27/05/2024
मेरी कहानी पूर्णत मौलिक है तथा यथार्थ से जुड़ी हुई हैं,
यह अप्रकाशित और अप्रसारित है,उम्मीद करती हूं इसे आपके अंतर्मन में स्थान मिलेगा
श्री मति विष्णुकांता चौधरी
फिरोजाबाद (उत्तर प्रदेश)
"टीस "
ऋषिकेश से लोटे को करीब तीन हफ्ते बीत गए ,लेकिन मन अत्यंत पीड़ा महसूस कर रहा है, कभी कभी जिंदगी कुछ ऐसी सच्चाइयों से रूबरू करा देती है की मन तड़पड़कर रह जाता है और सोचने के लिए मजबूर की, हे भगवान केसे केसे हादसे होते हैं तेरी इस दुनिया में ? रह रह कर मन अतीत की सुहानी यादों में भटकने लगता हैं और याद आता है बार बार रक्षा बंधन का वह पर्व_ कितना सुंदर कितना सुहाना ,सावन की फुहारे और चारो तरफ हरियाली लेकिन इसी से जुड़ गया है एक जख्म जो शायद कभी न भर पायेगा .
बात उस समय की है जब में बीए प्रथम वर्ष में पढ़ती थी मध्य प्रदेश के मालवा अंचल के उज्जैन जेसे रमणीक शहर में रहकर हुई मेरी पढ़ाई, सब यथावत चल रहे थे, 16_17 साल की उम्र वक्त कुलाचे भरते कट रहा था, उस समय पिताजी उज्जैन से करीब 50 km दूर उन्हेल नामक कस्बे में ख्याति प्राप्त चिकित्सक थे , उनकी घर पर बनाई हुई दवाएं बहुत कारगर साबित होती थी,बहुत नाम था उनका. लोग उन्हें महिदपुर वाले वैद्य जी के नाम से जानते थे क्यों की वो मूलत: वे महिदपुर के रहने वाले थे , चार भाई बहनों में मैं सबसे बड़ी थी ,जब मेरी हायर सेकेण्डरी तक की पढ़ाई पूरी हो गई तो उच्च शिक्षा के लिए पिताजी ने हमे उज्जैन भेजने के निर्णय ले लिया क्यो की उन्हेल में आगे शिक्षा की कोई सुविधा नहीं थी, सब भाई बहन मां सहित उज्जैन में रहने लगे ,पिताजी हफ्ते में एक बार प्रति सोमवार को आकार हम लोगो से मिलते थे ,सब भाई बहनों के दाखिले अच्छे स्कूलों में और मेरा कॉलेज में हो जाने पर निश्चिंता के साथ रह रहे थे की रक्षा बंधन का पर्व आ पहुंचा ,मुझे रक्षा बंधन बचपन से ही लुभाता हे,मेरे दोनो छोटे भाइयों से मुझे बेइंहता प्यार है उनकी पसंद से ही राखी लेकर उनको बांधती हूं, उस दिन कुछ ऐसा ही हुआ . में कॉलेज से आकर शाम को पड़ोस वाली भाभी और अपने दोनो भाईयो को लेकर राखिया खरीदने छत्री चौक के राखी वाले बाजार में गई तथा एक से एक सुंदर राखिया खरीदार घर आई ,दोनो भाई जो मुझसे काफी छोटे है मुझसे बोले " ये में बंधवाउगा, ये में बंधवाउगा "
मां अलग तैयारियों में व्यस्त थी की अचानक कॉल बेल बजी,मेने जाकर दरवाजा खोला और पूछा आप कोन , किससे काम है,उन्होंने कहा महिदपुर वाले वैद्य जी यही रहते है क्या ,हाथ में अटेची लिए हुए एक 18_19 साल का एक युवक सामान्य सी कद काठी का तथा साथ में एक अधेड़ आदमी जो धोती कुर्ता और जैकेट पहने हुआ था ,मेरे हां कहने पर उन्होंने बताया की हम रतलाम से आए हैं,मेरा नाम शिवनारायण तथा ये मेरा बेटा प्रशांत है ,कहने लगे अरे पगली पहचाना नहीं ,में तेरे बाप का मामा हु और जोर से हंसने लगे , मेने उनके चरण स्पर्श किए और उन्हें सम्मान से अंदर ले गई , मां ने सर पर पल्ला लिया और उन्होंने भी उनके चरण स्पर्श किए .
