Dastangoi Collective

Dastangoi Collective The revival of an art form of storytelling lost for almost 90 years. Dastangoi is the lost art form of storytelling.

Mahmood Farooqui, a historian, writer and performer based in Delhi, revived this art form. Together with his team, he is putting this art form back on the performing arts' map. This page is a support system for this art form informing members about the performance activities and other related news. For shows, please contact Anusha Rizvi at +91- 9899973769

21/08/2026

Aurat Dalla & Chabeeli Bhatiyari are officially SOLD OUT! ❤️

Thank you for the incredible love and support. We can’t wait to see you there!

18/08/2026

Most awaited Dastan
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From  Ather Farouqui Sbs Wall महमूद फ़ारूक़ी : जो सू-ए-दार से उतरे तो कू-ए-यार चलेकुछ लोग छोटे काम करने के लिए पैदा ही न...
18/08/2026

From Ather Farouqui Sbs Wall
महमूद फ़ारूक़ी : जो सू-ए-दार से उतरे तो कू-ए-यार चले

कुछ लोग छोटे काम करने के लिए पैदा ही नहीं होते। कुछ लोग मगर ऐसे भी होते हैं कि कोई छोटा काम कर ही नहीं सकते। ऐसे लोगों को आम इस्तिलाह में या आम ज़ेहनों के मुताबिक़ ज़िंदगी में बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है। ऐसे लोगों के लिए मगर इस क़ीमत का कोई मतलब नहीं होता :

चले तो पाँव तले कुचल गई कोई शै
नशे की झोंक में देखा नहीं कि दुनिया है
(शहाब जाफ़री)

महमूद फ़ारूक़ी इन्हीं लोगों में हैं जिन्होंने शायद ही दुनिया का कोई काम अपनी मर्ज़ी से न किया हो। मशहूर-ए-ज़माना दून स्कूल देहरादून, सेंट स्टीफ़ंस कॉलेज, दिल्ली यूनिवर्सिटी और ऑक्सफ़र्ड और कैम्ब्रिज में तारीख़ की आला तालीम के बाद भी उन्होंने अपने शौक़ के लिए हर चीज़ को लात मार दी। उन्हें करना क्या है यह उन्हें भी इसलिए नहीं मालूम था कि ब-ज़ाहिर मोर्रिख़ के तौर पर दुनिया के तमाम दरवाज़े उनके इस्तक़बाल के लिए खुले हुए थे। उन्हें तो मगर उर्दू में दास्तानगोई की उस रिवायत को ज़िंदा करना था जिसकी क़ब्र के आसार भी मिट चुके थे। फिर कमबख़्त लफ़्ज़ ‘उर्दू’ आते ही दुनिया के सारे दरवाज़े ख़ुद-ब-ख़ुद बंद हो जाते हैं!

उन्होंने और उनकी अहलिया ने अचानक एक रोज़ ब-यक-जुंबिश-ए-क़लम अपनी-अपनी नौकरियों से इस्तीफ़ा दिया और कुछ रोज़ निहायत उसरत की ज़िंदगी गुज़ारने के बाद कई बरस की रियाज़त के बाद दास्तान-ए-तिलिस्म-ए-होशरुबा के पहले शो की शक्ल में उसकी बेहतरीन शक्ल हमारे सामने आई। और उस शायद दो घंटे की दास्तान की पहली महफ़िल ने दास्तानगोई का मुस्तक़बिल रोशन कर दिया :

दहर में मजरूह लुई जाविदाँ मज़मूँ कहाँ
मैं जिसे छूता गया वो जाविदाँ बनता गया
(मजरूह सुल्तानपुरी)

फ़िल्म ‘पिपली लाइव’ (Pepli Live) की कामयाबी के बाद मालूम हुआ कि आसमान हद है बस, तो ठीक है मगर अरस्तू के नज़रिये के मुताबिक़ कितने आसमान हैं, चूँकि यह मसला अभी तय नहीं हुआ है, इसलिए आसमान को तस्ख़ीर करने की मंज़िल ‘ला-मतनाही’ है।

अहबाब इसका बुरा न मानें। हसद तो इंसानी फ़ितरत का हिस्सा है मगर मुसलमानों में बिलख़ुसूस तक़रीबन हर आदमी का मिज़ाज यह है कि वह अपनी परेशानी से परेशान और उसके हल के लिए कोशाँ नहीं बल्कि दूसरों की ख़ुशी को मिटाने के लिए बेचैन है। इसके पस-ए-पर्दा क्या तारीखी अवामिल हैं, उनकी शनाख़्त इसलिए ज़रूरी है कि इंसानी फ़ितरत तो एक जैसी है फिर यह ख़ुदकुशी की आदत सिर्फ़ मुसलमानों में ही क्यों है?

