filmo ki duniya

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 # # **रहस्यमयी हवेली का राज**शहर से कई किलोमीटर दूर, घने जंगलों और ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी। हवे...
03/11/2025

# # **रहस्यमयी हवेली का राज**
शहर से कई किलोमीटर दूर, घने जंगलों और ऊँचे-ऊँचे पेड़ों के बीच एक पुरानी हवेली खड़ी थी। हवेली इतनी विशाल थी कि उसकी टूटी हुई दीवारें और ऊँचे गुम्बद दूर से ही नज़र आ जाते। गाँव वाले कहते थे कि वहाँ अजीब घटनाएँ होती हैं—रात के सन्नाटे में चीखने की आवाज़ें, खिड़कियों से दिखती रहस्यमयी परछाइयाँ और अपने-आप बजने वाली घंटियाँ।
किसी में इतनी हिम्मत नहीं थी कि वो सूरज ढलने के बाद हवेली के आस-पास भी जाए। लोग बच्चों को डराने के लिए कहते—“अगर शरारत करोगे तो हवेली का भूत पकड़ ले जाएगा।”
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# # **राहुल की जिज्ञासा**
राहुल बीस साल का एक जिज्ञासु लड़का था। उसे बचपन से ही रहस्यमयी कहानियों में दिलचस्पी थी। जब भी कोई हवेली की डरावनी बात करता, उसके अंदर रोमांच भर जाता। उसके दोस्त चेतन, पायल और समीर अक्सर उसे समझाते, “पागल मत बन, वहाँ कोई जाता नहीं। जो गया, वो लौटकर नहीं आया।”
लेकिन राहुल का मन मानने वाला कहाँ था। उसने ठान लिया कि वह हवेली के रहस्य से पर्दा उठाकर रहेगा।
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# # **आधी रात की यात्रा**
एक रात, जब सब सो रहे थे, राहुल चुपचाप घर से निकला। उसके पास सिर्फ एक टॉर्च, एक मोबाइल और जेब में पेन-नोटबुक थी। अँधेरी रात में झींगुरों की आवाज़ और पेड़ों से आती ठंडी हवा उसे और भी बेचैन कर रही थी।
जंगल का रास्ता लंबा था। पत्तियों की सरसराहट और अचानक टूटती डालियाँ सुनकर कई बार उसका दिल जोर से धड़का। पर उसने कदम नहीं रोके। लगभग आधे घंटे की पैदल यात्रा के बाद वह हवेली के दरवाज़े तक पहुँच गया।
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# # **हवेली के भीतर**
हवेली का दरवाज़ा आधा टूटा हुआ था। राहुल ने हल्का धक्का दिया तो दरवाज़ा अपने-आप चरमराता हुआ खुल गया। अंदर घुप्प अंधेरा और सीलन की गंध थी। उसने टॉर्च जलाकर देखा—चारों तरफ पुरानी पेंटिंग्स, टूटे फर्नीचर और मकड़ी के जाले।
फर्श पर कदम रखते ही उसकी आवाज़ पूरे हॉल में गूँज गई। तभी अचानक उसे सीढ़ियों से ऊपर भागती हुई परछाई दिखी। राहुल का दिल तेज़ी से धड़कने लगा, पर उसका डर उसकी जिज्ञासा से छोटा था।
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# # **कमरों का रहस्य**
वह सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपर पहुँचा। पहला कमरा खोला तो उसमें एक टूटी हुई चारपाई और बिखरे हुए बर्तन पड़े थे। दूसरे कमरे में दीवार पर एक विशाल पेंटिंग थी—राजा विक्रम सिंह और उनका परिवार। पेंटिंग के नीचे लिखा था, *“सत्य छिपा है भीतर।”*
इतने में अचानक कमरे का झूला अपने-आप हिलने लगा। राहुल के हाथ-पाँव ठंडे पड़ गए। उसने टॉर्च उस ओर घुमाई तो झूला रुक गया।
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# # **गुप्त दरवाज़ा**
राहुल की नज़र अलमारी पर पड़ी। उसने ज़ोर लगाया तो अलमारी हिली और पीछे से एक गुप्त दरवाज़ा दिखाई दिया। राहुल ने दरवाज़ा खोला और नीचे उतरने लगा। सीढ़ियाँ तहखाने की ओर जाती थीं।
नीचे पहुँचते ही उसे पुराने कागज़, नक्शे और एक धूल भरी डायरी मिली। डायरी खोलते ही पहला वाक्य चमका:
*“यदि कोई यह पढ़ रहा है, तो सावधान! यह हवेली सिर्फ एक महल नहीं, बल्कि एक रहस्य की क़ैदगाह है।”*
डायरी के पन्नों में लिखा था कि राजा विक्रम सिंह के पास *नवरत्न मणि* नामक हीरा था, जो जिसे भी मिलता, उसकी किस्मत बदल देता। पर उस हीरे के पीछे कई चोर और दुश्मन पड़े थे। एक रात वह हीरा गायब हो गया और उसी के बाद राजा रहस्यमय तरीके से लापता हो गए।
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# # **डरावनी मुलाक़ात**
अचानक तहखाने का दरवाज़ा ज़ोर की आवाज़ से बंद हो गया। राहुल घबरा गया। तभी पीछे से धीमी आवाज़ आई—“यहाँ आकर तूने बड़ी गलती की है।”
उसने टॉर्च घुमाई तो सामने एक परछाई खड़ी थी। परछाई धीरे-धीरे पास आई और अब साफ़ दिखा—वह कोई भूत नहीं बल्कि एक बूढ़ा आदमी था।
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# # **बूढ़े चौकीदार का सच**
बूढ़े आदमी ने कहा, “मैं इस हवेली का चौकीदार हूँ। सालों पहले राजा ने हीरे को यहाँ छिपाया था। चोरों ने हमला किया, राजा ने बचाने की कोशिश की पर वे खुद इसी तहखाने में क़ैद हो गए। लोग सोचते हैं कि यह हवेली भूतहा है, पर असल में ये सिर्फ अफवाहें थीं ताकि कोई हीरे तक न पहुँचे।”
फिर उसने दीवार के कोने में छिपी तिजोरी दिखाई। चाबी निकालकर तिजोरी खोली तो उसमें छोटा-सा डिब्बा था। जब डिब्बा खोला, तो उसमें से चमकदार *नवरत्न मणि* निकला।
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# # **सच्चाई सामने**
“यह हीरा अब किसे मिलेगा?” राहुल ने पूछा।
बूढ़ा बोला, “इसे सही हाथों में जाना चाहिए। लालच ने ही इस हवेली को सुनसान बना दिया। अब यह जनता की अमानत है।”
राहुल ने अगली सुबह पुलिस को सूचना दी। सरकार ने उस हीरे को संग्रहालय में सुरक्षित रख लिया।
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# # **अंतिम संदेश**
राहुल जब हवेली से निकला तो उसने पीछे मुड़कर देखा। हवेली अब भी खंडहर थी, पर अब उसके लिए वह डरावनी नहीं, बल्कि इतिहास और साहस की गवाही थी।
राहुल ने सबको साबित कर दिया कि—
**डर अक्सर हमारे दिमाग़ का वहम होता है, और सच्चाई को जानने के लिए हिम्मत चाहिए।**

