Cinema of Resistance

Cinema of Resistance It is a cultural campaign. Selected films of Indian languages in addition to a selection of classics from world cinema given priority in this plateform.

In September 2005 while expending its activity Uttar Pradesh unit of Jan Sanskriti Manch decided to experiment with film screenings. In its natural progression in the year 2006 for the very first time in the history of Gorakhpur we made an attempt to organize a festival of films from peoples’ contribution. We showed almost 20 films including short films, animation, documentaries and full length fe

ature films. After screening of Anand Patwardhan’s film “War and Peace” we conducted a discussion session anchored by a panel of 4 people. More than 100 people participated in the discussion which lasted for 45 minutes. Around 4000 people enjoyed the screenings in the festival. At least 500 people from surrounding small towns participated in the festival. First year we dedicated our festival to the theme of Resistance in Cinema and clubbed it with 75th year of Bhagat Singh’s martyrdom. Jan Sanskriti Manch, Expression- Gorakhpur Film Society, Peoples’ Forum and PUHR (Peoples Union for Human Rights) were the main organizers of the festival. It was solely financed by individual contributions. We also released a festival brochure. From next year i.e. in 2007 the idea of organizing independent film festival really picked up and we succeeded in repeating it for the first time in Allahabad (April 2007) and Bhilai (May 5-6, 2007). After that it became a continuous journey. A brief journey of Cinema of Resistance is as follows:

Year 2008
3rd Gorakhpur Film Festival, 23 to 26 February
1st Bareilly Film Festival, 7-8 June 2008
1st Lucknow Film Festival, 13-14 September, 2008

Year 2009
4th Gorakhpur Film Festival, 3 to 6 February 2009
2nd Lucknow Film Festival, 11 to 13 September, 2009
1st Nainital Film Festival, 7-8 November 2009
2nd Bhilai Film Festival, 13 to 15 November 2009
1st Patna Film Festival, 25 to 27 December 2009

Year 2010
5th Gorakhpur Film Festival, 4 to 7 February 2010
3rd Lucknow Film Festival, 8 to 10 October, 2010
2nd Nainital Film Festival, 29 to 31 October, 2010
2nd Patna Film Festival, 4 to 6 December 2010

Year 2011
6th Gorakhpur Film Festival, March 23 to 27, 2011
1st Indore Film Festival, April 16-17, 2011
1st Ballia Film Festival, September 10-11, 2011
4th Lucknow Film Festival October 21 to 23, 2011

3rd Nainital Film Festival, October 30 to 31 and November 1, 2011
3rd Patna Film Festival, December 2 to 4, 2011
1st Allahabad Film Festival, December 6 to 8, 2011

Till now we have successfully organized 22 film festivals without a single sponsorship. In all these festivals some of important name of cinema, art and literature have actively participated. They are Arundhati Roy, Uma Chakraborti, MS Sathyu, Shaji N Karun, Girish Kasarvalli,Saeed Mirza, Kundan Shah, Anand Patwardhan, Ashok Bhowmik, Anand Swarop Verma, Mangalesh Dabral, Viren Dangwal, Sanjay Kak, Saba Deewan, Yousuf Saeed, Megnath, Biju Toppo, Ajay Bhardwaj, Ladli Mukhopadhay, Anupama Srinivasan, Surya Shankar Dash, Ananaya Chatterjee, Gibby Zobel, Loknath Goswami, Devndra Raj Ankur, Kaluram Bamania, Zahoor Alam, Santosh Jha to name a few.

15/04/2026

मजदूर आंदोलन के समर्थन में लेखकों कलाकारों का एकजुटता बयान
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हम लेखक कलाकार देश भर में चल रहे मज़दूरों के स्वत:स्फूर्त आंदोलनों के साथ हैं और उन पर हो रहे दमन के विरुद्ध एकजुट हैं!

