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•  मिलिए देशराज यादव से — 50 वर्ष के एक टैक्सी चालक, जो मुंबई के रहने वाले हैं।  > 26 जनवरी को उन्होंने एक अमेरिकी नागरि...
30/01/2026

• मिलिए देशराज यादव से — 50 वर्ष के एक टैक्सी चालक, जो मुंबई के रहने वाले हैं।

> 26 जनवरी को उन्होंने एक अमेरिकी नागरिक () को एयरपोर्ट से पिक किया। लालच में आकर उन्होंने केवल 400 मीटर की होटल दूरी के लिए उससे ₹18,000 वसूल लिए, जबकि सामान्य किराया ₹200 से अधिक नहीं होता।

> उस अमेरिकी महिला ने एक्स (X) पर अपनी कहानी पोस्ट की और मुंबई पुलिस को टैग किया।

> चार दिनों के भीतर देशराज गिरफ्तार हो गया। केवल लालच की वजह से उसकी पूरी ज़िंदगी बर्बाद हो गई, और उसका नाम बदनाम हो गया।

> अगर एक्स जैसा सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म न होता, तो यह संभव नहीं हो पाता। अपनी कमियों के बावजूद मुंबई पुलिस अब भी देश की सबसे बेहतरीन पुलिस फ़ोर्स है।

> भारत की छवि सुधारने के लिए मुंबई पुलिस को धन्यवाद, और देशराज यादव जैसे लोगों को शर्म आनी चाहिए जो उसे ख़राब करते हैं।

(तस्वीर AI जनरेटेड है!!)

आईआईटी हैदराबाद के 21 वर्षीय छात्र एडवर्ड नाथन वर्गीज ने नेदरलैंड्स की प्रमुख ट्रेडिंग फर्म ऑप्टिवर से 2.5 करोड़ रुपये स...
05/01/2026

आईआईटी हैदराबाद के 21 वर्षीय छात्र एडवर्ड नाथन वर्गीज ने नेदरलैंड्स की प्रमुख ट्रेडिंग फर्म ऑप्टिवर से 2.5 करोड़ रुपये सालाना का ऐतिहासिक जॉब ऑफर हासिल कर लिया है, जो संस्थान के 18 साल के इतिहास का सबसे ऊँचा पैकेज है।

यह सफलता कठिन जॉब मार्केट में भारतीय इंजीनियरिंग टैलेंट की वैश्विक माँग को दर्शाती है, जहाँ मात्र एक इंटरव्यू और दो महीने की इंटर्नशिप ने उन्हें सॉफ्टवेयर इंजीनियर के तौर पर जुलाई से नीदरलैंड्स ऑफिस में जगह दिला दी।

सपनों को हकीकत बनाने की प्रेरणा

एडवर्ड का सफर- हैदराबाद से बैंगलोर की पढ़ाई, जेईई एडवांस्ड में एआईआर 558, और कैट में 99.96 परसेंटाइल—हर उस छात्र के लिए आँसू भरी उम्मीद जगाता है जो रात-दिन मेहनत करता है।

कोडिंग, कॉम्पिटिटिव प्रोग्रामिंग और दबाव में फैसले लेने की उनकी कला ने साबित कर दिया कि मजबूत बेसिक्स और फोकस से दुनिया की टॉप कंपनियाँ झुक जाती हैं।भारत के युवाओं के लिए संदेशयह उपलब्धि पूरे देश के आकांक्षी छात्रों के दिलों में आग जला रही है- साबित हो गया कि आईआईटी का ताजा खून न सिर्फ मुकाबला कर सकता है, बल्कि ग्लोबल स्टेज पर चमक भी सकता है।एडवर्ड जैसे हीरो देखकर हर JEE क्रैकर सोचेगा, "मेरा भी टर्न आएगा!" क्योंकि मेहनत कभी बेकार नहीं जाती।

सौरभ द्विवेदी ने लल्लनटॉप से इस्तीफ़ा देकर अपने 12 साल के सफ़र को अलविदा कह दिया, जो इंडिया टुडे ग्रुप के डिजिटल न्यूज़ ...
05/01/2026