अभी तो बकवास लगती है। मगर उस ज़माने में ये फ़िल्म बहुत पसंद आई थी। खासतौर पर इसका टाइटल सॉन्ग। "ये दिन ये महीने, साल। गु...
02/11/2025

अभी तो बकवास लगती है। मगर उस ज़माने में ये फ़िल्म बहुत पसंद आई थी। खासतौर पर इसका टाइटल सॉन्ग। "ये दिन ये महीने, साल। गुज़र जाएंगे मेरे यार। मगर इतना रखना खयाल। जीना सिर्फ़ मेरे लिए।" हमने तो बहुत गुनगुनाया था ये गाना। आज 23 साल हो गए इस फ़िल्म के। 1 नवंबर 2002 के दिन ये फ़िल्म रिलीज़ हुई थी। करीना कपूर और तुषार कपूर की साथ में दूसरी फ़िल्म थी ये। बजट था इस फ़िल्म का आठ करोड़ रुपए। और नेट कलैक्शन रहा था मात्र छह करोड़ 80 लाख रुपए। यानि ये फ़िल्म फ्लॉप हो गई थी। तलत जानी इस फ़िल्म के डायरेक्टर थे। वासू भगनानी इसके प्रोड्यूसर थे और नदीम-श्रवण ने म्यूज़िक कंपोज़ किया था। गाने चले थे इस फ़िल्म के।

