अश्वमेघ

अश्वमेघ साहित्य का संसार

11/01/2026

रेडियो 9 प्रतापगढ़ को सादर आभार सहित

मैं मरघट का टूटा बाँस देखे मैने आम और ख़ास सबको जलते देखा हैं एक पथ पर चलते देखा हैं।धनकुबेर हो कोई अथवा कोई भिक्षुक राह...
09/01/2026

मैं मरघट का टूटा बाँस
देखे मैने आम और ख़ास
सबको जलते देखा हैं
एक पथ पर चलते देखा हैं।

धनकुबेर हो कोई अथवा
कोई भिक्षुक राहों का
सभी चार काँधे पर आए
ये धोखा नहीं निगाहों का।
यह सत्य है शाश्वत पुरातन
पाषाण पिघलते देखा है।

मैने सच में सबको सबसा
जाना माना और पहचाना हैं।
सबकी हस्ती धुंआ हो गई
हाँ ये दस्तूर पुराना हैं।
संदेह नहीं यह देह वही
इसी को गलते देखा हैं।

राजा आए महाराजा आए
स्वर्ण रथों में चलने वाले
हीरे मोती माणिक मूंगे
जड़े हुवे पलने वाले।
उनकी भी हस्ती को
ऐसे ही बदलते देखा हैं।

अभी भी यदि अभिमान शेष
मानो स्वयं को यदि विशेष
भ्रम से बाहर आ जाओ
ऐसे तुम ना बौराओ।
अटल समझते थे उनको
मैने टलते देखा हैं।

उस बगल में चांद होगाजिसमें थी पहले रोटियां लोग लड़ बैठेंगे फेंकोबीच में तुम बोटियां।हम चांद के माथे पे जाके देख लेना एक ...
07/01/2026

उस बगल में चांद होगा
जिसमें थी पहले रोटियां
लोग लड़ बैठेंगे फेंको
बीच में तुम बोटियां।
हम चांद के माथे पे जाके
देख लेना एक दिन
उसपे कूढ़े की बना देंगे
ऊंची बड़ी सी चोटियां।
खाके खैनी छोड़ेंगे फिर
हम वहां पिचकारियां
पाउच ओ पॉलिथिन
थोड़ी प्लास्टिक की बोतलें
एक दिन हम कर ही देंगे
चांद ओ मंगल खोखले।
तब चांद आके हमसे एकदिन
बोलेगा मिमिया के फिर
मुझको अपने हाल पर क्यों
छोड़ देते तुम नहीं….
तब कहेंगे हंसके हम बेटा
बता कैसी रही…
खूब खाए भाव ईद और चौथ
पर मत भूल तू
फिर कभी करना नहीं हरकत
ये उलजलूल तू…।
जब चांद माफ़ी मांग ले
आ जायेंगें ज़मीन पर।
अब आप ही कुछ कह भी दें
इस हरकते नाचीज पर…

तुम पौष की सुबह की गुनगुनी सी धूप हो ।अम्बर से अवतरित अलौकिक अप्सरा अनूप हो ।शशांक सी शीतलता तुममे ,सागर सी गम्भीर होप्र...
07/01/2026

तुम पौष की सुबह की गुनगुनी सी धूप हो ।
अम्बर से अवतरित अलौकिक अप्सरा अनूप हो ।

शशांक सी शीतलता तुममे ,सागर सी गम्भीर हो
प्रतिकृति हो प्रकृति की, निसर्ग का तुम रूप हो ।

मादक चितवन,मोहक स्मित,सौंदर्य का प्रतिमान भी
तुम्हीं तो सौरभ उपवन की तुम मदिरा का कूप हो।

हो पुष्प का पराग तुम, हर रागिनी का राग भी
हृदय यंत्र का तुम स्पंदन तुम प्रेम का प्रतिरूप हो।

प्रसाद की कामायनी मधुशाला हो हरिवंश की
मेरे काव्य की प्रेरणा हर पंक्ति का प्रारूप हो।

उम्मीद लिए खुशहालबदल गया फिर साल बहाना किसी के शौक काकोई हाल बेहाल ।मस्ती का माहौल वहाँ परजहाँ जेब मे माल ।कहीं अगर हैं ...
01/01/2026

