Anup Sharma poetry

Anup Sharma poetry This is a special place for my poems where I can express my feelings

01/12/2022

एक बहुत ही अद्भुत कविता मुझे मिला

वरदान मांगूंगा नहीं
कवि- शिवमंगल सिंह सुमन जी

My new Poem
21/04/2021

My new Poem

मेरी नयी कविता
06/02/2021

मेरी नयी कविता

My new poemPositivity of mind
17/11/2020

My new poem
Positivity of mind

15/07/2020
जब लोग बदलते हैं तो सबकुछ बदलता है, और उसी बदलाब में सारी चीजें बदलती है। और तभी.. उसके बाद मतलबी दुनिया बनती है। प्रेम ...
20/06/2020

जब लोग बदलते हैं तो सबकुछ बदलता है, और उसी बदलाब में सारी चीजें बदलती है। और तभी.. उसके बाद मतलबी दुनिया बनती है। प्रेम कब ईर्ष्या में बदल जाती है, और "हम" कब "मैं" में तब्दील हो जाते हैं इसका भी पता नही चलता।
हम सबकुछ बदलना चाहते हैं परन्तु अपना परिवेश और व्यवहार नही बदलना चाहते हैं, क्योंकि यही हमारी विरासत है। हमें अपनापन का बोध हो , कुछ ऐसा आभास हो , बस यही चाहतें है ।

कुछ पंक्तियाँ ✍️

✍️ Poetry-3
06/05/2020

✍️ Poetry-3

हर रिश्ते का अपना एक वजूद होता है।कभी भी किसी भी रूप में उसकी तुलना किसी और रिश्ते से नहीं करनी चाहिए ।मेरे मित्र अनूप न...
01/05/2020

हर रिश्ते का अपना एक वजूद होता है।
कभी भी किसी भी रूप में उसकी तुलना किसी और रिश्ते से नहीं करनी चाहिए ।
मेरे मित्र अनूप ने एक कविता लिखी है जो इशारो में उस व्यक्ति की भावनाओं को शब्दों में पिरोया है।

29/04/2020

संधि वार्तालाप

है प्रेम पिपासा आँखों में
है क्रन्दन करती साँसों में
जो इतर बितर कर बिखर गयी
कुछ चिपटी चुपड़ी बातों में
है वो प्रेम पिपासा आंखों में

मन को अक्सर चन्कित कर दे
अपने जीवन से बंचित कर दे
दे धार अधर के बाणों से
वो मूल्य चुका दे प्राणों से
गर मौन न हो तेरे मन में
या प्रेम न हो तेरे तन में
तो ऐसा कुछ उपचार करूँ
या तेरे मस्तक पर वार करूँ
अब और भी बातें बढ़ न जाए
तेरे मूढ़मति न हर जाए
लो और धीरज मैं धरता हूँ
फिर से बात मैं रखता हूँ
कुछ और न शेष हमें देना
बस भिक्षा मात्र दया देना
और रखना हो तो तू सब कुछ रख
जरा शांति का तो स्वाद तू चख
गर अगली प्रहार तेरी होगी
तो अंतिम वार उनकी होगी
होगी भले ही तेरी हार
अरे पगले पर अनन्त अश्रु गिरेंगे हमार
अरे मूढ़ मूर्ख अज्ञानी मानव
तू रूप कुरूप, या कोई दानव
तनिक तुझको का लाज आयी
जब अपने गोद में चिता जलायी
दम्भ रणभेरी का जब जाग गया
समझो तेरा विचित्र साम्राज्य गया
अब और न शेष तुझसे कहना
दे शीश तू अपना हरि को अपना
मैं भी वंदन कई बार करूँ
तेरे आँगन में विलाप करूँ
कुछ और भी भेष बनाकर के
जाऊंगा आज तो पूरी वार्ता कर के

सोचों , सोचों,फ़िर से विचार करो
अपने सदबुद्धि का विस्तार करो
क्या रह जायेगा जीने को
जब बचा न हो पानी पीने को
तुम वही वस्त्र पहनोगे
जो तेरे अनुज तुझसे लेंगें
गर अब भी न हो यकीन तुम्हे
तो मेरे मन का मान करो
सोचों फिर से विचार करो।
अंत भेंट मैं रखता हूँ
हे प्रिय तुझसे स्नेह मैं करता हूँ
गर हो गयी हो कोई भूल चूक
अपने से निवेदन करता हूँ
कुछ भर आये हैं आंखों में
भारी कर गयी है साँसों में
मेरे आँखों पर टिका हुआ
तेरे निर्णय की आशा में

है प्रेम पिपासा आँखों में
है क्रन्दन करती साँसों में
जो इतर बितर कर बिखर गयी
कुछ चिपटी चुपड़ी बातों में
है वो प्रेम पिपासा आंखों में

हरि ॐ

By : Anup Sharma

❤
29/04/2020

Address

Jabalpur

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Anup Sharma poetry posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Share

Category