Kavyitri Antrika Navodayan

Kavyitri Antrika Navodayan कवयित्री, मंच संचालिका

ओ,सृजनों के सृजनहार तुम, आशाएं सृजनों में बोना...��

देश में आज जो कुछ भी घटित हो रहा है,किसी की तो नाकामी है यह, जिसका जिम्मा लेकर सुधार करना आवश्यक है। मात्र चुप्पी और बहस...
22/07/2026

देश में आज जो कुछ भी घटित हो रहा है,किसी की तो नाकामी है यह, जिसका जिम्मा लेकर सुधार करना आवश्यक है। मात्र चुप्पी और बहसें किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकतीं... अराजक तत्वों को छोड़ यदि केवल निर्दोष छात्रों के साथ हुए दुर्व्यवहार की बात करें तो,जो भी हुआ बिल्कुल गलत हुआ, अत्यंत निंदनीय है और शासन प्रशासन को सदा यह याद रखना चाहिए कि...

संसद के गलियारों ने जब जब हथियार उठाए हैं।
सिंहासन के सिर पर काले, घने मेघ मंडराए हैं।।

कभी उचित मांगों को जब दरबारों ने ठुकराया है
कठपुतली की भांति इशारों पर सबको नचवाया है
संविधान की गरिमा रक्खी गई न सत्ता के मद में
और घोषणा करी गई, रहना होगा सबको हद में
तब गलियों से उठते स्वर ने लोहे भी मनवाए हैं
संसद के गलियारों ने जब जब हथियार उठाए हैं।।

मत समझो जनता की खामोशी उसकी दुर्बलता है
धैर्य धरा का टूटा यदि फिर बचती बस विह्वलता है।
कितने दंभ मिले माटी में, कितने ध्वज झुक चुके यहां,
आहों की ज्वाला में कितने झूठे वैभव फुंके यहां
कितने ही साम्राज्य इन्हीं हुंकारों ने दफनाए हैं
संसद के गलियारों ने जब जब हथियार उठाए हैं।।

राजनीति ने राष्ट्रधर्म से जब जब निज नाता तोड़ा,
न्यायालय ने भय,लालच में साथ सत्य का जब छोड़ा
सत्ता वैभव तब क्षणभंगुर, जनता शाश्वत शक्ति हुई,
गिरे शीघ्र औंधे मुंह जिनको कुर्सी संग आसक्ति हुई
कालचक्र की ठोकर ने तब शीश कई झुकवाए हैं
संसद के गलियारों ने जब जब हथियार उठाए हैं।।

किन्तु इस पक्ष को भी नहीं नकारा जा सकता कि समय की मांग यह भी है कि ऐसे दुष्कर समय में सभी देशवासियों को बहुत ही सजग रहकर सतर्कता एवं विवेक के साथ कार्य करने की, सामंजस्य बिठाने की आवश्यकता है खासकर ऐसी परिस्थितियों में जब.....

देश तोड़ने वाले तत्वों ने जब पैठ जमाया है
निर्दोषों ने षड्यंत्रों से घिरा स्वयं को पाया है
निर्दोषों को आवश्यकता है बुरी शक्ति से बचे रहें
राजनीति के छलछंदों, जयचंदों से भी बचे रहें।
याद रखें ये राष्ट्र खण्ड करने की ताक लगाए हैं,
आड़ आपकी ले केवल कुछ स्वहित साधने आए हैं।।

युवा एवं विद्यार्थी ध्यान दें कि -
ओट में छुप आपकी ही खेल खेले जा रहे हैं
आप,जब लाठी चली,आगे धकेले जा रहे हैं

निष्कर्ष -

माँग समय की सदा रही है, सिंहासन सम्मान बने
शासन का हर निर्णय केवल भारत का अभिमान बने
जनसेवा इकमात्र धर्म हो, सत्ता केवल साधन हो
शासक जनता के मध्य मात्र,पिता पुत्र सा बन्धन हो
जिनके कारण बगिया के हर एक पुष्प मुस्काए हैं
युग युग से ऐसे ही शासक सबके मन को भाए हैं।।