IMDB पर बताया गया है कि तुषार कपूर के बडे़ भाई का एक रोल भी था इस फ़िल्म में पहले। और वो रोल संजय दत्त निभाने वाले थे। मगर किन्हीं वजहों से संजय ने इस फ़िल्म में काम नहीं किया। और वो रोल ही फ़िल्म से हटा दिया गया। ये भी आईएमडीबी ने बताया है कि वासू भगनानी ने इस फ़िल्म के लिए जब पहली बार करीना को अप्रोच किया तो करीना ने डेट्स ना होने की बात कहकर इस फ़िल्म में काम करने से इन्कार कर दिया था। तब वासू ने बात की दिया मिर्ज़ा से। और दिया मिर्ज़ा इस फ़िल्म में काम करने के लिए तैयार भी हो गई। मगर फिर दिया मिर्ज़ा से वासू भगनानी का कुछ मनमुटाव हो गया। दिया ने ये फ़िल्म छोड़ दी। वासू ने एक बार फिर से करीना कपूर से बात की। इस बार करीना इस फ़िल्म में काम करने को तैयार हो गई।

तुषार कपूर की डेब्यू फ़िल्म थी मुझे कुछ कहना है। वो फ़िल्म बढ़िया चली थी। और उस फ़िल्म को भी वासू भगनानी ने ही प्रोड्यूस किया था। जब मुझे कुछ कहना है फ़िल्म फ्लॉप हो गई तो तुषार कपूर ने एक बयान दिया था। तुषार ने कहा था कि वो इस फ़िल्म की कहानी से संतुष्ट नहीं थे। मगर वासू भगनानी ने उन्हें इस फ़िल्म में काम करने को फ़ोर्स किया। और क्योंकि वो मुझे कुछ कहना है फ़िल्म के लिए वासू भगनानी के अहसानमंद थे, इसलिए उन्होंने ना चाहते हुए भी जीना सिर्फ़ मेरे लिए फिल्म में काम किया। जबकी उन्हें पता था कि इस फ़िल्म का क्या हश्र होने वाला है।

जीना सिर्फ़ मेरे लिए फ़िल्म से एक बेहद खास बात ये जुड़ी है कि इस फ़िल्म से मल्लिका सहरावत का डेब्यू हुआ था। जी हां, मल्लिका सहरावत ने इस फ़िल्म में ही सबसे पहली बार कैमरे के सामने एक्टिंग की थी। हालांकि इस फ़िल्म की क्रेडिट लिस्ट में मल्लिका का रियल नेम, रीमा लांबा दिया गया था। मल्लिका नाम उन्होंने बाद में रखा था।

29/10/2025

Amiro sahi hai apas me hi ijjat ijjat khelte rahte hai 🤓🤓🤓

22/02/2025

Tumhare Siva kuch na India Today Himesh Reshammiya Vicky Kaushal #

पति का बिछोह उस के लिए बड़ा दुखदाई था. दिन काटे नहीं कटता था, रात बिताए नहीं बीतती थी. तिलतिल कर सुलगती जवानी से उर्मिला...
10/02/2025

पति का बिछोह उस के लिए बड़ा दुखदाई था. दिन काटे नहीं कटता था, रात बिताए नहीं बीतती थी. तिलतिल कर सुलगती जवानी से उर्मिला पर उदासीनता छा गई थी. वह चंद दिन ससुराल में, तो चंद दिन मायके में गुजारती.

गांव से चलते समय उर्मिला को पूरा यकीन था कि कोलकाता जा कर वह अपने पति को ढूंढ़ लेगी. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. कोलकाता में 3 दिन तक भटकने के बाद भी पति राधेश्याम का पता नहीं चला, तो उर्मिला परेशान हो गई.

हावड़ा रेलवे स्टेशन के नजदीक गंगा के किनारे बैठ कर उर्मिला यह सोच रही थी कि अब उसे क्या करना चाहिए. पास ही उस का 10 साला भाई रतन बैठा हुआ था.

राधेश्याम का पता लगाए बिना उर्मिला किसी भी हाल में गांव नहीं लौटना चाहती थी. उसे वह अपने साथ गांव ले जाना चाहती थी. उर्मिला सहमीसहमी सी इधरउधर देख रही थी. वहां सैकड़ों की तादाद में लोग गंगा में स्नान कर रहे थे. उर्मिला चमचमाती साड़ी पहने हुई थी. पैरों में प्लास्टिक की चप्पलें थीं.