उम्मीद लिए खुशहाल
बदल गया फिर साल
बहाना किसी के शौक का
कोई हाल बेहाल ।
मस्ती का माहौल वहाँ पर
जहाँ जेब मे माल ।
कहीं अगर हैं मुफ़लिसी
जाँ पर उसके जंजाल ।
मना रहा कोई मस्त होकर
पीकर हुआ कोई टुन्न।
कहीं ठंड में बिना ओढ़े
पड़ा हुवा कोई सुन्न ।
कितने अजब निराले कितने
दाता तेरी दुनिया के रूप ।
कहीं किसी के सर पर साया
किसी के भाग में धूप ।
मिलकर साल नया मनाओ
बेबस को कुछ आस बंधाओ
अपने पास बहुत सारा है
तो घना कहीं पर अंधियारा है ।
उनकी हमसे उम्मीद लगी है
दो साथ उनका आस जगी है ।
सफल तभी नववर्ष तुम्हारा
उद्देश्य बने उत्कर्ष तुम्हारा ।

….. अंग्रेजी नववर्ष 2026 शुभ हो ।

28/12/2025
इतने उतने ही नहीं मसले मज़ीद थे उनके लिये सब खामख्वाह, सब उनके मुरीद थे वक़्त हमारी ख़ातिर ज़ाया भी वो क्यों करतेहम मामूली ज़...
26/12/2025

इतने उतने ही नहीं मसले मज़ीद थे
उनके लिये सब खामख्वाह, सब उनके मुरीद थे

वक़्त हमारी ख़ातिर ज़ाया भी वो क्यों करते
हम मामूली ज़र्रे ही थे और वो फ़रीद थे

भटके नहीं हम राह वो हमराह जब तक थे
नेकी बदी की हर डगर पर वो रशीद थे…

माकूल हो हालात या के दौर ए गर्दिश हो
नुस्खे मगर मुस्कान के सब पर मुफ़ीद थे…

अफ़सोस ये अब हैँ तब बेख़बर हम थे
समझा नहीं जाना नहीं कितने वहीद थे…

मुरीद= प्रशंसक
फ़रीद=चमकता सितारा
रशीद =मार्गदर्शक
मुफीद=प्रभावी
वहीद=बेजोड़

अकड़ कब तकगुरुर कब तकमद कब तकसुरूर कब तकजो आज हैं वो कल नहींलौट कर आते पल नहीं।।ख्वाहिश कब तकउम्मीद कब तकप्यास कब तकज़रू...
26/12/2025

अकड़ कब तक
गुरुर कब तक
मद कब तक
सुरूर कब तक
जो आज हैं वो कल नहीं
लौट कर आते पल नहीं।।

ख्वाहिश कब तक
उम्मीद कब तक
प्यास कब तक
ज़रूरत कब तक
हर सवाल वक्त सुलझाएगा
हां, वो ख़ुद न लौट पायेगा।।

साथ कब तक
बात कब तक
जज़्बात कब तक
हालात कब तक
तुम्हें पता हैं न मुझे ख़बर हैं
पूछ लो, क्या वक्त बताएगा ?

दौलत कहां तक
शोहरत कहां तक
रुतबा कहां तक
लवाजमा कहां तक
है कुछ जो साथ जायेगा
या फिर सब धरा रह जायेगा?

अपने कौन हैं
सपने मौन हैं
उम्मीदें फ़ीकी है
आसार गौण हैं
मन कितना सोचता जायेगा
कोई समझा जो मुझे समझाएगा?

मैं अक्सर इश्क़ की तहरीर को हर बार पढ़ता हुँवो जब जब याद आती है यूँही हरबार पढ़ता हुँ ।वो कसमें और वो वादे जो उल्फ़त में किय...
25/12/2025

मैं अक्सर इश्क़ की तहरीर को हर बार पढ़ता हुँ
वो जब जब याद आती है यूँही हरबार पढ़ता हुँ ।
वो कसमें और वो वादे जो उल्फ़त में किये तूने
वफ़ाओं की उन्हीं बातों को मैं बेज़ार पड़ता हुँ ।
तेरे ख़्वाबों ख़यालों से मुझे फुरसत नही मिलती
मैं गीतों में ओ गज़लों में वही अशआर पढ़ता हुँ
मुझे इतना पता है बस मेरा मज़हब मोहब्बत हैं
तेरी राहों के काँटों को भी मैं गुलज़ार पढ़ता हूँ ।
तेरी नाकाम चाहत को लगा बैठा मैं सीने से
ख़ुद अपनी ज़िल्लतों को मैं सरे बाज़ार पढ़ता हूँ ।

21/12/2025

आप सभी की शुभकामनाओं से आज redio9 पर रचना पाठ का सुअवसर प्राप्त हुआ... धन्यवाद रेडियो 9 टीम का जिन्होंने मेरी रचनाओं को एक सुदृढ़ मंच प्रदान किया...

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