23/07/2026
जब जैसा मन ,उंगलियों की गति उसी तरह से कागज पर रंग बिखेरती है
एक नई कहानी के रूप में Aug 1995 फिरोजाबाद रेल दुर्घटना पर आधारित ..
जैसे जैसे अगस्त आता है मेरी आँखों के सामने पूरा वृत्तांत घूम जाता है बात 20 अगस्त 1995 की है
संजोग
रात करीब 4 बजे अचानक फोन की घंटी बजी गहरी नींद से चौक कर, मैंने फोन उठाया तो उधर से आवाज आई डॉ साहब हे क्या जरा बात कराइए ,फोन हॉस्पिटल से चीफ मेडिकल ऑफिसर का था,
इनको तुरंत बुलाया था|
फिरोजाबाद में भयंकर रेल दुर्घटना हुई थी कहां अपने आसपास के डॉक्टरों
को तुरंत लेकर पहुंचो
जल्दी से तैयार होकर ये अस्पताल पहुंचे
पूरी डॉक्टरों के टीम दुर्घटना स्थल पर पहुंची
आमने सामने की भिड़ंत में ट्रेन के आगे आगे की डिब्बों के परखच्चे उड़ गए थे
चारों तरफ हाहाकार चीत्कार
लाइट भी नहीं थी
काला अंधेरा
लोगों ने टॉर्च ,पेट्रोमेक्स आदि जलाकर थोड़ा प्रकाश किया
कुछ घायल, कुछ मृतक,
पुलिस दल पहुंच गया था
आसपास की गांव के लोग भी मदद के लिए प्रयासरत थे
चारों तरफ खून-खून , टूटे फूटे डिब्बों में फंसे लोग
खेर लाइट का प्रबंध हुआ
लोगों को डिब्बे से निकालने का काम शुरु हुआ कानूनी कार्रवाई के बाद लाशे पोस्टमार्टम के लिए भेजी जाने लगी घायलों को जिला अस्पताल तथा आगरा भेजा गए
मेरा भी बहुत मन हुआ कि एक बार घटनास्थल तथा हॉस्पिटल जाकर उन लोगों से मिलूं जो घायल है
जिस दिन दुर्घटना हुई उस दिन तो में नहीं जा पाई क्योंकि बाहर से इनके कई साथी डॉक्टर यहां अपनी सेवाएं देना आए हुए थे और उनके खाने पीने का प्रबंध हमारी यही हुआ था
दूसरे दिन में अपने आप को रोक नहीं पाई और अपने बेटे को लेकर घटनास्थल पर पहुंची वहां 10 15 लाशें सफेद कपड़े से ढकी हुई खुली जमीन पर रख हुई थी तथा और भी लाशें निकालने का क्रम जारी था
बड़ा ही हदय विदारक दृश्य था वहां से सीधे में हॉस्पिटल पहुंची वह जहां बरामदो में ठसाठस भरे लोग जमीन पर पड़े हुए थे चारों तरफ
हाहाकार रोने चीखने की आवाज किसी का हाथ टूटा तो किसी का पैर किसी के सिर पर चोट थी
तो किसी की आंख पर
कई लोगों से मिली कुछ लोग बहुत अच्छे परिवार के थे जो राहत सामग्री लेने में भी हिचकिचा रहे थे
लेकिन सब बेबस थे
बहुत से लोग ऐसे थे जो बिल्कुल अकेले थे
अधिकांश के घरवालों को खबर कर दी गई थी कुछ के आ गए थे
कुछ आने का इंतजार कर रहे थे
भारी मन से घर जाने को मुड़ी ही थी कि करीब 60 साल का बुजुर्ग सा आदमी जिसके दाहिने हाथ में प्लास्टर बंधा था
सर पर पट्टी बंधी थी
आंख पर भी सूजन आ रही थी किसी 35_ 40 वर्ष के स्मार्ट से आदमी के साथ जाते हुए दिखा
शायद ये लोग प्राथमिक उपचार के बाद जा रहे थे
जिज्ञासु प्रवति होने की वजह से पहले तो में ठिठककर देखती रही फिर मैं अपने आप को रोक ना पाई तो पास जाकर पूछ ही लिया
क्या आप भी ट्रेन में थे ,
ज्यादा चोट तो नहीं लगी
भगवान का शुक्र हे आदी आदि
उस बुजुर्ग आदमी ने बताया चोट तो काफी हे
लेकिन भगवान की दया से जान बच गई अब छुट्टी करवाकर जा रहा हूं
मेरा बेटा आ गया है यह भी डॉक्टर ही उत्सुकता वश मैंने पूछा बाबा कहां के रहने वाले हैं
मध्य प्रदेश के सुनकर थोड़ी जिज्ञासा और बढ़ी
किस जगह के?
