26/08/2026
इंदौर की जनता कब तक ट्रैफिक की सजा भुगतेगी?
क्या इंदौर के बाशिंदे घरों में ही बैठे रहें?
इंदौर आज देश के सबसे तेजी से विकसित होते शहरों में शामिल है। स्वच्छता में लगातार मिसाल कायम करने वाला हमारा शहर विकास, व्यापार और रोजगार का बड़ा केंद्र बन चुका है। लेकिन दुर्भाग्य से शहर की यातायात व्यवस्था दिन-ब-दिन आम नागरिकों के लिए परेशानी का कारण बनती जा रही है।
आज स्थिति यह है कि इंदौर का ट्रैफिक मानो भगवान भरोसे चल रहा है।
किसी नेता का कार्यक्रम हो—जुलूस निकलता है।
कोई लालबत्ती वाला नेता शहर में आता है—रास्ते बंद।
कोई वीआईपी आता है—घंटों ट्रैफिक रोक दिया जाता है।
किसी धार्मिक या सामाजिक आयोजन की सवारी निकलती है—सड़कें बंद।
और अब तो ऐसा लगता है कि जब तक “राजा साहब ( व्ही. आई. पी.)की सवारी” निकल नहीं जाती, तब तक आम जनता के लिए रास्ता खुलने की उम्मीद भी नहीं की जा सकती।
सवाल यह है कि इस शहर की सड़कें आखिर किसके लिए हैं?
जिस व्यक्ति ने चुनाव के समय जनता से वोट मांगने के लिए इन्हीं सड़कों पर पैदल घूम-घूमकर लोगों से संपर्क किया, घर-घर जाकर समर्थन मांगा, वही व्यक्ति चुनाव जीतकर मंत्री या जनप्रतिनिधि बनते ही जनता के रास्ते बंद करवाकर निकलता है—क्या यही लोकतंत्र की तस्वीर है?
क्या वीआईपी की सुविधा आम नागरिक की परेशानी से बड़ी हो गई है?
एक सामान्य नागरिक को अपने कार्यालय पहुंचना है, बच्चे को स्कूल छोड़ना है, किसी मरीज को अस्पताल ले जाना है, किसी व्यापारी को दुकान खोलनी है, किसी कर्मचारी को समय पर ड्यूटी पहुंचना है—लेकिन सड़क बंद है तो वह घंटों जाम में फंसा रहे।
उसका समय जाए, पेट्रोल जले, व्यापार प्रभावित हो, मरीज परेशान हो, विद्यार्थी देर से पहुंचे—क्या प्रशासन की जिम्मेदारी केवल वीआईपी के सुरक्षित और सुविधाजनक आवागमन तक सीमित है?
यह भी समझना होगा कि जुलूस, धार्मिक आयोजन, सामाजिक कार्यक्रम और राजनीतिक गतिविधियां लोकतंत्र का हिस्सा हैं। किसी को इन आयोजनों से आपत्ति नहीं है। आपत्ति है तो केवल इस बात से कि इन आयोजनों की कीमत आम जनता क्यों चुकाए?
यदि किसी जुलूस की अनुमति दी जाती है तो उसके लिए पहले से निर्धारित रूट, समय, अवधि और ट्रैफिक डायवर्जन की व्यवस्था क्यों नहीं हो सकती? अन्य शहरों में बड़े आयोजनों के लिए पहले से ट्रैफिक एडवाइजरी जारी की जाती है, वैकल्पिक मार्ग बताए जाते हैं और यातायात को नियंत्रित किया जाता है।
इंदौर में भी यही व्यवस्था सख्ती से लागू होनी चाहिए।
प्रशासन को अनुमति देने के साथ-साथ उसकी शर्तों का पालन करवाने की जिम्मेदारी भी निभानी होगी।
यदि जुलूस निर्धारित मार्ग से हटकर चले, निर्धारित समय से अधिक सड़क घेरकर रखे, अनावश्यक रूप से यातायात रोके या नियमों का उल्लंघन करे तो जिम्मेदार आयोजकों के विरुद्ध कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए?
