Vishnu kanta chaudhary-madhuram

Vishnu kanta chaudhary-madhuram this is a page of my expressions & life experiences in the form of poems & stories written by me only

यादों के उस पार ...यूँ ही गुजर जाते हैं मीठे सपने मुसाफिर की तरह,और यादें वहीं खड़ी रह जाती हैं बेजान रास्तों की तरह।कुछ...
01/09/2026

यादों के उस पार ...

यूँ ही गुजर जाते हैं मीठे सपने मुसाफिर की तरह,
और यादें वहीं खड़ी रह जाती हैं बेजान रास्तों की तरह।

कुछ खट्टे, कुछ मीठे अनुभवों के साथ जिंदगी रफ्ता-रफ्ता गुजरती रही। कभी रिश्तों को निभाने की भागदौड़, कभी जिम्मेदारियों का बोझ और कभी अपनों की खुशियों में अपनी खुशियाँ तलाशते-तलाशते कब जिंदगी की शाम करीब आ गई, पता ही नहीं चला।

एक दिन यूँ ही गौर से आईने में देखा तो अपना ही चेहरा बहुत उदास नजर आया।

शायद दुनियादारी में इतनी उलझ गई थी कि खुद को ही कहीं पीछे छोड़ आई थी।

जिंदगी भी तो एक रंगमंच ही है... चलचित्र की तरह चलती रहती है। कब सुबह हुई, कब दोपहर आई और कब शाम उतर आई, पता ही नहीं चलता।

बचपन में कितने किरदार निभाए थे—किसी की बेटी, किसी की बहन, किसी की पोती, किसी की भतीजी... फिर वक्त बदला तो बहू, भाभी, देवरानी, नंद और न जाने कितने रिश्ते जिंदगी के रंगमंच पर जुड़ते चले गए।

लेकिन उन सभी किरदारों में सबसे खास किरदार था—एक पत्नी का।

उस एक रिश्ते से न जाने कितने रिश्ते जुड़ते गए। फिर बच्चे हुए। उनकी किलकारियों ने घर को जैसे एक नई दुनिया दे दी। उनके जन्म से लेकर उन्हें बड़ा करने, पढ़ाने और उनका भविष्य बनाने तक जिंदगी का एक और खूबसूरत अध्याय चलता रहा।

सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा था।

लेकिन वक्त को शायद कुछ और ही मंजूर था।

मेरे सपनों के सौदागर, मेरे हमसफर, मेरे पतिदेव... कब मुझे छोड़कर चले गए, समय का अंदाज ही नहीं रहा।

एक हवा का झोंका आया...
टूटा डाली से फूल ...
और जिंदगी की शाम आ गई।

एक ऐसी घटना घट गई जिसकी कल्पना तक कभी नहीं की थी।

सुबह होती है, शाम होती है,
यूँ ही उम्र तमाम होती है।

आज उनकी अनुपस्थिति में जब शाम का जुगनू-सा उजाला मन में उतरता है, तो उनका ख्याल उसी तरह आता है जैसे अंधेरी जमीन पर अचानक कोई जुगनू जगमगा उठे।

अब उनके साथ बिताया हुआ समय ही मेरी सबसे बड़ी पूंजी है।

चाँदनी रात की वह याद...

चंद्रपूर्णिमा का दिन था।

उन्होंने बड़े प्यार से कहा—
“तुम वही सफेद साड़ी पहनना, जिसमें गोल्डन सितारे लगे हैं... और वही ज्वेलरी भी।”

मैंने कहा, “ठीक है।”

फिर अचानक बोले—“कुछ और...”

मैंने कहा—“क्या?”

उन्होंने कहा—“सफेद फूलों का गजरा।”

मैंने हँसकर कहा, “वो तो है ही नहीं... और यहाँ मिलेगा भी नहीं।”

तुरंत गेटमैन को बुलाकर चमेली के फूल मंगवाए।

मैंने उसी समय उन फूलों का गजरा बनाया और बालों में सजा लिया।

फिर हम दोनों चाँदनी रात में घूमने निकल पड़े।

आज भी पूर्णिमा का चाँद दिखाई देता है तो लगता है जैसे वह रात वहीं ठहर गई हो।

कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें भूलना मुश्किल नहीं, नामुमकिन होता है।

उनकी जिंदगी में नकारात्मकता के लिए जैसे कोई जगह ही नहीं थी। हर सांस में सकारात्मकता थी। मुझे उन पर इतना अटूट विश्वास था कि लगता था—उनके लिए दुनिया में कुछ भी असंभव नहीं।

भुट्टे के भजिये और उनकी छोटी-सी जिद

एक समय हम आजमगढ़ की एक छोटी-सी पीएचसी पर पोस्टेड थे। अस्पताल के पास खेत था, जिसमें मक्का, गेहूँ और सब्जियाँ उगाई जाती थीं।

एक रात करीब दस बजे उन्होंने कहा—

“सुनो, भुट्टे के भजिये खाने का बहुत मन कर रहा है।”

मैंने कहा—“भुट्टे कहाँ से आएँगे?”

बोले—“चलो, पीछे खेत में लगे हैं।”

मैंने कहा—“अभी तो बिल्कुल कच्चे होंगे।”

वे मुस्कुराए और बोले—
“नहीं... सुबह देखा था, कुछ में दाने आने लगे हैं।”

बस फिर क्या था! गेटमैन बंशी को साथ लिया और रात में ही खेत की ओर निकल पड़े।

कुछ देर बाद सचमुच भुट्टे लेकर लौटे।

और मैंने उसी रात उनके लिए भुट्टे के भजिये बनाए।

आज सोचती हूँ तो लगता है कि वह सिर्फ भुट्टे के भजिये खाने की जिद नहीं थी... वह जिंदगी को पूरी तरह जी लेने का उनका अंदाज था।

उनका पेशा ही उनका जुनून था

डॉक्टर होना उनके लिए सिर्फ एक पेशा नहीं था।

वह मरीजों की सेवा में अपनी ऊर्जा तलाशते थे।

दिन हो या रात, तबीयत ठीक हो या खराब—मरीज उनके लिए सबसे पहले होते थे।

एक बार उनकी तबीयत काफी खराब थी। उन्होंने कहा—

“आज पेशेंट मत बैठाना... आज मैं किसी को नहीं देखूँगा।”

मैंने चार-पाँच मरीजों को लौटा दिया।

करीब एक घंटे बाद बाहर आई तो देखा, एक महिला अपने दो छोटे-छोटे बच्चों के साथ दरवाजे पर बैठी थी।

मैंने कहा—
“अरे, तुम गई नहीं?”

वह बोली—
“जाऊँगी थोड़े ना।”

मैंने समझाया—
“आज डॉक्टर साहब की तबीयत ठीक नहीं है। वे किसी को नहीं देख पाएँगे।”

वह रोते हुए बोली—

“मैडम, मेरे बच्चों को दिखा दीजिए... नहीं तो ये मर जाएँगे।”

उसकी आवाज शायद अंदर तक पहुँच गई थी।

वह बिस्तर पर लेटे हुए थे। उन्होंने उसकी बात सुन ली।

कुछ क्षण बाद उन्होंने अपनी दोनों बाहें मेरी तरफ बढ़ाईं और कहा—

“चलो... देख लेते हैं।”

मैं उन्हें सहारा देकर बाहर लेकर आई। मेरी छोटी बेटी भी साथ थी। हम दोनों ने उन्हें पकड़कर मरीज के पास पहुँचाया।

उन्होंने उन दोनों बच्चों को देखा।

शायद...

वही उनकी जिंदगी का आखिरी मरीज था।

आज भी जब वह दृश्य याद आता है तो मन भर आता है।

उन्होंने अपने जीवन की आखिरी साँसों तक अपने कर्तव्य को नहीं छोड़ा।

अब सिर्फ यादें हैं...

कभी-कभी लगता है कि आंखों को जब किसी की चाहत हो जाती है, तो उसे देखकर ही दिल को राहत मिलती है।

कैसे भूल सकता है कोई किसी को,
जब किसी को किसी की आदत हो जाती है?

उनके जाने के बाद जिंदगी चल तो रही है, मगर पहले जैसी नहीं रही।

अब घर वही है, कमरे वही हैं, रास्ते वही हैं... मगर उनके बिना सब कुछ अधूरा-सा लगता है।

कभी चाँदनी रात उनकी याद दिलाती है,
कभी चमेली के फूल,
कभी भुट्टे के भजिये,
कभी किसी मरीज की आवाज...

और कभी यूँ ही आईने में अपना चेहरा देखकर लगता है कि जिंदगी ने जाने कितने किरदार निभवा लिए, लेकिन सबसे खूबसूरत किरदार तो वही था—उनकी हमसफर होने का।

अब हमारे बीच सिर्फ यादों का रिश्ता है।

लेकिन ये यादें भी कितनी खूबसूरत हैं...