गुड़गांव-मानेसर, नोएडा, फरीदाबाद, भिवाड़ी और पानीपत सहित देश के अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में लाखों मजदूर एक बुनियादी मांग को लेकर सड़कों पर हैं — उचित वेतन और क़ानूनी अधिकार।

यह आंदोलन किसी बाहरी उकसावे की उपज नहीं, बल्कि मज़दूरों के शोषण, उपेक्षा और वादाख़िलाफ़ी का स्वाभाविक परिणाम है।

गुड़गाँव- मानेसर और नोएडा में मज़दूर 10-12 हजार रु. प्रतिमाह में 8 से 13 घंटे तक काम करते रहे हैं । कोई छुट्टी नहीं, कैंटीन में घटिया खाना, और क़दम-क़दम पर अपमान।

इस नाम मात्र के वेतन के साथ पहले से ही चल रही भयंकर महंगाई और अभी अमेरिका-इजराइल के ईरान के खिलाफ़ आपराधिक युद्ध के बाद गैस की किल्लत और उसके बेतहाशा बढ़ते दामों के चलते मजदूरों का धैर्य जबाव दे गया है। एक के बाद दूसरी कंपनियों के ठेका मज़दूर सड़कों पर आने शुरू हो गये हैं।

ग़ौरतलब है कि यहां सरकार द्वारा घोषित न्यूनतम वेतन असल में इतना कम है कि उसे भुखमरी वेतन की ही संज्ञा दी जा सकती है; और उसे भी फैक्टरी मालिक अथवा पूंजीपति देने को तैयार नहीं हैं।
एक तरफ इन्हीं शहरों के तेज आर्थिक विकास का दावा किया जा रहा है, देश को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बताया जा रहा है, दूसरी तरफ मजदूरों और गिग-कर्मियों को भुखमरी और अतिशय असुरक्षा के जाल में फंसाया जा रहा है।
भारत में उदारवाद के सबसे अमानवीय रूप और भ्रष्ट क्रोनी पूंजीवाद का संश्रय देखा जा रहा है, जो केवल फासीवादी राजनीति के सहारे व्यापक जन-असंतोष का प्रबंधन करना चाहता है। लेकिन धार्मिक उन्माद और विकृत राष्ट्रवाद के सहारे रोजी रोटी के प्रश्नों को हमेशा के लिए स्थगित नहीं किया जा सकता। ऐसे में मज़दूरों का सड़कों पर आना अपरिहार्य था!

गुरुवार से ही NSEZ मेट्रो स्टेशन के पास सैकड़ों ठेका मज़दूर धूप में खड़े होकर 20,000 रु. न्यूनतम वेतन की मांग कर रहे थे। किसी अख़बार या चैनल को इस की सुध लेने की फुर्सत नहीं थी।

जब तक आंदोलन उग्र नहीं हुआ, तब तक न उत्तर प्रदेश सरकार हिली, न श्रम विभाग।

जिला प्रशासन ने रविवार को कई घोषणाएं कीं, लेकिन मज़दूरों की मूल मांग — 20,000 रु. वेतन — को दरकिनार कर दिया। यही कारण है कि आंदोलन जारी रहा। यही कड़वा सच है।

जब तक दर्जनों कारखानों के मज़दूर
हड़ताल पर थे — किसी अख़बार को, किसी चैनल को सुध लेने की फुर्सत नहीं थी।

जब नोएडा में प्रदर्शन उग्र हुए, तभी आनन-फानन में "21 प्रतिशत" वृद्धि की घोषणा की गई है। अकुशल मजदूर को इस वृद्धि से महज 13,690 रु. प्रतिमाह मिल पाएंगे।

यह वह मज़दूर है, जो कपड़े से लेकर कार तक, मोबाइल से लेकर बच्चों के खिलौने तक, सब कुछ बनाता है। यह देश की आबादी का सबसे बड़ा हिस्सा है। फिर भी सबसे अदृश्य बना रहता है।

इस पूरे आंदोलन में महिला मज़दूरों की बढ़-चढ़कर भागीदारी को समझना मुश्किल नहीं। उन्हें इन तमाम मुश्किलों के साथ-साथ घर चलाने, बच्चों को पालने और कार्यस्थल पर अतिरिक्त ज़िल्लतों से भी जूझना पड़ता है। फिर भी, 9 अप्रैल को मानेसर में गिरफ़्तार 56 मज़दूरों में 20 महिलाएं थीं। पुरुष पुलिसकर्मियों ने खुलेआम उन पर भी लाठियां भांजीं।

9 अप्रैल 2026 को मनेसर में दमन का नंगा चेहरा दिखाई पड़ा। शांतिपूर्ण प्रदर्शन कर रहे मज़दूरों पर भाड़े के गुंडों और पुलिस द्वारा लाठीचार्ज किया गया। 55 मज़दूरों को गिरफ़्तार किया गया। उन पर हत्या के प्रयास, आगजनी और आपराधिक षड्यंत्र जैसी संगीन धाराएं लगाई गईं। इंकलाबी मज़दूर केंद्र के श्यामवीर, अजीत, पिंटू यादव, हरीश, राजू और आकाश को साजिशकर्ता घोषित कर जेल भेज दिया गया।