असल में वे मेरे पिताजी के मामा थे, दादी की असमय मृत्यु तथा बाबा के पुनविवाह की वजह से रिश्ते थोड़े धूमिल से हो गए थे,उन्होंने बताया की इधर से जा रहे थे अत: महाकालेश्वर के दर्शन लाभ की वजह से थोड़ी देर उज्जैन में रुकने का मन बनाया , अभी दर्शन करके आ ही रहे हैं.
तुम्हारी मामी ने बताया था की महिदपुर वाले रणछोड़ जी के बच्चे उज्जैन में ही है अत: पता पूछते पूछते मिलने की चाह में मुश्किल से यहां तक पहुंचे हैं, उन लोगो से मिलकर सबको बहुत प्रसन्नता हुई, बहुत अपनापन उनसे हमने पाया .
स्वर्गीय दादी जी की कई यादें ताजा हुई अपनी बहन की याद में मामा जी की आंखों में कई बार आसू भर आए ,मां खाना लगाने चली गई बात तो बातों में पता चला उनका बेटा प्रशांत बीएससी द्वितीय वर्ष में पढ़ रहा है स्वभाव से थोड़ा गंभीर लेकिन बहुत समझदार लग रहा था उसने मुझसे भी कई प्रश्न पूछे ,
मां ने मुझे बुलाकर कहा कि आज राखी का दिन है ये लोग चलकर यहां तक आए हैं अतः बिटिया प्रशांत को राखी बांध दे कहते हुए मा ने सजी हुई थाली मुझे थमा दी
पहले तो मुझे थोड़ा संकोच हुआ लेकिन अपने आप को तुरंत संभालकर में उन लोगों के पास पहुंची प्रशांत को तिलक लगाकर मैंने राखी बांधी सब लोग बहुत भावुक हो गए थे मैंने उसको मिठाई खिलाई, उसने मुझे रुपए निकालकर दिए , खाना खाकर थोड़ा आराम करके वे लोग हमसे विदा लेकर रतलाम की ओर रवाना हो गए बातों बातों में प्रशांत ने बताया कि वे लोग दो भाई है,बड़े भाई की सैलाना में सर्विस ही रेलवे में, उनकी शादी भी हो गई है तो भैया भाभी से सैलाना में ही रहते है इस तरह एक अनजाने इंसान ने मेरा तीसरा भाई होने का धर्म निभाया इस बात को करीब 2 साल बीत गए! विधाता के लेख में कभी मिटते नहीं यह बात कभी कभी बड़े वेग से चरितार्थ होती है एक दिन मां कहीं रिश्तेदारी में से लौटी तो उन्होंने बताया कि घर में किसी बात पर कहा सुनी हो जाने की वजह से क्षुब्ध होकर भी बिना बताए प्रशांत बड़े भाई भाभी के पास सैलाना जा रहा था रात भर की कशमकश एवं अंतर्द्वंद के पश्चात सुबह जल्दी बिना किसी को बताए रेलवे स्टेशन पहुंच गया उसके पहुंचते-पहुंचते ही ट्रेन चल दी पहले धीमी गति से चली वह दौड़ा ट्रेन की गति थोड़ी और तेज हो गई वह दौड़ कर पायदान पर लटक गया सांस तेजी से चल रही थी दरवाजे पर खड़ी भीड़ ने उसे अंदर नही घुसने दिया घर से भागने का भय तथा बर्फीले तेज झपट वाली ठंड, किसी तरह आधा किलोमीटर पहुंचा होगा कि बैलेंस बिगड़ गया चीखते हुए वो नीचे घसीटता चला गया , किसी ने चेन खींची थोड़ा आगे चलकर ट्रेन रुकी रेलवे पुलिस आई
लोगों की भीड़ जमावड़ा हो गया, थोड़ी देर देखने सुनने में वक्त लगा
एक पैर उसका बिल्कुल अलग हो चुका था तथा दूसरी में भी काफी चोट थी फिर भी वह बचा रहा
हास्पिटल में एडमिट कराने के बाद पुलिस ने लावारिस समझकर अगले दिन वहां के लोकल पेपर में उसकी फोटो छपा दी इधर घरवाले परेशान थी लेकिन पहले भी एक बार बिना बताए किसी दोस्त के यहां चला गया था तो तीन दिन में लौटा था अतः यही सोचकर कि कहीं चला गया होगा तो एक दो दिन में लौटा आएगा