वे आज भी मेरे जेहन में सिमटी हुई हैं और शायद कल भी रहेंगी।

मन बार-बार यही कहता है—

“उन्हें खुदा मिले जिन्हें खुदा की है तलाश,
मुझको बस एक झलक मेरे दिलदार की मिले।”

हम दो पक्षी थे...
एक ही शाख पर रहते थे।

फिर वक्त ने ऐसी करवट ली कि—

एक उड़ गया अम्बर में,
और दूसरा पिंजरे में ही रह गया।

किस्मत भी न जाने कैसा अत्याचार कर रही है मुझ पर...

हमसफर चला गया,
और मेरा सफर अभी बाकी है।

अब जिंदगी की इस शाम में मेरे पास न कोई शिकायत है, न कोई सवाल।

बस उनकी यादें हैं...

और उन यादों के सहारे बाकी का सफर।

शायद प्यार का यही सबसे खूबसूरत सच है—

इंसान चला जाता है,
लेकिन सच्चा साथ कभी नहीं जाता।

वह चाँदनी बनकर,
खुशबू बनकर,
किसी गीत की धुन बनकर,
किसी पुराने स्पर्श की तरह
हमारे भीतर हमेशा जीवित रहता है।

और फिर किसी शांत शाम को, जब दुनिया से नजरें बचाकर हम आईने में खुद को देखते हैं...

तो लगता है—

वो कहीं गए ही नहीं,
बस यादों के उस पार खड़े हैं...
और मुस्कुराकर कह रहे हैं—
“मैं यहीं हूँ।”

17/08/2026
दो छतों के बीचएक अधूरी कहानी, एक अधूरा मनलेखिका — विष्णुकांता चौधरी«“तन से तन का मिलन हो भी जाए तो क्या ,मन से मन का मिल...
08/08/2026

दो छतों के बीच

एक अधूरी कहानी, एक अधूरा मन

लेखिका — विष्णुकांता चौधरी

«“तन से तन का मिलन हो भी जाए तो क्या ,
मन से मन का मिलन कोई कम तो नहीं…”»

---

भाग एक

जब दो छतों के बीच प्यार ने जन्म लिया

आज पुनः आप सबके सामने एक कहानी लेकर उपस्थित हूँ।

कहानी का शीर्षक है—“दो छतों के बीच”।

यह कहानी उन दिनों की है, जब जीवन बहुत सरल था। रिश्तों में औपचारिकताएँ कम और भावनाओं में सच्चाई अधिक हुआ करती थी। मगर कभी-कभी वही मासूम भावनाएँ सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक हैसियत और परिवार की अपेक्षाओं के बीच ऐसी उलझ जाती हैं कि जीवन भर के लिए एक कहानी बन जाती हैं।

अब मायके जाना बहुत कम हो पाता है। घर और परिवार की जिम्मेदारियाँ, मध्य प्रदेश से उत्तर प्रदेश की दूरी और माँ-पिताजी का न रहना—इन सबने मायके की यात्राएँ बहुत कम कर दी थीं। हाँ, साल-दो साल में कभी एकाध बार जाना हो ही जाता था।

ऐसे ही एक बार मैं मायके आई हुई थी।

वर्षों से पुरानी सहेलियों से भी मुलाकात नहीं हुई थी। एक दिन भाभी ने कहा—

“चलो, मंदिर घूम आते हैं।”

हम दोनों अच्छे मूड में मंदिर गए। लौटते समय रास्ते में अपने पुराने घर के सामने लगे नल पर पानी भरती हुई एक स्त्री दिखाई दी।

मैंने उसे देखा।

फिर कुछ क्षण गौर से देखा।

अचानक मेरे मुँह से निकला—

“श्री!”

उसने भी मेरी आवाज पहचान ली।

वह दौड़कर मेरे पास आई और मुझसे लिपट गई।

मैंने उसे गौर से देखा और कहा—

“ये क्या हुलिया बना रखा है?”

उसने मेरी ओर देखा।

उसकी आँखों में जैसे वर्षों का दर्द जमा था।

धीरे से बोली—

“सब कुछ खत्म हो गया…”

उस एक वाक्य ने मेरे भीतर अतीत का एक बंद दरवाजा खोल दिया।

और मैं लौट गई उन दिनों में…

जब श्री और श्रेष्ठ की दुनिया बस दो छतों के बीच सिमटी हुई थी।

---

श्री के नाना-नानी की केवल एक संतान थी—पुष्पा।

पुष्पा का विवाह एक संपन्न परिवार में हुआ था। परिवार का सराफा व्यवसाय था और शहर में अच्छा मान-सम्मान था।

नाना-नानी अकेले रहते थे। इसलिए पुष्पा ने अपनी बड़ी बेटी को उनके पास भेज दिया। बच्ची नाना-नानी के साथ रहने लगी और वहीं पढ़ाई करने लगी।

नाना-नानी का घी का अच्छा व्यापार था। वे गाँवों से घी खरीदकर अपनी जमी-जमाई दुकान पर बेचते थे। कस्बे के लोग उन्हें प्यार से केसर बुआ और रामनारायण फूफाजी के नाम से जानते थे।

मेरे पिताजी भी उन्हीं के यहाँ से घी मंगवाते थे, इसलिए मेरा भी उनके घर आना-जाना रहता था।

उनकी नातिन बहुत सभ्य और पढ़ने में होशियार थी। नौवीं कक्षा तक आते-आते उसके लिए एक अच्छा रिश्ता देखकर उसका विवाह कर दिया गया और वह अपने ससुराल चली गई।

अब नाना-नानी फिर अकेले हो गए।

इस बार पुष्पा ने अपनी दूसरी बेटी को उनके पास भेज दिया।

उसका नाम था—श्री।

श्री बहुत प्यारी, चुलबुली, सुंदर और पढ़ने में तेज-तर्रार लड़की थी। उसका सातवीं कक्षा में दाखिला कराया गया।

उधर, नाना-नानी के घर के पीछे वाली गली में एक और परिवार रहता था। वे भी उसी समाज से थे—महेश्वरी।

उनकी बहुत अच्छी हलवाई की दुकान थी। कचौड़ी, जलेबी और घेवर उनके यहाँ के विशेष व्यंजन थे।

दुकान के मालिक थे—शिवनारायण जी महेश्वरी।

उन्होंने भी अपनी बड़ी बहन के बेटे को अपने पास रखा हुआ था।

उस लड़के का नाम था—श्रेष्ठ।

श्रेष्ठ नौवीं कक्षा में पढ़ता था। स्कूल के अलावा जो समय मिलता, वह अपने मामा के साथ दुकान पर बैठकर उनकी मदद करता।

वह अपने नाम की तरह ही श्रेष्ठ था—लंबा, गोरा, आकर्षक व्यक्तित्व वाला, सुंदर नैन-नक्श और मधुरभाषी।

पढ़ाई में भी अच्छा था।

श्री और श्रेष्ठ के पारिवारिक संबंध बहुत अधिक नहीं थे, लेकिन दोनों स्कूल में एक-दूसरे को जानते थे।

एक बार स्कूल के वार्षिक उत्सव में लड़कियों के विद्यालय की छात्राओं को भी आमंत्रित किया गया।

कार्यक्रम में जल संरक्षण पर प्रतियोगिता रखी गई।

लड़कियों ने भी बहुत अच्छा प्रदर्शन किया, लेकिन लड़कों की तैयारी कुछ बेहतर थी और वे प्रतियोगिता जीत गए।

इसके बाद प्रधानाचार्य ने अंताक्षरी का आयोजन किया।

एक तरफ लड़के थे और दूसरी तरफ लड़कियाँ।

श्री को गाने का बहुत शौक था और श्रेष्ठ भी कम नहीं था।

दोनों के बीच गीतों का बहुत सुंदर मुकाबला हुआ।

आखिरकार विजय लड़कियों के हिस्से में आई।

यही वह दिन था जब दोनों की दोस्ती की शुरुआत हुई।

धीरे-धीरे दोस्ती गहरी होती गई।

श्री के घर की छत से श्रेष्ठ का आँगन दिखाई देता था।

अब छत दोनों के मिलने का माध्यम बन गई थी।

कभी श्रेष्ठ तीन-चार कपड़े लेकर आँगन में खड़ा होकर इशारे से पूछता—

“इनमें से कौन-सा पहनूँ?”