सौरभ द्विवेदी ने लल्लनटॉप से इस्तीफ़ा देकर अपने 12 साल के सफ़र को अलविदा कह दिया, जो इंडिया टुडे ग्रुप के डिजिटल न्यूज़ का एक महत्वपूर्ण अध्याय था।

उन्होंने गाँव की ज़मीनी हवा से लबरेज़ बातचीतों के ज़रिए लल्लनटॉप को हिंदी डिजिटल मीडिया का चहेता चैनल बना दिया, जहाँ देहाती किस्से और राजनीतिक चर्चाएँ लाखों लोगों को खींच लातीं।लेकिन उनकी पत्रकारिता पर सत्तारूढ़ दल के प्रति पक्षपात के गंभीर सवाल हमेशा खड़े रहे - बीजेपी समर्थकों पर कंडोम वाले तंज से लेकर अमित शाह के साथ डिनर वाली तस्वीर तक, जहाँ निष्पक्षता की बजाय 'चाटुकारिता' का आरोप लगा!

उनकी मेहनत ने लल्लनटॉप को करोड़ों युवाओं तक पहुँचाया, ख़ासकर नेटानगरी जैसी सीरीज़ से जो सवाल पूछने का हौसला देती थी।गाँव की बोली में राजनीति को परोसने का उनका अंदाज़ अनोखा था, जिसने हिंदी पत्रकारिता को नया रंग दिया।

फिर भी, कई मौक़ों पर उनकी रिपोर्टिंग में संतुलन की कमी दिखी- बीजेपी नेताओं को सॉफ्टबॉल फेंकना, विपक्ष पर कठोरता, और सोशल मीडिया ट्वीट्स जैसे कंडोम वाले व्यंग्य ने उनकी विश्वसनीयता पर बट्टा लगाया। अमित शाह के साथ तस्वीर और डिबेट्स में पक्ष लेने के आरोपों ने साबित किया कि निष्पक्ष पत्रकारिता से ज़्यादा, राजनीतिक झुकाव हावी रहा।

इस इस्तीफ़े के साथ सौरभ जी को सलाम उनकी क्रिएटिविटी का, लेकिन पत्रकारिता में सच्ची निष्पक्षता अपनाने की सीख भी।

उम्मीद है नई यात्रा में वे गाँव की चौपाल जैसी खुली, बिना पूर्वाग्रह वाली बातचीत लाएँगे, ताकि मीडिया की साख बचे।

17/08/2024

. Vinesh Phogat की माता जी, अपनी बेटी को लेने Bajrang Punia के साथ एयरपोर्ट पहुंची !!

अक्सर पूछा जाता है कि भगतसिंह का मुकदमा, मोहनदास करमचंद गांधी में क्यो नही लड़ा। तो पहली फोटो उस बन्दे की है, जिसने भगतस...
17/08/2024

अक्सर पूछा जाता है कि भगतसिंह का मुकदमा, मोहनदास करमचंद गांधी में क्यो नही लड़ा।

तो पहली फोटो उस बन्दे की है, जिसने भगतसिंह का केस लड़ा।

इनका परिचय दूं..
इसके पहले एक मजेदार घटना बताता हूँ।
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2020 में मैनें भक्तों की भीड़ पर रैंडम पत्थर फेंका। चार लोग चोटिल हुए। पूछताछ में पता चला,

उसमे से 3 इंजीनियर थे।
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यही रैंडम पत्थर अगर 1920 में देशभक्तों पर फेंका होता,

तो चार में से 3 वकील निकलते।

खराब एनॉलजी के लिए क्षमा, पर कवि कहना चाहता है कि जैसे आजकल सब लोग भरभरा के इंजीनियरिंग करते है..

तब लोग वकालत करते थे।
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मगर जैसे आज के इंजीनियरिंग पढ़े सारे लोग बिल्डिंग नही बनाते.

