Rebuilding Sangeet Mahavidyalaya Jabalpur

Rebuilding Sangeet Mahavidyalaya Jabalpur This is a page dedicated to the campaign to rebuild Sangeet Vidyalaya which was destroyed to build flyover in Jabalpur.

मेरी कॉन्टैक्ट लिस्ट में बाळ घाटे नाम से एक नंबर सेव्ड है। विगत कई वर्षों से वह उपयोग में नहीं है। यदि मैंने लगाया भी, त...
23/01/2026

मेरी कॉन्टैक्ट लिस्ट में बाळ घाटे नाम से एक नंबर सेव्ड है। विगत कई वर्षों से वह उपयोग में नहीं है। यदि मैंने लगाया भी, तो उषाताई से बात होती है। चूँकि बाळ आजकल सुनने में कठिनाई का अनुभव करते थे, एकाध वाक्य बोलने के पश्चात ही वे फोन उषाताई को दे देते थे और वही उनके मन की बात मुझ तक पहुँचाती थीं।

जहाँ तक बाळ का संबंध है, अब उसे भूतकाल समझना होगा क्योंकि बाळ का देह ९७ वर्ष के बाद कल पंचतत्त्व में विलीन हो गया।

उम्र में बाळ मुझसे दस वर्ष बड़े होंगे, पर जिस प्यार और आत्मीयता से उन्होंने मुझे अपनी मित्रमंडली में शामिल कर लिया था, मैं उन्हें बाळ नाम से ही संबोधित करना चाहूँगा, जैसा उन्हें उनके अन्य मित्र कहते थे। इसे कृपया मेरी उद्दंडता न समझें।

घाटे परिवार से मेरे परिवार का परिचय पिछली पीढ़ी से था। उनके बड़े मामा श्री आत्माराम खंडकर, स्व. स. ल. परांजपे जी के “दत्ताश्रम”, गढ़ाफाटक, जबलपुर में हमारे पड़ोसी थे। वे भी मेरे पिताजी की तरह शिक्षक थे। छोटे मामा खंडवा में संगीत शिक्षक थे और मेरे पिताजी के अभिन्न सखा थे।

मैंने १९५६ में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की। तब तक बाळ घाटे से घनिष्ठता लगभग नहीं के बराबर थी, बल्कि बहुत सीनियर होने के कारण मैं उनसे डरता ही था। उसी समय मैंने व्यवस्थित ढंग से तबला बजाना और सीखना प्रारंभ किया था। वसंत रानडे, शरद तैलंग, के. श. साने, सुरेश ताम्हणकर, सरोज परांजपे, अविनाश खंडकर, गजानन ताडे, बाळ भांडारकर, पांडुरंग आरोणकर और कई अन्य लोगों का एक ग्रुप होता था। तब, चूँकि सिनेमा और नाटक छोड़कर मनोरंजन के कोई अन्य साधन नहीं होते थे, यह मित्रमंडली बड़े ही अनौपचारिक रूप में संगीत बैठकें किया करती थी। मुख्य तबला संगतकार गजानन ताडे होते थे, पर स्टेपनी के रूप में मेरा इस ग्रुप में प्रवेश हुआ। कालांतर में घनिष्ठता भी बढ़ी। कई बार मैं इन लोगों की साइकिल पर डबल सीट बैठकर कार्यक्रमों में शिरकत करता रहा हूँ।

वसंत रानडे नागपुर आकाशवाणी में स्टाफ आर्टिस्ट होकर गए और वहाँ खूब लोकप्रिय हुए। वहाँ भी उनके युवा प्रशंसकों का समूह बना। तरुण वायलिन वादक अरुण वकील इनमें बहुत अधिक प्रभावित थे। वसंत रानडे के चाचा बाळूकाका रानडे जबलपुर में रहते थे और कठोर अनुशासन के साथ संगीत शिक्षा देने में उनकी ख्याति थी। अरुण वकील उनसे वायलिन सीखने जबलपुर आए। जीवनयापन में कुछ आर्थिक मदद हो, इसलिए वे भातखंडे संगीत महाविद्यालय में वायलिन के शिक्षक बने। मेरे पिता वहाँ के प्राचार्य थे। मैं भी वहाँ तबला सिखाता था, इसलिए मेरी आनंद जोशी (गायन शिक्षक) और अरुण से प्रगाढ़ दोस्ती हुई, इतनी कि हमारे त्रिकुट को “किरणअरुणआनंद” कहने लगे।

