Mai gulmohar

Mai gulmohar ताजे, चमकीले, लदे हुए
सांवली सी डाल पर
कहते हो जैसे
मिलकर रहो
मिलते रहो.......
गुलमोहर के फूल....

24/02/2026

कर्म कभी मौन नहीं रहता,
वह समय की परतों में छुपकर भी
हर आह, हर आँसू का हिसाब रखता है।
जिसे तुमने तड़पाया है,
समय तुम्हें भी उसी वेदना का आईना दिखाएगा —
क्योंकि कर्म से बड़ा कोई न्यायाधीश नहीं होता।
ईश्वर करुणामय है,
वह क्षमा का सागर है,
पर कर्म का लेखा-जोखा अटल सत्य है।
जब समय की घड़ी बजती है,
तो बिना शोर, बिना पक्षपात,
न्याय स्वयं तुम्हारे द्वार पर आ खड़ा होता है।
इसलिए अपने कदम सोच-समझकर बढ़ाओ —
क्योंकि दुनिया की नजरों से बच भी जाओ,
पर अपने कर्मों से कभी नहीं बच पाओगे।

11/12/2025

कुछ औरतें यूँ ही नहीं हो जातीं चिड़चिड़ी सी…
उनके भीतर दबे पड़े—
अधूरे सपनों के पिटारे,
अधूरी इच्छाओं की पीर
आज भी करवटें लेती रहती है।

तन कई तरह के विकारों से जूझता है,
हॉर्मोनल तूफ़ान भीतर उठते हैं,
कभी देह में असहनीय दर्द,
तो कभी मन बार-बार छलनी होता है।

उनकी अनकही पीड़ाएँ
जब नज़रअंदाज़ कर दी जाती हैं,
तो चोट तन पर नहीं—
सबसे गहरी चोट मन पर लगती है।

किसी को लगता है—
"सब कुछ तो है इनके पास,
सुविधाएँ भी हैं, आराम भी..."
पर कौन समझाए कि
भौतिक सुख मन का सुकून नहीं होता।

अस्पताल के चक्कर लगाकर लौट आती हैं,
लेकिन तबियत जैसे वहीं की वहीं—
क्योंकि हर मर्ज़ का इलाज
सिर्फ दवा नहीं,
कभी-कभी थोड़ा
समय, स्नेह और परवाह भी होता है।

ये छोटी-छोटी बातें ही
इनके जीवन के बूस्टर हैं।
आप दे कर तो देखिए—
फिर दिखेगी इनकी फुर्ती,
और हर रोज़ जीने की ललक।

पर जब इन्हें यूँ ही हाल पर छोड़ दिया जाता है,
तो मन भीतर-ही-भीतर खोखला होने लगता है।
सोचिए—क्या कोई खाली मन
जीवन की राह चल सकता है?

यही खालीपन
धीरे-धीरे अंधेरों को समेट लेता है,
हर ओर धुंध छा जाती है,
और जीने की चाह बुझने लगती है।

तन से भारी हो जाता है मन
जब अवसाद की जकड़ आ जाती है;
खुशियाँ दूर भागती हैं,
और जीवन एक बोझ-सा लगता है।

चिकित्सकीय भाषा में इसे "अवसाद" कहते हैं,
पर इनकी भाषा में इसका नाम है—
अकेलापन।

अकेलापन—
जो अधूरी ख्वाहिशें दिखाता है,
बीते सुखद दिनों की याद दिलाता है,
और बार-बार कहता है—
“अब कोई नहीं तुम्हारा…”

ये अकेलापन दीमक है,
धीरे-धीरे चाट जाता है
जीवन का हर सुख।

तुम ही बताओ—
हर पल दर्द और पीड़ा से जूझती,
तन-मन से थकी,
मानसिक अशांति में उलझी
एक इंसान—
चिड़चिड़ा नहीं होगा तो क्या होगा…!

