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कंठी माला क्यों ?ISKCON में  भक्त गले में तुलसी की कंठी माला क्यों पहनते है ? क्या शास्त्रों में कही कंठी माला पहनने के ...
24/01/2024

कंठी माला क्यों ?

ISKCON में भक्त गले में तुलसी की कंठी माला क्यों पहनते है ? क्या शास्त्रों में कही कंठी माला पहनने के लिए वर्णन है? क्या केवल दीक्षित भक्त ही कंठी माला पहन सकते है या कोई भी कंठी माला पहन सकता है ?

शास्त्रों में कई जगह आप पढ़ सकते है की जो लोग अध्यात्मिक उन्नति करना चाहते है उन्हें कंठी माला पहननी चाहिए l पद्म पुराण में कहा गया है – जो लोग तुलसी की कंठी माला पहनते है और अपने शारीर पर १२ स्थानों पर चन्दन का तिलक करते है वे भगवान विष्णु (कृष्ण) के उपासक होते है और वैष्णव कहलाते है l उनकी उपस्थिति से सारा ब्रम्हांड शुध्ह होता है और अपनी उपस्थिति से ऐसे भक्त किसी भी स्थान को वैकुण्ठ की तरह शुभ बना सकते है l “

स्कन्द पुराण में भी कहा गया है – “ जो लोग गोपी चन्दन से अपने ललाट और शरीर को भूषित करते है और गले में कंठी तुलसी माला धारण करते है उन्हें यमराज के दूत छु भी नहीं पाते l”

श्रीमद भागवतम में अजामिल के प्रसंग में अपने पढ़ा ही होगा की यमराज अपने दूतो से कहते है की – “मेरे दूतो तुम मेरे पुत्रो के सामान हो और मै तुम्हे यह समझl देना चाहता हु की तुम लोग कभी किसी वैष्णव को लेने पृथ्वी लोक मत जानाl वे भगवान के भक्त है और म्रत्यु के उपरांत उन पर हमारा कोई हक़ नहीं बनता l “

कंठी माला सभी धारण नहीं कर सकते केवेल वे भक्त जो चार नियमो का पालन करते है वे ही कंठी माला धारण कर सकते है l चार नियम है – १) मांसाहार न करना २) किसी भी प्रकार का नशा न करना ३) जुआ न खेलना ४) अवैध स्त्री / पुरुष गमन न करना l

यदि आप इन ४ नियमो का पालन करते है और १६ या कुछ माला हरे कृष्ण महा मन्त्र का जप करते है तो आप कंठी माला पहन सकते हैl कंठी माला पहनने के लिए दीक्षा लेने की, गुरु स्वीकार करने की जरुरत नहीं है l

जो दीक्षित भक्त है उन्हें ३ घेरो में कंठी माला पहनना चाहिए किन्तु जिनकी दीक्षा नहीं हुई है वे एक या दो घेरे की कंठी माला पहन सकते है ऐसा श्रील प्रभुपाद कहते थे l

हमारा पहनावा हमारी सोच को प्रभावित करता है इसलिए यदि आप कंठी माला पहनते है और जहा संभव हो वहा तिलक धारण करते है तो इस प्रकार आप स्वयं को दुसरो के समक्ष भक्त के रूप में प्रस्तुत करेंगे इसप्रकार भक्ति दृढ होगी और निषिद्ध कर्म नहीं होंगे l आशा है आप इस जानकारी से भक्ति लाभ अर्जित करेंगे l

श्रील प्रभुपद की जय ..................................................... हरे कृष्णा.