श्री मुस्कुराकर अपनी पसंद के कपड़े की ओर इशारा कर देती।

कभी श्री छत पर कपड़े सुखाने के बहाने आती, तो कभी धूप में बाल सुखाने के बहाने।

बचपन की उस मासूम दोस्ती में कब एक अनकहा आकर्षण जन्म लेने लगा, दोनों स्वयं भी नहीं समझ पाए।

समय बीतता गया।

श्री की पढ़ाई अच्छी चल रही थी। परीक्षा में उसके अंक श्रेष्ठ से भी अधिक आए।

श्री आठवीं में पहुँच गई और श्रेष्ठ दसवीं में।

दिन बीतते गए और दोनों का मिलना-जुलना बढ़ता गया।

अब उनकी दुनिया मानो उन्हीं दो छतों के बीच बस गई थी।

लेकिन नानी की नजरों से यह सब छिपा नहीं था।

श्री का बार-बार छत पर जाना और देर तक वहाँ रहना उन्हें खटकने लगा।

वह कभी कपड़े सुखाने का बहाना करती, कभी धूप में बाल सुखाने का।

नानी को धीरे-धीरे चिंता होने लगी।

समय पंख लगाकर उड़ता रहा।

श्री दसवीं में पहुँच गई।

वह अब पहले से अधिक समझदार, सुंदर और विनम्र हो चुकी थी।

दूसरी ओर श्रेष्ठ की मामी भी कभी-कभी दोनों को लेकर मजाक कर देतीं, लेकिन उन्हें लगता था कि दोनों पढ़ने वाले बच्चे हैं।

दसवीं के बाद श्री के भविष्य को लेकर नाना-नानी भी चिंतित होने लगे।

एक दिन नानी ने पुष्पा से कहा—

“अब श्री के लिए भी रिश्ते की बात सोचो।”

पुष्पा हँसते हुए बोली—

“माँ, अभी तो बच्ची है।”

नानी ने कहा—

“बच्ची है, लेकिन समय रहते अच्छा रिश्ता मिल जाए तो देर नहीं करनी चाहिए।”

पुष्पा ने आश्वासन दिया—

“आप चिंता मत करो। मेरी नजर में है। अच्छा रिश्ता मिला तो ग्यारहवीं तक इसकी शादी कर देंगे।”

नानी संतुष्ट तो हो गईं, लेकिन श्री को लेकर उनके मन की चिंता पूरी तरह समाप्त नहीं हुई।

---

दसवीं की परीक्षा हुई।

श्री ने बहुत अच्छे अंक प्राप्त किए।

श्रेष्ठ ने भी प्रथम श्रेणी में परीक्षा उत्तीर्ण की।

छुट्टियों में दोनों अपने-अपने परिवारों के पास चले गए।

यहीं से कहानी ने एक नया मोड़ लिया।

श्री के परिवार ने उसके विवाह की चर्चा शुरू कर दी।

और यह सुनते ही श्री का व्यवहार बदलने लगा।

वह चुप रहने लगी।

उदास रहने लगी।

माँ ने कई बार पूछा—

“क्या हुआ? इतनी चुप-चुप और सुस्त क्यों रहती हो?”

काफी हिम्मत जुटाने के बाद एक दिन श्री ने माँ से पूछा—

“माँ… अगर मैं अपने रिश्ते के बारे में आपसे कुछ कहूँ, तो क्या आप मेरी बात सुनेंगी?”

माँ चौंक गईं।

“बता, क्या कहना चाहती है?”

श्री ने डरते-डरते श्रेष्ठ के बारे में सब बता दिया।

माँ स्तब्ध रह गईं।

उन्हें विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उनकी बेटी के मन में यह भाव इतने समय से पल रहा था।

लेकिन बात अब छिपी नहीं थी।

उन्होंने बहुत हिम्मत करके यह बात अपने पति और बेटे गोविंद को बताई।

और यहीं से शुरू हुआ दूसरा संघर्ष…

---

भाग दो

जब प्रतिष्ठा जीत गई और प्रेम हार गया

श्री के पिता ने जब यह बात सुनी तो उनका चेहरा क्रोध से तमतमा उठा।

उन्होंने कहा—

“उस हलवाई के यहाँ हम शादी करेंगे? शहर में हमारे मान-सम्मान की धज्जियाँ उड़ जाएँगी। हमने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि ऐसा कुछ हो सकता है।”

गोविंद का गुस्सा भी बेकाबू था।

उसे लग रहा था कि परिवार की प्रतिष्ठा पर किसी ने चोट कर दी हो।

माँ ने समझाने का प्रयास किया—

“बच्ची ने कोई अपराध नहीं किया है। उसने केवल अपने मन की बात हमसे कही है। पहले शांत होकर सोचिए।”

लेकिन उस समय किसी के मन में श्री की भावनाओं के लिए जगह नहीं थी।

परिवार का निर्णय स्पष्ट था—

श्रेष्ठ से यह रिश्ता नहीं हो सकता।

श्री को समझाने की बहुत कोशिश की गई।

वह अपनी बात पर अड़ी रही।

घर में तनाव बढ़ता गया।

श्री की आँखों से आँसू बहते रहे।

उसके सामने एक ओर उसका मासूम प्रेम था और दूसरी ओर परिवार की प्रतिष्ठा, मान-सम्मान और माता-पिता की इच्छा।

उसे पहली बार महसूस हुआ कि प्रेम का रास्ता उतना सरल नहीं होता, जितना उसने अपनी मासूम दुनिया में समझा था।

उस रात उसकी आँखों में नींद नहीं थी।

मन में केवल एक प्रश्न था—

क्या किसी को सच्चे मन से चाहना इतना बड़ा अपराध है?

उधर श्रेष्ठ का भी बुरा हाल था।

उसने अपनी मामी के सामने श्री के प्रति अपने मन की बात रखी।

मामी ने शिवनारायण जी से बात की।

उन्होंने कहा—

“लड़की वालों की तरफ से रिश्ता आए तो हम सोच सकते हैं। समाज भी एक है, परिवार भी ठीक है।”

लेकिन समस्या आर्थिक और सामाजिक हैसियत की थी।

श्रेष्ठ का परिवार रिश्ता लेकर आगे नहीं बढ़ पाया।

इधर श्री के परिवार ने एक बेहद संपन्न व्यवसायी परिवार के इकलौते बेटे आकाश के साथ उसका रिश्ता तय कर दिया।

देखने-दिखाने की औपचारिकताएँ पूरी हुईं।

और देखते ही देखते पंद्रह दिनों के भीतर श्री का विवाह भी हो गया।

जिस छत पर कभी दोनों के बीच इशारों में बातें होती थीं, अब वहाँ सन्नाटा था।

जाते-जाते श्रेष्ठ ने श्री को एक पत्र दिया।

उसमें लिखा था—

«“रहा गुलशन तो फूल खिलेंगे,
रही जिंदगी तो फिर मिलेंगे…”»

श्री बहुत रोई।

लेकिन परिवार ने उसके आँसुओं को बचपना समझा।

वह ससुराल चली गई।

---

आकाश का परिवार बहुत बड़ा और संपन्न था।

वह अपने माता-पिता का इकलौता बेटा था। उसकी तीन बहनें थीं। घर में दादा-दादी, चाचा-चाची, बुआ और अन्य सदस्य भी थे।

श्री का स्वागत बहुत अच्छे ढंग से हुआ।

आकाश भी बहुत नेकदिल और समझदार इंसान था।

शादी के बाद उसने कई बार महसूस किया कि श्री मन से खुश नहीं है।

एक दिन उसने पूछा—

“क्या तुम खुश नहीं हो?”

श्री ने कहा—

“नहीं… ऐसी कोई बात नहीं है।”

“फिर क्या बात है?”

“कुछ नहीं… बस घर की याद आती है।”

लेकिन आकाश समझ रहा था कि बात केवल मायके की याद की नहीं है।

श्री ने अपनी जिम्मेदारियाँ पूरी ईमानदारी से निभाईं।

एक वर्ष बाद उनके घर पुत्र का जन्म हुआ।

पूरा परिवार खुशी से भर गया।

लेकिन श्री की उदासी नहीं गई।

वह सबके साथ रहती, घर के काम करती, सभी का सम्मान करती, लेकिन उसके भीतर की खाली जगह जैसे भरती ही नहीं थी।

दो वर्ष बीते।

फिर तीन वर्ष।

समय चलता रहा, लेकिन श्री और आकाश के बीच वह सहज अपनापन कभी नहीं बन पाया जिसकी दोनों को आवश्यकता थी।

आकाश ने बहुत प्रयास किए।

कभी प्यार से, कभी समझाकर।

एक दिन उसने दुखी होकर कहा—

“अगर तुम्हें मैं या मेरा परिवार पसंद नहीं है तो मैं तुम्हें तुम्हारे मायके छोड़ आता हूँ। लेकिन तुम्हें इस तरह दुखी देखकर मैं भी नहीं जी पा रहा हूँ।”