घर वालों ने बात का बतनगढ़ बनाने से बचना ही उचित समझा था
लेकिन दूसरे दिन किसी ना कर पेपर में छपी फोटो दिखाई तो घर में हड़कंप मच गया घर के सब लोग बदहवास से अस्पताल पहुंचे
अपने लाल को इस हालत में देखकर मां पागल सी हो गई वह अपनी चेतना खो बैठी
नियति ने प्रशांत के दोनों पैरों को बड़ी बेरहमी से कुचल डाला था एक पैर तो घटनास्थल पर ही साथ छोड़ चुका था, दूसरा इतना जख्मी हो गया था कि डॉक्टरों के अथक प्रयासों के बाद भी उसे काटना पड़ा
वह तो तीन चार दिनों तक होश में ही नही आया
चार दिनों के बाद जब उसकी तंद्रा टूटी तो उसे अपनी लूटी जिंदगी का एहसास हुई
मां पास बैठी सर को सहला रही थी पश्चाताप तथा अपराध बोध से ग्रस्त मां की तरफ देख कितनी हिचकियों के साथ रोया की देखने वाले पत्थर दिलों का भी कलेजा दहल गया लेकिन अब कुछ नहीं हो सकता था
दो माह अस्पताल के रहने के बाद छुट्टी कर दी गई अब तो सहारा बेसाखियो का था
रिश्तेदार मित्र हिम्मत दिलाने वाले शुरुआत में तो बहुत आए धीरे धीरे उनकी रफ्तार धीमी पर गई
अब उसका मन बिल्कुल नहीं लगता था हालाकि मां पिताजी उसका बहुत ध्यान रखते थे हर संभव उनका यही प्रयास रहता था की उसका मन लगा रहे
न्यूज पेपर से लगाकर लिखने पढ़ने की सारी सामग्री उसके पास रहती थी , ट्रांजिस्टर सदैव उसके पास रहता
आगे की पढ़ाई भी जारी रखी रेगुलर जाना संभव नहीं था अतः प्राइवेट फॉर्म भरवा दिया कभी मन नहीं लगता तो मां से कहता की मैं मटर झिलुगा, सब्जी में काटूंगा
ट्रांजिस्टर पर गाने सुनता ,न्यूज सुनता
सब कुछ जैसे सामान्य से चल रहा था लेकिन अंतर्मन सामान्य नहीं था हरदम कुछ सोचता सा रहता
बाहर के लोगों से मिलने से घबराता था मां हर बात उसकी इच्छा के अनुरुप करती थी लेकिन कहता था सब लोग मुझ पर दया दिखाते हैं मैं किसी की दया पर जीना नहीं चाहता
समझाते समझाते सभी परेशान थे लेकिन धीरे-धीरे उसके मन की टीस उग्र होती चली गई वैसे वह ऊपर वाली मंजिल पर रहता था, वही गैलरी में से सड़क का नजारा देखता रहता था
धीरे-धीरे इतनी हिम्मत आ गई थी की सरकते सरकते प्रसाधन तक पहुंच जाता था, अपना काम खुद करने की कोशिश करता रहता था इतना सब होने के बावजूद पिछले कुछ दिनों से ज्यादा ही गंभीर हो गया था
एक दिन जब सुबह मां चाय लेकर उसकी कमरे में गई तो देखा बिस्तर खाली था सोचा नित्य कर्म के लिए बाथरुम में गया होगा काफी देर के बाद भी जब कोई हलचल नहीं हुई तो ऊपर नीचे के सब कमरों में देखा आवाज लगाई मेन गेट जब खुला देखा तो सोचा मां के मन की आशंका सच में बदल गई
बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन ,हॉस्पिटल ,मंदिर ,कॉलेज दोस्तों के घर सब जगह ढूंढ वाया कहीं पता नहीं चला दो दिन हो गए गुमशुदगी की रिपोर्ट भी दर्ज करवा दी लेकिन कहीं पता नहीं चला
पूरे घर की सफाई की, शायद कुछ छोड़ गया हो कुछ नहीं मिला
