बजाना किया और खाना खाया।
आज के आनंद की जय, टीम को शुभकामनाएं

हिमांशु राय
08 03 2026 रविवार
रात 11 बजे

विवेचना की संगीत मंडली का शुभारंभ विवेचना के इतिहास में 22 फरवरी 2026 का इतवार एक ऐतिहासिक दिन साबित हुआ जब कुछ रूचिवान ...
22/02/2026

विवेचना की संगीत मंडली का शुभारंभ
विवेचना के इतिहास में 22 फरवरी 2026 का इतवार एक ऐतिहासिक दिन साबित हुआ जब कुछ रूचिवान और समर्पित कलाकारों ने विंग्स ऑफ जॉय, विजयनगर जबलपुर के हॉल में एकत्रित होकर विवेचना की संगीत मंडली का शुभारंभ किया। विवेचना की संगीत मंडली बनाने का विचार विगत 2 वर्षों से चल रहा था।
विवेचना के नौजवान साथी आदित्य रूसिया जो गायन के अलावा हारमोनियम, ढोलक, तबला और टिमकी बजाने में निपुण हैं। वरिष्ठ साथी निर्मल खम्परिया बांसुरी के अच्छे वादक होने के साथ ढोलक और हारमोनियम पर भी संगत करते हैं। अमित दुग्गल, आदित्य रूसिया के गायन से हॉल गूंज उठा। हम सबका मार्गदर्शन करने के लिए विवेचना के शुरूआती दौर के साथी संगीत, गायन और गीतों, फिल्मी गीतों और कविताओं के विद्वान राजीव शुक्ल उपस्थित हुए। उन्होंने अनेक गीत और कविताएं सुनायीं। धीरे शुरूआत के बाद गायन का जो सिलसिला शुरू हुआ तो घंटों चला और हॉल के बाहर निकल कर गेट पर खड़े होकर भी चलता ही रहा। किसी का जाने का मन ही नहीं कर रहा था।
विवेचना के वरिष्ठ साथी हिमांशु राय ने बताया कि विवेचना की संगीत मंडली की योजना दो साल पूर्व बनी थी और आज उसकी शुरूआत हो रही है। विवेचना की कोशिश है कि हम एक ऐसी संगीत मंडली का निर्माण करेंगे जिसमें वरिष्ठ और युवा महिला पुरूष शौकिया तौर पर गीत, अच्छे फिल्मी गीत, कविताएं, जोशीले नग्मे, लोकगीत, कव्वाली के अलावा आधुनिक संगीत व गायन की विधाओं आदि का एक ऐसा गुलदस्ता तैयार करेंगे जिसके अलग से कार्यक्रम आयोजित हों और आम जनता के बीच गीतों, कविताओं और संगीत के माध्यम से सुरूचि का विस्तार हो।
आज के शुभारंभ कार्यक्रम में बदरीश पांडेय, चेतन जग्गी, धु्रव, विश्वेन्द्र, अमित दुग्गल, आदित्य रूसिया, हिमांशु राय, निर्मल खम्परिया,राजीव शुक्ल उपस्थित थे। विवेचना ने शहर के सभी गायक वादक कलाकारों से विवेचना की गायन मंडली में जुड़ने का अनुरोध किया है।
विवेचना के नाटक ’72 मील’ की रिहर्सल चल रही है और उसके शो मार्च व अप्रैल में होने जा रहे हैं। विवेचना के नाटकों में काम करने के इच्छुक सभी लोग आमंत्रित हैं। शीघ्र ही दो नए नाटकों की रिहर्सल शुरू कर दी जाएगी।
विवेचना की रिहर्सल विंग्स ऑफ जॉय स्कूल, एम आर फोर, मुस्कान प्लाजा के पास, विजयनगर जबलपुर में प्रतिदिन संध्या 6 बजे से होती है।
हिमांशु राय
9425387580

Address

657, Narsingh Ward
Jabalpur
482001

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Vivechana Theater Group jabalpur posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Establishment

Send a message to Vivechana Theater Group jabalpur:

Share