श्री ने जाने से इनकार कर दिया।

वह किसी से शिकायत नहीं करती थी।

बस मौन रहती थी।

उधर श्रेष्ठ को भी श्री के विवाह की खबर ने भीतर तक तोड़ दिया था।

लेकिन जीवन आगे बढ़ता गया।

मामा के कहने पर श्रेष्ठ ने एक साधारण, समझदार और सुंदर लड़की से विवाह कर लिया।

दोनों ने अपनी-अपनी जिंदगी शुरू कर दी।

लेकिन अतीत की छाया पूरी तरह कभी नहीं गई।

---

इधर आकाश की स्थिति धीरे-धीरे बिगड़ने लगी।

श्री की उदासी और उससे जुड़ी अनकही दूरी ने उसे भीतर से परेशान कर दिया।

उसका व्यवसाय प्रभावित होने लगा।

वह निराश रहने लगा।

परिवार ने बहुत प्रयास किए।

श्री ने भी अपनी ओर से घर और परिवार की जिम्मेदारियाँ निभाने में कोई कमी नहीं रखी, लेकिन दोनों के बीच जो भावनात्मक दूरी थी, वह कम नहीं हो सकी।

अंततः एक दिन आकाश ने ऐसा कदम उठा लिया, जिसने पूरे परिवार को हमेशा के लिए दुःख में डाल दिया।

आकाश के जाने के बाद उसका परिवार टूट गया।

श्री के मायके में भी पछतावे के सिवा कुछ नहीं बचा।

समय बीतता गया।

श्री के नाना-नानी भी इस दुनिया से चले गए।

आकाश के परिवार ने श्री के मायके वालों को संदेश भेजा—

“अपनी लड़की को ले जाइए।”

श्री वापस अपने मायके आ गई।

लेकिन उसका बेटा उसके साथ नहीं भेजा गया।

अब वह उसी पुराने नाना-नानी के घर में रहने लगी, जहाँ कभी उसकी जिंदगी की सबसे सुंदर यादें बसी थीं।

घर वही था।

आँगन वही था।

छत वही थी।

लेकिन उन छतों के बीच अब कोई संवाद नहीं था।

नानी नहीं थीं।

नाना नहीं थे।

श्रेष्ठ नहीं था।

और श्री का वह बचपन भी नहीं था, जिसमें भविष्य के सपने बिना किसी डर के देखे जाते थे।

मैंने जब वर्षों बाद श्री को देखा और पूछा—

“क्या हुआ?”

उसने मेरी ओर देखा और केवल इतना कहा—

“सब कुछ खत्म हो गया…”

उसकी आवाज में न शिकायत थी, न किसी के प्रति क्रोध।

बस एक गहरी थकान थी।

शायद उसे भी समझ आ चुका था कि जिंदगी में कुछ फैसले वापस नहीं लिए जा सकते।

---

कहानी का सार

बच्चों की भावनाएँ बहुत प्रबल होती हैं।

माता-पिता अपने बच्चों के लिए हमेशा अच्छा ही सोचते हैं, लेकिन कभी-कभी सामाजिक प्रतिष्ठा, आर्थिक हैसियत, पद और लोक-लाज का प्रभाव इतना बढ़ जाता है कि बच्चे की वास्तविक भावनाएँ पीछे छूट जाती हैं।

हर प्रेम-विवाह सही हो, यह आवश्यक नहीं।

लेकिन हर प्रेम को केवल इसलिए गलत मान लेना कि परिवारों की आर्थिक या सामाजिक हैसियत अलग है—यह भी उचित नहीं।

बच्चे के जीवन का निर्णय लेने से पहले उसके मन को समझना, उसकी बात सुनना और उसके भविष्य के हर पहलू पर शांतिपूर्वक विचार करना बहुत आवश्यक है।

क्योंकि—

एक गलत निर्णय केवल एक रिश्ता नहीं तोड़ता,
कभी-कभी कई जिंदगियों की दिशा बदल देता है।

श्री की कहानी हमें यही सिखाती है कि रिश्ते केवल धन और प्रतिष्ठा से नहीं चलते।

रिश्तों की असली नींव होती है—

विश्वास, सम्मान, समझ और मन का जुड़ाव।

और शायद इसीलिए इन पंक्तियों का अर्थ श्री की पूरी जिंदगी पर उतर आता है—

«“तन से तन का मिलन हो भी जाए तो क्या है,
मन से मन का मिलन कोई कम तो नहीं…”»

कभी-कभी दो घरों के बीच की दूरी बहुत कम होती है,
लेकिन दो दिलों और दो परिवारों के बीच खड़ी सामाजिक दीवार बहुत ऊँची होती है।

और श्री की कहानी…

उन्हीं दो छतों के बीच जन्मे एक मासूम एहसास की कहानी है,
जो उम्र भर अधूरा रह गया।

31/07/2026

मेरी कहानियां और रचनाएं यथार्थ से प्रभावित रहती हैं,
नित्य मीडिया में आने वाली धार्मिक अंधत्वता एवम छोटे बच्चो के साथ होने वाले अमानवीय कृत्य झंझोर देते है .
ठीक उसी प्रकार की एक सत्य घटना मुझे मेरे बचपन की याद आती हैं और उसे ही मेने कागज क़लम की मदद से कहानी का रूप देने की कोशिश की है ,

बात उस समय की है जब में 7- 8 वर्ष की रही होऊंगी...............................

"धर्मान्धता"

कस्बे में महाराज श्री के आगमन की तथा उनके सम्मान की चर्चा जोरों पर थी, बार-बार टांगे से अनाउंस हो रहा था कि श्री 1008 राम जी महाराज सोमवार को सुबह 10:00 बजे पधार रहे हैं सभी श्रद्धालु जन सुबह 8:00 बजे तक महाराज श्री के स्वागत में लालघाटी तक पहुंचे उनके सम्मान में जगह -जगह वंदन द्वार बनाए गए थे ठहरने की उत्तम व्यवस्था वहां के स्थानीय लोगों ने ही वही की एक धर्मशाला में की थी ,
खाने तथा ठहरने की उत्तम व्यवस्था थी

पूरे कस्बे में चर्चा का एक ही विषय था कि महाराज जी कितने पहुंचे हुए हैं उनके प्रवचन कितने ज्ञानवर्धक हैं उनकी जिव्हा में सरस्वती बसती है,
महाराज श्री के साथ में उनके करीब 15 चेले भी होंगे वहां के मैदान में एक बड़ा सा स्टेज बना बनाया था जहां महाराज श्री के प्रवचन होने थे,
सब लोग बड़ी बेचैनी से प्रतीक्षा कर रहे थे ,
खैर वह घड़ी आ गई और नियत समय पर सभी भक्तगण बैंड बाजे सहित लाल घाटी पर पहुंचे महाराज श्री का आगमन हुआ, जयकारों के साथ पुष्प मालाओं से तथा गुलाल से महाराज श्री का सम्मान किया उनके साथ उनके 15 लोगों की मंडली भी थी सब गेरूए कपड़े पहने हुए थे

लाल कपड़े के थान आए हुए थे , 🕉️

महाराज श्री के पैर को जमीन पर नहीं रखने दिया ,
, दो-तीन आदमी आगे आगे पट्टी बिछा रहे थे
तथा पीछे से दो-तीन आदमी थान लपेटकर आगे भिजवा रहे थे ताकि आगे की बिछात चलती रहे, करीब 2 घंटे के जुलूस के बाद धर्मशाला पहुंचे एकादशी से पूर्णिमा तक 5 दिन का कार्यक्रम था,
रोज सुबह शाम प्रवचन भजन कीर्तन होते थे महाराज श्री किसी से भी बात नहीं करते थे बस उनके चेले कुछ बातें कुछ हिदायत देते थे महाराज श्री की स्टेज पर आने से पहले उनका एक चेला जो करीब 22 से 23 साल का रहा होगा बड़े अच्छे भजन गाकर लोगों को मंत्र मुग्ध कर देता था काफी धार्मिक किस्से कहानियां भी सुनता था बाद में महाराज श्री के प्रवचन होते थे बच्चे उस चेले से बहुत प्रभावित हुए थे विशेष कर छोटी-छोटी लड़कियां उन्होंने कोशिश कर थोड़ा समय मांग ही लिया उसे चेले ने बच्चों को अपने पास बुलाया लड़कियों ने भजन लिखवाने की बात कही उसने कॉपी पेन मंगवाया तथा बच्चों को भजन लिखवाने लगा......
बातों बातों में उसने अपना नाम रामदास बताया मैं यह सब देख रही थी उसके भजन मुझे भी मंत्र मुग्ध कर रहे थे ,
लड़कियों ने कुछ भजन लिखे और एक-एक करके सरकती गई मैं इन सब बातों से बेखबर थी उसे समय मेरी उम्र सिर्फ 9 साल थी तथा वहा कुछ 11 12 13 साल तक की लड़कियां भी थी

सभी ने कुछ कुछ भजन लिखे तथा तुरंत ही वहा से सरक ली .

