शोक ए रूहानी इक गैबी उल्फत

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20/03/2026

मुझे उसने ना छुआ वो छुअन उसके पास ही है,,
दिल में उतर जाए वो बाकपन उसके पास ही है,,

वक्त की छाया भी जिस पे ना पड़ीं जरी,,,
वो चेहरा वो जमाल वो जोबन उसके पास ही है,,

मरहम की तरह है उसका खोपा हुआ खंजर,,
मुझे जो चाहिए वो चुभन उसके पास ही है,,

सुन लेता हूं मैं मिलो की मुसाफत से वो आवाज,,
मेरी रूह को भा जाए वो धड़कन उसके पास ही है,,

तमाम आलम के नजारों से अज़ीज़ है वो चीज,,
हर वक्त सताए जो वो मसकन उसके पास ही है,,

ना चाहिए मुझे दर-दर फिर के कुछ और अब,,
मेरा कीमती गहना तो असलन उसके पास ही है,,

20/03/2026

अख्तियार तेरा मेरे वजूद पे मेरा तेरे वजूद पे,
फिर भी आज तक छुआ ना एक दूजे को हमने,,
है बरसों का अफसाना किसी छूटे हुए माजी में,,
मगर अब तक कुछ कहा ना एक दूजे को हमने,,

है इलाज मेरे मर्ज का तू ओर तेरे मर्ज का मैं,,
दी थोड़ी सी भी दवा ना एक दूजे को हमने,,
इबादत एक दूजे की करते हैं छुप छुप के,,
कहा अब तक खुदा ना एक दूजे को हमने,,

22/01/2026

जमीन पे देखे क्या फलक की पेशी है।।
ना आए नजर उस आलम ए ब्रजख की पेशी है।।

आमद मौत की दरियाफ्त क्या करे।।
मंजुरी हो ना हो एक छलक की पेशी है।।

झेल चुका एक एक बसर अफसाना।।
देख दरवाजे पे किस दस्तक की पेशी है।।

इल्जाम मुहतसिब पे महशर में लगाए।।
अच्छा या बुरा अमल के सबक की पेशी है।।

अच्छा है बच निकला नियत ए बदनुमा से।।
आए कब्र पर तो खुली महक की पेशी है।।

जुबा बंद तल्खियां बंद किस पेशापेशी।।।
आगे नबी है उठती बंद होती पलक की पेशी है।।

16/01/2026

चोट दुश्मन को क्या पहुंचाएं भूल जाना उन्हें मेरा इंतकाम है।।
गुमनामी ही मेरा सुकून तक गुमनामी ही मेरा इकराम है।।

16/01/2026

जमाना इकराम अपने पास रखें।।
जमाने का मुख्तार मेरी झोली में।।

अकीदा मुख्तलिफ रख इखलास रखे।।
जमाने का परवरदिगार मेरी झोली में।।

है दुनिया ही तलब जिसका इजलास रखें।।
आखिरत की दरकार मेरी झोली में।

शोहरत को कितना भी खास रखें।।
इश्क इलाही का कारोबार मेरी झोली मे।।

मूरत परस्त कितने पत्थर तराश रखे।।
खुदा का गैबी रुखसार मेरी झोली मे।।

14/01/2026

दौलत जर से राजी कोई बंदा परवर से राजी।।
क्या लगाव दुनियां का, होना है हशर से राजी।।

प्यास बढ़ी तो ना दरिया ना समंदर से राजी।।
अली असगर यूंही चला होके मुकद्दर से राजी।।

ख्वाब है सुनहरा मंजिल से पहले का कियाम।।
हामिल ख्वाबों का फिर भी बिस्तर से राजी।।

घिर गई बातील से सच्चाई आज की सारी।।
नई नजर से राजी कोई नई खबर से राजी।।

चला सियासी दौड़ हर नजर में इक फितूर।।
कोई जमीन से राजी कोई अम्बर से राजी।।

05/01/2026

हिक्मत तेरे वहम पर रखी हुकूमत।।
रुखसत तेरे खैर मकदम पर रखी हुकूमत।।

सफर तेरा पर मंजिल तेरी नहीं।।
तेरे हर कियाम हर कदम पर रखी हुकूमत।।

ताबीर ए गैर से बेदार ख्वाब तेरा।।
तेरी जुस्तजू के अलम पर रखी हुकूमत।।

पहलू में हकीकत के ले लें कैसे आराम।
बातिल ने हर रस्म पे रखी हुकूमत।

इश्तिहार अखबारों में सच आखिर कैसा ।
रिश्वत ने जब कलम पर रखी हुकूमत।।

सुकून दिल का हर साज से गाफिल।।
शोरोगुल ने बज्म पर रखी हुकूमत।।

मिल जाए कहने को बिन मोल भाव सब।।
इक़्तेदार ने किस रकम पर रखी हुकूमत।।

28/12/2025

झूठ को मकर को मुहाफिज रखा।।
तबाही की नजर को मुहाफिज रखा।।

रहनुमाई उनकी किस के बस में ।।
गुमराही के सफर को मुहाफिज रखा।

तरजीह हकीक़त पे वहम को दे।।
दिखावे के मंजर को मुहाफिज रखा।।

बांटता रहा ख्वाब झूठ का।।
बड़ा ना मुख्तसर को मुहाफिज रखा।।

बस्ती गरीबों की तबाह कर।
हैवानों के शहर को मुहाफिज रखा।।

बनाकर बदनसीब सारे मुल्क को।।
बैठे तख्त के सदर को मुहाफिज रखा।।

मकर मकीर का खुद का हुआ ना ।।।
किस-किस के मुकद्दर को मुहाफिज रखा।।

21/12/2025

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