25/09/2025
बूदे एहसास की
स्वरचित — पुष्पेंद्र गौर
मैं गुजरता हूँ कभी तेरे ख्यालों के समुद्र में,
जब कभी तेरी मोहब्बत की दुनिया में उतरता हूँ।
महसूस होता है यूँ, कि हम तो अपनी दुनिया कब की खो चुके हैं,
फिर भी न जाने क्यों,
एक अजीब सी खालिस,
एक अजीब सी कशिश भरी दुनिया में
हम हर रोज़ तुमसे रूबरू हुआ करते हैं।
लगता है यूँ, मेरी दुनिया में अब एक खालीपन पर जाकर ठहर गई है,
मेरी रंगीन दुनिया एक खालीपन से भर गई है।
यह दुनिया वह दुनिया हो गई है, जिसमें तेरी कमी खला करती है।
याद करते हैं तुझे,
तो मेरी आँखों की किनारी गीली हो जाती है,
रात के तकिए पर आंसुओं की झड़ी लग जाती है।
आंख मेरी सोती नहीं,
रात भर बस याद तुझे किया करती है।
मेरी आँखों में तेरी जुदाई की नमी रहती है।
होता है छलनी मेरा दिल इस कदर,
जिनकी दवा भी नहीं मिल पाती।
मेरे इन जख्मों का इलाज भी तुम ही तो हो।
तुम होती थी जो साथ,
तो यह दुनिया बेहतर प्रतीत होती थी।
तेरा साथ पाकर यह दुनिया हरी-भरी दिखती थी।
तेरी जुदाई के बाद,
कैसे बताऊँ कि कैसे जिए करते हैं?
लगता है, कंधों पर अपनी ही लाश लिए फिरा करते हैं,
जैसे किसी गुनाह का कर्जदार हुआ करते हों।
तेरी तन्हाइयों का आलम कुछ इस कदर बढ़ा करता है,
जैसे मेरा दिल एक घुटन भरे अंधेरे में कैद हो गया हो।
साँसों की उखड़न, साँसों की तड़पन अब महसूस होने लगी है।
तेरी चाहत अब मेरी जिंदगी पर भारी पड़ने लगी है।
यह बहम हुआ करती है, रात-दिन,
जैसे मैं एक लाइलाज बीमारी से भर रहा हूँ।
ना दवा काम करती है, ना दुआ साथ देती है,
मैं बस तिल-तिल इस बीमारी में घुलता जा रहा हूँ।
अब तो यकीन हो चला है,
कि तेरे सिवा इसका हल कोई और नहीं।
मेरी बिखरती, टूटती जिंदगी की बागडोर अब तेरे सिवा किसी और पर नहीं।
यह तन्हाइयाँ अब और भी भयावह हो चली हैं।
साँसों की गिनती अब कम होने लगी है,
लगता है मेरी जान बस अब जाने लगी है।
होता है यह एहसास भी,
कि इसे अब भी, न जाने क्यों,
तेरी आने की उम्मीद लिए मेरी जान अब तक मेरी जान में अटकी पड़ी है।
उखड़ती साँसे अब भी मेरी निकल नहीं रही हैं,
अटकी हैं कहीं सीने में शायद,
तेरे मिलने की आस इन में अभी तक बनी हुई है।
एक ख्याल अक्सर मुझे ताउम्र परेशान करता रहा—
काश कभी तू भी मेरे वजूद में आ सकती,
तो देख सकती कि क्या होती है तेरी कमी मेरी जिंदगी में।
क्या तु कभी महसूस कर सकती,
मेरी नजरों से पढ़ कर देख सकती,
मेरे हृदय की वेदना तु भी महसूस कर सकती।
असहाय, अविरल, विस्मित सा, तेरी तलाश में भटका करता हूँ।
अब ऊब चुका हूँ मैं इस दुनिया से।
अपनी टूटी-घुटी दुनिया में,
तेरे मिलने की उम्मीद की मशाल लिए अब तक खड़ा हूँ।
जिए जा रहा हूँ इस दुनिया में,
जहाँ तेरी रुसवाई की कोफ्त में मैं धीरे-धीरे जर्जर हो रहा हूँ।
कैसे बताऊँ, कैसे?
मैं उस मशाल को हर दिन, हर पल प्रज्वलित कर रहा हूँ।
हर अरमान, हर सपना जो देखा था तेरे साथ,
हर घड़ी, हर पल, उसकी आहुति अब मैं इसमें सहा कर रहा हूँ।
जी, मैं आता है कि बुझा दूँ वो दिया,
वह जो तेरी चाहत से कभी रोशन हुआ करता था।
पर मजबूर हूँ, ये भी तो नहीं हो पाता—
कमबख्त इतना साहस भी तो नहीं कर पा रहा हूँ।
कैसे कहूँ, कैसे बताऊँ,
कितनी न खुशी, कितनी बेबसी से कदम बढ़ा रहा हूँ।
तो कभी अपने इस हाल पर ज़ार-ज़ार रुदन कर रहा हूँ।
शायद मेरी साँसों में ठहराव होने लगा है,
मेरे बहते रक्त में भी थक्कों का जमाव होने लगा है।
शायद मेरी आँखों की सफेदी लाल होने लगी है,
शायद मेरी साँसें भी मेरा साथ छोड़ने लगी हैं।
खोल रखी हैं आँखें मैंने अब तक भी,
शायद तेरे आने का भ्रम अभी तक बाकी है।
एक अधूरे ख्वाब के अधूरेपन की आस अभी बाकी है।
लो, शायद मेरे बदन में अब स्थिरता आने लगी है।
लगता है, मेरे कंठ में तुम्हारी यादों का कोई कंकर फँस गया है।
होने लग रहा है अब महसूस,
जीने की मेरी जिद को शायद तेरी जुदाई की नजर लगी है।
अब वह उम्मीद भी सब टूट रही है,
शायद यह बदन निर्जीव हो रहा है।
अब आओगी तो भी देखना मेरी आँखों को,
खुली होंगी मेरी आँखें।
आँखों के पटल पर अब भी तेरी सूरत उभर रही होगी।