उर्मिला का पहनावा गंवारों जैसा जरूर था, लेकिन उस का तनमन और रूप सुंदर था. उस के गोरे तन पर जवानी की सुर्खी और आंखों में लाज की लाली थी.

हां, उर्मिला की सखीसहेलियों ने उसे यह जरूर बताया था कि वह निहायत खूबसूरत है. उस के अलावा गांव के हमउम्र लड़कों की प्यासी नजरों ने भी उसे एहसास कराया था कि उस की जवानी में बहुत खिंचाव है. सब से भरोसमंद पुष्टि तो सुहागसेज पर हुई थी, जब उस के पति राधेश्याम ने घूंघट उठाते ही कहा था, ‘तुम इतनी सुंदर हो, जैसे मेरी हथेलियों में चौदहवीं का चांद आ गया हो.’

उर्मिला बोली कुछ नहीं थी, सिर्फ शरमा कर रह गई थी. उर्मिला बिहार के मुजफ्फरपुर जिले के एक गांव की रहने वाली थी. उस ने 19वां साल पार किया ही था कि उस की शादी राधेश्याम से हो गई.

राधेश्याम भी गांव का रहने वाला था. उर्मिला के गांव से 10 किलोमीटर दूर उस का गांव था. उस के पिता गांव में मेहनतमजदूरी कर के परिवार का पालनपोषण करते थे. उर्मिला 7वीं जमात तक पढ़ी थी, जबकि राधेश्याम मैट्रिक फेल था. वह शादी के 2 साल पहले से कोलकाता में एक प्राइवेट कंपनी में चपरासी था.

शादी के लिए राधेश्याम ने 10 दिनों की छुट्टी ली थी, लेकिन उर्मिला के हुस्नोशबाब के मोहपाश में ऐसा बंधा कि 30 दिन तक कोलकाता नहीं गया.

जब घर से राधेश्याम विदा हुआ, तो उर्मिला को भरोसा दिलाया था, ‘जल्दी आऊंगा. अब तुम्हारे बिना काम में मेरा मन नहीं लगेगा.’

उर्मिला झट से बोली थी, ‘ऐसी बात है, तो मुझे भी अपने साथ ले चलिए. आप का दिल बहला दिया करूंगी. नहीं तो वहां आप तड़पेंगे, यहां मैं बेचैन रहूंगी.’

उर्मिला ने राधेश्याम के मन की बात कही थी. लेकिन उस की मजबूरी यह थी कि 4 दोस्तों के साथ वह उर्मिला को रख नहीं सकता था.

सच से सामना कराने के लिए राधेश्याम ने उर्मिला से कहा, ‘तुम 5-6 महीने रुक जाओ. कोई अच्छा सा कमरा ले लूंगा, तो आ कर तुम्हें ले चलूंगा.’

राधेश्याम अंगड़ाइयां लेती उर्मिला की जवानी को सिसकने के लिए छोड़ कर कोलकाता चला गया.

फिर शुरू हो गई उर्मिला की परेशानियां. पति का बिछोह उस के लिए बड़ा दुखदाई था. दिन काटे नहीं कटता था, रात बिताए नहीं बीतती थी.

तिलतिल कर सुलगती जवानी से उर्मिला पर उदासीनता छा गई थी. वह चंद दिन ससुराल में, तो चंद दिन मायके में गुजारती.

साजन बिन सुहागन उर्मिला का मन न ससुराल में लगता, न मायके में. मगर ऐसी हालत में भी उस ने अपने कदमों को कभी बहकने नहीं दिया था.

पति की अमानत को हर हालत में संभालना उर्मिला बखूबी जानती थी, इसलिए ससुराल और मायके के मनचलों की बुरी कोशिशों को वह कभी कामयाब नहीं होने देती थी.

ससुराल में सास ससुर के अलावा 2 छोटी ननदें थीं. मायके में मातापिता के अलावा छोटा भाई रतन था. उर्मिला ने जैसेतैसे बिछोह में एक साल काट दिया. मगर उस के बाद वह पति से मिलने के लिए उतावली हो गई.

हुआ यह कि कोलकाता जाने के 6 महीने तक राधेश्याम ने उसे बराबर फोन किया. मगर उस के बाद उस ने फोन करना बंद कर दिया. उस ने रुपए भेजना भी बंद कर दिया.

