Hindi Tarang, BITS Pilani Hyderabad Campus

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BITS Pilani Hyderabad Campus

10/04/2022

तुमने कभी देखा है
खाली कटोरों में वसंत का उतरना!
यह शहर इसी तरह खुलता है
इसी तरह भरता
और खाली होता है यह शहर
इसी तरह रोज़ रोज़ एक अनंत शव
ले जाते हैं कंधे
अँधेरी गली से
चमकती हुई गंगा की तरफ़
~केदारनाथ सिंह
अपने कृतित्व संसार में केदारनाथ सिंह को आत्मिक तृप्ति व उनके पाठकों को अचम्भा देने वाली कविता है बनारस। उसी का एक छोटा सा अंश यहाँ प्रस्तुत है। काशी नगरी की जड़ परंपरावादी व्यवस्थाओं से विद्रोह अनुभव करके भी इसके जादू का मुरीद होने से कौन विचारक, कवि, दार्शनिक बच पाया है? केदारनाथ सिंह की कलम से ये कविता इसी दिशा में काशी की तस्वीर उकेरती है, कबीर जैसी उन्मुक्तता से दो संसारों की खाई पाटती ये अद्भुत नगरी। भरी पूरी पर सदा से रिक्त, पुरातन में डूबी आधुनिकता के मुहाने पर खड़ी।

08/04/2022

जिसके अरूण-कपोलों की मतवाली सुन्‍दर छाया में।
अनुरागिनी उषा लेती थी निज सुहाग मधुमाया में।
उसकी स्‍मृति पाथेय बनी है थके पथिक की पंथा की।
सीवन को उधेड़ कर देखोगे क्‍यों मेरी कंथा की?
छोटे से जीवन की कैसे बड़ी कथाएँ आज कहूँ?
क्‍या यह अच्‍छा नहीं कि औरों की सुनता मैं मौन रहूँ?
-जयशंकर प्रसाद 🥀

सन 1641 में हिंदी भाषा की पहली आत्मकथा अर्धकथानक लिखी गयी, और फिर आधुनिक युग में गद्य के आविर्भाव से तो बाज़ार में आत्मकथाओं की बाढ़ आ गयी। कवि और लेखक जयशंकर प्रसाद से भी एक बार उनके दोस्तों ने आत्मकथा लिखने का अनुरोध किया जिसका प्रतिउत्तर है उनकी मशहूर कविता 'आत्मकथ्य'। अपनी खाली गगरी पर थाप क्यों दू? अपनी बेज़ार, निराश, असफल ज़िन्दगी की दास्तान का चौक पर ढिंढोरा क्यों पीटू, अपने भोलेपन का उपहास क्यों उड़वाउ और अपनी प्रियतमा की सहेजी हुई मीठी यादों को उधेड़कर नुमाइश पर क्यों लगाऊँ?
झकझोर देने वाला जवाब है।

https://www.facebook.com/153188024723583/posts/7233748913334090/
21/03/2022

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"From the quest for words ranging to the discovery of meanings, the epiphanies and realisations from various stimuli - we all tend to pen down a few words just like that, create anecdotes for our own selves or even to issue polemics.

Presenting to all the platform of Alfaaz at Pearl, BPHC, to recite your Hindi-Urdu poetry treasures and experience the thrill of performing your self written pieces, in a language of your own."
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07/03/2022

देखि-देखि जिय अचरज होई यह पद बूझें बिरला कोई॥
धरती उलटि अकासै जाय, चिउंटी के मुख हस्ति समाय।
बिना पवन सो पर्वत उड़े, जीव जन्तु सब वृक्षा चढ़े।
सूखे सरवर उठे हिलोरा, बिनु जल चकवा करत किलोरा।
बैठा पण्डित पढ़े कुरान, बिन देखे का करत बखान।
कहहि कबीर यह पद को जान, सोई सन्त सदा परबान॥
कबीर