Sri Giriraj Goverdhan ji Maharaj ki Jai  😍 Srila Prabhupada ji ki jayaaa 🙏*काश कोई मेरे दर्द को समझ सकता*पाँच साल की बहु...
09/01/2024

Sri Giriraj Goverdhan ji Maharaj ki Jai 😍
Srila Prabhupada ji ki jayaaa 🙏

*काश कोई मेरे दर्द को समझ सकता*

पाँच साल की बहुत ही सुन्दर बच्ची मंजरी, एक दिन स्कूल से अाते ही अपने बहुत ही सुन्दर बालों को मुंडवाने की जिद्द पकड़ कर बैठ जाती है। जब उसके माता–पिता ने उसकी बात नहीं सुनी तो उसने पूरा दिन पानी भी नहींपिया अाैर अन्तत: मात–पिता को उसकी बात माननी पड़ी।

अगले दिन स्कूल से लोटने पर उसमें खुशी की लहर दौड़ रही थी।

उसकी खुशी के रहस्य को जानने हेतु अगले दिन जब उसके माता–पिता स्कूल पहुँचे तो उन्होंने देखा एक अौर लड़का वहाँ अपने माता–पिता के साथ अाया है जिसके बाल नहीं हैं। तब उन्होंने सोचा कि हमारी बच्ची ने भी अपनासिर इसलिए मुंडवाया क्योंकि उसके मित्र ने एेसा किया।

तभी उसे लड़के माता–पिता ने उनको कहा कि अाप इस बच्ची के माता–पिता होने के नाते बहुत ही भाग्यशाली हो, इतनी छोटी बच्ची की इतनी बड़ी सोच होना बहुत ही दुर्लभ है। उन्होंने बताया कि उनके बेटे को कैन्सर हो गयाथा अौर कीमोथैरेपी के इलाज के कारण उसके सारे बाल झड़ गये। जब अापकी बच्ची ने देखा कि कक्षा के सभी लड़के–लड़कियाँ इसकी मजाक बनाते हैं तो उसे बहुत बुरा लगा क्योंकि अापकी बच्ची का दिल दुखता है जब कोईभी किसी पर हँसता है या मजाक बनाता है अौर इसने सोचा कि यदि मैं भी बाल मुँडवा लूँगी तो कक्षा में दो बच्चे बिना बाल के हो जायेंगे अौर तब बाकी बच्चे मजाक नहीं कर पायेंगे।

भगवान् कृष्ण के परम सखा एवं भक्त होने के नाते अर्जुन का हृदय भी करुणामय है अौर युद्ध से पहले उनका हृदय युद्ध में अनेक योद्धअों की मृत्यु का चिन्तन करने मात्र से करुणा से भर उठा अौर वे भगवान् श्रीकृष्ण से कहनेलगे –

दृष्ट्वेमं स्वजनं कृष्ण युयुत्सुं समुपस्थितम् ।
सीदन्ति मम गात्राणि मुखं च परिशुष्यति ।।

अपने मित्रों एवं सम्बन्धियों को युद्ध करने के इस भाव में देखकर मेरा शरीर काँप रहा है अौर मुख सूख रहा है।

दूसरों के दु:ख के बारे में सोचना उनके दर्द से जुड़कर उनकी वास्तविक खुशी के लिए कुछ करने की ललक हमें वास्तविक सुख की अोर ले जाती है।

मंजरी के जीवन में भी उस दिन एक एेसी खुशी की लहर थी जो उसके माता–पिता ने उसके जीवन में पहले कभी नहीं देखी थी। अौर उसका कारण था कि वह अपनी खुशी से अधिक किसी दूसरे के दर्द को समझकर उसकीअावश्यकताअों को पूरा कर रही थी। यही खुशी का रहस्य है।

हमारी सोच अधिकतर यही होती है कि काश यह व्यक्ति एेसा न होकर वैसा होता, क्या हम उसे बदलने की मुहिम चलाने से पहले उसकी भावनाअों या परिस्थिति को जानने या समझने का प्रयास करते हैं?

अौर जब तक हम दूसरों के दर्द अौर भावनाअों से जुड़ना नहीं सीखेंगे तब तक हम उनकी सहायता नहीं कर पायेंगे।

Today's (7.7.18) Natkhat Thakurji darshan @ home 💓💗Everything belongs to Krishna, everything should be employed in the s...
07/07/2018

Today's (7.7.18) Natkhat Thakurji darshan @ home 💓💗

Everything belongs to Krishna, everything should be employed in the service of Krishna. This perfect form of action in Krishna consciousness is far better than any amount of artificial renunciation.

