Boody Ehsaaas Ki

Boody Ehsaaas Ki emotions in words

08/06/2026

नज़्म – "एक ख़याल ही सही"
मैं जी सका तुझे, एक ख़याल ही सही,
मेरे लिए यही किसी इबादत से कम नहीं।
दुनिया की हर दौलत, हर शोहरत फीकी है,
तेरी याद के आगे कोई नेमत बड़ी नहीं।
ये सच है कि तू मेरी हक़ीक़त न बन सकी,
मेरे हिस्से में बस तेरी तसव्वुर की रौशनी आई।
मगर जो लम्हे तेरे साथ गुज़ारे थे कभी,
वही मेरी ज़िंदगी की सबसे कीमती कमाई।
अब जब तन्हाई रातों में दस्तक देती है,
मैं उन पलों की चादर ओढ़ लिया करता हूँ।
तेरी हँसी की गूँज, तेरी बातों की खुशबू,
अपने वीरान दिल में संजो लिया करता हूँ।
मुझे तुझसे कोई शिकायत नहीं,
न मुकद्दर से कोई गिला रहा।
तू न मिली तो क्या हुआ आखिर,
तेरा एहसास तो हर पल मिला रहा।
मेरी बाकी उम्र के हर दर्द की दवा,
तेरी यादों के पास कहीं रखी है।
मैं जी रहा हूँ उसी सहारे आज भी,
कि तू कभी मेरी थी... यही खुशी काफ़ी है।
मैं जी सका तुझे, एक ख़याल ही सही,
और मेरी पूरी ज़िंदगी के लिए,
ये ख़याल ही काफ़ी है।

Bus kuch lines mein  bahut kuch  hota hai , bahut kuch kya  , sab kuch hota hai ,. jiski bhi hai ye lines , hai bahut kh...
05/06/2026

Bus kuch lines mein bahut kuch hota hai , bahut kuch kya , sab kuch hota hai ,. jiski bhi hai ye lines , hai bahut khubsurat or gahari

19/05/2026

मैं आज भी उस रात को भूल नहीं पाया।
सितंबर की ठंडी रात थी। कमरे में बस पंखे की धीमी आवाज़ थी और मेरी अधूरी नींद। पता नहीं कितनी देर से मैं करवटें बदल रहा था। शायद दिल फिर तुम्हें याद कर रहा था। आंख लगते ही ऐसा लगा जैसे कोई मेरे बहुत करीब आकर बैठ गया हो।
फिर अचानक… किसी ने मेरा हाथ छुआ।
वो स्पर्श इतना अपना था कि बिना देखे ही समझ गया — तुम थी।
मेरी बंद आंखों के किनारों से आंसू बहने लगे। ऐसा लगा जैसे बरसों से रोना बाकी था। तुम कुछ देर तक चुपचाप मेरा हाथ थामे रही। जैसे पहले थामा करती थी, जब मैं बिना वजह उदास हो जाया करता था।
फिर तुम धीरे से बोली…
“मैं मजबूर थी…”
बस इतना ही।
मैंने आंख खोलने की कोशिश की, लेकिन डर रहा था। डर इस बात का कि कहीं तुम फिर गायब न हो जाओ। मगर जब आखिरकार आंख खुली, कमरे में कोई नहीं था।
सिर्फ तकिये पर चूड़ी का टूटा हुआ एक छोटा-सा टुकड़ा पड़ा था।
मैं उसे देर तक देखता रहा। हाथ में अब भी हल्की गर्मी थी, जैसे तुम्हारा स्पर्श अभी बाकी हो। और कंधे में एक छोटी-सी चुभन… शायद उसी टूटी चूड़ी की।
तुम ख्वाब में आई थी, मगर आदतें वही पुरानी थीं। पहले की तरह आई, मेरे दिल को छुआ… और फिर बिना पूरा जवाब दिए चली गई।
तुम जानती थी ना, मैंने कभी तुमसे मोहब्बत का हिसाब नहीं मांगा। फिर भी हर बार तुम मजबूरियों की गठरी लेकर चली आती हो। शायद खुद को समझाने… या मुझे तोड़ने।
तुम्हारे जाने के बाद जिंदगी रुकी तो नहीं, मगर चलना भूल गई। अब नींद आती भी है तो सिर्फ इसलिए… कि शायद किसी रात फिर तुम ख्वाब में आओगी।
और मैं इस बार तुमसे सिर्फ एक बात पूछूंगा—
“अगर जाना ही था… तो इतनी मोहब्बत क्यों की थी?”

