11/12/2025
कुछ औरतें यूँ ही नहीं हो जातीं चिड़चिड़ी सी…
उनके भीतर दबे पड़े—
अधूरे सपनों के पिटारे,
अधूरी इच्छाओं की पीर
आज भी करवटें लेती रहती है।
तन कई तरह के विकारों से जूझता है,
हॉर्मोनल तूफ़ान भीतर उठते हैं,
कभी देह में असहनीय दर्द,
तो कभी मन बार-बार छलनी होता है।
उनकी अनकही पीड़ाएँ
जब नज़रअंदाज़ कर दी जाती हैं,
तो चोट तन पर नहीं—
सबसे गहरी चोट मन पर लगती है।
किसी को लगता है—
"सब कुछ तो है इनके पास,
सुविधाएँ भी हैं, आराम भी..."
पर कौन समझाए कि
भौतिक सुख मन का सुकून नहीं होता।
अस्पताल के चक्कर लगाकर लौट आती हैं,
लेकिन तबियत जैसे वहीं की वहीं—
क्योंकि हर मर्ज़ का इलाज
सिर्फ दवा नहीं,
कभी-कभी थोड़ा
समय, स्नेह और परवाह भी होता है।
ये छोटी-छोटी बातें ही
इनके जीवन के बूस्टर हैं।
आप दे कर तो देखिए—
फिर दिखेगी इनकी फुर्ती,
और हर रोज़ जीने की ललक।
पर जब इन्हें यूँ ही हाल पर छोड़ दिया जाता है,
तो मन भीतर-ही-भीतर खोखला होने लगता है।
सोचिए—क्या कोई खाली मन
जीवन की राह चल सकता है?
यही खालीपन
धीरे-धीरे अंधेरों को समेट लेता है,
हर ओर धुंध छा जाती है,
और जीने की चाह बुझने लगती है।
तन से भारी हो जाता है मन
जब अवसाद की जकड़ आ जाती है;
खुशियाँ दूर भागती हैं,
और जीवन एक बोझ-सा लगता है।
चिकित्सकीय भाषा में इसे "अवसाद" कहते हैं,
पर इनकी भाषा में इसका नाम है—
अकेलापन।
अकेलापन—
जो अधूरी ख्वाहिशें दिखाता है,
बीते सुखद दिनों की याद दिलाता है,
और बार-बार कहता है—
“अब कोई नहीं तुम्हारा…”
ये अकेलापन दीमक है,
धीरे-धीरे चाट जाता है
जीवन का हर सुख।
तुम ही बताओ—
हर पल दर्द और पीड़ा से जूझती,
तन-मन से थकी,
मानसिक अशांति में उलझी
एक इंसान—
चिड़चिड़ा नहीं होगा तो क्या होगा…!
सिंह अंजू