वाचस्पति वत्सल

वाचस्पति वत्सल कवि, लेखक एवं व्यंगकार

31/07/2026

बिहान

अंधियारी रतिया बीतल हो, फेर से भइल बिहान
बीतल दिनवां भूल के पंचे करम पर करs गुमान।

बरखा पर खिसिआइल कबले तकबs तूहूं सूखल धान
अंखिया लोरवा पोछि के उठs फेटा बांधs फेरू किसान।

चिरई के केतना घोंसला टूटल, अम्बर से केतना जोन्ही छूटल
दू दिन बीतल चिरई फेर के उठिके तिनका जोड़ल।

जोन्ही भी त अंतिम क्षण ले राहि पर आगे बढ़ते गईल
आसमान से कबो कहंवाँ रोअन पीटन केहू कईल?

इहे चिरईया आस जगावे आ जोन्ही जगावे मान
करs तैयारी बीज बोये के फेर से होई धान।

मनइ के त नाम तबे बा ताल ठोक के आवे
दुनु हाथे में माटी मलि के बिपते से हाथ मिलावे।

तू किसान के बेटा हउअ बंजर में फूल खिला दे
सूखा, मौसम आ मंहगाई से काहे नयन भिंजावे?

अंधियारी रतिया बीतल हो, फेर से भइल बिहान...

17/07/2026

मधुशाला

रातें कट गई गजलों में मेरी
गीतों में दिवस बीत गए
तेरी यादों में खो गया जबसे
आज कितने बरस बीत गए।

छेड़ दिया मन का तार फिर
उस राग की तरन्नुम ने
तेरी तलाश में फिरते हुए
खुशबू के शहर रीत गए।

वो तेरा साथ, रंगीली शाम
फिर लौटकर न आएगी
कोशिशें लाख हों भुलाने की
दिल से अब याद कहां जाएगी?

तुम मुझे सोचते होगे
किसी अनजान से शहर में
मैं कविता में ढूंढता तुमको
तुम मेरी मधु हो, मधुशाला भी।

जो फूलों और कलियों में
खुशी का रंग छाया है
वही तो आज भी मेरा
हर राह पर हमसाया है।

कहीं से तुमने अधरों पर
कोई गीत गुनगुनाया है
गुलमोहर लाल हुआ
मधुमास फिर से आया है।

मैं जो लिखता हूं कुछ भी
दिल की कलम तुम हो
हर समय साथ होने का
खूबसूरत सा वहम तुम हो।

तुमने शायर बना दिया मुझको
मैं तो शौक-ए-ग़ाफ़िल था
प्रेम का ही कमाल यह है
और मैं कहां किसी काबिल था?

15/07/2026

चराग़

जब एक चराग़ बुझ गया तूफान हंस पड़ा
उसने समझा कि अब कहीं चराग़ नहीं।

जगनुओं को देकर कसम चराग़ों ने
अंधेरी राह पर फिर से उजाले कर दिए।

वो उजालों का निगहबान होता जाएगा
जो अंधेरों में पशेमान होता जाएगा।

बस एक ज़ुबान की चाहत तो है उजालों को
अंधेरे देर तक मेहमान नहीं होते हैं।

थर थर कांप रही है लौ, पर जिंदा है
देर तक वो भी अंधेरों का भरम रखती है।

तुम चराग़ न सही, जुगनू ही चलो हो जाना
जिसमें न तेल है, न दिया है, न बाती है।

11/07/2026

आगाज

कविता जो बंध गई जद में तो कविता क्या है?
सरिता जो रुक गई हद में तो सरिता क्या है?

नजरिया ही तो होता है कलम की रेख में केवल
जो हरदम मुक्त होता है कोई सजदा नहीं होता।

इस दौरे-ऐ-कातिल में सितमगर तो बहुत मिलते
किसी का जख्म भरने को कोई मरहम नहीं मिलता।

तेरी आवाज ही पहचान तेरे होने न होने की
चुप चुप से जीने का किसी को हक नहीं मिलता।

बहुत है शौक अब मुझको नया आगाज करने का
अंधेरे दौर में खुद से कोई पत्ता नहीं हिलता।

29/06/2026

कारी बदरिया से...
(भोजपुरी गीत)

अबकि गरमियां पड़ि गइल भारी
बरखा के तनिको ना आइल फंकारी
धाने के रोपवा जरि गइलें सारी
पछुआ के जैसे कौनो भइल बा बेमारी
कारी बदरिया से पूछीले हम
हमरे गऊंआं में काहे बरसलू तू नाहिं?