Jaya jaya sri sri ji ki 💕😍💖

एक छोटी सी ग़ौरकथा सुनिएएक बार की बात है - हर वर्ष की तरह गौड़ देश से ग़ौर भक्त नीलाचल पुरी आया करते थे इस वर्ष भी सभी भ...
15/04/2018

एक छोटी सी ग़ौरकथा सुनिए
एक बार की बात है - हर वर्ष की तरह गौड़ देश से ग़ौर भक्त नीलाचल पुरी आया करते थे
इस वर्ष भी सभी भक्त वहाँ पधारे
श्रीमनमहाप्रभु जी ने श्रीजगन्नाथ जी की मंगला आरती मे सभी भक्तों के संग ख़ूब नृत्य गान किया
श्रीग़ौरचंद्र को उत्कृष्ट भावो का उदय होता के सम्पूर्ण देह कदली की डाल की तरह काँप उठता, मुख से पूर्ण ज ज ज ग ग न न पुरा जगन्नाथ भी नहीं कहा करते
महाभाव रस संकीर्तन श्रीमहाप्रभु जी ने ख़ूब नृत्य किया। श्रीनित्यानंद प्रभु ने श्रीग़ौर को थका हुआ जान विश्राम करने को कहा
श्रीमहाप्रभु ने संकीर्तन बंद करवा दिया और विश्राम को चले गए
श्रीमहाप्रभु जी का एक सेवक था श्रीगोबिंद ( यह श्रीमहाप्रभु जी के गुरु श्रीईश्वरपुरी का शिष्य था) वह सदा श्रीमहाप्रभु जी की सेवा करता था
वह श्रीमहाप्रभु जी को प्रसाद खिला कर, उनकी सेवा करके ही स्वयं प्रसाद पाता था
श्रीमहाप्रभु अपनी लीला के छह वर्ष श्रीराधा भाव दिव्यनुमाद मे रहते थे तब उस समय वह अपना अधिक से अधिक समय श्रीकाशीमिश्र के घर मे एक छोटा सा कक्ष जहाँ केवल एक व्यक्ति के जाने की जगह थी उस कमरे का नाम गम्भीरा था वहाँ महाप्रभुजी रहा करते थे राधा विरह भाव में
उस दिन जब श्रीमहाप्रभु जी संकीर्तन से श्रमित होकर गम्भीरा मे जाकर अपना शीश तो द्वार पर रख दिया और अपने चरण कमल कमरे के भीतर रख दिए
वह गम्भीरा छोटा होने से कमरे में कोई जा नहीं सकता था और महाप्रभु जी का शीश द्वार पर था
हर दिन की सेवा नियम के अनुसार श्रीगोविंद प्रभु के गम्भीरा मे प्रवेश करने लगा परंतु प्रभु का शीश द्वार पर होने से गोविंद प्रवेश नहीं कर सका
गोविंद प्रभु से बोला " प्रभु! आप हमें अंदर आने का स्थान दीजिए हम अंदर कैसे आए?
आपकी सेवा करनी है
प्रभु बोले- गोविंद! मेरे मे हिम्मत नहीं मै बहुत थका हुआ है। तु स्वयं ही अंदर आ जा
मै नहीं हिल सकता
गोविंद ने कहा प्रभु मै कैसे अंदर आऊँ
प्रभु बोले मुझे नहीं पता आना है तो आओ नहीं तो मत आओ
गोविंद दुखी हुआ - प्रभु की सेवा का नियम कैसे तोड़ सकता हुँ
चाहे अपराध हो जाए पर प्रभु की सेवा नहीं छोड़ सकता
तभी गोविंद अपराध आदी का विचार ना करते हुए श्रीमहाप्रभु जी के मुख पर कपड़ा रख कर ताकी गोविंद के चरण की धूल नहीं पड़े महाप्रभु जी पर ऐसा करते हुए गोबिंद प्रभु के शीश से लाँघते हुए अपना पैर उठा कर गम्भीरा कक्ष मे आ गया
और गम्भीरा मे आकर प्रभु के चरणों की सेवा करने लगा, कई घंटो तक चरण सेवा करता रहा श्रीमहाप्रभु जी को आँख भी लग गयी
फिर महाप्रभु जी उठे और देखा गोविंद अभी भी चरण दबा रहा है
प्रभु बोले- गोविंद तेरा तो नियम है सदा के मेरी सेवा करके जब मै सो जाता हुँ तब तु भी प्रसाद पाकर सो जाता है
प्रभु क्रोध में बोले- "अभी तक तूने प्रसाद क्यूँ नही पाया" जाकर क्यूँ नहीं सोया
गोविंद बोला- रोते हुए बोला, प्रभु! आपके शीश के ऊपर लाँघने का अपराध तो मैंने किया आपकी सेवा के लिए चाहे इसके लिए कितने वर्षों ही मुझे नरक जाना पड़े परंतु अब अपने " भोजन सुख" के लिए फिर आपको लाँघ कर बाहर जाऊँ यह मेरा सामर्थ्य नहीं
मै अपने सुख के लिए कोई काम नहीं कर सकता आपका सुख मेरा सुख है
भोजन करने का सुख और आपको लाँघू ऐसा मै कभी नहीं कर सकता