18/05/2026

Tumhy bhool jau, itni to taqqat nahi mujhe, tum yaad na aao ,itni to himmat bhi nahi mujhmy , mein rokk lu asoo teri yaado ka shahar ghoomkar bhi , itny to halky zasbaat nahi mery , tu mily na mily , tu baat kary na kary , per mein bhi Mita saky tery sath ke pallo ko itni to badi zindagi bhi bakki nahi meri

15/05/2026

“नीला टिफिन”
कल इतवार था।
एक शांत, ठहरा हुआ और फुर्सत भरा इतवार।
सुबह देर तक कमरे में सन्नाटा पसरा रहा। खिड़की से आती हल्की धूप और बाहर चाय वाले की आवाज़ बता रही थी कि शहर अपनी रफ्तार में लौट चुका है, लेकिन मेरे कमरे की घड़ी जैसे किसी पुरानी याद पर अटक गई थी।
मैंने सोचा, आज नाश्ते में सैंडविच बना लेता हूँ।
ब्रेड सेंकते ही अचानक तुम्हारी याद आ गई। वही तरीका… पहले हल्का मक्खन, फिर हरी चटनी, और आखिर में टमाटर के ऊपर थोड़ा सा चाट मसाला।
तुम कहा करती थी—
“सैंडविच सिर्फ पेट नहीं भरता, मूड भी ठीक करता है।”
मैं मुस्कुरा दिया।
लेकिन पहला कौर लेते ही जैसे पूरा अतीत सामने बैठ गया।
वो बरसाती सितंबर याद आ गया, जब हम बारिश से बचते हुए सड़क किनारे एक छोटी-सी चाय की टपरी पर रुक जाया करते थे। तुम अपने नीले रंग के टिफिन में घर का बना सैंडविच लाती थी।
अजीब बात है…
मुझे अपना कोई टिफिन याद नहीं, लेकिन तुम्हारा वो नीला टिफिन आज भी साफ याद है।
उसका एक कोना टूटा हुआ था।
उस दिन बारिश में भीगे हाथों से तुम उसे खोल नहीं पा रही थी और अचानक उसका किनारा चटक गया था।
तुम उदास हो गई थी, और मैं हँस पड़ा था।
तब तुमने नाराज़ होकर कहा था—
“इतना भी मत हँसो, इसमें तुम्हारा पसंदीदा सैंडविच रखा है।”
आज इतने साल बाद वही सैंडविच बनाने की कोशिश कर रहा था, लेकिन स्वाद कहीं खो गया था।
शायद इसलिए क्योंकि रेसिपी तो याद थी, पर वो हाथ नहीं थे, जिनमें अपनापन मिला करता था।
इन्हीं यादों में खोया रहा और तवे पर रखा सैंडविच जल गया।
धुआँ उठा तो मैं वर्तमान में लौट आया।
मैंने जला हुआ सैंडविच प्लेट में रखा, एक लंबी साँस ली और धीरे से मुस्कुरा दिया।
कुछ चीज़ें शायद दोबारा कभी वैसी नहीं बनतीं—
न सैंडविच…
और न ही कुछ रिश्ते।

Swarachit
Boodein ehassa ki

13/05/2026

Raat gahari sahi per slavery ka wajood nahi mit taa, rasta pathrila sahi per mazil abhi baaki hai , waqth kathin sahi per teri meri zindgi ki hasi abhi bakki hai , sath kuch juda sa sahi per apney hausllo ka dum abhi baki hai , be rangi dikhy zindgi abhi shayed per kushiya ka inderdhanush abhi baaki hai, teri meri zindgi ki hasi abhi baaki hai

Swarachit
Boodein ehsaas ki

11/05/2026

Kuch yaady mitatti nahi teri , tery jany ke baad bhi, kuch kissy bhool patty nahi teri baatain khatam hony ke baad bhi ,kuch chehry bhool bhi nahi paaty , unkey na hony ke baad bhi , kuch kissy pury hi nahi hoty bahut chhahny ke baad 🎉🎉

05/05/2026
25/09/2025

बूदे एहसास की
स्वरचित — पुष्पेंद्र गौर

मैं गुजरता हूँ कभी तेरे ख्यालों के समुद्र में,
जब कभी तेरी मोहब्बत की दुनिया में उतरता हूँ।

महसूस होता है यूँ, कि हम तो अपनी दुनिया कब की खो चुके हैं,
फिर भी न जाने क्यों,
एक अजीब सी खालिस,
एक अजीब सी कशिश भरी दुनिया में
हम हर रोज़ तुमसे रूबरू हुआ करते हैं।

लगता है यूँ, मेरी दुनिया में अब एक खालीपन पर जाकर ठहर गई है,
मेरी रंगीन दुनिया एक खालीपन से भर गई है।
यह दुनिया वह दुनिया हो गई है, जिसमें तेरी कमी खला करती है।

याद करते हैं तुझे,
तो मेरी आँखों की किनारी गीली हो जाती है,
रात के तकिए पर आंसुओं की झड़ी लग जाती है।
आंख मेरी सोती नहीं,
रात भर बस याद तुझे किया करती है।

मेरी आँखों में तेरी जुदाई की नमी रहती है।
होता है छलनी मेरा दिल इस कदर,
जिनकी दवा भी नहीं मिल पाती।
मेरे इन जख्मों का इलाज भी तुम ही तो हो।

