06/12/2025
*अमृत कलश*
।।🕉️ मानस में नाम-वन्दना ।।
जैसे, धन कमानेवालों के पास धन ज्यादा बढ़ जाता है तो उनके धन का लोभ भी बढ़ता जाता है। परन्तु अन्त में वह पतन करता है, क्योंकि धन नाशवान् वस्तु है। मानो साधारण आदमी के धन का अभाव थोड़ा होता है। धनी आदमी के अभाव ज्यादा होता है। साधारण आदमी के सैकड़ों का, धनी के हजारों का, अधिक धनी के लाखों का और उससे भी बड़े धनीके करोड़ों का घाटा होता है। वैसे ही भजन करनेवालों के भी भजन की जरूरत होती है।
जो इसकी महिमा जानते हैं, उन्हें बहुत बड़े अभाव का अनुभव होता है कि हमारे भजन बहुत कम हुआ । परन्तु जो लोग भजन नहीं करते हैं, उन्हें पता ही नहीं, वे इसके माहात्म्य को जानते ही नहीं। परन्तु वे ज्यों ही अपने में कमी समझते है, त्यों ही भजन का माहात्म्य समझ में आता है। ऐसे माहात्म्य को समझनेवालों के लिये लिखा है कि नाम के उच्चांरणमात्र से कल्याण हो जाय।
‘भगवन्नाम-कौमुदी’ नामक एक ग्रन्थ है। उसमें बड़े शास्त्रार्थ-दृष्टि से विवेचना की गयी है। नाम का उच्चारण करनेवाले नाम के पात्र माने गये हैं। जैसे गजेन्द्र ने आर्त होकर भगवान् का नाम लिया तो भगवान् प्रत्यक्ष प्रकट हो गये। आर्त होकर जो नाम लिया जाता है, उसका बहुत जल्दी महत्त्व दीखता है। ऐसे ही भावपूर्वक नाम लिया जाता है, उसका विलक्षण ही असर होता है। एक पद में आता है-
कृष्ण नाम जब श्रवण सुने री मैं आली।
भूली री भवन हौं तो बावरी भयी री।।
जिन गोपिकाओं के हृदय में भगवान् का प्रेम है, वे उनका नाम सुनने से ही पागल हो जाती हैं। पता ही नहीं कि स्वयं मैं कौन हूँ, कहाँ हूँ ! ऐसे ही भगवन्नाम से ऐसी दशा हो जाती है। ‘कल्याण’ के भूतपूर्व सम्पादक भाई श्रीहनुमानप्रसादजी पोद्दार की नाम-निष्ठा अच्छी थी। कल्याण शुरू नहीं हुआ था, उस समय की बात है। किसी ने कह दिया- ‘राम नाम लेने से क्या होता है ?’ तो उन्होंने कहा- ‘कल्याण’ हो जाता है।’
उसने कहा- ‘अर्थ समझे बिना क्या है ?’ ‘राम’ नाम अंग्रेजी में मेढा और भेड़ा का भी है।’ तब उन्होंने जोश में आकर कह दिया, ‘राम-नाम से कल्याण होता है।’ ऐसे जोश में आकर कहने से उन्हें आठ पहर तक होश नहीं आया। खाना-पीना, टट्टी-पेशाब सब बन्द। इस बात से उनकी माँ जी बड़ी दुःखी हो गयीं कि हनुमान को क्या हो गया ? ऐसे जो भगवान् का नाम लेता है, उसमें बहुत विलक्षणता आ जाती है।