सम्पूर्ण जीवन भूखा रहूँगा परंतु आपको लाँघ कर कभी भोजन को देखूँगा तक नहीं।

Jaya jaya sri Sachinandan gaur hari ji ki 👐

Sri Sri   lal ji darshan 💓
20/03/2018

Sri Sri lal ji darshan 💓

Yesterday's 6.2.18 lala ke   darshan @ home 😍He does not like to read anything except topics relating to Krishna; he doe...
07/02/2018

Yesterday's 6.2.18 lala ke darshan @ home 😍

He does not like to read anything except topics relating to Krishna; he does not like to eat anything which is not of offered to Krishna; and he does not wish to go anywhere if Krishna is not involved. Therefore, his senses are controlled.

Jaya jaya sri sri Natwar Naagar Nandlala ju ki 😍💓Jaya jaya sri sri   ju ki 😍💗*📝चरणामृत का महत्व 👣💧**💒अक्सर जब हम मंदिर ज...
21/01/2018

Jaya jaya sri sri
Natwar Naagar Nandlala ju ki 😍💓

Jaya jaya sri sri ju ki 😍💗

*📝चरणामृत का महत्व 👣💧*

*💒अक्सर जब हम मंदिर जाते है तो पंडित जी हमें भगवान का चरणामृत देते है,*
*🤔ये जाने की चरणामृतका क्या महत्व है,*

*📚❋━━► शास्त्रों में कहा गया है*

*अकालमृत्युहरणं सर्वव्याधिविनाशनम्।*
*विष्णो: पादोदकं पीत्वा पुनर्जन्म न विद्यते ।।*

*📖"अर्थात भगवान विष्णु के चरण का अमृत रूपी जल समस्त पाप -व्याधियों का शमन करने वाला है तथा औषधी के समान है।*

*💧जो चरणामृत पीता है उसका पुनः जन्म नहीं होता" जल तब तक जल ही रहता है जब तक भगवान के चरणों से नहीं लगता, जैसे ही भगवान के चरणों से लगा तो अमृत रूप हो गया और चरणामृत बन जाता है.*

*❋━━► जब भगवान का वामन अवतार हुआ, और वे राजा बलि की यज्ञ शाला में दान लेने गए तब उन्होंने तीन पग में तीन लोक नाप लिए जब उन्होंने पहले पग में नीचे के लोक नाप लिए और दूसरे में ऊपर के लोक नापने लगे तो जैसे ही ब्रह्म लोक में उनका चरण गया तो ब्रह्मा जी ने अपने कमंडलु में से जल लेकर भगवान के चरण धोए और फिर चरणामृत को वापस अपने कमंडल में रख लिया,*

*💧वह चरणामृत गंगा जी बन गई, जो आज भी सारी दुनिया के पापों को धोती है, ये शक्ति उनके पास कहाँ से पात्र शक्ति है भगवान के चरणों की जिस पर ब्रह्मा जी ने साधारण जल चढाया था पर चरणों का स्पर्श होते ही बन गई गंगा जी .*