रोवेलें किसान भरि अंखिया में पानी
खइहें पहुंनवां का, का खइहें जवारी
बेटी के बियाह कइसे करइहें मुरारी
खइहें सवंगवा का, का खइहें भिखारी?
कारी बदरिया से पूछीले हम
हमारे गऊंआं में काहे बरसलू तू नाहिं?

चिरई-चुरुंग जाने कइसे जियेलें?
कवने तलइया के पानी पियेलें?
कइसे दुपहरिया गुजारेलें राही?
न पानी मिले ना मिले तनिको छांहिं
कारी बदरिया से पूछीले हम
हमरे गऊंआं में काहे बरसलू तू नाहिं?

अबकि त अमवो से डाढ़ि ना भरल
ना अंचरवे परल ना अमावट बनल
जामुन के बगिइचा में मनवां दुखल
ऊ फरेनिया बिना सब उदासे कटल
धाने के रोपवा जरि गइलें सारी
काहे बरखा के तनिको आइल ना फंकारी?

कारी बदरिया से पूछीले हम
हमारे गऊंआं में काहे बरसलू तू नाहिं?
अबकी गरमियां पड़ि गईल भारी...

26/06/2026

मिल्कियत

कितना बदल गए हम भी
प्यार ही जिंदगी कर ली
मौसम से रंज कर बैठे
फूलों से दोस्ती कर ली।

क्या मिला, न मिला, देखें कौन?
कौन इतना हिसाब कर डाले?
है फुर्सत किसे जो वणिकों सा
अपना मिजाज कर डाले?

जफ़ा वाले अब सोच में रहते
कि पत्थर का जवाब पत्थर है
मैंने रिवायत पलट कर रख डाली
फूलों में जवाब कर डाला।

लगा लो मिल्कियत का हिसाब
मैंने पलड़े गज़ल को रख डाला
तुम जो चाहे तुम रख लो
मैंने अपनी शग़ल को रख डाला।

अब देखे कहां ले जाता हुनर
नदी की धार में कश्ती
और पतवार उसके हाथों में
उसकी ही बंदगी कर ली।

अब तो वही शेर कहता है
मैं तो बस काग़ज़ निकाल लेता हूं
और फिर सर झुकाए रहता हूं
जाने कब वो उतर आए
जाने कब वो उतर आए।

21/06/2026

सियासत

आज तेरी बातों में सियासत है बहुत
तभी एहसासों में बनावट है बहुत

मैं तो अब भी होश मंद रहता हूं
आज भी वक्त किताबों में गुजारा है बहुत।

दो कदम तो चलो, हम चार कदम चल देंगे
आज फिर जगने का इरादा है बहुत।

चुपचाप खड़े रहने से अच्छा है मेरा मर जाना
आज वैसे भी जिंदगी में खतरा है बहुत।

मैं तो बस ठोकर से हर दीवार गिरा डालूं
आज इन दीवारों में शीशा है बहुत।

जूझना होगा ही आज सोचा है बहुत
अब तलक तो हमने बचाया है बहुत।

कुसूर मेरा था सब को जगा कर देख लिया
अपने अहबाबों को पुकारा है बहुत।

गिनाए फायदे तुमने बहुत से जुबां-फरोशी के
उसने ईमान वालों को सताया है बहुत।

आज मालूम हुआ दूसरी सिम्त क्या होती
अपने करीब वालों को बुलाया है बहुत।

क्या होता जो हम भी मौसम के हिसाब से चलते
अब सियासत में सिर्फ एक रंग छाया है बहुत।

हमने कोई भी गुलशन एक रंग नहीं देखा
क्या तुमने देखा है जिसका चर्चा है बहुत?