मुझे भी भजन लिखने का इतना ज्यादा मन हुआ लेकिन कह नहीं पाई दूसरे दिन एक लड़की ने रामदास महाराज से कह ही दिया कि महाराज जी अब यह लड़की लिखेगी उसने मुझे अपने पास बुलाया मैं शर्माती हुई उनके पास गई उसने बड़े प्यार से अपने पास बिठाया पूछा कौन सी क्लास में पढ़ती हो...
मैंने उससे कहा पांचवी क्लास में पढ़ती हूं अच्छा राइटिंग कैसी है तुम्हारी
मैंने उससे बड़े उत्साह से कहा बहुत अच्छी है रोज मुझे स्कूल में गुड मिलता है😌
पास से दूसरी लड़की की अचानक से आवाज आई
"कभी-कभी वेरी गुड भी",😃😃
उसने कहा अच्छा और गाना आता है मैंने कहा हां थोड़ा बहुत... तो उसने कहा अच्छा तो गाकर सुनाओ, मैं शर्मा गई तो उसने कहा अच्छा क्या आता है -भजन
मैंने कहा नहीं,
15 अगस्त पर राष्ट्रीय गीत गाया था,
वही आता है ,
खैर हमारा कौन सा भजन पसंद आया ..तो मेने कहा जो शाम को आप गा रहे थे वो ही तो उसने कहा ठीक है लिखो …

अपने पास बिठाकर बड़े प्यार से पीठ सहलाई तथा लिखवाना शुरू किया मेने दो लाइन लिखी और वो बोल वाह भाई तुम्हारी राइटिंग तो काबिले तारीफ है,
अच्छा और क्या-क्या आता है तुमको और दिन भर क्या करती रहती हो
ओर मुझे पूछा अच्छा तुम अपने मुंह पर क्या लगाती हो!
पाउडर अफगान स्प्रे 🙂‍↔️....... अरे वाह 😍

लगातार पीठ पर हाथ फेरता रहा एक भजन पूरा लिखवा कर कई कहानी किस्से सुनाते रहा
जैसे राधा कृष्ण का प्रेम प्रसंग और हाथ लगातार कभी सर पर कभी पीठ पर चलता रहा कुछ मन में अटपटा तो लग ही रहा था की उसने हाथ से गाल पर नोच दिया और बोला ..तुम बहुत प्यारी हो साथ में पीठ पर जब चुटकी ली तो मैं 2 मिनट रुक कर कुछ याद आने का बहाना किया और बोली महाराज जी मेरे टीचर आने वाले हैं ट्यूशन पढ़ने जा रही हूं तो उसने कहा अच्छा फिर आना बहुत सारे भजन लिखवा देगे .
बीच बीच में बहुत सारी लड़कियों के नाम पते भी बता रहा था की यह सब मेरी सखियां है ।
घर जाने के बाद में काफी सोचती रही पड़ोस में रहने वाली मंगला शाम को आई और पूछा लिख आई भजन तो मैंने कहा एक ही लिखा तो वह बोली कल और लिख लेना मैंने उससे कहा मेरी कॉपी तू ही ले जाना और इसी में लिख लाना !!

उसने यह कह कर मना कर दिया कि मेरी मां ने कल जाने से मना किया है उसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया की आखिर माजरा क्या है 😇

उस लड़की ने बाद में मुझे बताया की एक-एक कर कर सभी लड़कियां क्यों जाना बंद हो गई थी…😡

दूसरे दिन सुबह श्री राम जी महाराज के प्रवचन सुनने गए तो लोगों ने बताया कि महाराज जी ने 6,7 चेलों की एक टोली को आगे भेज दिया है,

उसमें रामदास भी था........🥹🥹🥹🥹 ‎ ‎

29/07/2026

Qआज शाम मॉल में घूमते-घूमते अचानक एक माँ को अपनी बच्ची को "गुलाब" कहकर पुकारते सुना। वह शब्द कानों में पड़ते ही स्मृतियों के द्वार खुल गए और मुझे अपने बचपन की वह गुलाब याद आ गई, जो आज तक मेरे मन और स्मृतियों से कभी ओझल नहीं हुई।
उसी गुलाब की यादों को अपनी कलम के माध्यम से एक कहानी का रूप देने का प्रयास कर रही हूँ। आशा है कि मेरी यह कहानी आपको पसंद आएगी और आपके हृदय को भी उसी प्रकार स्पर्श करेगी, जैसे उसकी स्मृतियाँ आज भी मेरे मन को स्पर्श करती हैं।


*गिन्नियाँ*

“गुलाब... ए गुलाब...!”
आँगन में झाड़ू लगाती हुई गुलाब ने जैसे ही माँ की आवाज़ सुनी, वह दौड़ती हुई भीतर आ गई। उसके चेहरे पर वही चिर-परिचित मुस्कान थी। अभी एक साल पहले ही तो उसकी शादी हुई थी। सोलह सत्रह वर्ष की वह नन्ही-सी बच्ची, जो छठी कक्षा तक पढ़ पाई थी और फिर घर-गृहस्थी के कामों में लग गई थी।
गुलाब अपने माता-पिता की सबसे बड़ी संतान थी। उसके दो भाई और दो बहनें थीं। चुलबुली, हँसमुख और समझदार। उसकी हँसी से घर का हर कोना खिल उठता था। कुछ ही समय पहले उसका विवाह पास के कस्बे में रहने वाले केशव से हुआ था। दोनों परिवारों में आत्मीयता थी, इसलिए शादी के बाद भी उसका मायके आना-जाना लगा रहता था।
उस दिन माँ ने कहा, “आज थोड़ा समय है, चल पुरानी कपड़ों की पेटी जमा लेते हैं।”
गुलाब फौरन माँ के पास बैठ गई। माँ एक-एक साड़ी निकालतीं और गुलाब उन्हें तह करके देती जाती। तभी पेटी के कोने से एक छोटी-सी कपड़े की थैली निकली।
“माँ, इसमें क्या है?” गुलाब ने उत्सुकता से पूछा।
माँ मुस्कराईं, “इसमें गिन्नियाँ हैं।”
दोनों ने थैली खोली। चमचमाती सोने की गिन्नियाँ देखकर गुलाब की आँखें फैल गईं। माँ ने उन्हें गिना और फिर सावधानी से थैली में रखकर पेटी बंद कर दी।
बात आई-गई हो गई।
लगभग एक सप्ताह बाद ससुराल वाले गुलाब को लेने आए। माँ ने प्रेम से नई साड़ी, मिठाइयाँ और परिवार के सभी लोगों के लिए छोटे-छोटे उपहार दिए। ढेर सारे आशीर्वादों के साथ बेटी की विदाई हुई।
ससुराल पहुँचने पर हमेशा की तरह सास ने उसकी पेटी खुलवाई। मायके से क्या-क्या आया है, यह देखने की परंपरा थी।
गुलाब बड़े उत्साह से एक-एक सामान निकालकर बताने लगी।
“यह माँ ने मेरे लिए दी है... यह आपके लिए... यह देवर जी के लिए...”
तभी पेटी के एक कोने में रखी कागज़ की छोटी-सी पुड़िया दिखाई दी।
सास ने उसे खोलकर देखा।
अंदर चार सोने की गिन्नियाँ थीं।
वे चौंक गईं।
“ये कहाँ से आईं?”
गुलाब सहम गई.....
“मुझे नहीं मालूम,
सास ने बात वहीं छोड़ दी, पर उनके मन में प्रश्न रह गया।
कुछ दिनों बाद मंदिर में संयोग से दोनों माताएँ मिल गईं। पूजा के बाद वे कुछ देर बैठकर बातचीत करने लगीं।
बातों-बातों में गुलाब की सास ने कहा, “बाकी तो सब ठीक है, लेकिन आपने वे चार गिन्नियाँ बिना किसी वजह के क्यों भेजीं?”
यह सुनते ही गुलाब की माँ का चेहरा सफेद पड़ गया।
उन्होंने किसी तरह बात सँभाली और घर लौट आईं।
घर पहुँचते ही उन्होंने कपड़ों वाली पेटी खोली।
गिन्नियों की थैली निकाली।
गिनते ही उनके होश उड़ गए।
चार गिन्नियाँ सचमुच कम थीं।
उनके मन में शंका पैदा हो गई..
कुछ दिनों बाद जब गुलाब फिर मायके आई तो माँ ने उसे अकेले में बुलाया।
“सच-सच बता, गिन्नियाँ तूने ली थीं?”
गुलाब चुप कर गई
“नहीं माँ, मैंने कुछ नहीं लिया।”
लेकिन माँ का क्रोध बढ़ता गया।
“झूठ मत बोल! और कौन लेगा? मुझे तो शर्म आती है कि मेरी बेटी ऐसा काम कर सकती है।”मै होती तो डूब मारती ?
एक-एक शब्द तीर बनकर गुलाब के हृदय में उतरता गया।