तुम होती थी जो साथ,
तो यह दुनिया बेहतर प्रतीत होती थी।
तेरा साथ पाकर यह दुनिया हरी-भरी दिखती थी।
तेरी जुदाई के बाद,
कैसे बताऊँ कि कैसे जिए करते हैं?
लगता है, कंधों पर अपनी ही लाश लिए फिरा करते हैं,
जैसे किसी गुनाह का कर्जदार हुआ करते हों।

तेरी तन्हाइयों का आलम कुछ इस कदर बढ़ा करता है,
जैसे मेरा दिल एक घुटन भरे अंधेरे में कैद हो गया हो।
साँसों की उखड़न, साँसों की तड़पन अब महसूस होने लगी है।
तेरी चाहत अब मेरी जिंदगी पर भारी पड़ने लगी है।
यह बहम हुआ करती है, रात-दिन,
जैसे मैं एक लाइलाज बीमारी से भर रहा हूँ।
ना दवा काम करती है, ना दुआ साथ देती है,
मैं बस तिल-तिल इस बीमारी में घुलता जा रहा हूँ।

अब तो यकीन हो चला है,
कि तेरे सिवा इसका हल कोई और नहीं।
मेरी बिखरती, टूटती जिंदगी की बागडोर अब तेरे सिवा किसी और पर नहीं।

यह तन्हाइयाँ अब और भी भयावह हो चली हैं।
साँसों की गिनती अब कम होने लगी है,
लगता है मेरी जान बस अब जाने लगी है।

होता है यह एहसास भी,
कि इसे अब भी, न जाने क्यों,
तेरी आने की उम्मीद लिए मेरी जान अब तक मेरी जान में अटकी पड़ी है।

उखड़ती साँसे अब भी मेरी निकल नहीं रही हैं,
अटकी हैं कहीं सीने में शायद,
तेरे मिलने की आस इन में अभी तक बनी हुई है।

एक ख्याल अक्सर मुझे ताउम्र परेशान करता रहा—
काश कभी तू भी मेरे वजूद में आ सकती,
तो देख सकती कि क्या होती है तेरी कमी मेरी जिंदगी में।
क्या तु कभी महसूस कर सकती,
मेरी नजरों से पढ़ कर देख सकती,
मेरे हृदय की वेदना तु भी महसूस कर सकती।

असहाय, अविरल, विस्मित सा, तेरी तलाश में भटका करता हूँ।
अब ऊब चुका हूँ मैं इस दुनिया से।
अपनी टूटी-घुटी दुनिया में,
तेरे मिलने की उम्मीद की मशाल लिए अब तक खड़ा हूँ।
जिए जा रहा हूँ इस दुनिया में,
जहाँ तेरी रुसवाई की कोफ्त में मैं धीरे-धीरे जर्जर हो रहा हूँ।

कैसे बताऊँ, कैसे?
मैं उस मशाल को हर दिन, हर पल प्रज्वलित कर रहा हूँ।
हर अरमान, हर सपना जो देखा था तेरे साथ,
हर घड़ी, हर पल, उसकी आहुति अब मैं इसमें सहा कर रहा हूँ।

जी, मैं आता है कि बुझा दूँ वो दिया,
वह जो तेरी चाहत से कभी रोशन हुआ करता था।
पर मजबूर हूँ, ये भी तो नहीं हो पाता—
कमबख्त इतना साहस भी तो नहीं कर पा रहा हूँ।

कैसे कहूँ, कैसे बताऊँ,
कितनी न खुशी, कितनी बेबसी से कदम बढ़ा रहा हूँ।
तो कभी अपने इस हाल पर ज़ार-ज़ार रुदन कर रहा हूँ।
शायद मेरी साँसों में ठहराव होने लगा है,
मेरे बहते रक्त में भी थक्कों का जमाव होने लगा है।
शायद मेरी आँखों की सफेदी लाल होने लगी है,
शायद मेरी साँसें भी मेरा साथ छोड़ने लगी हैं।

खोल रखी हैं आँखें मैंने अब तक भी,
शायद तेरे आने का भ्रम अभी तक बाकी है।
एक अधूरे ख्वाब के अधूरेपन की आस अभी बाकी है।
लो, शायद मेरे बदन में अब स्थिरता आने लगी है।
लगता है, मेरे कंठ में तुम्हारी यादों का कोई कंकर फँस गया है।
होने लग रहा है अब महसूस,
जीने की मेरी जिद को शायद तेरी जुदाई की नजर लगी है।

अब वह उम्मीद भी सब टूट रही है,
शायद यह बदन निर्जीव हो रहा है।
अब आओगी तो भी देखना मेरी आँखों को,
खुली होंगी मेरी आँखें।
आँखों के पटल पर अब भी तेरी सूरत उभर रही होगी।

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