15/06/2026

परिंदा

एक दिन ये जिस्म औ लिबास छूट जाएंगे
हम बन के एक याद तेरे पास छूट जाएंगे।

यहीं आसपास होने के अहसास में जिंदा होंगे
आसमां पर किसी चांद-सितारे के मानिंदा होंगे।

खोजेंगे लोग हमें थक हार इन्हीं शब्दों में
और हम कैद से छूटे हुए आज़ाद परिंदा होंगे।

13/06/2026

डांस पे चांस
(व्यंग्य आलेख)

एक फिल्मी गाना कुछ वर्षों पहले आया था जिसका मुखड़ा कुछ “डांस पे चांस मार ले” से शुरू होता है। उस समय तो इसका मतलब मुझे समझ नहीं आया कि गायक कहना क्या चाहता है पर इसका अर्थ मुझे अब समझ में आया है।’डांस पे चांस मार ले’ गाना तो उनके लिए था जिन्हें डांस आता हो पर जिन्हें डांस का कुछ भी नहीं आता वे क्या करेंगे, गाना लिखने वाले को ये अवश्य सोचना चाहिए था। वैसे आजकल शादियों का मौसम चल रहा है और हर शादी में डांस भी जोरदार ढंग से देखने को मिल रहा है। नौजवान प्रसन्न हैं, वह कभी नागिन डांस, कभी मुर्गा डांस, कभी पलटू डांस, कभी कौवा डांस, कभी लुंगी डांस और तमाम अन्य तरह के डांस कर रहे हैं जिनके नाम हम लेखकों को मालूम नहीं है। भाई, यह डांस का क्षेत्र जो हमारा नहीं है और इसमें इतनी वैरायटी है कि एक याद करो तो दूसरा भूल जाता है। हम जैसे लोग तो इन सब चीजों से दूर दूर तक वास्ता नहीं रखते। पर मेरे नायक मकरंद मिश्र साथ शुरू में ही बड़ी गड़बड़ हो गई। जब उनकी शादी हुई तो उनके ससुराल वाले डांस के शौकीन निकल गए जिनमें उनके सभी साले-सालियां हैं। सरहजों की तो आप बात ही मत पूछिए। वे सभी उन्हें पकड़ कर गाहे-बगाहे घसीट ही लेते हैं और उन्हें मजबूर हो कर डांस के नाम पर थोड़ा बहुत कूदना फांदना पड़ता है। वैसे सावधानी हेतु वे बारात की रोड लाइट से या डी जे से बहुत दूर रहते हैं फिर भी कभी कभार बुरी तरह फंस जाते हैं। बड़ी विकट समस्या है उनकी, यह अदना लेखक उसे हल नहीं कर पाता।

पता नहीं आपका क्या अनुभव क्या है इस मामले में, मिलने पर अवश्य बताइएगा। मेरे छात्र जीवन तक तो शादियों में डांस करने बहुत रिवाज नहीं था अतः कभी हमारी पीढ़ी को सीखने की आवश्यकता ही महसूस नहीं हुई। हमारे बाद की पीढ़ी जब अवतरित हुई उसके बाद समय बड़ी तेजी से बदला। बुफे डिनर होने लगे, डिजाइनर सूट और लहंगे आ गए, वीडियो कैसेट बनने लगे और शादी के पूर्व ही दूल्हा दुल्हन के बीच बातचीत होने लगीं। घर के दरवाजे से हम मैरिज हॉल में आ गए और शादियों का खर्च चौगुने से भी अधिक बढ़ गया। शादियों में द्वारपूजा के वक्त हाथी घोड़े आने बंद हो गए, तिलक के बदले लोग रिसेप्शन करने लगे और कन्या निरीक्षण के बदले प्रत्यक्ष जयमाला होने लगी। सास-ससुर, भाई-भतीजे, बुआ और भाभियां एक साथ डी जे पर डांस करने लगे। घूंघट हट गया और महिलाएं और पुरुषों के नए नए परिधान आ गए जिनके नाम भी हम सबको नहीं पता। इतना कुछ बदल गया कि पता ही नहीं चला कब हम आउटडेटेड हो गए? और वह भी सिर्फ एक वजह से, क्योंकि हमें डांस करना नहीं आता। शादी विवाह में बारात में नवयुवक जब ताल पर थिरकते हैं और उसमें हमें बुलाते हैं तो हम झेंप जाते हैं, इसलिए नहीं कि हमारा ज्ञान किसी से कम है, या किसी और मामले में हम किसी से कम है, पर यह कमबख्त डांस न कर पाना एक ऐसा अवगुण बन जाता है जिसका कोई तोड़ नहीं। हमारी कूद फांद को देखकर सभी हंस पड़ते हैं और हमारा फूफा या जीजा इत्यादि होने का सारा टेंपो धरा का धरा रह जाता है। इस तरह हमारा चांस पे डांस करने का मामला गड़बड़ हो जाता है।