*👬जब हम बाँके बिहारी जी की आरती गाते है तो कहते है -*
*👣"चरणों से निकली गंगा प्यारी जिसने सारी दुनिया तारी"*

*📚इसे बहुत ही पवित्र माना जाता है तथा मस्तक से लगाने के बाद इसका सेवन किया जाता है।*

*💧चरणामृत का सेवन अमृत के समान माना गया है।*

*📚भगवान श्री राम के चरण धोकर उसे चरणामृत के रूप में स्वीकार कर केवट न केवल स्वयं भव-बाधा से पार हो गया बल्कि उसने अपने पूर्वजों को भी तार दिया।*

*💧चरणामृत का महत्व चिकित्सकीय भी है। चरणामृत का जल हमेशा तांबे के पात्र में रखा जाता है।*

*📚आयुर्वेदिक मतानुसार तांबे के पात्र में अनेक रोगों को नष्ट करने की शक्ति होती है जो उसमें रखे जल में आ जाती है। उस जल का सेवन करने से शरीर में रोगों से लडऩे की क्षमता पैदा हो जाती है तथा रोग नहीं होते।*

*🌿❋━━►आयुर्वेद के अनुसार इसमें तुलसी के पत्ते डालेेजाते हैं जिससे इस जल की रोगनाशक क्षमता और भी बढ़ जाती है।*
*🌿❋━━► तुलसी के पत्ते पर जल इतने परिमाण में होना चाहिए कि सरसों का दाना उसमें डूब जाए ।*
*❋━━► ऐसा माना जाता है कि तुलसी चरणामृत लेने से मेधा, बुद्धि,स्मरण शक्ति को बढ़ाता है।*

*📚इसीलिए यह मान्यता है कि भगवान का चरणामृत औषधी के समान है। यदि उसमें तुलसी पत्र भी मिला दिया जाए तो उसके औषधीय गुणों में और भी वृद्धि हो जाती है। कहते हैं सीधे हाथ में तुलसी चरणामृत ग्रहण करने से हर शुभ का या अच्छे काम का जल्द परिणाम मिलता है।*

*👣💧इसीलिए चरणामृत हमेशा सीधे हाथ से लेना चाहिये,*

*👣❋━━► चरणामृत लेने के बाद अधिकतर लोगों की आदत होती है कि वे अपना हाथ सिर पर फेरते हैं। चरणामृत लेने के बाद सिर पर हाथ रखना सही है या नहीं यह बहुत कम लोग जानते हैं.?*🤔

*📚 शास्त्रों के अनुसार चरणामृत लेकर सिर पर हाथ रखना अच्छा नहीं माना जाता है। इससे विचारों में सकारात्मकता नहीं बल्कि नकारात्मकता बढ़ती है।*

*💧इसीलिए चरणामृत लेकर कभी भी सिर पर हाथ नहीं फेरना चाहिए।*

Jaya jaya srimati   ju (Vrinda maiya ju) 😍💟😍💖😍💗😍💓😍"हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे      हरे राम हरे राम, राम रा...
19/01/2018

Jaya jaya srimati ju (Vrinda maiya ju) 😍💟😍💖😍💗😍💓😍

"हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥"

"जो इच्छा कर ही मन माही।
प्रभु कृपा कछु दुर्लभ नाही॥"

एक बाद नारद जी ने भगवान से प्रश्न किया कि प्रभु आपके भक्त गरीब क्यों होते हैं?