~अंत्रिका सिंह ✍️✍️

12/07/2026
Happy father's day Papa 💐🙏जीवन के हर सुख - दुख के क्षणों में बहुत याद आती है आपकी। आपकी रिक्तता का यह स्थान कोई पूर्ण नह...
21/06/2026

Happy father's day Papa 💐🙏
जीवन के हर सुख - दुख के क्षणों में बहुत याद आती है आपकी। आपकी रिक्तता का यह स्थान कोई पूर्ण नहीं कर सकता।😥

हम करें गलतियां तो सुधारें हमें,
जिद रखें नेह देकर दुलारें हमें ।
जानते हम सभी सच मगर दिल कहे,
इक दफा आप आकर पुकारें हमें।।

~अंत्रिका सिंह ✍️

तुमने न्याय सुनाया लेकिन, वेतन देगा कौनप्रश्न पर साधे हैं सब मौन...... कोई लेखाजोखा नहीं हिसाब यहां है कोई दिनभर काम किए...
16/06/2026

तुमने न्याय सुनाया लेकिन, वेतन देगा कौन
प्रश्न पर साधे हैं सब मौन......

कोई लेखाजोखा नहीं हिसाब यहां है कोई
दिनभर काम किए कितने है कब जागी कब सोई
कितनी कमियां गिनी गिनाई गईं आज तक उनमें
गर्वित मिलता संस्कारों पर प्रश्न उठा हर कोई
संबंधों की दिए दुहाई करते आधा पौन
प्रश्न पर साधे हैं सब मौन........

गृहणी के श्रम का सम्मानित होना तो आवश्यक
किंतु समाधानों पर भी होंगे प्रयत्न कब भरसक
कागज पर अधिकार लिखे हों, यह पर्याप्त नहीं है
उन अधिकारों का, तर्कों का कौन यहां संरक्षक
क्या जिनकी नजरों में, नारी सदा रही है गौण
प्रश्न पर साधे हैं सब मौन........

पति देगा या राज्य करेगा या कि केंद्र भरपाई
या फिर कोई नई व्यवस्था जाएगी अपनाई
और आयकर के संग क्या छुट्टी की सुविधा होगी
कहो तुम्हारे इस निर्णय में है कितनी सच्चाई
नीति, नियत, निर्भयता से कब टूटेगा यह मौन
प्रश्न पर साधे हैं सब मौन........

प्रेम,समर्पण,तप का मूल्यांकन क्या खूब किया है
रूपये तीस हजार तराजू में धर तौल दिया है
ममता, चिंता, के भावों का भी तो मूल्य बताओ
उसका मोल कहो क्या हो,जिसने निस्वार्थ जिया है
चंदन को चंदन ही बोलो, बोलो मत सागौन
प्रश्न पर साधे हैं सब मौन........

~अंत्रिका सिंह (गौरैया) ✍️ ✍️

खोखले  रिश्ते   बचाने  के   प्रयत्नों  का   सिला बलि चढ़ी इन बेटियों को आज देखो  क्या मिला जब प्रशासन ही झिझकता सा दिखे ...
20/05/2026

खोखले रिश्ते बचाने के प्रयत्नों का सिला
बलि चढ़ी इन बेटियों को आज देखो क्या मिला

जब प्रशासन ही झिझकता सा दिखे तो समझिए
दोषियों के पक्ष में ही चल पड़ा है काफिला

तंग सोचों की बदौलत , झेल अत्याचार नित
है कली मुरझा गई वह , जो हँसी थी खिलखिला

क्रूरता की लांघ हद सारी बनें मासूम अब
मृतक पर लांछन लगाकर क्यों उठे हैं बिलबिला

लांघ चौखट भी न पाई , श्वास घुटकर रह गई
संस्कारों पर उठा हर प्रश्न था सुदृढ़ किला

आखिरी इक आस लेकर न्याय की दहलीज पर
पूछतीं हर एक चीखें कब थमेगा सिलसिला

~अंत्रिका सिंह ✍️✍️

पुस्तक के  पृष्ठों में  अंकित , आखर - आखर  बोल  रहे हैं हर उलझन को  सुलझा करके , जीवन में  रस घोल  रहे हैं काव्य, कथा, इ...
23/04/2026

