12/02/2026
*सबसे बड़ी नेअमत हिदायत*
दौलत,सेहत और औलाद नेमत नहीं है अगर हिदायत नहीं है।
दौलत है और अगर हिदायत नहीं है तो दौलत का इस्तेमाल फालतू जगह होगा, गुल छर्रे उड़ाएगा वो दौलत उसके लिए रहमत के बजाय ज़हमत बन जाएगी।अगर सेहत और जवानी है और हिदायत नहीं है तो सेहत और जवानी का इस्तेमाल अय्याशी और दरिंदगी के काम में होगा और वो इंसान अशरफ़ से अर्ज़ल होते हुए असफला साफ़िलीन की शक्ल में सोशल एनिमल से एनिमल बन जायेगा।अगर औलाद है और हिदायत नहीं है तो वही औलाद जिसके लिए रात दिन पैदा होने की दुआ की गई थी घर के लिए मुसीबत बन जाएगी।
इसलिए अपने रब से दौलत, सेहत और औलाद की चाह रखने वालों को सबसे पहले हिदायत का तलबगार होना चाहिए।
हर नमाज़ में में हिदायत की आयत*एहदिनस सिरातल मुस्तक़ीम* तो हम पढ़ते हैं मगर उस पर दिल से रूजू नहीं होते।
हिदायत पाने का पहला ज़ीना हिदायत की तलब में बंदे का अपने रब से दुआ करना और हिदायत पाने का वाहिद ज़रिया अल्लाह का कलाम *क़ुरआन* है.....जिसका नुज़ूल रमज़ान के मुबारक महीने में हुआ...... रमज़ान की आमद आमद है.....क़ुरआन को सवाब की नियत से ज्यादा हिदायत और आख़िरत में निजात के नज़रिए से पढ़ें तो यह रमजानुल मुबारक का सबसे अच्छा इस्तकबाल होगा।
अल्लाह हम सबको हिदायत की दौलत से मालामाल करते हुए जानवरों की ज़िन्दगी से निकाल कर इंसानों वाली ज़िंदगी गुजारने वाला बनाए...वरना एप्सटाइन फ़ाइल हर समाज का हिस्सा बन जाएगा
हिदायत उस रूह का नाम है जो बंदे के अंदर गुनाह करते वक्त इस बात का डर पैदा कर दे कि कल मुझे अपने रब के सामने हाज़िर होना है.......जिसको अरेबिक में तकवा कहते हैं और क़ुरआन में रोज़ा का मक़सद भी हुसूल ए तक्वा ही बताया गया है.....*लाअल्लकुम तत् तक़ून*शायद कि तुम परहेज़ गार हो जाओ.....
हम अल्लाह से दुआ करते हैं कि आने वाला रमज़ान हमारे लिए हिदायत का जरिया और रोज़ा हमारे अंदर तकवा की सिफत पैदा कर दे
आमीन या रब्बुल आलमीन