Gautam Art Institute of Fine Art

Gautam Art Institute of Fine Art ◆ Diploma Course from recognized university
◆ IKSUV Khairagarh University (C.G.)
◆ Special Tra

02/12/2025

Shiv Hari Narayan

*GAUTAM ART INSTITUTE OF FINE ART*Affiliated to      *CHHAYA SCHOOL OF    ARTS(CHANDIGARH)*   Drawing & Painting Practic...
19/11/2024

*GAUTAM ART INSTITUTE OF FINE ART*
Affiliated to
*CHHAYA SCHOOL OF ARTS(CHANDIGARH)*

Drawing & Painting Practical Examination 2024 .

Dipolma Exam year :- PP1 to 7th Year
Exam centre :- *Address - Shree Swaminarayan Gurukul school behind Surya mall , Surya vihar colony bhilai (C.G.)*

Shree Ganesh chaturthi clay model work in my students 09092024
12/09/2024

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2024 bappa morya
09/09/2024

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Happy Ganesh chaturthi to all my friends and family ❤️ 2024
09/09/2024

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*Happy Krishna Janmashtami 🦚❤️ Radhe Radhe🌷*26082024 water colour painting 🎨
26/08/2024

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Ordar work15012024
29/02/2024

Ordar work
15012024

सती अनुसुईया 36 “ x 48 “ , कैनवास पर तैल रंग ।संग्रह - महाराजा विक्रमादित्य शोध पीठ उज्जैन, मध्यप्रदेश , भारत ।भारतवर्ष ...
27/07/2023

सती अनुसुईया
36 “ x 48 “ , कैनवास पर तैल रंग ।
संग्रह - महाराजा विक्रमादित्य शोध पीठ उज्जैन, मध्यप्रदेश , भारत ।

भारतवर्ष की महान महिलाओं में से एक माता अनुसुइया को पांच पतिव्रता पत्नियों में स्थान मिला हुआ है। द्रौपदी, सुलक्षणा, सावित्री और मंदोदरी को भी पतिव्रता पत्नि माना जाता है ।



ब्रह्मा जी के मानसपुत्र महर्षि अत्रि इनके पिता तथा कर्दम ऋषि की कन्या और सांख्यशास्त्र के प्रवक्ता कपिलदेव की बहन सती अनुसूया इनकी माता थीं। महर्षि अत्रि सतयुग के ब्रह्मा के 10 पुत्रों में से थे तथा उनका आखिरी अस्तित्व चित्रकूट में सीता-अनुसूया संवाद के समय तक अस्तित्व में था। उन्हें सप्तऋषियों में से एक माना जाता है और ऋषि अत्रि पर अश्विनीकुमारों की भी कृपा थी। अत्रि ऋषि की पत्नी और ब्रह्मवादिनी (संन्यासीन) सती अनसूया के पति भक्ति की प्रसिद्धी को सब जानते हैं। सती अनसूया का नाम स्वर्ण अक्षरों में लिखा है। रामायण, महाभारत और पुराणों में उनका उल्लेख मिलता है। भारतवर्ष की महान महिलाओं में से एक माता अनुसुइया को पांच पतिव्रता पत्नियों में स्थान मिला हुआ है। द्रौपदी, सुलक्षणा, सावित्री और मंदोदरी को भी पतिव्रता पत्नि माना जाता

एक बार नारद जी घूमते-घूमते देवलोक पहुंचे और तीनों देवियों ( सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती ) के पास बारी-बारी जाकर कहा- अत्रिपत्नी अनसूया के समक्ष आपको सतीत्व नगण्य है। तीनों देवियों ने अपने स्वामियों- विष्णु, महेश और ब्रह्मा से देवर्षि नारद की यह बात बताई और उनसे अनसूया के पातिव्रत्य की परीक्षा करने को कहा।

देवताओं ने बहुत समझाया परंतु उन देवियों के हठ के सामने उनकी एक न चली। अंततः साधुवेश बनाकर वे तीनों देव अत्रिमुनि के आश्रम में पहुंचे। महर्षि अत्रि उस समय आश्रम में नहीं थे। अतिथियों को आया देख देवी अनसूया ने उन्हें प्रणाम कर अर्घ्य, कंदमूलादि अर्पित किए किंतु वे बोले- हम लोग तब तक आतिथ्य स्वीकार नहीं करेंगे, जब तक आप हमें अपने गोद में बिठाकर भोजन नहीं कराती।

यह बात सुनकर प्रथम तो देवी अनसूया अवाक्‌ रह गईं किंतु आतिथ्य धर्म की महिमा का लोप न जाए, इस दृष्टि से उन्होंने नारायण का ध्यान किया। अपने पतिदेव का स्मरण किया और इसे भगवान की लीला समझकर वे बोलीं- यदि मेरा पातिव्रत्य धर्म सत्य है तो यह तीनों साधु छह-छह मास के शिशु हो जाएं। इतना कहना ही था कि तीनों देव छह मास के शिशु हो रुदन करने लगे।

तब माता ने उन्हें गोद में लेकर दुग्ध पान कराया फिर पालने में झुलाने लगीं। ऐसे ही कुछ समय व्यतीत हो गया। इधर देवलोक में जब तीनों देव वापस न आए तो तीनों देवियां अत्यंत व्याकुल हो गईं। फलतः नारद आए और उन्होंने संपूर्ण हाल कह सुनाया। तीनों देवियां अनसूया के पास आईं और उन्होंने उनसे क्षमा मांगी।

देवी अनसूया ने अपने पातिव्रत्य से तीनों देवों को पूर्वरूप में कर दिया। इस प्रकार प्रसन्न होकर तीनों देवों ने अनसूया से वर मांगने को कहा तो देवी बोलीं- आप तीनों देव मुझे पुत्र रूप में प्राप्त हों। तथास्तु- कहकर तीनों देव और देवियां अपने-अपने लोक को चले गए। कालांतर में यही तीनों देव अनसूया के गर्भ से प्रकट हुए।

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