राधेश्याम को फोन करने पर उस का फोन स्वीच औफ आता था. शायद उस ने फोन नंबर बदल दिया था.

किसी को कुछ समझ नहीं आ रहा था कि आखिर राधेश्याम ने एकदम से परिवार से संबंध क्यों तोड़ दिया?

गांव के लोगों को यह शक था कि राधेश्याम को शायद मनपसंद बीवी नहीं मिली, इसलिए उस ने घर वालों व बीवी से संबंध तोड़ लिया है.

लेकिन उर्मिला यह बात मानने के लिए तैयार नहीं थी. वह तो अपने साजन की नजरों में चौदहवीं का चांद थी. राधेश्याम जिस कंपनी में नौकरी करता था, उस का पता उर्मिला के पास था. राधेश्याम के बाबत कंपनी वालों को रजिस्टर्ड चिट्ठी भेजी गई.

15 दिन बाद कंपनी का जवाब आ गया. चिट्ठी में लिखा था कि राधेश्याम 6 महीने पहले नौकरी छोड़ चुका था.

सभी परेशान हो गए. कोलकाता जा कर राधेश्याम का पता लगाने के सिवा अब और कोई रास्ता नहीं था.

उर्मिला का पिता अपंग था. कहीं आनेजाने में उसे काफी परेशानी होती थी. वह कोलकाता नहीं जा सकता था.

उर्मिला का ससुर हमेशा बीमार रहता था. जबतब खांसी का दौरा आ जाता था, इसलिए वह भी कोलकाता नहीं जा सकता था.

हिम्मत कर के एक दिन उर्मिला ने सास के सामने प्रस्ताव रखा, ‘अगर आप कहें, तो मैं अपने भाई रतन के साथ कोलकाता जा कर उन का पता लगाऊं?’

परिवार के लोगों ने टिकट खरीद कर रतन के साथ उर्मिला को हावड़ा जाने वाली ट्रेन में बिठा दिया.

राधेश्याम जिस कंपनी में काम करता था, सब से पहले उर्मिला वहां गई. वहां के स्टाफ व कंपनी के मैनेजर ने उसे साफ कह दिया कि 6 महीने से राधेश्याम का कोई अतापता नहीं है.

उस के बाद उर्मिला वहां गई, जहां राधेश्याम अपने 4 दोस्तों के साथ एक ही कमरे में रहता था. उस समय 3 ही दोस्त थे. एक गांव गया हुआ था.

तीनों दोस्तों ने उर्मिला का भरपूर स्वागत किया. उन्होंने उसे बताया कि 6 महीने पहले राधेश्याम यह कह कर चला गया था कि उसे एक अच्छी नौकरी और रहने की जगह मिल गई है. मगर सचाई कुछ और थी.

‘कैसी सचाई?’ पूछते हुए उर्मिला का दिल धड़कने लगा.

‘दरअसल, उसे किसी अमीर औरत से प्यार हो गया था. वह उसी के साथ रहने चला गया था,’ 3 दोस्तों में से एक दोस्त ने बताया.

उर्मिला को लगा, जैसे उस के दिल की धड़कन बंद हो जाएगी और वह मर जाएगी. उस के हाथपैर सुन्न हो गए थे, मगर जल्दी ही उस ने अपनेआप को काबू में कर लिया.

उर्मिला ने पूछा, ‘वह औरत कहां रहती है?’

तीनों में से एक ने कहा, ‘यह हम तीनों में से किसी को पता नहीं है. सिर्फ गणपत को पता है. उस औरत के बारे में हम लोगों ने उस से बहुत पूछा था, मगर उस ने बताया नहीं था.

‘उस का कहना था कि उस ने राधेश्याम से वादा किया है कि उस की प्रेमिका के बारे में वह किसी को कुछ नहीं बताएगा.’

‘गणपत कौन…’ उर्मिला ने पूछा.

‘वह हम लोगों के साथ ही रहता है. अभी वह गांव गया हुआ है. वह एक महीने बाद आएगा. आप पूछ कर देखिएगा. शायद, वह आप को बता दे.’

‘मगर, तब तक मैं रहूंगी कहां?’

‘चाहें तो आप इसी कमरे में रह सकती हैं. रात में हम लोग इधरउधर सो लेंगे.’