सिंह अंजू

06/06/2025

नित जीवन के संघर्षों से
जब टूट चुका हो अन्तर्मन,
तब सुख के मिले समन्दर का
*रह जाता कोई अर्थ नहीं*।।

जब फसल सूख कर जल के बिन
तिनका -तिनका बन गिर जाये,
फिर होने वाली वर्षा का
*रह जाता कोई अर्थ नहीं।।*

सम्बन्ध कोई भी हों लेकिन
यदि दुःख में साथ न दें अपना,
फिर सुख में उन सम्बन्धों का
*रह जाता कोई अर्थ नहीं।।*

छोटी-छोटी खुशियों के क्षण
निकले जाते हैं रोज़ जहाँ,
फिर सुख की नित्य प्रतीक्षा का
*रह जाता कोई अर्थ नहीं।।*

मन कटुवाणी से आहत हो
भीतर तक छलनी हो जाये,
फिर बाद कहे प्रिय वचनों का
*रह जाता कोई अर्थ नहीं।।*

सुख-साधन चाहे जितने हों
पर काया रोगों का घर हो,
फिर उन अगनित सुविधाओं का
*रह जाता कोई अर्थ नहीं।।*

हम वो पीढ़ी हैं,जिसने महाकुम्भ भी देखा है।तपस्वीनी इस धारा को हमने,सजते-संवारते देखा है।पतित-पावनी इस धरती पर,पतितों को प...
03/02/2025

हम वो पीढ़ी हैं,
जिसने महाकुम्भ भी देखा है।
तपस्वीनी इस धारा को हमने,
सजते-संवारते देखा है।

पतित-पावनी इस धरती पर,
पतितों को पावन होते देखा है।
साधु सन्तों से सजी धरती को,
खुद पर इतराते देखा है।

नर-नारी और किन्नर को,
एक घाट पर बसते देखा है।
अर्पण-तर्पण की भूमि पर हमने,
पूर्ण समर्पण देखा है।

मोह-माया में फसे जनों को,
भक्ति में डूबा देखा है।
नेता-अभिनेताओं को भी हमने,
संगम में डुबकी लगाते देखा है।

हाड़ कपाती सर्दी में हमने,
शाही स्नान भी देखा है।
संगम की नदियों को हमने,
मिलकर नृत्य करते देखा है।

‘गूगल बाबा’ को भी हमने,
‘महाकुंभ’ का दीवाना देखा है,
‘महाकुंभ’ के नाम पर,
पुष्प वर्षा करते देखा है।

144 साल बाद आने वाले इस पर्व को,
हमारी पीढ़ी ने देखा है।
धन्य हैं हम!
जो इस भूमि,इस पीढ़ी में जन्मे,
जिन्होंने, ‘जन्नत’ को धरती पर देखा है।
‘जन्नत, को धरती पर देखा है।

21/07/2024

मां ही है
वो प्रथम शिक्षक
जो गर्भ में ही
निज रक्त सिंचित कर
पोषित करती है
नवांकुर को।

वात्सल्य की ममता में
बांधकर, तृप्त करती है,
गिरना-संभलना,
चलना-दौड़ना
सिखाती है।

संस्कारों की दिव्यता
प्रदान कर,
विनम्रता के साँचे में ढालकर,
औपचारिक गुरु के
योग्य बनाती है।

वो पुण्य सलिला है,
जिसने दुःखों को भुलाकर
अविरल प्रेम बहाया है,
और बदले में
कभी कोई गुरु दक्षिणा
नहीं मांगी है।
अंजू सिंह

ताजे, चमकीले, लदे हुए
सांवली सी डाल पर
कहते हो जैसे
मिलकर रहो
मिलते रहो.......
गुलमोहर के फूल....

05/07/2024

जीवन में हम सभी को अक्सर एक ही पहलू दिखाई देता है और हम उसी के आधार पर अपनी प्रतिक्रिया देने का प्रयास करते हैं। अधिकांश लोग यह भूल जाते हैं कि हर स्थिति का एक दूसरा पहलू भी होता है, जो अपने समय का इंतजार कर रहा होता है।

उदाहरण के लिए, एक भंवरा जो अपनी ताकत से मजबूत लकड़ी को भी छेद सकता है, वह भी जब कमल की नाजुक पंखुड़ियों के बीच फंस जाता है, तो उसकी सारी सामर्थ्य बेबस हो जाती है। इसी प्रकार, मनुष्य भी अपने जीवन में कई बार ऐसी परिस्थितियों का सामना करता है जहां वह खुद को असहाय महसूस करता है, चाहे वह कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो।