तो भगवान बोले - "नारद जी ! मेरी कृपा को समझना बड़ा कठिन है।" इतना कहकर भगवान नारद के साथ साधु भेष में पृथ्वी पर पधारे और एक सेठ जी के घर भिक्षा मांगने के लिए दरवाजा खटखटाने लगे। सेठ जी बिगड़ते हुए दरवाजे की तरफ आए और देखा तो दो साधु खड़े हैं।

भगवान बोले - "भैया ! बड़े जोरों की भूख लगी है। थोड़ा सा खाना मिल जाए।"

सेठ जी बिगड़कर बोले "तुम दोनों को शर्म नहीं आती। तुम्हारे बाप का माल है ? कर्म कर के खाने में शर्म आती है, जाओ-जाओ किसी होटल में खाना मांगना।"

नारद जी बोले - "देखा प्रभु ! यह आपके भक्तों और आपका निरादर करने वाला सुखी प्राणी है। इसको अभी शाप दीजिये।" नारद जी की बात सुनते ही भगवान ने उस सेठ को अधिक धन सम्पत्ति बढ़ाने वाला वरदान दे दिया।

इसके बाद भगवान नारद जी को लेकर एक बुढ़िया मैया के घर में गए। जिसकी एक छोटी सी झोपड़ी थी, जिसमें एक गाय के अलावा और कुछ भी नहीं था। जैसे ही भगवान ने भिक्षा के लिए आवाज लगायी, बुढ़िया मैया बड़ी खुशी के साथ बाहर आयी। दोनों सन्तों को आसन देकर बिठाया और उनके पीने के लिए दुध लेकर आयीं और बोली - "प्रभु ! मेरे पास और कुछ नहीं है, इसे ही स्वीकार कीजिये।"

भगवान ने बड़े प्रेम से स्वीकार किया। तब नारद जी ने भगवान से कहा - "प्रभु ! आपके भक्तों की इस संसार में देखो कैसी दुर्दशा है, मेरे पास तो देखी नहीं जाती। यह बेचारी बुढ़िया मैया आपका भजन करती है और अतिथि सत्कार भी करती है। आप इसको कोई अच्छा सा आशीर्वाद दीजिए।"

भगवान ने थोड़ा सोचकर उसकी गाय को मरने का अभिशाप दे डाला।" यह सुनकर नारद जी बिगड़ गए और कहा - "प्रभु जी.! यह आपने क्या किया ?"

भगवान बोले - "यह बुढ़िया मैया मेरा बहुत भजन करती है। कुछ दिनों में इसकी मृत्यु हो जाएगी और मरते समय इसको गाय की चिन्ता सताएगी कि मेरे मरने के बाद मेरी गाय को कोई कसाई न ले जाकर काट दे, मेरे मरने के बाद इसको कौन देखेगा ?
तब इस मैया को मरते समय मेरा स्मरण न होकर बस गाय की चिन्ता रहेगी और वह मेरे धाम को न जाकर गाय की योनि में चली जाएगी।"

उधर सेठ को धन बढ़ाने वाला वरदान दिया कि मरने वक़्त धन तथा तिजोरी का ध्यान करेगा और वह तिजोरी के नीचे साँप बनेगा।
प्रकृति का नियम है जिस चीज में अति लगाव रहेगा यह जीव मरने के बाद वही जन्म लेता है और बहुत दुख भोगता है।

अतः अपना चिंतन प्रभु की तरफ अधिक रखें।

"हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे।
हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे॥"

Lala ke aaj (16.1.18) ke Natkhat darshan 😍*क्या बच्चों को उनकी गलतियों पर दण्डित करना उचित है?*  उचित समय पर दण्ड देना भ...
16/01/2018

Lala ke aaj (16.1.18) ke Natkhat darshan 😍

*क्या बच्चों को उनकी गलतियों पर दण्डित करना उचित है?*

उचित समय पर दण्ड देना भी समाज एवं हमारे जीवन में एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है। यदि गलती करने पर छात्रों अथवा बच्चों को दण्ड न दिया जाये तो उनका बिगड़ना स्वाभाविक है। नादान होने के कारण बच्चों को सही-गलत की समझ नहीं होती, इसलिए जब वे बड़ों की सलाह नहीं मानते तो उनके भले के लिए उन्हें दण्ड देना अावश्यक हो जाता है।