हालांकि 7 और 9 अप्रैल को दोनों बार उनके फोन और व्हाट्सएप खंगालने के बाद पुलिस को कुछ भी आपत्तिजनक नहीं मिला था।

नोएडा में 13-14 अप्रैल को पुलिस ने 7 एफआईआर दर्ज कीं और 300 से अधिक मज़दूरों को गिरफ़्तार किया। पुलिस आयुक्त ने दावा किया कि व्हाट्सएप ग्रुप बनाकर मज़दूरों को जोड़ा जा रहा है। इसलिए इसके पीछे एक "सिंडिकेट" है। यह वही पुराना हथकंडा है। जब मजदूर एकजुट हों तो उसे षड्यंत्र बताओ, आंदोलन को अपराध बताओ।

दमन यहीं नहीं रुका। नोएडा में बिगुल मज़दूर के कार्यकर्ताओं रूपेश, आकृति, सृष्टि और मनीषा को गिरफ़्तार किया गया। उनकी पैरवी करने पहुंचे वकीलों को भी यूपी पुलिस ने मारपीट कर उठा लिया। लखनऊ में कवयित्री कात्यायनी, पत्रकार सत्यम वर्मा और वरिष्ठ पत्रकार संजय श्रीवास्तव को हिरासत में लिया गया। बनारस में BHU के युवा कवि तनुज कुमार को उनके कमरे से उठाया गया। सोशल मीडिया अकाउंट्स के खिलाफ़ मुकदमे दर्ज किए गए।

गुड़गांव का एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी खुलेआम घोषणा कर रहा है कि मज़दूर संगठनों को मज़दूरों को संगठित नहीं करने दिया जाएगा। हड़ताल करना और यूनियन बनाना संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकार है। इसे अपराध की तरह पेश करना न केवल अन्यायपूर्ण है, बल्कि असंवैधानिक भी है।

एक ओर 4 नये लेबर कोड लागू कर मज़दूरों को गुलामी की नई बेड़ियों में जकड़ा जा रहा है, दूसरी ओर उनकी आवाज़ उठाने वालों को — मजदूर नेता हों, लेखक हों, पत्रकार हों या वकील — सबको निशाना बनाया जा रहा है। यह महज मजदूर आंदोलन पर हमला नहीं — यह लोकतंत्र और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला है।

हम माँग करते हैं —

सभी गिरफ़्तार मज़दूरों, कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और लेखकों को तत्काल एवं बिना शर्त रिहा किया जाए

सभी फ़र्जी और संगीन मुकदमे तत्काल वापस लिए जाएं

9 और 13-14 अप्रैल की हिंसा की निष्पक्ष न्यायिक जाँच हो; दोषी प्रबंधकों और अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज हो

मज़दूर विरोधी 4 नये लेबर कोड रद्द किए जाएं; स्थायी काम पर स्थायी नियुक्ति हो; ठेका प्रथा समाप्त हो

न्यूनतम वेतन 30,000 रु. प्रतिमाह घोषित किया जाए; ओवरटाइम का क़ानूनन डबल भुगतान सुनिश्चित हो

हड़ताल व यूनियन के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित की जाए।

हम देश के सभी लेखकों, बुद्धिजीवियों, नागरिकों और जनपक्षधर संगठनों से अपील करते हैं कि वे इस दमन के विरुद्ध एकजुट हों। मज़दूरों की यह लड़ाई केवल वेतन की लड़ाई नहीं है, लोकतंत्र, संविधान और इंसानी गरिमा की लड़ाई है। वे जो बनाते हैं, उससे देश चलता है । अब वक़्त है कि देश उनके साथ खड़ा हो।

*हम देखेंगे : अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान*
[जनवादी लेखक संघ (जलेस)
दलित लेखक संघ (दलेस)
जन संस्कृति मंच (जसम)
प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस)
अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच (अभादलम)
न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव (एनएसए)
प्रतिरोध का सिनेमा
जन नाट्य मंच (जनम)
इप्टा]

_*मोहम्मद दीपक का जज़्बा एक उम्मीद है — इसे बचाइए*_*कोटद्वार, उत्तराखंड की घटना के संदर्भ में साझा बयान*_‘हम देखेंगे’ : ...
05/02/2026

_*मोहम्मद दीपक का जज़्बा एक उम्मीद है — इसे बचाइए*_

*कोटद्वार, उत्तराखंड की घटना के संदर्भ में साझा बयान*

_‘हम देखेंगे’ : अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान की ओर से जारी_