यह समझना महत्वपूर्ण है कि जीवन में हर मुश्किल के साथ एक सीख छिपी होती है। हमें जीवन के हर पहलू को समझने और स्वीकारने का प्रयास करना चाहिए। कठिन समय में धैर्य बनाए रखना और सही अवसर का इंतजार करना ही समझदारी है।

जीवन के हर अनुभव में हमें कुछ नया सीखने को मिलता है और यही हमें मजबूत बनाता है। इसलिए, हर परिस्थिति का सामना सकारात्मक दृष्टिकोण से करना चाहिए और यह याद रखना चाहिए कि हर मुश्किल का हल समय के साथ अवश्य मिलता है। जब हम जीवन की इस सच्चाई को समझते हैं, तो हम बेहतर तरीके से चुनौतियों का सामना कर सकते हैं और अपनी सामर्थ्य का पूर्ण उपयोग कर सकते हैं।

इसलिए, जीवन के हर पहलू को ध्यानपूर्वक देखना और उसे समझना आवश्यक है। ऐसा करने से हम न केवल अपनी मुश्किलों का सामना कर पाएंगे, बल्कि उनसे सीखकर और भी मजबूत बनेंगे। कठिनाइयाँ अस्थायी होती हैं, लेकिन उनसे प्राप्त अनुभव और सीखें हमारे साथ हमेशा रहती हैं।
*सिंग अंजू*

27/04/2024

क्षण- क्षण से ही जीवन बनता है। इस सत्य की समझ से ही जीवन का रहस्य अनावृत होता है। वर्तमान को छोड़ भविष्य की योजना बनाना एक दिवास्वप्न के समान है और ऐसे ही वर्तमान को छोड़कर अतीत में ही उलझे रहना एक बिडंबना के समान, परंतु जो वर्तमान को पहचान कर उसके प्रति सजग रहते हैं, वे एक ऐसे जीवन को प्राप्त कर लेते हैं, जिसका प्रत्येक क्षण मूल्यवान बन जाता है।

सचमुच ही जो जीवन का सत्य पाना चाहता है , उसे वर्तमान क्षण में जीने की कला आनी चाहिए ।जीवन में सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि किसी भी क्षण को व्यर्थ न जाने दिया जाए और हर क्षण शुभकर्म करते रहा जाए। बूँद- बूँद से सागर बनता है और क्षण-क्षण से जीवन। बूँद को जो पहचान ले, वह जीवन को पा लेता है।

अंजू सिंह

26/03/2024

क्या आपने कभी गुलमोहर के प्रेम की विनम्रता को देखा है? गर्म हवाओं का गुरूर कैसे उसकी पातियों को छिन्न-भिन्न कर देती है पर वह कभी विलाप नहीं करती वह अपने भीतर के सौंदर्य को टेसू के रूप में पुष्पित कर उन हवाओं के अहंकार को अपनी विनम्रता से तुष्ट करने का प्रयत्न करती है।

मैंने इसी गुलमोहर से सीखा है प्रेम की अभिव्यक्ति। तुमने कितनी बार अपने अहंकार से मुझे तोड़ने का प्रयत्न किया पर मैने अपने भीतर के आहत मन को सदैव अल्फाजों की शक्ल में पल्लवित और पुष्पित कर तुम्हे नज़राने के स्वरूप में भेंट करने की चेष्टा की।

खैर! प्रेम के कई रंग होते हैं ...

आने वाला पल आपके जीवन में प्रगति के नये आयाम लेकर दस्तक दे। इसी शुभेच्छा के साथ..होली की हार्दिक शुभकामनाएं।

आपकी
अंजू सिंह

ताजे, चमकीले, लदे हुए
सांवली सी डाल पर
कहते हो जैसे
मिलकर रहो
मिलते रहो.......
गुलमोहर के फूल....

28/01/2024

ताजे, चमकीले, लदे हुए
सांवली सी डाल पर
कहते हो जैसे
मिलकर रहो
मिलते रहो.......
गुलमोहर के फूल....

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