*चाणक्य पण्डित कहते थे* –
*लालयेत पंचवर्षाणि दशवर्षाणि ताडयेत् ।*
*प्राप्ते तु षोडषे वर्षे पुत्रं मित्रवदाचरेत् ।।*
पहले पाँच वर्ष तक बच्चे को दुलारना चाहिए। उसके पश्चात् अगले दस वर्षों तक उसे दण्ड देना चाहिए। परन्तु जब वह सोलहवें वर्ष में प्रवेश कर जाये तो उसके साथ मित्रतापूर्ण व्यवहार करना चाहिए।

सोने के अाभूषण बनाने के लिए उसे पिघलाकर काटा-पीटा जाता है तथा पेड़ की लकड़ी से सुन्दर नक्काशीयुक्त कुर्सी बनाने के लिए उसे काटा-खुरचा जाता है।

इसी प्रकार हमारे व्यक्तित्व को निखारने के लिए अावश्यक है कि उसमें बैठी अनावश्यक बुरी अादतों तथा स्वभाव को निकाला जाये। इसके लिए कई बार दण्ड ही एकमात्र साधन बच जाता है।

कहा जाता है कि जब शास्त्र (अच्छी सलाह) काम करना बंद कर दे तो शस्त्र (दण्ड) से काम लेना पड़ता है।
शास्त्र के अनुसार दिये गये दण्ड स्वयं भगवान् का प्रतिनिधित्व करते हैं। जैसा कि भगवान् *श्रीकृष्ण स्वयं भगवद्गीता (१०.३८) में कहते हैं*,
अराजकता को दमन करने वाले समस्त साधनों में से मैं दण्ड हूँ।

अनुशासन के लिए अनेक बार दण्ड देना ही पड़ता है अौर सही समय पर बच्चों को अनुशासित न करने का मुख्य कारण हमारा कमजोर हृदय है जो भावनाअों में बह जाता है अौर बुद्धि के अनुसार कार्य नहीं करता।

बच्चा जब गलती करता है अौर गलती सुधारने में यदि हम उसकी मदद नहीं करेंगे तो वह बड़ा होकर हमें ही दोष देगा कि अापने मुझे सही समय पर सुधारा क्यों नहीं मैं तो नादान था पर अापको तो सही अौर गलत की समझ थी।

अपनी भावनात्मक अासक्तियों के कारण ही कई बार हम सही निर्णय लेने में असफल हो जाते हैं अौर अपने तथाकथित प्रेम के कारण बच्चों की सभी प्रकार की इच्छाअों की पूर्ति कर उनका जीवन ही बर्बाद कर देते हैं।

जैसा कि धृतराष्ट्र ने दुर्योधन की सभी कुटिल चालों में उसका साथ देकर किया। राजा की गद्दी पर बैठे होने के कारण यदि धृतराष्ट्र चाहते तो दुर्योधन को उसकी कुटिल एवं भद्दी चालों को करने से रोक सकते थे किन्तु उन्होंने एेसा नहीं किया अौर उसका एकमात्र कारण था – पुत्र मोह… जिसका अन्तत: परिणाम यह हुअा कि वे अपने सारे पुत्रों को खो बैठे।

दया न दिखाने पर हम कठोर हो जाते हैं अौर दण्ड न देने पर लोगों की गलतियों को बढ़ावा देते हैं।

सही समय पर दया या दण्ड का चुनाव करना ही परिपक्वता है। अौर यह परिपक्वता अाध्यात्मिक चेतना में प्रगति करने से अाती है क्योंकि अध्यात्म के द्वारा हमारी भौतिक दृष्टि से काम, क्रोध, लोभ, मोह इत्यादि की परते उतरनी लगती हैं अौर हम सही दृष्टि से निर्णय ले सकते हैं।

*हरे कृष्ण।*

Wishes a very happy   maiya ju & krishna concious lohri maha-mahotsav darshan of natkhat   @ home 😍Jaya jaya srimati   m...
13/01/2018

Wishes a very happy maiya ju & krishna concious lohri maha-mahotsav darshan of natkhat @ home 😍

Jaya jaya srimati maiya ju ki 😍👐😍

Mercy is always flowing, but everything depends upon our Receptivity.