पुस्तक के पृष्ठों में अंकित , आखर - आखर बोल रहे हैं
हर उलझन को सुलझा करके , जीवन में रस घोल रहे हैं

काव्य, कथा, इतिहास अमर अरु ग्रन्थ, पुराणों की गाथाएं
रामचरितमानस , गीता , सब वेद , उपनिषद्, मंत्र, ऋचाएं
मूल्य सिखाकर जीवन की,हर मुश्किल का हल बतलाते हैं
अंधियारे से लड़कर उजियारे की राहें दिखलाते हैं
मोहपाश को काट निरन्तर , भ्रम की गांठें खोल रहे हैं
पुस्तक के पृष्ठों में अंकित , आखर - आखर बोल रहे हैं.....

~ अंत्रिका सिंह ✍️✍️
#विश्वपुस्तकदिवस

अत्यंत शर्मनाक 😔🥹हे ईश्वर,किस दिशा में बढ़ रहे हम 🥲अपनी ही रीतियों का , उड़ाते मजाक आज व्यस्त हैं  बनाने  में  ये , रील ...
20/04/2026

अत्यंत शर्मनाक 😔🥹
हे ईश्वर,किस दिशा में बढ़ रहे हम 🥲

अपनी ही रीतियों का , उड़ाते मजाक आज
व्यस्त हैं बनाने में ये , रील युवा पीढ़ियां
रखकर ताक पर , मान - मर्यादा सभी
कर रहीं काम अशलील युवा पीढ़ियां
जिनके कांधों को देश का दायित्व देखना था
रहीं खुद के भविष्य , लील युवा पीढ़ियां
ऐसी करतूतों पे लगानी पड़े रोक तब
देतीं अधिकारों की दलील युवा पीढ़ियां

~अंत्रिका सिंह ✍️✍️
#युवा_पीढ़ियां

ये जो सड़कों पर उतरे हैं कुछ तो मुद्दे होंगे इनके मान मनव्वल कर करके भीहल ना निकले होंगे जिनके ये मेहनत करने वाले हैं छल...
16/04/2026

ये जो सड़कों पर उतरे हैं
कुछ तो मुद्दे होंगे इनके
मान मनव्वल कर करके भी
हल ना निकले होंगे जिनके
ये मेहनत करने वाले हैं
छल से नहीं कमा पाते हैं
दिन भर खटते कामों में तब
रूखी सूखी घर लाते हैं
नहीं दिहाड़ी घटने पाए
करते पूरी कोशिश हर पल
और कभी आराम करेंगे
सोच यही गुजरे कितने कल
मूल्य समय का खूब जानते
मजदूरी घंटों से जुड़ती
स्वप्न चूर हो जाते हैं जब
खुशियां दरवाजे से मुड़तीं
खूब जानते धरने की इस
कीमत होगी कितनी ज्यादा
नहीं दिहाड़ी आएगी तो
पूरा ना होगा वह वादा
वह वादा जो घर से चलते
मुनिया से करके आए थे
राशन, दवा , सभी पर्चे जो
पत्नी ने भी पकड़ाए थे
कर्जों की किश्तें लटकी ही
रह जाएंगी फिर से कुछ दिन
थम सा जाएगा जीवन यह
जीवन क्या चलता पैसे बिन
मंहगाई का दौर हठीला
हालातों से खेल रहा है
कीमत आसमान नित छूती
किन्तु कमाई बढ़ी कहां है
खूब जानते लगा दांव पर
क्या होगा, कितना कुछ होगा
फिर भी भविष्य के लिए डटे
हैं कर प्रयत्न जितना कुछ होगा
ये मेहनतकश श्रमिक भले हैं
किंतु नहीं हिंसक होते हैं
कुछिक मुखौटे पहन भले हां
कायर राग द्वेष बोते हैं
इनके खीसों में तो कल हैं
जिनको वादों ने कुतरे हैं
खोई खुशियां खोज रहे बस
ये जो सड़कों पर उतरे हैं…..

~अंत्रिका सिंह ✍️✍️
#मजदूर_आंदोलन

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