जिस बेटी ने कभी घर की एक सुई तक बिना पूछे नहीं उठाई थी, उसी पर चोरी का आरोप लग गया था।
उस दिन के बाद गुलाब बदल गई।
उसकी चंचल हँसी कहीं खो गई।
वह चुप-चुप रहने लगी।
आँखों में हमेशा आँसू तैरते रहते।
उसका पति केशव इन सब बातों से बिल्कुल अनजान था। उसे मालूम ही नहीं था कि उसकी मासूम पत्नी किस पीड़ा से गुजर रही है।
चार-पाँच दिन बीत गए।
एक शाम गुलाब अपने छोटे भाई पारस को साथ लेकर घर से कुछ दूर बगीचे की ओर निकल गई। वहाँ एक पुराना कुआँ था। पेड़ों की छाँव थी और वातावरण में अजीब-सी उदासी घुली हुई थी।
काफी देर तक वह चुपचाप टहलती रही।
फिर उसने पारस से कहा, “जा, अपने जीजा जी को बुला ला। कह देना, दीदी याद कर रही हैं।”
पारस दौड़ पड़ा।
थोड़ी देर बाद केशव वहाँ पहुँच गया।
लगभग इक्कीस वर्ष का सुंदर, सरल और प्रेम करने वाला युवक।
पत्नी को देखकर मुस्कराया।
“आज अचानक यहाँ बुलाया है?”
गुलाब भी मुस्कराने की कोशिश करने लगी।
दोनों पेड़ के नीचे बैठ गए।
कुछ पुरानी बातें हुईं।
कुछ सपनों की बातें हुईं।
केशव अपने साथ रबड़ी लेकर आया था।
दोनों ने एक ही कटोरी से रबड़ी खाई।
जैसे जीवन के सारे मधुर क्षण उस आधे घंटे में सिमट आए हों।
फिर केशव ने पूछा, “घर कब आओगी?”
गुलाब ने दूर आसमान की ओर देखते हुए कहा,
“पता नहीं... शायद दो-चार दिन में।”
थोड़ी देर बाद केशव चला गया।
केशव के जाते ही गुलाब ने पारस को बुलाया।
वह दौड़ता हुआ आया।
गुलाब ने उसके सिर पर हाथ फेरा।
“एक काम करेगा?”
“हाँ दीदी।”
“घर जाकर कहना... बहन कुएँ में गिर गई।”
पारस घबरा गया।
“दीदी! ये कैसी बात कर रही हो?”
लेकिन गुलाब ने उसे डाँटकर घर की ओर भेज दिया।
पारस रोता हुआ भागा।
और इधर...
गुलाब ने एक पत्थर अपनी साड़ी के पल्लू में बाँधा।
उसकी आँखों में आँसू थे।
शायद उसे अपनी माँ याद आ रही थी।
शायद केशव का मुस्कुराता चेहरा।
शायद वह बचपन, जो अभी पूरा जिया भी नहीं गया था।
एक क्षण के लिए उसने आसमान की ओर देखा।
फिर कुएँ के गहरे अँधेरे में छलाँग लगा दी।
और एक मासूम जीवन की कहानी वहीं समाप्त हो गई।
उसके साथ डूब गया वो अनकहा आरोप, वह प्रेम और वह विश्वास, जो उसे सबसे अधिक प्रिय था
गुलाब लौटकर नहीं आ सकती थी।
केवल उसकी यादें रह गईं।
उसकी हँसी रह गई।
उसकी मासूम आँखें रह गईं।
और पीछे रह गया एक प्रश्न—
क्या एक आरोप किसी जीवन से अधिक बड़ा हो सकता है?
गुलाब चली गई, क्योंकि कभी-कभी
"रहे न रहें हम, महका करेंगे,
बन के कली, बन के सबा बाग़-ए-वफ़ा में...

जब जैसा मन ,उंगलियों की गति उसी तरह से कागज पर रंग बिखेरती है एक नई कहानी के रूप में Aug 1995 फिरोजाबाद रेल दुर्घटना पर ...
23/07/2026

जब जैसा मन ,उंगलियों की गति उसी तरह से कागज पर रंग बिखेरती है
एक नई कहानी के रूप में Aug 1995 फिरोजाबाद रेल दुर्घटना पर आधारित ..

जैसे जैसे अगस्त आता है मेरी आँखों के सामने पूरा वृत्तांत घूम जाता है बात 20 अगस्त 1995 की है

संजोग


रात करीब 4 बजे अचानक फोन की घंटी बजी गहरी नींद से चौक कर, मैंने फोन उठाया तो उधर से आवाज आई डॉ साहब हे क्या जरा बात कराइए ,फोन हॉस्पिटल से चीफ मेडिकल ऑफिसर का था,
इनको तुरंत बुलाया था|
फिरोजाबाद में भयंकर रेल दुर्घटना हुई थी कहां अपने आसपास के डॉक्टरों
को तुरंत लेकर पहुंचो
जल्दी से तैयार होकर ये अस्पताल पहुंचे
पूरी डॉक्टरों के टीम दुर्घटना स्थल पर पहुंची
आमने सामने की भिड़ंत में ट्रेन के आगे आगे की डिब्बों के परखच्चे उड़ गए थे
चारों तरफ हाहाकार चीत्कार
लाइट भी नहीं थी
काला अंधेरा
लोगों ने टॉर्च ,पेट्रोमेक्स आदि जलाकर थोड़ा प्रकाश किया
कुछ घायल, कुछ मृतक,
पुलिस दल पहुंच गया था
आसपास की गांव के लोग भी मदद के लिए प्रयासरत थे
चारों तरफ खून-खून , टूटे फूटे डिब्बों में फंसे लोग
खेर लाइट का प्रबंध हुआ
लोगों को डिब्बे से निकालने का काम शुरु हुआ कानूनी कार्रवाई के बाद लाशे पोस्टमार्टम के लिए भेजी जाने लगी घायलों को जिला अस्पताल तथा आगरा भेजा गए
मेरा भी बहुत मन हुआ कि एक बार घटनास्थल तथा हॉस्पिटल जाकर उन लोगों से मिलूं जो घायल है
जिस दिन दुर्घटना हुई उस दिन तो में नहीं जा पाई क्योंकि बाहर से इनके कई साथी डॉक्टर यहां अपनी सेवाएं देना आए हुए थे और उनके खाने पीने का प्रबंध हमारी यही हुआ था
दूसरे दिन में अपने आप को रोक नहीं पाई और अपने बेटे को लेकर घटनास्थल पर पहुंची वहां 10 15 लाशें सफेद कपड़े से ढकी हुई खुली जमीन पर रख हुई थी तथा और भी लाशें निकालने का क्रम जारी था
बड़ा ही हदय विदारक दृश्य था वहां से सीधे में हॉस्पिटल पहुंची वह जहां बरामदो में ठसाठस भरे लोग जमीन पर पड़े हुए थे चारों तरफ
हाहाकार रोने चीखने की आवाज किसी का हाथ टूटा तो किसी का पैर किसी के सिर पर चोट थी
तो किसी की आंख पर
कई लोगों से मिली कुछ लोग बहुत अच्छे परिवार के थे जो राहत सामग्री लेने में भी हिचकिचा रहे थे
लेकिन सब बेबस थे
बहुत से लोग ऐसे थे जो बिल्कुल अकेले थे
अधिकांश के घरवालों को खबर कर दी गई थी कुछ के आ गए थे
कुछ आने का इंतजार कर रहे थे
भारी मन से घर जाने को मुड़ी ही थी कि करीब 60 साल का बुजुर्ग सा आदमी जिसके दाहिने हाथ में प्लास्टर बंधा था
सर पर पट्टी बंधी थी
आंख पर भी सूजन आ रही थी किसी 35_ 40 वर्ष के स्मार्ट से आदमी के साथ जाते हुए दिखा
शायद ये लोग प्राथमिक उपचार के बाद जा रहे थे
जिज्ञासु प्रवति होने की वजह से पहले तो में ठिठककर देखती रही फिर मैं अपने आप को रोक ना पाई तो पास जाकर पूछ ही लिया
क्या आप भी ट्रेन में थे ,
ज्यादा चोट तो नहीं लगी
भगवान का शुक्र हे आदी आदि

उस बुजुर्ग आदमी ने बताया चोट तो काफी हे
लेकिन भगवान की दया से जान बच गई अब छुट्टी करवाकर जा रहा हूं

मेरा बेटा आ गया है यह भी डॉक्टर ही उत्सुकता वश मैंने पूछा बाबा कहां के रहने वाले हैं
मध्य प्रदेश के सुनकर थोड़ी जिज्ञासा और बढ़ी
किस जगह के?