और इस हसद के नतीजे में महमूद भाई जेल पहुँच गए। वह भी ऐसे इल्ज़ाम में जिसमें सज़ा से बचना तक़रीबन नामुमकिन था। क़ानून बहुत सख़्त, समाज उस क़ानून के पीछे अँधा और हर मुल्ज़िम को फाँसी पर लटका हुआ देखने का ख़्वाहाँ, मगर साहिब कमाल हो गया। उस क़ानून की पहली मंतिक़ी तशरीह करने की हिम्मत दिल्ली हाई कोर्ट ने महमूद फ़ारूक़ी साहब के केस में ही की और वह बाइज़्ज़त बरी कर दिए गए। सुप्रीम कोर्ट ने भी बहुत ग़ौर-ओ-फ़िक्र के बाद इस फ़ैसले और उसकी मंतिक़ को सहीह व दुरुस्त पाया। ‘सहीह व दुरुस्त’ मौलाना नियाज़ फ़तहपुरी की सुन्नत है।

जेल से रिहाई के बाद दास्तानगोई का सफ़र फिर जारी हुआ, और फ़िल्मसाज़ी का भी। उनकी नई फ़िल्म The Great Shamsuddin Family मुस्लिम मिडिल क्लास की पहली सहीह अक्कासी इसलिए है कि महमूद भाई ख़ुद स्कॉलर हैं और उस ज़ेहनियत से जिसे मिडिल क्लास और इस्तिमाल-पसंद कहते हैं, के तज़ादात को उन्होंने क़रीब से देखा है।

दास्तानगोई की रिवायत का इहया तो एक बात हुई (हालाँकि उर्दू में ऐसी कोई भी दूसरी मिसाल नहीं है जब एक सिन्फ़ का इहया हुआ हो) मगर कमाल तो यह हुआ, महमूद भाई ने जेल में भी अपना तमाम वक़्त क़ैदियों को दास्तानगोई सिखाने में लगा दिया और एक पूरी टीम तैयार हो गई।

हाल ही में महमूद भाई की यह निहायत दिलचस्प ख़ुदनविश्त सवानिह (ज़ाहिर है कि जेल में भले ही उन्होंने कुछ बरस गुज़ारे मगर वह एक पूरी ज़ेहनी उम्र थी) The Tihar Players शाए हुई है। मैंने जब-जब यह किताब शुरू की, हर काम छोड़कर कम-से-कम सौ सफ़्हे हर बार ज़रूर पढ़े। किताब में क्या लिखा है, यह बताने पर किताब पढ़ने का मज़ा जाता रहेगा, इसलिए किताब ख़रीदिए और पढ़िए। इम्तिहान के जवाबात की कुंजी आपको थर्ड या ज़्यादा-से-ज़्यादा सेकंड डिविज़न में पास तो करा सकती है मगर इम्तियाज़ से पास होने के लिए तो सारा निसाब पढ़ना पड़ता है।

किताब का तर्जुमा सुना है कोई अच्छा मुतर्जिम कर रहा है। उम्मीद है कि वह जल्द ही उर्दू क़ारिईन के हाथों में होगी।
अंजुमन तरक़्क़ी-ए-उर्दू (हिंद) ने महमूद भाई की दास्तानगोई के बीस बरस मुकम्मल होने पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाई थी। जी, इसे आप अपने मुँह मियाँ मिट्ठू बनना कह सकते हैं कि वह डॉक्यूमेंट्री वाक़ई बहुत अच्छी है और उर्दू के इदारे अगर तनक़ीद की किताबों की रस्म-ए-इजरा और थके-थकाए उर्दू प्रोफ़ेसरों को ख़ुश करने के लिए सेमिनार कराने के बजाय कुछ अच्छे काम भी करना चाहें तो यह बदलते ज़माने के साथ उर्दू को हम-आहंग करने के लिए डॉक्यूमेंट्री बनाने जैसे काम करना हफ़्त-ख़्वाँ तय करना नहीं है। डॉक्यूमेंट्री दुनिया भर में देखी जा रही है। आप भी किताब की इशाअत तक उसको मुलाहज़ा कर सकते हैं। यक़ीनन मौलाना आज़ाद को यहाँ लफ़्ज़-ए-मुलाहज़ा के इस्तिमाल पर एतराज़ होता मगर—

"अब न रहे वे लेने वाले, अब न रही वो मधुशाला।

18/08/2026

Dastan-e- Aurat Dalla .
Premiering on 22 August 2026

17/08/2026

Rehearsal Series Part 1 .
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