उन्होंने बताया
खाचरोद जिला उज्जैन के
मेने पूछा
कहां जा रहे थे
तो उन्होंने बताया बिजनेस के सिलसिले में दिल्ली जा रहा था कि बीच में अचानक इतना बड़ा हादसा हो गया बात बात में मालवी भाषा का पुट
कुछ और जिज्ञासा बढ़ी
तो मेने कहा बाबा हम भी मध्य प्रदेश की रहने वाले हैं और आपके खाचरोद के पास की है
तो उन्होंने पूछा
कौन सी जगह
तो मेरे मुंह से उन्हेल का नाम सुनकर वह चौक उठा उसने गौर से मुझे देखा और बोला
कहीं तुम मुन्नी बिटिया तो नहीं मेने कहा हा मैं मुन्नी फिर मेने पूछा आप कोन,
तो उन्होंने कहा
मैं तुम्हारा रामसुख
नाम सुनते ही आसुओं का सैलाब उमर पड़ा मैंने उनसे घर चलने का बहुत आग्रह किया
लेकिन बाहर उनकी मारुति वैन खड़ी थी
उनका बेटा जो फिजिशियन था खबर मिलते ही लेने आ पहुंचा
अगली बार इधर आने पर घर अवश्य आने का वादा लेकर उनको विदा किया भारी मन से घर लौटी
तो मन में 40 साल पहले का बचपन लौट आया
तब में 6 वर्ष की थी कक्षा 2 में पढ़ती थी
पिताजी ने घर तथा क्लीनिक के सारे काम के लिए एक नौकर रखा था नाम था सुखराम
संपन्न परिवार का चार भाइयों में सबसे छोटा था वह 17 18 साल का स्वस्थ अनपढ़ देहाती
लेकिन सभ्य गोरा चिट्ठा युवक
सिर पर साफा धोती कुर्ता यही उसकी वेशभूषा ,कृषक परिवार का था लेकिन खेती का काम करना नहीं चाहता था मां बाप पहले ही चल बसे थे भाइयों के प्यार में पला या दिन भर इधर उधर घूमता रहता था
यह सोया रहता था कि किंचित मात्र भी खेती बाड़ी में सहयोग नहीं करता किसी ने सुझाया होगा कि महिदपुर वाले वैद्य जी को अपने क्लीनिक पर काम करने के लिए किसी लड़के की तलाश हे तो वह लेकर हमारे यहां आए थे
सारी स्थिति से अवगत कराकर हमारे यहां रख दिया आपके यहां रहा तो कुछ काम सीखेगा
अच्छा इंसान बनेगा
आप जैसा चाहें वैसा रखे
वैद्य जी का स्वभाव बेहद गर्म था, घरवालों से लेकर मरीजों तक सब उनके स्वभाव से परिचित थे
पिताजी ने सारी बातें साफ तय
की थी
क्लीनिक के अलावा घर का भी काम करना पड़ेगा जैसे झाड़ू लगाना, बिस्तर उठाना, पानी भरना ,मसाले कूटना बाजार से सब्जी लाना ,आटा पिसवाना मेहमानों के आने पर उन्हें बस स्टैंड से लेकर आना
जाते वक्त उनका सामान उठाकर उन्हें बस में बिठाना आदि
सब बातों को सर आंखों पर लेकर उसके भाई ने उसे हमारे यहां छोड़ दिया पिताजी ने सख्त हिदायत दी थी की सुबह 7:00 बजे आना और शाम को 7:00 बजे वापस अपने घर जाना
बीच में 1 घंटे के लिए खाना खाने जाता था
नाम क्या है रे तेरा राम सुख वह नीची नजर कर बोला
अरे हां राम सुख कल से यह फेंटा उतारकर
आना सफेद रंग का कुर्ता पजामा तथा बालों को तेल लगाकर ढंग से कंघी कर कर आना
हमारे घर में मुझसे बडी एक बहन तथा 3 छोटे भाई-बहन इस तरह हम लोग पांच भाई बहन थे क्रमश 10 ,6 4,2,1 वर्ष के थे
कठोर अनुशासन में पले हम सब भाई बहन सब संकोची तथा शर्मीले थे
उन दिनों मेरे आगे की दो तीन दांत टूटे हुए थे
अंदर दरवाजे की ओट से हम सब भाई बहन क्लिनिक में नए आंगतुंको को झांक कर देखते और जैसे ही वह हमारी और देखता हंसकर अंदर भाग जाते