उन्होंने बताया

खाचरोद जिला उज्जैन के

मेने पूछा
कहां जा रहे थे
तो उन्होंने बताया बिजनेस के सिलसिले में दिल्ली जा रहा था कि बीच में अचानक इतना बड़ा हादसा हो गया बात बात में मालवी भाषा का पुट
कुछ और जिज्ञासा बढ़ी

तो मेने कहा बाबा हम भी मध्य प्रदेश की रहने वाले हैं और आपके खाचरोद के पास की है

तो उन्होंने पूछा
कौन सी जगह
तो मेरे मुंह से उन्हेल का नाम सुनकर वह चौक उठा उसने गौर से मुझे देखा और बोला
कहीं तुम मुन्नी बिटिया तो नहीं मेने कहा हा मैं मुन्नी फिर मेने पूछा आप कोन,

तो उन्होंने कहा

मैं तुम्हारा रामसुख

नाम सुनते ही आसुओं का सैलाब उमर पड़ा मैंने उनसे घर चलने का बहुत आग्रह किया
लेकिन बाहर उनकी मारुति वैन खड़ी थी
उनका बेटा जो फिजिशियन था खबर मिलते ही लेने आ पहुंचा
अगली बार इधर आने पर घर अवश्य आने का वादा लेकर उनको विदा किया भारी मन से घर लौटी
तो मन में 40 साल पहले का बचपन लौट आया
तब में 6 वर्ष की थी कक्षा 2 में पढ़ती थी
पिताजी ने घर तथा क्लीनिक के सारे काम के लिए एक नौकर रखा था नाम था सुखराम
संपन्न परिवार का चार भाइयों में सबसे छोटा था वह 17 18 साल का स्वस्थ अनपढ़ देहाती

लेकिन सभ्य गोरा चिट्ठा युवक
सिर पर साफा धोती कुर्ता यही उसकी वेशभूषा ,कृषक परिवार का था लेकिन खेती का काम करना नहीं चाहता था मां बाप पहले ही चल बसे थे भाइयों के प्यार में पला या दिन भर इधर उधर घूमता रहता था
यह सोया रहता था कि किंचित मात्र भी खेती बाड़ी में सहयोग नहीं करता किसी ने सुझाया होगा कि महिदपुर वाले वैद्य जी को अपने क्लीनिक पर काम करने के लिए किसी लड़के की तलाश हे तो वह लेकर हमारे यहां आए थे
सारी स्थिति से अवगत कराकर हमारे यहां रख दिया आपके यहां रहा तो कुछ काम सीखेगा
अच्छा इंसान बनेगा
आप जैसा चाहें वैसा रखे

वैद्य जी का स्वभाव बेहद गर्म था, घरवालों से लेकर मरीजों तक सब उनके स्वभाव से परिचित थे
पिताजी ने सारी बातें साफ तय
की थी
क्लीनिक के अलावा घर का भी काम करना पड़ेगा जैसे झाड़ू लगाना, बिस्तर उठाना, पानी भरना ,मसाले कूटना बाजार से सब्जी लाना ,आटा पिसवाना मेहमानों के आने पर उन्हें बस स्टैंड से लेकर आना
जाते वक्त उनका सामान उठाकर उन्हें बस में बिठाना आदि
सब बातों को सर आंखों पर लेकर उसके भाई ने उसे हमारे यहां छोड़ दिया पिताजी ने सख्त हिदायत दी थी की सुबह 7:00 बजे आना और शाम को 7:00 बजे वापस अपने घर जाना
बीच में 1 घंटे के लिए खाना खाने जाता था

नाम क्या है रे तेरा राम सुख वह नीची नजर कर बोला
अरे हां राम सुख कल से यह फेंटा उतारकर
आना सफेद रंग का कुर्ता पजामा तथा बालों को तेल लगाकर ढंग से कंघी कर कर आना
हमारे घर में मुझसे बडी एक बहन तथा 3 छोटे भाई-बहन इस तरह हम लोग पांच भाई बहन थे क्रमश 10 ,6 4,2,1 वर्ष के थे
कठोर अनुशासन में पले हम सब भाई बहन सब संकोची तथा शर्मीले थे

उन दिनों मेरे आगे की दो तीन दांत टूटे हुए थे
अंदर दरवाजे की ओट से हम सब भाई बहन क्लिनिक में नए आंगतुंको को झांक कर देखते और जैसे ही वह हमारी और देखता हंसकर अंदर भाग जाते
दूसरे दिन से वह मन लगाकर काम करने लगा सुबह 7:00 बजे से ही आ जाता आकर हम सब भाई बहनों को जागता तथा यथावत घर का काम करता
3,4 बार बिस्तर से लुढ़का नहीं देता तब तक हम नहीं उठते
कभी-कभी बहुत परेशान हो जाता था तो कहता कि पिताजी से कहता हूं ऐसे नहीं मानोगे मैं गुस्से से उठती और कहती जाओ
कह दो पिताजी से,
दौड़कर मनाने लगता
धीरे-धीरे परिवार के सभी लोगों के साथ घुल मिल गया मुझे चिढ़ाता था पाठ याद कर नहीं ले गई इसलिए मास्टर जी के एक चाटे से दो दात उड़ गए
मैं कहती हट तो दूसरे ही क्षण कहता तो चूहा ले गया
निश्चिंत देखा नहीं घर में कितने बड़े बड़े चूहे हो रहे हैं पिताजी की आदतों से वो भी भली भांति परिचित हो गया था,
एक दिन मां ने मटर की कचोरी बनाई एक प्लेट में लगाकर मां ने कहां रामसुख को दे आ

संकोचवश वह मना करने लगा पिताजी देख रहे हैं इतनी जोर से लताड़ा _सुन रे
जो हम देंगे वह लेना पड़ेगा
अगर नखरे दिखाना हे तो जा अपने घर
उस दिन तो उसने खा लिया लेकिन दूसरे दिन से आना बंद कर दिया दो-तीन दिन तक नहीं आया

चौथे दिन उसका भाई लेकर आया माफी मांगकर वापस छोड़कर गया धीरे-धीरे रामसुख की समझ में सबकुछ आने लगा

बिल्कुल अनपढ़ था
दस्तखत की जगह अंगूठा लगाता था यह देखकर मुझे बड़ी दया आती थी हमे
पढ़ते देख उसका भी मन करता था उससे में पूछती रामसुख तुम पढ़े-लिखे नहीं तो कहता
नहीं बहन हमें कौन पढ़ाए,

मैंने कहा मैं तुम्हें तुम्हारा नाम लिखना सिखा दूंगी

पिताजी प्रति सोमवार को दवाखाना बंद रखते थे

तथा इंदौर दवाइयां लेने जाते थे

उस दिन को हम स्वर्ण दिवस के रूप में मनाते थी

क्योंकि पिताजी का खौफ नहीं रहता था
जी खोलकर हंसते मस्ती करते
उस दिन रामसुख को पढ़ने का मौका मिल जाता

मैंने देखा बड़ी लगन से वह पढ़ता
थोड़े दिन में नाम लिखना ,गिनती बोलना काफी कुछ सीख गया था

दिन पंख लगा कर उड़ते जा रहे
थे
तब रामसुख हमारे परिवार का अभिन्न हिस्सा बन गया
पता ही नहीं चला परिवार में सात सदस्य थे आठवां राम सुख
उसको गिनना कोई भी भाई बहन कभी नहीं भुला
उसके साथ सब्जी लेने जाना

बाग से ताजे ताजे फल बेर ,अमरुद सीताफल, जामुन, लेने जरुर जाती

मोर ,तोते, तितलियां ,चांद तारे, बादल भूत प्रेत, परी जाने किन-किन बारे में बताता
किस्से, कहानियां सुनाता
कभी कहता ये बादल है ना इंद्र देवता के यह पानी लेने जा रहे हैं

अभी थोड़ी देर में देखना बरसा देगे

मैं पूछती थी यह सब तुम्हें कैसे मालूम तो जोर से हंसकर करता हर बात में कहेगी तुम्हे कैसे मालूम _अरे हमें क्या नहीं मालूम ये पूछो ,

एक दिन तो हद ही हो गई मां ने कहा जा रामसुख से कह की सब्जी ले आए मैंने क्लीनिक में झांक कर देखा तो काफी भीड़ थी मरीजों से हाल भरा पड़ा था
रामसुख ने मुंह पर उंगली रखकर इशारे में मुझे मना कर दिया
मेने मां को बताया आज राम सुख नहीं जाएगा
मां ने कहा बेटे आज कोई भी सब्जी नहीं
शाम होने वाली जब तू ही ले, पैसे था झोला देकर मा ने मुझे ही भेज दिया में इतराती हुई, रामसुख के बिना क्या मैं सब्जी नहीं ला सकती
दौड़ती उछलती हुई जा रही थी

सब्जी मार्केट से कुछ पहले सड़क पर मुझे कुछ भीड़ दिखाई दी डम डम डम डमरु की आवाज

जिज्ञासा वश में भीड़ को चिढ़ती हुई थोड़ा आगे पहुंची देखा

एक आदमी डमरु बजा बजा कर जादू दिखा रहा था
मैं वही खड़ी रही
उसने अपने पुराने गंदे झोले में से एक खोपड़ी निकाल कुछ क्षण में उससे छू आकर मिट्टी से पैसा बनाने लगा