कभी कभी तो मैं भी सोच में पड़ जाता हूं कि अपने बेटे की शादी में मेरा क्या हश्र होगा, कहीं उसमें तो नहीं कोई मुझसे आग्रह कर बैठेगा? आशंका देखकर मन में थोड़ी प्रैक्टिस कर लेने का भाव जगता है पर कहें किससे? पत्नी से अपना प्लान बताऊं तो गारंटी है कि वह अपने मायके में ढिंढोरा पीट देगी। स्त्री के पेट में कोई बात कहां छुपती है, यह तो आप जानते ही हैं। बाथरूम सिंगर्स की तरह डांस की प्रैक्टिस बाथरूम में नहीं की जा सकती जैसे गाने की प्रैक्टिस संभव हो जाती हैं। यहां मामला थोड़ा रिस्की है। कहीं गलती से भी अगर टाइल्स पर पैर फिसल गया तो लेने के देने पड़ जायेंगे, प्लास्टर चढ़ेगा सो अलग। इसलिए सोचता हूं, जब घर में कोई नहीं हो तो थोड़ा बहुत हाथ पांव मार लिया जाय और वह भी बहुत कम म्यूजिक पर कि पड़ोसियों को भनक न लगे, और पत्नी को तो बिल्कुल भी नहीं। सावधान रहना बहुत जरूरी है। मुझे अच्छी तरह याद है कि कभी कभार चांस पे डांस जैसा सीन मेरी गाड़ी में मेरे दो अभिन्न मित्रों द्वारा क्रिएट किया जाता था पर वह एक साधारण बात थी। यहां मामला अत्यधिक गंभीर है क्योंकि यह मेरे मित्र मकरंद मिश्र की प्रतिष्ठा से जुड़ा हुआ है। मेरे अन्य मित्र भी ऐसा ही कुछ झेलते होंगे क्योंकि कई बार गाड़ी की पिछली सीट पर प्रैक्टिस करने के बावजूद यह तो तय है कि हम में से कोई भी इस कला में पारंगत नहीं हो पाया था।

मकरंद मिश्र ने तो कई बार तो शादियों में पैर में मोच या कमरदर्द का बहाना बनाया पर अंततः पोल खुल गई क्योंकि जैसे ही उनके साले सरहज थोड़े किनारे हुए वह यह भूल गए कि उन्हें मोच होने की एक्टिंग करनी है। सीधे आदमी जो ठहरे। चाल समझ में आते ही वे उन्हें टांग ले गए और डी जे पर खड़ा कर दिया और फिर क्या हुआ, आप समझ ही गए होंगे। उनसे छोटे साले तो कुछ नहीं बोलते पर जो बड़े हैं, बड़े जालिम हैं, उन पर पर जरा भी नरमी नहीं दिखाते। लौटकर वह जब अपना दुखड़ा मुझे सुनाते हैं तो मुझे उनका कष्ट जानकर बड़ा दुख होता है और मैं उन्हें समझाने का यत्न करता हूं। पर अगली बार के लिए हम दोनों मिलकर कुछ सोच रहे हैं। आप अपने आदमी हैं इसलिए बता रहा हूं, किसी से कहिएगा मत। हम डांस सीख कर अपने को अपग्रेड कर रहे हैं। क्या विडंबना है, अपने को अपग्रेड भी छुप छुपा कर करना पड़ रहा है।