उत्तराखंड राज्य से आ रही घटनाओं ने देशभर के लेखकों, कलाकारों और संस्कृतिकर्मियों को गहरी चिंता में डाल दिया है। समृद्ध लोकसंस्कृति और रचनात्मक जन-प्रतिरोध की परंपरा के लिए जाना जाने वाला यह राज्य पिछले कुछ वर्षों से साम्प्रदायिक ध्रुवीकरण की राजनीति की प्रयोगशाला बनता जा रहा है। योजनाबद्ध ढंग से तनाव पैदा करने वाली घटनाएँ लगातार घटित की जा रही हैं। इसके बावजूद, उत्तराखंड की सुसंस्कृत जनता का सहज और मानवीय प्रतिरोध बार-बार सामने आ रहा है।

इसी क्रम में गणतंत्र दिवस, 26 जनवरी 2026 को उत्तराखंड के कोटद्वार स्थित पटेल रोड पर 75 वर्षीय वकील अहमद की दुकान — ‘बाबा स्कूल ड्रेस एंड मैचिंग सेंटर’ — पर बजरंग दल से जुड़े कुछ उत्पाती तत्वों ने हमला किया। उनकी मांग थी कि दुकान के नाम से ‘बाबा’ शब्द हटाया जाए। दुकानदार द्वारा इसके लिए कुछ समय की मोहलत मांगे जाने के बावजूद हमलावरों ने धमकाना जारी रखा। यह देखकर पास स्थित जिम के ट्रेनर दीपक कुमार कश्यप ने हस्तक्षेप किया।

पीड़ित समुदाय के साथ एकजुटता व्यक्त करते हुए दीपक ने हमलावरों को अपना नाम ‘मोहम्मद दीपक’ बताया। आज देश उनके इस साहस में उम्मीद की एक उजली किरण देख रहा है। दीपक ने यह साबित किया कि शारीरिक स्वास्थ्य के साथ-साथ सामाजिक और सांस्कृतिक स्वास्थ्य की रक्षा भी उतनी ही ज़रूरी है।

घटना के दिन तो हमलावर लौट गए, लेकिन 31 जनवरी 2026 को वे पुनः संगठित होकर आए। इस बार उन्होंने दीपक के जिम का घेराव किया और उनके परिवार को खुली धमकियाँ दीं। यह अत्यंत चिंताजनक है कि दोनों ही अवसरों पर राज्य पुलिस की मौजूदगी के बावजूद वह मूकदर्शक बनी रही। 31 जनवरी को दो एफआईआर दर्ज की गईं — एक दीपक कुमार के विरुद्ध नामजद, और दूसरी चालीस-पचास अज्ञात लोगों के खिलाफ।

जबकि सच्चाई यह है कि इन घटनाओं से जुड़े वीडियो सोशल मीडिया पर मौजूद हैं, जिनमें वास्तविक हमलावरों की पहचान स्पष्ट रूप से की जा सकती है।

वर्तमान स्थिति यह है कि बजरंग दल से मिल रही धमकियों के कारण दीपक कुमार का जिम बंद है और उनका परिवार भय के साए में जीने को विवश है। इसी तरह वृद्ध दुकानदार वकील अहमद और उनका परिवार भी दहशत में है। पूरे शहर का वातावरण साम्प्रदायिक ज़हर से विषाक्त किया जा चुका है।

‘हम देखेंगे’ : अखिल भारतीय सांस्कृतिक प्रतिरोध अभियान से जुड़े सभी संगठन इस स्थिति पर गहरा क्षोभ व्यक्त करते हैं और स्पष्ट रूप से मांग करते हैं कि
— सभी वास्तविक हमलावरों को तत्काल न्याय के दायरे में लाया जाए,
— पीड़ित परिवारों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए ठोस और प्रभावी कदम उठाए जाएँ,
— राज्य प्रशासन अपनी संवैधानिक ज़िम्मेदारी निभाए।

हस्ताक्षरकर्ता संगठन :
जनवादी लेखक संघ (जलेस)
जन संस्कृति मंच (जसम)
दलित लेखक संघ (दलेस)
प्रगतिशील लेखक संघ (प्रलेस)
न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव (एनएसआई)
प्रतिरोध का सिनेमा
इप्टा
अखिल भारतीय दलित लेखिका मंच (अभादलम)
जन नाट्य मंच (जनम)

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201012

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