दूसरे दिन से वह मन लगाकर काम करने लगा सुबह 7:00 बजे से ही आ जाता आकर हम सब भाई बहनों को जागता तथा यथावत घर का काम करता
3,4 बार बिस्तर से लुढ़का नहीं देता तब तक हम नहीं उठते
कभी-कभी बहुत परेशान हो जाता था तो कहता कि पिताजी से कहता हूं ऐसे नहीं मानोगे मैं गुस्से से उठती और कहती जाओ
कह दो पिताजी से,
दौड़कर मनाने लगता
धीरे-धीरे परिवार के सभी लोगों के साथ घुल मिल गया मुझे चिढ़ाता था पाठ याद कर नहीं ले गई इसलिए मास्टर जी के एक चाटे से दो दात उड़ गए
मैं कहती हट तो दूसरे ही क्षण कहता तो चूहा ले गया
निश्चिंत देखा नहीं घर में कितने बड़े बड़े चूहे हो रहे हैं पिताजी की आदतों से वो भी भली भांति परिचित हो गया था,
एक दिन मां ने मटर की कचोरी बनाई एक प्लेट में लगाकर मां ने कहां रामसुख को दे आ
संकोचवश वह मना करने लगा पिताजी देख रहे हैं इतनी जोर से लताड़ा _सुन रे
जो हम देंगे वह लेना पड़ेगा
अगर नखरे दिखाना हे तो जा अपने घर
उस दिन तो उसने खा लिया लेकिन दूसरे दिन से आना बंद कर दिया दो-तीन दिन तक नहीं आया
चौथे दिन उसका भाई लेकर आया माफी मांगकर वापस छोड़कर गया धीरे-धीरे रामसुख की समझ में सबकुछ आने लगा
बिल्कुल अनपढ़ था
दस्तखत की जगह अंगूठा लगाता था यह देखकर मुझे बड़ी दया आती थी हमे
पढ़ते देख उसका भी मन करता था उससे में पूछती रामसुख तुम पढ़े-लिखे नहीं तो कहता
नहीं बहन हमें कौन पढ़ाए,
मैंने कहा मैं तुम्हें तुम्हारा नाम लिखना सिखा दूंगी
पिताजी प्रति सोमवार को दवाखाना बंद रखते थे
तथा इंदौर दवाइयां लेने जाते थे
उस दिन को हम स्वर्ण दिवस के रूप में मनाते थी
क्योंकि पिताजी का खौफ नहीं रहता था
जी खोलकर हंसते मस्ती करते
उस दिन रामसुख को पढ़ने का मौका मिल जाता
मैंने देखा बड़ी लगन से वह पढ़ता
थोड़े दिन में नाम लिखना ,गिनती बोलना काफी कुछ सीख गया था
दिन पंख लगा कर उड़ते जा रहे
थे
तब रामसुख हमारे परिवार का अभिन्न हिस्सा बन गया
पता ही नहीं चला परिवार में सात सदस्य थे आठवां राम सुख
उसको गिनना कोई भी भाई बहन कभी नहीं भुला
उसके साथ सब्जी लेने जाना
बाग से ताजे ताजे फल बेर ,अमरुद सीताफल, जामुन, लेने जरुर जाती
मोर ,तोते, तितलियां ,चांद तारे, बादल भूत प्रेत, परी जाने किन-किन बारे में बताता
किस्से, कहानियां सुनाता
कभी कहता ये बादल है ना इंद्र देवता के यह पानी लेने जा रहे हैं
अभी थोड़ी देर में देखना बरसा देगे
मैं पूछती थी यह सब तुम्हें कैसे मालूम तो जोर से हंसकर करता हर बात में कहेगी तुम्हे कैसे मालूम _अरे हमें क्या नहीं मालूम ये पूछो ,
एक दिन तो हद ही हो गई मां ने कहा जा रामसुख से कह की सब्जी ले आए मैंने क्लीनिक में झांक कर देखा तो काफी भीड़ थी मरीजों से हाल भरा पड़ा था
रामसुख ने मुंह पर उंगली रखकर इशारे में मुझे मना कर दिया
मेने मां को बताया आज राम सुख नहीं जाएगा
मां ने कहा बेटे आज कोई भी सब्जी नहीं
शाम होने वाली जब तू ही ले, पैसे था झोला देकर मा ने मुझे ही भेज दिया में इतराती हुई, रामसुख के बिना क्या मैं सब्जी नहीं ला सकती
दौड़ती उछलती हुई जा रही थी
सब्जी मार्केट से कुछ पहले सड़क पर मुझे कुछ भीड़ दिखाई दी डम डम डम डमरु की आवाज