वे जब भी मिलते हैं अपना दृढ़ निश्चय दोहराते हैं और मैं उन्हें समर्थन देता हूं। कुछ ही दिनों में उनके छोटे साले की शादी है अतः तैयारी जोर शोर से चल रही है और प्रैक्टिस का उन्हें भरपूर मौका भी मिल रहा है। उनकी पत्नी आजकल छोट भाई की शादी की खरीदारी में व्यस्त हैं और अक्सर घर खाली रहता है। वे प्रसन्न हैं, अबकी बार ससुराल वालों को चित जो कर देना है। वे भी क्या याद करेंगे कि यह मकरंद मिश्र क्या चीज है। उन्हें यह भी पता चलेगा कि उनका जीजा किसी मामले में कम नहीं। दिन जल्दी गुजर रहे हैं और मेरे मित्र के चेहरे की मुस्कान बता रही है कि वे डांस के नए नए पायदान चढ़ते चले जा रहे हैं। पर मेरी स्थिति कुछ अलग है क्योंकि लेखन और बाजार आने जाने के बाद समय ही कहां बचता है, और जो थोड़ा बहुत होता भी है तो पत्नी घर पर मौजूद होती है इसलिए मैं मकरंद मिश्र में ही अपने आप को देखता हूं और उनके सफल होने की दुआ करता हूं। आखिर मुझे भी मेरे ससुराल वालों ने कम परेशान थोड़े किया है? वे ससुराल वालों द्वारा सताए हुए लोगों के नेता बनकर उभरे हैं जो लड़ेगा और जीतेगा भी। हमें उनपर पूरा भरोसा है।

उनके साले की शादी नजदीक आ गई है। तिलक कल ही है। डी जे लग रहा है और मकरंद मिश्र दूर से ही युद्धभूमि का निरीक्षण कर रहे हैं। समय नजदीक आते ही उनकी भुजाएं फड़कने लग रही हैं और जैसे वह बस बिगुल बजने का इंतजार कर रहे हैं, परफॉर्म करने के लिए उतावले। आजकल वे अपनी पत्नी और सालों से कम बोलते हैं, इस भय से कि कहीं खुद ही राजफ़ाश न कर दें। पत्नी भी थोड़ी सशंकित है, कुछ तो अवश्य बदला है जो उन्हें नहीं पता, पर सोचती हैं, शायद उम्र का तकाज़ा है इसलिए ऐसे हो गए हैं। शाम होते ही डी जे बज उठा है, बच्चे उछल कूद रहे हैं। तिलक के बाद वह घड़ी आती है जिसका मकरंद मिश्र को महीनों से इंतजार था। उनकी पत्नी उन्हें बुलाती हैं कि शायद इससे उनके चेहरे की गंभीरता कुछ कम हो। वो मना कर देते हैं। पर जैसे ही उनके साले डांस करना शुरू करते हैं मकरंद मिश्र लगभग दौड़ते हुए वहां पहुंचते हैं और गाना लगाने वाले से उनका गाना बजाने की फरमाइश कर देते हैं। सभी आश्चर्यचकित हैं कि यह उनके जीजा का कौन सा रूप आज उन्हें देखने को मिल रहा है। पर यहां भी एक गड़बड़ हो चुकी है, जिस गाने पर मेरे मित्र ने महीनों अभ्यास किया वह गाने वाले के पास है ही नहीं। मैं कुछ दूर खड़ा सब देख रहा हूं कि वे उसे बार बार डांट रहे हैं। वह उनसे कह रहा है, “सर, अब ऐसे गानों पर कौन डांस करता है, मेरे पास नहीं है, आपको ले कर आना चाहिए था”। इसी तकरार के बीच बज उठता है, “बुलेट पर जीजा, बुलेट पर जीजा”, वही गाना जिसके लिए मकरंद मिश्र बिल्कुल तैयार नहीं थे। मैं देख रहा हूं कि उन्हें डी जे के केंद्र में खींचा जा चुका है और उन्हें जैसे तैसे अपनी परफॉर्मेंस दिखानी पड़ रही है। गाने लगातार बदल रहे हैं, कभी “लगवेलु तू जब लिपीस्टिक” तो कभी कोई और, उन सभी में हमारा नायक एक बार पुनः परस्त एवं आउटडेटेड सिद्ध होता है। इस तरह उनका डांस पे चांस का मामला एक बार पुनः व्यर्थ होता है। जब वे हांफते हुए बाहर आते हैं तो उनकी भाव भंगिमा देखकर मुझे थॉमस हार्डी के नायक माइकल हेन्चार्ड की बहुत याद आती है जिसे फेट और चांस ने हरा दिया था। काश उस गाने वाले के संग्रह में वह गाना होता तो स्थिति एकदम उलट होती। सांत्वना देने हेतु मैं मिर्जा अज़ीम बेग का यह शेर पढ़ता हूं:

गिरते हैं शहसवार ही मैदान-ए-जंग में
वो तिफ्ल क्या गिरें जो घुटनो के बल चलें।

यह बाद में पता चलता है कि उन्होंने गुलाम अली की किसी ग़ज़ल पर प्रैक्टिस की थी। तब मैं अपना माथा पकड़ लेता हूं और मुझे यह आभास होता है कि वास्तव में हमलोग कुछ ज्यादा ही आउटडेटेड हैं जिसकी भरपाई इस जन्म में संभव नहीं।

07/06/2026

शिक्षक का मान

जब तक शिक्षक का मान न होगा
सामाजिक उत्थान न होगा
कभी उन्हें भी याद तो कर लो
जिसने था पढ़ना सिखलाया।

तेरे पूर्वज तुमसे अच्छे थे
गुरु समक्ष नतमस्तक होते
गुरु जैसा था सखा न कोई
देवों से भी स्थान बडा था।

बनते तुम संस्कृति के पोषक
शिक्षक से भोजन बनवाते?
शिक्षक को नौकर समझे हो
अब तुमसे उम्मीद न कोई।

अब चयनों में घोटाले होते
श्रम-चोरों की फौज आ गईं
हर पद चाटुकार तुम भरते
उनको रोज पुरष्कृत करते।

सच्चे शिक्षक को कौन पूछता?
वह तो सदा से योगी ठहरा
कर्मरती है अपने श्रम में
सरकारें आयें या जाएं।

शिक्षा की है नींव हिल चुकी
जाने कब तक तुम चेतोगे
अधकचरे सी पौध उग रही
जिनको थोड़ा भी ज्ञान नहीं है।

झूठ ओढ़ता सच की चादर
भ्रष्टों की छाती है चौड़ी
क्या सीखेगी नयी पौध ये
कलुषित होते इस समाज में?

गांधी के सपनों का भारत
मन चिंतित आगे क्या होगा
कलयुग के हैं दृश्य उपस्थित
तमस घनेरा, ऊब हो रही।

दिखलाते स्वर्णिम से सपने
कोई न देखे नींव गल चुकी
स्त्री-बहुओं का मान नहीं है
आज कलंकित देश हमारा।

क्या मानक बहओं का चीरहरण है?
या नोटों पर बिकते अधिकारी?
नेता का बिकना लोकतन्त्र में
या रक्षक का भक्षक बन जाना?

जिन संस्कृतियो का पतन हो चुका
सबने मौलिक भूल यही की
शिक्षा का कोई मोल न जाना
इसको सबसे कमतर माना।

जितनी भी सरकारें आयी
सबने शिक्षा पर मौन ही साधा
मूल बिंदुओं से भटकाकर
वोट बैंक का दामन थामा।

चारित्रिक सारा पतन हो गया
भारत में पुष्पित नई पौध का
जितने बनवाओ सड़क-पुलों को
भौतिक साधन में देश नहीं है।

याद ये रखो गांठ बांध कर
शिक्षक समाज का प्रेरक होता
उसकी आत्मा मर गई अगर तो
कोई फिर ना गांधी होगा।

कोई न जन्मेगा शास्त्री भी
राजधर्म क्या है दिखलाये
ना कोई भगत और शेखर बन
देश के हित बलिदान करेगा।

शिक्षक ही नेताजी सुभाष है
शिक्षक ही मेरा कालिदास है
शिक्षक जयशंकर प्रसाद है
विवेकानंद भी है शिक्षक ही।

शिक्षक मेरा हरिवंश राय है
शिक्षक ही कोई फ़िराक़ भी
शिक्षक राष्ट्र कवि दिनकर है
नेहरू को गिरते समय सम्हाले।

शिक्षक ही पालक नई पौध का
खुद ही दर्पण है अपने श्रम का
जब तक शिक्षक का मान न होगा
सामाजिक उत्थान न होगा।

Address

F 78, Mahadeopuram , Kunraghat
Gorakhpur

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