चकरा गए? कबीर कहते हैं बूझे ये पद बिरला कोई। काव्य अभिव्यक्ति है, और घट के रहस्यों का मालिक कबीर जैसा जोगी जब काव्य की धारा बहाये, तो धारा का प्रवाह भी उल्टा पड़ जाता है। इस शैली को उलटबांसी कहते हैं, अर्थात सामान्य से उल्टी बात कहना। जैसे यहाँ धरती आकाश को और चींटी हाथी को निगल जाती है। बिना पवन पहाड़ उड़ने लगते हैं, सूखे सरोवर में हिलोरे उठने लगते हैं, पंडित कुरान का बखान करने लगते हैं। इस पद का रहस्य जो जानता है, वही सत्य का संगी है। उल्टी वाणी की इन विचित्र रचनाओं में भक्ति काल के हिंदी कवियों ने गहरे आध्यात्मिक अर्थ पिरोए हैं , अब इस उल्टी माला के मणको में राम आप पाठक स्वयं ढूंढे। 💐🌸

04/03/2022

ज़ाहिद शराब पीने से काफ़िर हुआ मैं क्यूँ
क्या डेढ़ चुल्लू पानी में ईमान बह गया
शेख़ इब्राहीम ज़ौक़

ग़ालिब से अपनी अदबी शायराना जंग और बादशाह ज़फर के उस्ताद होने की हैसियत से तो ज़ौक़ खासे मशहूर हैं, पर उर्दू ग़ज़ल की दुनिया में तंज और लक्षण के पैमानों पर भी ज़ौक़ लाजवाब शायर हैं। प्रस्तुत शेर में जहाँ 'ज़ाहिद'( शायरी में एक ऐसा पारंपरिक पात्र जिसे निशाना बनाकर व्यंग्य परोसा गया है) काफ़िर और मज़हबी फतवों पर टिप्पणी की परंपरागत भाषा का प्रयोग है तो वहीं अचानक अगले ही हिस्से में तीखा तंज कसकर यह कह देना कि भला ईमान क्या इतना कमज़ोर है कि दो घूँट में धुल जाए, पाठक को हैरत में डाल देता है। 💐💐

03/03/2022

असर भी ले रहा हूँ तेरी चुप का
तुझे क़ाइल भी करता जा रहा हूँ

यक़ीं ये है हक़ीक़त खुल रही है
गुमाँ ये है कि धोके खा रहा हूँ

ये सन्नाटा है मेरे पाँव की चाप
'फ़िराक़' अपनी कुछ आहट पा रहा हूँ
-फ़िराक़ गोरखपुरी,
पुण्यतिथि स्मरण
जगजीत सिंह की गायकी में आप सभी ने फ़िराक़ की नायाब ग़ज़लों का स्वाद बेशक चखा होगा। लफ़्ज़ों की कलाकारी ऐसी कि नफ़्स में उतर जाए, और कलम की वो कला जो कागज़ पर कभी बिखरे काले बाल, सुर्ख गालों वाली हसीना को ज़िंदा करदे तो कभी उसी के दिये गम की गहराईयों में डुबो दे, ग़ज़ल की दुनिया में फ़िराक़ एक अलग मक़ाम रखते हैं।

02/03/2022

फागुन लाग्यौ सखि जब तें, तब तें ब्रजमंडल धूम मच्यौ है ।
नारि नवेली बचै नहीं एक, विसेष इहैं सबै प्रेम अँच्यौ है ॥
साँझ-सकारे कही रसखान सुरंग गुलाल लै खेल रच्यौ है ।
को सजनी निलजी न भई, अरु कौन भटू जिहिं मान बच्यौ है ॥
~ रसखान
रंग, रस, रूप के माधुर्य की पराकाष्ठा और काव्य में इसके अविरल प्रवाह का मास है फाल्गुन। इस मनोहर फाल्गुन ने अपने रंग और राग की छाप हिंदी भाष साहित्य पर बड़ी व्यापक छोड़ी है, जिसके केंद्र में हैं अष्टछाप कवि। ब्रज भूमि में फागोत्सव की धूम उफान पर है और इस फागुन के रसिया की रसिक लीलाओं को पदों में बाँधा है रसखान ने। 💐💐