जिज्ञासा वश में भीड़ को चिढ़ती हुई थोड़ा आगे पहुंची देखा
एक आदमी डमरु बजा बजा कर जादू दिखा रहा था
मैं वही खड़ी रही
उसने अपने पुराने गंदे झोले में से एक खोपड़ी निकाल कुछ क्षण में उससे छू आकर मिट्टी से पैसा बनाने लगा
जिज्ञासा और बढ़ी , घर _सब्जी सबको भूलकर उसे ही देखने लगी थोड़ी देर बाद उसने अपनी लड़के की जीभ काट दी
यह देखकर मेरे पसीने छूट गए
कसम भी उसने ऐसी चढ़ाई की अगर बीच में कोई घर गया तो उसके मां बाप मर जाएंगे
ऐसी कसम पर जाने का तो सोच भी नहीं सकती थी थोड़ी देर में वह बोला की क्या आप चाहते हैं कि मेरे बच्चे की जीभ ठीक हो जाए
चारों तरफ घूम घूम कर पैसे मांगने लगा बच्चे की खातिर जिसके पर जो भी हो दे दो
भाई मैंने भी सब्जी वाले पैसे तत्काल उसकी झोली में डाल दिए उसका लड़का तुरंत उठकर खड़ा हो गया
खेल खत्म की घोषणा होने पर मैंने घर का रुख किया
घर से निकले को काफी देर हो गई थी अन्त मां ने राम सुख को देखने भेजा, वह मुझे रास्ते में ढूंढता हुआ मिला
उसने देखा झोली खाली
मैंने सारी बात सच सच उसको बताई तथा कसम दिलाई की घर जाकर वह किसी से पूछ नहीं कहेगा
उसने अपने पैसे से सब्जी ली तथा मा से बहाना बना दिया कि वह सहेली के घर चली गई थी
इस घटना के दो तीन दिन बाद तक मैं बहुत सुस्त रही तथा डर के मारे बुखार आ गया था
तब राम सुख में मां को सब बात विस्तार से बताई
क्लीनिक का काम उसमें बड़ी मेहनत लगन से संभाला था आसपास की ग्रामीण इलाको से मरीज ज्यादा आते थे अपनी मालवी भाषा में उन्हे बड़े ढंग समझाता था
वह जाति का धाकड़ था
लेकिन हम लोगों के बीच में रहकर काम करने का सलीका सीख गया था हल्की फुल्की हिंदी,गिनती जोड़ना, घटाना जल्दी से सीख गया था
कभी कभी पिताजी उसको इंदौर उज्जैन भेजने लगे
सब काम व्यवस्थित करके ही आता था
हमे शाम के समय तिवारी सर पढ़ाने आते थे
वह हमें हिंदी इंग्लिश अनुवाद करवाते,
देखो भूतकाल भविष्य काल वर्तमान काल
पहले इसका अंग्रेजी बनाओ
राम सुख उज्जेन जा रहा हैं ,
राम सुख उज्जेन गया,
रामसुख उज्जेन जाएगा,
वह घूमते फिरते सुनता और फिर पूछता कि सर मेरे नाम से क्यों पढ़ाते हैं तब हम उसको पूरी बात समझाते
रामसुख की शादी बचपन में ही हो गई थी
ऐसा वह मां को बताता था दिन बीतते गए
हमारे घर दादाजी के घर, नाना जी के घर पिताजी अक्सर उसको भेजते सबके पैर छूना,
हंसकर बोलना उसकी आदत में शामिल था
उसका हसमुख स्वभाव, साफ सुथरा व्यक्तित्व सबको भाता था
हमारे यहां रहने से उसकी पहचान उसकी लोकप्रियता बढ़ गई थी धीरे-धीरे इंजेक्शन लगाना ,पुड़िया बनाना,
दवाइयां बनाने में मदद करना, काफी कुछ सीख गया था
जब दवाइयां बनती थी तो करीब 50 मजदूर ग्वारपाठा छिलने, मुनक्का जड़ी बूटियां आदि कूटने का काम करते थे,
रामसुख जैसे उन सभी का हेड रहता था
बड़ी सफाई से और समझदारी से काम करवाता था
पिताजी के डांट को भी वह अब बड़ी सहजता से लेता था, हर काम अपनेपन से तथा सूझ-बूझ से करता था