करीब एक हफ्ते बाद जब मां ने तकिया का गिलाफ निकाला तो उसमें से छोटी स्लिप मिली जिसमें लिखा था
मां मैं तुम्हारा बहुत बड़ा गुनाहगार हूं, तुम्हारी जैसी मां सबको मिले
लेकिन मेरे साथ जो घटित हुआ वह किसी के साथ ना हो मेरा अंतर्मन अत्यंत व्याकुल है, में किसी पर बोझ बनकर और दया के सहारे नहीं जीना चाहता अब मैं यह बर्दास्त नहीं कर सकता अभी पहाड़ जैसी जिंदगी पड़ी है मुझे अपनी जिंदगी को अपने तरीके से जीने की इजाजत दो
मां मैं भगवान की दी हुई इस जिंदगी को बोझ नहीं धरोहर समझकर काटुगा लेकिन अपने तरीके से
मुझे अपने हाल पर छोड़ दो, ढूंढने की कोशिश मत करना पूज्य पिताजी से भी ऐसी धृष्टता के के लिए बार बार क्षमा चाहता हूं मैं आपको असहनीय पीड़ा देकर जा रहा हूं लेकिन आप अपने आप को संभाल लेंगे ऐसी आशा के साथ क्षमा की चाह में,
एक नए लोक में जाने को आतुर आपके शुभ आशीर्वाद के लिए लालायित
आपका अपना प्रशांत
पत्र पढ़ने के बाद परिवार के लोग काफी समय तक अपने आप को संभाल नहीं पाए मां अपना मानसिक संतुलन खो करीब साल भर तक बहुत ढूंढने की कोशिश की
जो कोई जहां का कहता वही जाते , ज्योतिष ओझाओ उसे पूछा, कोई फायदा नहीं हुआ आज करीब दस साल बीत गए, मेरे मेरी शादी हो गई तीन बच्चे है ,
गर्मी की छुट्टियों में मैं अपने पति और बच्चों के साथ देहरादून मसूरी हरिद्वार और फिर ऋषिकेश पहुंची वैसे भी मुझे प्राकर्तिक स्थलों से कुछ ज्यादा ही लगाव है और ऐसे में यदि पति और बच्चों का साथ हो तो दुनिया को भूल कर मन उसी में रमण करने लगता है
वाकई गंगा का किनारा इतना मोहक , इतना सुंदर ,बहुत प्रफुल्लित मन से सब कुछ देखा आखिर में हमारे पूज्य माताजी (सासु मां) की बात याद आई स्वर्गीय ससुर जी की स्मृति में वहां बैठे हुए संतो को भोजन करा देना ,गंगा का किनारा इतना सुंदर, इतना मोहक, मन बड़ा प्रफुल्लित था सोचा भोजन का काम निपटा दे क्यों की की रात को ही वापसी का रिजर्वेशन था
तीन चार पंक्तियों साधुओं की बेटी थी,
मैंने भोजन कि पैकेट की डलिया हाथ में ली और एक एक सबको बाटती जा रही थी ,
लीजिए बाबाजी आप भी ले लीजिए जब दो पंक्तियों के बाद तीसरी पंक्ति में पहुंची तो एक साधू से कहा बाबा आप भी ले लीजिए वह अपलक मुझे देख रहा था
मैंने उसको खाना दिया और आगे बढ़ गई मन कुछ सोच में पड़ गया थोड़ा आगे जाकर फिर पीछे मुड़कर देखा तब भी वही देख रहा था चेहरा कुछ परिचित सा लगा रहा था
धुंधली धुंधली सी एक तस्वीर उभरी , चौथी पंक्ति में खाना बांटने गई तो देखा कि वह आंखों को गमछा से पोंछ रहा हे चौथी पंक्ति पूरी खत्म करके पति से कुछ कह कर जब उन्हें साथ लेकर वहां पहुंची तो वह अपना स्थान रिक्त कर कर कहीं अंजनी डगर पर जा चुका था
उसे बहुत ढूंढा साधु की टोली में पूछा ,भीड़ में भी तलाशा कहीं पता नहीं चला
प्रशांत जा चुका था अपने महासागर की लहरों में और दे गया था एक ऐसी टीस जो शायद अंतिम समय तक नहीं भुलाई जा सकेगी.....