19/02/2022

इन्द्र जिमि जंभ पर, बाडब सुअंभ पर,
रावन सदंभ पर, रघुकुल राज हैं।

पौन बारिबाह पर, संभु रतिनाह पर,
ज्यौं सहस्रबाह पर राम-द्विजराज हैं॥

दावा द्रुम दंड पर, चीता मृगझुंड पर,
'भूषन वितुंड पर, जैसे मृगराज हैं।

तेज तम अंस पर, कान्ह जिमि कंस पर,
त्यौं मलिच्छ बंस पर, सेर शिवराज हैं॥
भूषण

रीतिकाल में जब भारत भर के हिन्दवी कवि श्रृंगारिकता और विलासिताओं के वर्णन में डूबे थे, जब राजे रजवाडों के दरबार क्षात्र धर्म से विमुख होकर भोग विलास में लिप्त पड़े थे, तब एक कवि ऐसे भी हुए जिन्होंने क्षत्रिय चित्त पर जमी धूल पर कृपाण की तरह कलम चलाई और वीर रस से ओत प्रोत अपने काव्य से बुंदेलों और मराठों के दरबारों को गूंजायमान कर दिया। छत्रपति शिवाजी महाराज की जन्म जयंती के अवसर पर महान कवि भूषण की कुछ प्रसिध्द पंक्तियाँ।

13/02/2022

लहर रही शशिकिरण चूम निर्मल यमुनाजल,
चूम सरित की सलिल राशि खिल रहे कुमुद दल
कुमुदों के स्मिति-मन्द खुले वे अधर चूमकर,
बही वायु स्‍वच्‍छंद, सकल पथ घूम-घूमकर
है चूम रही इस रात को वही तुम्हारे मधु अधर
जिनमें हैं भाव भरे हु‌ए सकल-शोक-सन्तापहर!
सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला'

11/02/2022

कहीं अकेले में मिलकर झिंझोड़ दूंगा उसे,
जहाँ-जहाँ से वोह टूटा है जोड़ दूंगा उसे,
मुझे वोह छोड़ गया यह कमाल है उस का,
इरादा मैंने किया था कि छोड़ दूंगा उसे।

~ राहत इंदौरी🌸

07/02/2022

उसूलों पे जहाँ आँच आये टकराना ज़रूरी है,
जो ज़िन्दा हों तो फिर ज़िन्दा नज़र आना ज़रूरी है,
नई उम्रों की ख़ुदमुख़्तारियों को कौन समझाये,
कहाँ से बच के चलना है कहाँ जाना ज़रूरी है।

~ वसीम बरेलवी🌸

04/02/2022

यदि बाधाएँ हुईं हमें तो,उन बाधाओं के ही साथ,
जिससे बाधा-बोध न हो, वह सहन-शक्ति भी आई हाथ।
जब बाधाएँ न रहेंगी, तब भी शक्ति रहेगी यह,
पुर में जाने पर भी वन की, स्मृति अनुरक्ति रहेगी यह।

~ मैथिलीशरण गुप्त 🌸

यह पंक्तियाँ गुप्त जी की कविता "पंचवटी" से ली गई है। इसमें वे यह कह रहे हैं कि जब जब भी हमारे जीवन में मुश्किलें आती हैं तो उन मुश्किलों से जूझने का जज्बा भी उसके साथ आता है। समय के साथ वो बाधा तो चली जाती है हमारे जीवन से परंतु उन बाधाओं से लड़ने कि जो शक्ति होती है वह आजीवन हमारे पास रह जाती है। जिस प्रकार श्री राम, माता सीता और लक्ष्मण जी के पास वन में रहने का तजुर्बा आजीवन साथ रहा।

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