आखिर अनुमति का अर्थ मनमानी की छूट तो नहीं हो सकता।
इंदौर पुलिस के पास ट्रैफिक संबंधी शिकायतों के लिए हेल्पलाइन भी है और पुलिस स्वयं नागरिकों से व्यवस्थित यातायात के लिए शिकायत करने और सहयोग देने की अपील करती है। लेकिन केवल शिकायतों का समाधान पर्याप्त नहीं है। जरूरत है ऐसी स्थायी और प्रभावी ट्रैफिक नीति की, जिससे बार-बार वही समस्या उत्पन्न ही न हो।
कुछ सवाल प्रशासन से
1. बड़े जुलूसों और वीआईपी कार्यक्रमों की अनुमति देने से पहले ट्रैफिक पर पड़ने वाले प्रभाव का आकलन क्यों नहीं किया जाता?
2. क्या प्रत्येक बड़े जुलूस के लिए अनिवार्य ट्रैफिक मैनेजमेंट प्लान होना चाहिए?
3. जुलूस के कारण बंद होने वाले मार्गों की सूचना नागरिकों को पर्याप्त समय पहले क्यों नहीं दी जाती?
4. वैकल्पिक मार्गों पर पर्याप्त पुलिस बल और ट्रैफिक व्यवस्था क्यों नहीं की जाती?
5. निर्धारित समय समाप्त होने के बाद भी रास्ते बंद रहने पर जिम्मेदारी किसकी तय होगी?
6. क्या वीआईपी आवागमन के दौरान आम नागरिकों को न्यूनतम असुविधा हो, इसके लिए कोई स्पष्ट प्रोटोकॉल है?
7. क्या आयोजकों द्वारा अनुमति की शर्तों का उल्लंघन करने पर भविष्य की अनुमति पर कार्रवाई की जाती है?
जनता त्रस्त है, हैरान है, परेशान है।
इंदौर की जनता ने हमेशा प्रशासन का सहयोग किया है। स्वच्छता अभियान हो, यातायात व्यवस्था हो या कोई बड़ा आयोजन—इंदौरवासियों ने अनुशासन का परिचय दिया है। अब जनता प्रशासन से भी उसी संवेदनशीलता और जिम्मेदारी की अपेक्षा करती है।
इंदौर की सड़कें किसी व्यक्ति, दल, नेता या वीआईपी की निजी संपत्ति नहीं हैं। ये जनता की सड़कें हैं।
लोकतंत्र में जनप्रतिनिधि जनता से ऊपर नहीं होता। वह जनता का प्रतिनिधि होता है। इसलिए जब वह सड़क पर चले तो जनता का रास्ता अनिश्चितकाल के लिए बंद नहीं होना चाहिए। जनप्रतिनिधि की सुविधा और आम नागरिक के अधिकार के बीच संतुलन बनाना प्रशासन की जिम्मेदारी है।
अब समय आ गया है कि इंदौर प्रशासन इस समस्या को गंभीरता से ले।
जुलूस निकलें—लेकिन व्यवस्थित ढंग से।
धार्मिक आयोजन हों—लेकिन जनता को बंधक बनाकर नहीं।
वीआईपी आएं—लेकिन शहर को ठप करके नहीं।
राजनीतिक कार्यक्रम हों—लेकिन आम नागरिक के अधिकारों की कीमत पर नहीं।
इंदौर की जनता अब पूछ रही है—
“कब तक हम रास्ते बंद होने की सजा भुगतते रहेंगे?”
“कब तक हमारा समय, हमारा पैसा और हमारी परेशानी किसी और की सुविधा के लिए कुर्बान होती रहेगी?”
और सबसे बड़ा सवाल—
इंदौर कब जागेगा?
अब केवल जनता को जागरूक करने की नहीं, प्रशासन को भी जागने की जरूरत है।
प्रशासन के पास अधिकार हैं, व्यवस्था बनाने की शक्ति है और नियम लागू कराने की जिम्मेदारी है। जरूरत सिर्फ इच्छाशक्ति की है।
अब उठिए, जागिए और कुछ कीजिए।
क्योंकि इंदौर की जनता बहुत सह चुकी है।
जनता को सड़क पर चलने का अधिकार चाहिए—किसी की मेहरबानी नहीं।