इसी दौरान एक बार अरुण बीमार हुए और कोई अन्य रिश्तेदार पास न होने की स्थिति में बाळ घाटे ने तन, मन, धन से उनकी मदद और परिचर्या की। बाळ की वकील परिवार से निकटता बढ़ी, तो अरुण की बहन उषा के बाळ के साथ रिश्ते की बात चल पड़ी और उनका विवाह हुआ।

वैसे बाळ का प्रारंभ में शास्त्रीय संगीत से आकर्षणीय प्रेम नहीं रहा। पर युवा साथियों की बैठकों में दरी बिछाने से लेकर हॉल का ताला लगाने तक उनका निरपेक्ष सक्रिय योगदान हुआ करता था। वैसे कहते हैं कि उन्होंने तबला सीखने का असफल प्रयत्न किया था, पर वे अपने को मजाकिया तौर पर तबलावादक की जगह तबलावाहक कहते थे।

समाज में सेवा करना उन्हें स्वभावतः अच्छा लगता था। मात्र संगीत ही नहीं, किसी भी क्षेत्र में स्वयंसेवक की भूमिका में वे प्रोएक्टिव हुआ करते थे। किसी गरीब की अंत्येष्टि की व्यवस्था में वे प्रसिद्ध समाजसेवी बाबूराव परांजपे के दाएँ हाथ होते थे। व्यवसाय से वे टेलीग्राफ वर्कशॉप फैक्टरी में टेक्नीशियन थे। प्रति माह सब कर्मचारियों की सैलरी का हिसाब रखना यह उनकी जिम्मेदारी थी, पर अपनी लगन और कौशल से माह के पहले हफ्ते में वे सब काम निपटा कर मुक्त हो जाते थे। बाकी समय बस समाज सेवा। इस कारण यह सामान्य सा दिखने वाला व्यक्ति असामान्य रूप से लोकप्रिय था। मेरे पिताजी ने जबलपुर संगीत समाज के कार्य में उनके योगदान के लिए उनका जाहिर सम्मान किया था।

खाने-खिलाने के अतिरिक्त बाळ को किसी भी चीज का शौक नहीं रहा। कपड़ों का तो कतई नहीं। विवाह के बाद ही उषाताई के अनुरूप वे कुछ करीने से नाप के कपड़े पहनने लगे। सतना क्वार्टर्स, जबलपुर में कई वर्षों तक दो कमरों के मकान में घाटे परिवार रहता था। दो छोटे भाइयों को भी वहीं आश्रय था। नीचे गांधी भंडार और एक और मिष्ठान्न की दुकान थी, जहाँ बाळ की उदार उधारी चलती थी। मित्र लोग वहीं आतिथ्य का भरपूर आनंद लेते थे, और हमारे यजमान बाळ माह के अंत में उधारी हँसते-हँसते चुका देते थे।

सौभाग्य से उषाताई जैसी समझदार और सुविज्ञ पत्नी बाळ को मिली, जिन्होंने नूतन मराठी विद्यालय में शिक्षक के रूप में अपनी जिम्मेदारी सफलतापूर्वक निभाते हुए इस “औलिया” की गृहस्थी संभाली। बाळ की पुत्री माधुरी और पुत्रद्वय राजू–संजू अपने-अपने क्षेत्र में आनंद में हैं। ज्येष्ठ चिरंजीव विजय घाटे तो तालयोगी पं. सुरेश तलवलकर जी के शिष्य और लोकप्रिय तबलावादक हैं। बाळ के जीवन में विजय को भारत सरकार का पद्मश्री अलंकरण प्राप्त होना अत्यंत सुखदायी रहा होगा।

मराठी के लोकप्रिय साहित्यकार और हरहुन्नरी व्यक्तित्व पु. ल. देशपांडे यदि बाळ को देखते, तो उनके “व्यक्ति और वल्ली” चरित्रलेखन में एक और की वृद्धि होती।

मेरे मन में बाळ की असंख्य हृद्य यादें हैं। बाळ के हमउम्र अब लगभग नहीं के बराबर हैं। ये यादें किससे साझा करूँ, यही प्रश्न है।

मित्र, जहाँ अब हो, वहाँ ऐसी ही मित्रमंडली बनाकर रहो।
हम जीवनभर तुम्हें याद करते रहेंगे।

१९६३ - ऐतिहासिक चित्र जब आदरणीय पंडित दादा देशपांडे इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय डीन थे - ध्यान से देखिए - एक से एक दि...
20/03/2025

१९६३ - ऐतिहासिक चित्र जब आदरणीय पंडित दादा देशपांडे इंदिरा कला संगीत विश्वविद्यालय डीन थे - ध्यान से देखिए - एक से एक दिग्गज संगीत जगत के इस चित्र में। यह था उन दिनों संगीत जगत का परिपेक्ष्य।

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