11/01/2026
रेतीली मिट्टी अब हाथ से फ़िसलती जा रही है,
किस्मत के चक्कर में मेहनत बिगड़ती जा रही है।
सुनो! तुम लगे रहो जातियों को एक करने में,
इधर भारत की अर्थव्यवस्था बदलती जा रही है।
हम जाट,हम कुम्भार,हम चमार करने वालों,
इस सरजमीं पर मज़हबी हदें बढ़ती जा रही है।
*विनोद कुमार वियोगी*