09/06/2020
बचपन, जवानी और लाउक डाउन......................
(हर्ट टचिंग स्टोरी)
ना चाहते हुए भी आज घर लौट आया । गांव अपने ऐसा नहीं हैं की गाव आने का मन नहीं करता। ये ओही गांव हैं जो अभाव से भरा बचपन गुजरा था । अभाव इतना था कि साइकिल के टायर के लिए मार हो जाता था। कहा गया वह गांव? वह रविवार को 12:30 बजे शक्तिमान देखना , सुबह-शाम कबड्डी खेलना , लड्डू नचाना कहा गया वह गांव? फिर एक दिन काम की तलाश ने शहर (परदेश) दिखा दी। मुंबई से लौटने के बाद मेरा गांव , गांव नहीं रहा गया अब मोहल्ला बन गया था रिश्ते भले ही कच्चे रह गए थे ही लेकिन गांव की सड़क और घर पक्के हो गए थे । हर घर में बिजली , पानी और गैस सारी सुविधाएं उपलब्ध हो गई थी।
एक मेरा जमाना था जब रामायण आता था तो टीवी का एंटिना ही ठीक करने में बीतता । दीवारें भी जालिम लोशन की तरफ हो गई थी हर तरफ इंजीनियरिंग कालेज के एड लगे थे । वह दिन कब के बीत चुके थे जब दीवारों पर लोग गोबर की कंडी बनाया करते थे । पहले १४ दिन उसी स्कूल में रखा गया जहा से मैं कभी पढ़ा करता था आज फिर उसी क्लास को काफी देर से देख रहा था क्लास वहीं था लेकिन लाइटें और कलर थोड़ी अलग सी हो गई थी १४ दिन आइसोलेशन के बाद घर वाले ने ७ दिन अपने घर पर रहने की हिदायत दिए लेकिन बचपन के दोस्त ने अगवा कर के गांव का भ्रमण कराने लगे थे हमरा एक जमाना था टीवी ब्लैक एंड व्हाइट थी आज के घरों में कलर टीवी सेटअप बॉक्स के साथ हाथो में स्मार्ट फोन गांव और शहर का भेद मिटाने में लगे पड़े थे । गलियों में साइकिल कम मोटरसाइकिल ज्यादा दिखाई दे रहे थे। हरियाली का घुंघट हुआ करता था आज हरियाली बाहर निकल कर आ गई थी मास्क पहनकर ।
पता नहीं गांव के मोह ने घेर लिया या किसी गांव वाली ने अब मै शहर नहीं जाना चाहता।
(Jp kashyap)