Jaya jaya Sri Sri   ju   ju   ju   ju   ju darshan 😍💗💓💕जब तुलसीदासजी को भगवान जगन्नाथ ने दिये राम रुप में दर्शन🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹...
10/01/2018

Jaya jaya Sri Sri ju ju ju ju ju darshan 😍💗💓💕

जब तुलसीदासजी को भगवान जगन्नाथ ने दिये राम रुप में दर्शन
🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸🔹🔸🔸
तुलसीदास जी अपने इष्टदेव का दर्शन करने श्रीजगन्नाथपुरी गये। मंदिर में भक्तों की भीड़ देख कर प्रसन्न मन से अंदर प्रविष्ट हुए। जगन्नाथ जी का दर्शन करते ही निराश हो गये। विचार किया कि यह हस्तपादविहीन देव हमारा इष्ट नहीं हो सकता। बाहर निकल कर दूर एक वृक्ष के तले बैठ गये। सोचा कि इतनी दूर आना ब्यर्थ हुआ। क्या गोलाकार नेत्रों वाला हस्तपादविहीन दारुदेव मेरा राम हो सकता है? कदापि नहीं। रात्रि हो गयी, थके-माँदे, भूखे-प्यासे तुलसी का अंग टूट रहा था। अचानक एक आहट हुई। वे ध्यान से सुनने लगे।

अरे बाबा ! तुलसीदास कौन है? एक बालक हाथों में थाली लिए पुकार रहा था। तभी आप उठते हुए बोले –‘हाँ भाई ! मैं ही हूँ तुलसीदास।’

बालक ने कहा, ‘अरे ! आप यहाँ हैं। मैं बड़ी देर से आपको खोज रहा हूँ। ‘बालक ने कहा -‘लीजिए, जगन्नाथ जी ने आपके लिए प्रसाद भेजा है।’

तुलसीदास बोले –‘कृपा करके इसे बापस ले जायँ।

बालक ने कहा, आश्चर्य की बात है, ‘जगन्नाथ का भात-जगत पसारे हाथ’ और वह भी स्वयं महाप्रभु ने भेजा और आप अस्वीकार कर रहे हैं। कारण?

तुलसीदास बोले, ‘अरे भाई ! मैं बिना अपने इष्ट को भोग लगाये कुछ ग्रहण नहीं करता। फिर यह जगन्नाथ का जूठा प्रसाद जिसे मैं अपने इष्ट को समर्पित न कर सकूँ, यह मेरे किस काम का? ‘

बालक ने मुस्कराते हुए कहा, बाबा ! आपके इष्ट ने ही तो भेजा है ।

तुलसीदास बोले -यह हस्तपादविहीन दारुमूर्ति मेरा इष्ट नहीं हो सकता।

बालक ने कहा कि अपने श्रीरामचरितमानस में तो आपने इसी रूप का वर्णन किया है —

बिनु पद चलइ सुनइ बिनु काना।
कर बिनु कर्म करइ बिधि नाना ।।
आनन रहित सकल रस भोगी।
बिनु बानी बकता बड़ जोगी।।

अब तुलसीदास की भाव-भंगिमा देखने लायक थी। नेत्रों में अश्रु-बिन्दु, मुख से शब्द नहीं निकल रहे थे। थाल रखकर बालक यह कहकर अदृश्य हो गया कि मैं ही राम हूँ। मेरे मंदिर के चारों द्वारों पर हनुमान का पहरा है।विभीषण नित्य मेरे दर्शन को आता है। कल प्रातः तुम भी आकर दर्शन कर लेना।

तुलसीदास जी ने बड़े प्रेम से प्रसाद ग्रहण किया। प्रातः मंदिर में उन्हें जगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा के स्थान पर श्री राम, लक्ष्मण एवं जानकी के भव्य दर्शन हुए। भगवान ने भक्त की इच्छा पूरी की।

जिस स्थान पर तुलसीदास जी ने रात्रि व्यतीत की थी, वह स्थान ‘तुलसी चौरा’ नाम से विख्यात हुआ। वहाँ पर तुलसीदास जी की पीठ ‘बड़छता मठ’ के रूप में प्रतिष्ठित है।
🙏🙏🙏🙏🙏

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