मैंने देखा कि कुछ करने की उमंग और क्षमता उसमें हमेशा बनी रहती थी पिताजी से काफी प्रभावित था काफी कुछ सुना था उसने पिताजी के बारे में किसी की इस स्तिथि तक पहुंचने में उन्हे क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े
उनकी तरह बनने की सोचता
खुद नही पढ़ा लिखा था
लेकिन हम सबको पढ़ता देख
हमेशा अपने बच्चों को पढ़ाने की सोचता,
कभी-कभी कहता कि आने वाले कल की बहुत चिंता होती है
अपने गली मोहल्लों की इंजेक्शन वगेरह लगाकर, थोड़ी आमदनी उधर से भी कर लेता था
देखते देखते मैं सातवीं में आ गई दीदी की शादी हो गई मेरा कुकिंग का प्रैक्टिकल था आज मा ने स्कूल में सब सामान रामसुख के साथ भिजवाया बोला ढंग से करके आना
उस दिन भाभी जी ( मां को भाभी जी कहता था )ने रोटी बनवाई थी तो भारत का नक्शा बना दिया था में ही कुत्ते को देने गया था
वहां ऐसा किया तो सारे नंबर कट जाएंगे में चिढ़ती तो उसको बड़ा मजा आता
हल्की फुल्की चोट आदि लगने पर तो राम सुख से ही पट्टी बंधवा लेते थे क्योंकि पिताजी इस बात पर भी नाराज होते थी कि चोट क्यों और कैसे लगी,
कभी कहता आज छत पर चढ़कर कोन बैर तोड रहा था
कहूं पिताजी से
मैं गुस्सा होकर कहती
हां जा कह दो तो
फिर चुपचाप मना लेता
" मेरी अच्छी बहन"
ने गुस्सा नहीं होते मे तो बस मजाक कर रहा था,
आठवी पास होने पर पिताजी ने हमको उज्जैन पढ़ने के लिए भेज दिया
उसके बाद करीब 1 साल और रामसुख और रहा
क्लीनिक से जाने के बाद वह एक व्यापारी के यहां थोड़ा बही खाता सिखने जाता था
बाद में उसने बिना किसी शिकायत के काम छोड़ने की प्रार्थना की
पिताजी से छुट्टी लेकर वह अपने मामा के पास खाचरोद गया
वही पर उसमें छोटी सी दुकान खोली जिसमें किराना के सामान के अलावा मेडिकल से संबंधित कुछ दवाइयां जिनको वह भलीभांति जानता था रखने लगा
छोटे-छोटे नुस्खे जो सीख कर आया था छोटे रूप में घर पर बनाने लगा धीरे-धीरे उसकी लोकप्रियता वहां बढ़ गई , काम अच्छा चल निकला
बच्चों को पढ़ाने में उसकी शुरू से रुचि थी
राम सुख के दो बच्चे थे
दो लड़के तथा दो लड़कियां
लड़कियों की हायर सेकंडरी के बाद अच्छी जगह शादियां कर दी
तथा लड़कों को आगे पढ़ाने की लगन जारी रखी
बारहवी के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं में बिठाया
बड़ा लड़का पढ़ने में बहुत होशियार था पहली बार में ही पी एम टी में सिलेक्ट तो गया इंदौर के एम जी एम मेडिकल कॉलेज से एम बी बी एस था फिर एम डी करके मध्य प्रदेश के ही झाबुआ जिले में मेडिकल ऑफिसर हो गया, इसी तरह छोटा लड़का भी पढ़ लिखकर पुलिस विभाग में उच्च पद पद पर गया
संयोग से रेल दुर्घटना की वजह से उनका यू मिलना तथा सकुशल मिलना,
पूरी कहानी उनकी जुबानी सुनकर खुशी मिश्रित सुकून मिला
बार-बार उसके मुख से यह सुनकर बिटिया आज हम जो भी हे आपकी प्रेरणा से ही हे
शायद उन दिनों आपके घर में ना रहते तो इस स्थिति में नहीं होते
उसने अपने बेटे से मिलवाया यह आलोक मेरा बेटा है और बेटे यह दीदी!
एक दम आसू उमड़ पड़े
दोनों हाथ जोड़कर बड़ी कृतज्ञता व्यक्त की तथा
विदा ली
"प्रकृति कहां-कहां कैसे मोड़ लाती है यह आज पता चला"😔
लेखिका
विष्णुकांता चौधरी - मधुरम