10/04/2022
तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ़
~केदारनाथ सिंह
अपने कृतित्व संसार में केदारनाथ सिंह को आत्मिक तृप्ति व उनके पाठकों को अचम्भा देने वाली कविता है बनारस। उसी का एक छोटा सा अंश यहाँ प्रस्तुत है। काशी नगरी की जड़ परंपरावादी व्यवस्थाओं से विद्रोह अनुभव करके भी इसके जादू का मुरीद होने से कौन विचारक, कवि, दार्शनिक बच पाया है? केदारनाथ सिंह की कलम से ये कविता इसी दिशा में काशी की तस्वीर उकेरती है, कबीर जैसी उन्मुक्तता से दो संसारों की खाई पाटती ये अद्भुत नगरी। भरी पूरी पर सदा से रिक्त, पुरातन में डूबी आधुनिकता के मुहाने पर खड़ी।