23/09/2026
#रामधारी सिंह दिनकर
मेरे सबसे प्रिय कवि राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर।
आज रामधारी सिंह ‘दिनकर’ की जन्म-जयंती है। जब-जब मैं कुछ पढ़ता हूँ या पढ़ने का प्रयास करता हूँ, मेरी किताबों के संग्रह में से दिनकर जी की लिखी कोई न कोई पुस्तक मेरे हाथ में आ ही जाती है- चाहे वह ‘परशुराम की प्रतीक्षा’ हो, ‘उर्वशी’, ‘संस्कृति के चार अध्याय’, ‘लोकदेव नेहरू’, ‘कुरुक्षेत्र’ या ‘रश्मिरथी’।
दिनकर जी की भाषा की सबसे बड़ी विशेषता मुझे यही लगती है कि वह केवल पढ़ी नहीं जाती, वह आपसे संवाद करती है। उनकी भाषा में सरलता भी है, ओज भी है और संवेदना भी। वह भीतर वीरता जगाती है, तो कहीं करुणा और वात्सल्य से भी भर देती है।
स्वतंत्रता से पहले राष्ट्र-जागरण हो या स्वतंत्रता के बाद राष्ट्रोत्थान का प्रश्न दिनकर ने अपनी लेखनी के माध्यम से दोनों कालखंडों में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। वे राज्यसभा के सदस्य रहे और देश के उच्च सदन में भी अपनी बात निर्भीकता से रखते रहे।
दिनकर की लेखनी राजनीति से भी अछूती नहीं रही। उन्होंने सत्ता के सामने प्रश्न खड़े किए, व्यवस्था को आईना दिखाया और यह संदेश दिया कि लोकतंत्र में किसी व्यक्ति या दल के प्रति अंध-समर्थन से अधिक महत्वपूर्ण है, सत्य के प्रति निष्ठा।
शायद यही कारण है कि एक राजनीति विज्ञान के विद्यार्थी के रूप में भी दिनकर जी मुझे विशेष रूप से प्रिय हैं। उनकी रचनाओं में मुझे ऐसी राजनीति की आकांक्षा दिखाई देती है जिसमें विचारों का मतभेद हो सकता है, लेकिन संवाद समाप्त न हो; जहाँ अपने विचारधारा-समर्थक व्यक्ति की गलती पर भी प्रश्न उठाने का साहस हो और विरोधी के सही विचार को स्वीकार करने का धैर्य भी।
दिनकर से जुड़े दो प्रसंग अक्सर चर्चा में आते हैं, जो राजनीति और साहित्य के रिश्ते को समझने का एक सुंदर अवसर देते हैं।
पहला प्रसंग, सत्ता के सामने कवि की निर्भीकता।
भारत-चीन युद्ध के बाद देश की राजनीति और नेतृत्व पर गंभीर प्रश्न उठे। इसी संदर्भ में दिनकर जी की पंक्तियाँ आज भी अत्यंत प्रासंगिक लगती हैं- “रे रोक युधिष्ठिर को न यहाँ, जाने दे उनको स्वर्ग धीर; पर, फिरा हमें गांडीव-गदा, लौटा दे अर्जुन-भीम वीर।”
इन पंक्तियों में दिनकर आदर्श और शक्ति, दोनों के संतुलन की आवश्यकता का संकेत करते हैं। उनका आग्रह था कि राष्ट्र केवल आदर्शों की चर्चा से नहीं, बल्कि आत्मबल, पुरुषार्थ और सामर्थ्य से भी मजबूत होता है।
यहाँ दिनकर जी की सबसे बड़ी विशेषता दिखाई देती है, वे सत्ता के निकट होकर भी सत्ता के कवि नहीं बने।
दूसरा प्रसंग, नेहरू और दिनकर का चर्चित किस्सा।
दिनकर और पंडित जवाहरलाल नेहरू के संबंधों से जुड़ा एक प्रसिद्ध प्रसंग अक्सर सुनाया जाता है। कहा जाता है कि एक कार्यक्रम के दौरान सीढ़ियों पर नेहरू जी का संतुलन बिगड़ने पर दिनकर जी ने उन्हें संभाल लिया। इसके बाद दिनकर जी ने साहित्य और राजनीति के संबंध को लेकर एक मार्मिक टिप्पणी की - “जब-जब राजनीति लड़खड़ाई है, साहित्य ने उसे संभाला है।”
इस प्रसंग में छिपा भाव आज भी बेहद महत्वपूर्ण है, साहित्य का काम केवल सत्ता की प्रशंसा करना नहीं, बल्कि आवश्यकता पड़ने पर उसे आईना दिखाना भी है।
और शायद यही दिनकर की सबसे बड़ी प्रासंगिकता है।
आज जब राजनीति में असहमति को अक्सर विरोध समझ लिया जाता है, तब दिनकर हमें याद दिलाते हैं कि लोकतंत्र में असहमति भी लोकतंत्र की शक्ति है। अपने विचार के व्यक्ति की गलती पर भी सवाल उठाना और विरोधी विचार में भी सत्य को स्वीकार करना, यही स्वस्थ राजनीतिक संस्कृति की पहचान हो सकती है।
इसलिए राजनीति में धर्म हो, लेकिन धर्म की राजनीति न हो।
राजनीति में विचार हों, लेकिन विचारों में कट्टरता न हो।
सत्ता हो, तो उसके साथ संवेदना और जवाबदेही भी हो।
और राजनीति हो, तो उसके साथ साहित्य की निर्भीक दृष्टि भी हो।
राजनीति में रहकर राजनीति को आईना दिखाने वाले, राष्ट्र-जागरण और राष्ट्र-चेतना को अपनी लेखनी से स्वर देने वाले महान राष्ट्रकवि रामधारी सिंह ‘दिनकर’ को उनकी जन्म-जयंती पर सादर नमन।
“कलम, आज उनकी जय बोल।”