मगर उर्मिला उन लोगों के साथ रहने को तैयार नहीं हुई. उसे पति की बात याद आ गई थी.गांव से विदा लेते समय राधेश्याम ने उस से कहा था, ‘मैं तुम्हें ले जा कर अपने साथ रख सकता था, मगर दोस्तों पर भरोसा करना ठीक नहीं है.

‘वैसे तो वे बहुत अच्छे हैं. मगर कब उन की नीयत बदल जाए और तुम्हारी इज्जत पर दाग लगा दें, इस की कोई गारंटी नहीं है.’

उर्मिला अपने भाई रतन के साथ बड़ा बाजार की एक धर्मशाला में चली गई.

धर्मशाला में उसे सिर्फ 3 दिन रहने दिया गया. चौथे दिन वहां से उसे जाने के लिए कह दिया गया, तो मजबूर हो कर उसे धर्मशाला छोड़नी पड़ी.

अब उर्मिला अपने भाई रतन के साथ गंगा किनारे बैठी थी कि अचानक उस के पास एक 40 साला शख्स आया.

पहले उस ने उर्मिला को ध्यान से देखा, उस के बाद कहा, ‘‘लगता है कि तुम यहां पर नई हो. कहीं और से आई हो. काफी चिंता में भी हो. कोई परेशानी हो, तो बताओ. मैं मदद करूंगा…’’

मरहूम इरफ़ान खान की बहुत अंडररेटेड फ़िल्म है ये। ये साली ज़िंदगी। मेरे लिए ये उनकी टॉप 10 फ़िल्मों में से एक है।(मेरे लि...
08/02/2025

मरहूम इरफ़ान खान की बहुत अंडररेटेड फ़िल्म है ये। ये साली ज़िंदगी। मेरे लिए ये उनकी टॉप 10 फ़िल्मों में से एक है।(मेरे लिए हां। ज़रूरी नहीं सब ऐसा ही सोचें।) मैंने लैपटॉप पर देखी थी ये फ़िल्म। वो भी एचडी प्रिंट में। क्या प्रजेंटेशन है बॉस। सुधीर मिश्रा साहब की यही तो खासियत है। जो कहानी दूसरों के लिए मामूली होती है उन्हें सुधीर मिश्रा जी बड़े कायदे और सलीके से सेल्यूलॉयड पर पेश करते हैं। इस पूरी फ़िल्म में एक से एक खुर्राट कैरेक्टर हैं। लेकिन अरुण(इरफ़ान) और मेहता(सौरभ शुक्ला) सबसे बेस्ट हैं। पता नहीं क्यों? बड़ी कनैक्टिंग फ़ील होती है ये फ़िल्म। उन गुंडे बदमाशों की तरफ़ से नहीं हां। अरुण के कैरेक्टर की तरफ़ से। क्या है कि हमने अपने आस-पास भी कई ऐसे किस्से देखे हैं जिसमें लड़के किसी लड़की के लिए बड़ी-बड़ी भसड़ में पड़ते हैं और फ़िर किसी तरह सकुशल निकल भी आते हैं।

आज इस फ़िल्म के 14 साल पूरे हो गए हैं। 04 फ़रवरी 2011 को ये फ़िल्म रिलीज़ हुई थी। फ़िल्म का प्रदर्शन बहुत ख़ास नहीं रहा था। 11 करोड़ रुपए बजट था इस फ़िल्म का। और नेट कलैक्शन रहा था मात्र 10 करोड़ 94 लाख रुपए। और ये उस साल की, यानि 2011 की टॉप फ़िल्मों की लिस्ट में बहुत नीचे, 22वें स्थान पर रही थी। उस साल की टॉप तीन फ़िल्में थी बॉडीगार्ड, रेडी व सिंघम। मगर इस फ़िल्म के गाने अच्छे थे काफ़ी। मुझे तो बड़े पसंद आए थे। और सभी गाने पसंद आए थे। संगीत कंपोज़ किया था निशात खान ने। और सभी गीत लिखे थे स्वानदं किरकिरे जी ने। इस फ़िल्म के एक गीत की लाइन है "ज़िंदगी पे तेरा-मेरा किसी का ना ज़ोर है। हम सोचते हैं कुछ ये साली सोचती कुछ और है। ये ज़िंदगी। ये साली ज़िंदगी।" कभी चिल मूड में खुद को ले जाइए और तब ये गीत सुनिए। थैंक्स कहने खुद ब खुद आ जाएंगे आप।

06/02/2025

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