जिज्ञासा और बढ़ी , घर _सब्जी सबको भूलकर उसे ही देखने लगी थोड़ी देर बाद उसने अपनी लड़के की जीभ काट दी

यह देखकर मेरे पसीने छूट गए
कसम भी उसने ऐसी चढ़ाई की अगर बीच में कोई घर गया तो उसके मां बाप मर जाएंगे
ऐसी कसम पर जाने का तो सोच भी नहीं सकती थी थोड़ी देर में वह बोला की क्या आप चाहते हैं कि मेरे बच्चे की जीभ ठीक हो जाए

चारों तरफ घूम घूम कर पैसे मांगने लगा बच्चे की खातिर जिसके पर जो भी हो दे दो
भाई मैंने भी सब्जी वाले पैसे तत्काल उसकी झोली में डाल दिए उसका लड़का तुरंत उठकर खड़ा हो गया

खेल खत्म की घोषणा होने पर मैंने घर का रुख किया

घर से निकले को काफी देर हो गई थी अन्त मां ने राम सुख को देखने भेजा, वह मुझे रास्ते में ढूंढता हुआ मिला

उसने देखा झोली खाली

मैंने सारी बात सच सच उसको बताई तथा कसम दिलाई की घर जाकर वह किसी से पूछ नहीं कहेगा

उसने अपने पैसे से सब्जी ली तथा मा से बहाना बना दिया कि वह सहेली के घर चली गई थी
इस घटना के दो तीन दिन बाद तक मैं बहुत सुस्त रही तथा डर के मारे बुखार आ गया था

तब राम सुख में मां को सब बात विस्तार से बताई

क्लीनिक का काम उसमें बड़ी मेहनत लगन से संभाला था आसपास की ग्रामीण इलाको से मरीज ज्यादा आते थे अपनी मालवी भाषा में उन्हे बड़े ढंग समझाता था

वह जाति का धाकड़ था

लेकिन हम लोगों के बीच में रहकर काम करने का सलीका सीख गया था हल्की फुल्की हिंदी,गिनती जोड़ना, घटाना जल्दी से सीख गया था

कभी कभी पिताजी उसको इंदौर उज्जैन भेजने लगे

सब काम व्यवस्थित करके ही आता था
हमे शाम के समय तिवारी सर पढ़ाने आते थे
वह हमें हिंदी इंग्लिश अनुवाद करवाते,

देखो भूतकाल भविष्य काल वर्तमान काल
पहले इसका अंग्रेजी बनाओ
राम सुख उज्जेन जा रहा हैं ,
राम सुख उज्जेन गया,
रामसुख उज्जेन जाएगा,

वह घूमते फिरते सुनता और फिर पूछता कि सर मेरे नाम से क्यों पढ़ाते हैं तब हम उसको पूरी बात समझाते

रामसुख की शादी बचपन में ही हो गई थी
ऐसा वह मां को बताता था दिन बीतते गए

हमारे घर दादाजी के घर, नाना जी के घर पिताजी अक्सर उसको भेजते सबके पैर छूना,
हंसकर बोलना उसकी आदत में शामिल था
उसका हसमुख स्वभाव, साफ सुथरा व्यक्तित्व सबको भाता था

हमारे यहां रहने से उसकी पहचान उसकी लोकप्रियता बढ़ गई थी धीरे-धीरे इंजेक्शन लगाना ,पुड़िया बनाना,
दवाइयां बनाने में मदद करना, काफी कुछ सीख गया था

जब दवाइयां बनती थी तो करीब 50 मजदूर ग्वारपाठा छिलने, मुनक्का जड़ी बूटियां आदि कूटने का काम करते थे,

रामसुख जैसे उन सभी का हेड रहता था
बड़ी सफाई से और समझदारी से काम करवाता था

पिताजी के डांट को भी वह अब बड़ी सहजता से लेता था, हर काम अपनेपन से तथा सूझ-बूझ से करता था

मैंने देखा कि कुछ करने की उमंग और क्षमता उसमें हमेशा बनी रहती थी पिताजी से काफी प्रभावित था काफी कुछ सुना था उसने पिताजी के बारे में किसी की इस स्तिथि तक पहुंचने में उन्हे क्या-क्या पापड़ बेलने पड़े

उनकी तरह बनने की सोचता

खुद नही पढ़ा लिखा था
लेकिन हम सबको पढ़ता देख
हमेशा अपने बच्चों को पढ़ाने की सोचता,
कभी-कभी कहता कि आने वाले कल की बहुत चिंता होती है

अपने गली मोहल्लों की इंजेक्शन वगेरह लगाकर, थोड़ी आमदनी उधर से भी कर लेता था

देखते देखते मैं सातवीं में आ गई दीदी की शादी हो गई मेरा कुकिंग का प्रैक्टिकल था आज मा ने स्कूल में सब सामान रामसुख के साथ भिजवाया बोला ढंग से करके आना

उस दिन भाभी जी ( मां को भाभी जी कहता था )ने रोटी बनवाई थी तो भारत का नक्शा बना दिया था में ही कुत्ते को देने गया था

वहां ऐसा किया तो सारे नंबर कट जाएंगे में चिढ़ती तो उसको बड़ा मजा आता

हल्की फुल्की चोट आदि लगने पर तो राम सुख से ही पट्टी बंधवा लेते थे क्योंकि पिताजी इस बात पर भी नाराज होते थी कि चोट क्यों और कैसे लगी,

कभी कहता आज छत पर चढ़कर कोन बैर तोड रहा था

कहूं पिताजी से

मैं गुस्सा होकर कहती

हां जा कह दो तो

फिर चुपचाप मना लेता

" मेरी अच्छी बहन"

ने गुस्सा नहीं होते मे तो बस मजाक कर रहा था,

आठवी पास होने पर पिताजी ने हमको उज्जैन पढ़ने के लिए भेज दिया

उसके बाद करीब 1 साल और रामसुख और रहा

क्लीनिक से जाने के बाद वह एक व्यापारी के यहां थोड़ा बही खाता सिखने जाता था
बाद में उसने बिना किसी शिकायत के काम छोड़ने की प्रार्थना की

पिताजी से छुट्टी लेकर वह अपने मामा के पास खाचरोद गया

वही पर उसमें छोटी सी दुकान खोली जिसमें किराना के सामान के अलावा मेडिकल से संबंधित कुछ दवाइयां जिनको वह भलीभांति जानता था रखने लगा
छोटे-छोटे नुस्खे जो सीख कर आया था छोटे रूप में घर पर बनाने लगा धीरे-धीरे उसकी लोकप्रियता वहां बढ़ गई , काम अच्छा चल निकला

बच्चों को पढ़ाने में उसकी शुरू से रुचि थी

राम सुख के दो बच्चे थे

दो लड़के तथा दो लड़कियां

लड़कियों की हायर सेकंडरी के बाद अच्छी जगह शादियां कर दी
तथा लड़कों को आगे पढ़ाने की लगन जारी रखी
बारहवी के बाद प्रतियोगी परीक्षाओं में बिठाया

बड़ा लड़का पढ़ने में बहुत होशियार था पहली बार में ही पी एम टी में सिलेक्ट तो गया इंदौर के एम जी एम मेडिकल कॉलेज से एम बी बी एस था फिर एम डी करके मध्य प्रदेश के ही झाबुआ जिले में मेडिकल ऑफिसर हो गया, इसी तरह छोटा लड़का भी पढ़ लिखकर पुलिस विभाग में उच्च पद पद पर गया

संयोग से रेल दुर्घटना की वजह से उनका यू मिलना तथा सकुशल मिलना,

पूरी कहानी उनकी जुबानी सुनकर खुशी मिश्रित सुकून मिला

बार-बार उसके मुख से यह सुनकर बिटिया आज हम जो भी हे आपकी प्रेरणा से ही हे

शायद उन दिनों आपके घर में ना रहते तो इस स्थिति में नहीं होते

उसने अपने बेटे से मिलवाया यह आलोक मेरा बेटा है और बेटे यह दीदी!
एक दम आसू उमड़ पड़े
दोनों हाथ जोड़कर बड़ी कृतज्ञता व्यक्त की तथा
विदा ली

"प्रकृति कहां-कहां कैसे मोड़ लाती है यह आज पता चला"😔



लेखिका

विष्णुकांता चौधरी - मधुरम

Address

D-24, Ganesh Nagar, Firozabad(U. P)
Firozabad
283203

Telephone

+919634000209

Website

Alerts

Be the first to know and let us send you an email when Vishnu kanta chaudhary-madhuram posts news and promotions. Your email address will not be used for any other purpose, and you can unsubscribe at any time.

Contact The Establishment

Send a message to Vishnu kanta chaudhary-madhuram:

Shortcuts

Share

Category