वैसे ही तब वकालत पढ़े सभी लोग, वकालत नही करते थे।

अब जवाहरलाल नेहरू को ले लो, महात्मा गांधी को ले लो। इनको न मानो, तो सावरकर को ले लो। ये लोग वकालत पढ़े, मगर जिंदगी में वकालत किये नही।

लेकिन उस दौर में पढ़े लिखे हर आदमी की डिग्री लॉ की ही मिलेगी। क्योकि उच्च शिक्षा का मतलब, बीए के बाद एलएलबी करना था।
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लेकिन ऐसे एलएलबी से आप मकान- दुकान- कत्ल का केस नही लड़वा सकते।

तो जैसे घर बनवाने के लिए जैसे कोई "प्रैक्टिसिंग इंजीनियर" चाहिए..

वैसे ही केस लड़ने के लिए एक "प्रैक्टिसिंग वकील" चाहिए।

और आसफ अली तो बहुतई प्रैक्टिसिंग वकील थे, एकदम राम जेठमलानी-कपिल सिब्बल, या दामिनी के सन्नी देओल टाइप।

उनका हाथ ढाई किलो का नही था, मगर लन्दन की प्रिवी काउंसिल के मेंबर रह चुके थे। तो कांग्रेस ने, बेस्ट क्रिमिनल लॉयर होने के नाते आसफ अली को ही भगतसिंग का केस लड़ने का जिम्मा दिया ।
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मगर भगतसिंह ने वकील लिया नही।
क्योकि उनको अपनी पैरवी खुद करनी थी।

उन्हें बचना नही था, बल्कि इरादा तो सीना ठोककर मरने का उद्यम करने का था। जब दिल में सरफरोशी की तमन्ना हो, तो वकील मददगार नही, रोड़ा होता है। उनको अपनी पैरवी खुद करनी थी।

क्योकि खुद खड़ा होकर, कोर्ट में फरफ़ारती स्पीच दें, तब तो रंग जमेगा। और उसके लिए स्पीच तगड़ी होनी चाहिए।
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तो वे, अपनी स्पीच के लीगल पहलू आसफ अली से ड्राफ्ट करवाते। पॉलीटिकल पहलू खुद तैयार करते। तब जाकर कोर्ट में झमाझम स्पीच निकलती।

अलबत्ता, बटुकेश्वर दत्त ने वकील लिया। आसफ अली ने उन्हें बचा भी लिया।

राजगुरु सुखदेव को भी आसफ अली ने रिप्रेजेन्ट किया। लेकिन हंसराज वोहरा की गवाही ने सब मटियामेट कर दिया। फिर इन लोगो मे भी भगतसिंह की तरह सीना ठोकना शुरू कर दिया।

कुछ लोग सर शादीलाल और शोभा सिंह को उनकी फांसी का दोषी बताते हैं। ये फालतू बात है।
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तो जब भगत की स्पीच ने देश भर में धुंआ धुआं कर दिया, सरकार की झुरझुरी छूट गयी। प्रेस का मजमा कोर्ट में मौजूद रहता, और एक एक शब्द रिपोर्ट करता। इस रिपोर्टिंग ने आग लगा दी।

सरकार झुलसने लगी तो उसे अब मुकदमा जनता की निगाह से दूर करना था। वह बिल लायी। ऐसा ट्रिब्यूनल बनाने का बिल, जिसमे आतंकी मामलों की बन्द कमरे में सुनवाई होती।

ये बिल, जब सेंट्रल असेम्बली में आया, वहां जिन्ना मौजूद थे। और जिन्ना भी, फ़ॉर योर काइंड इन्फो,
.वकील ही थे।
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मगर अब पोलिटीशयन थे।

और ये 1947 वाला जिन्ना नही था। अभी वे इंसान थे। बिल पर बहस में ब्रिटिश सरकार को जो खरी खोटी सुनाई, कि पूरी असेम्बली, इस बिल के खिलाफ हो गई।

बिल गिर गया।
पर सरकार अड़ी हुई थी।
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सरकारें जब सदन में फेल हो जाती हैं, तो ऑर्डिनेंस लाती हैं। तो यह ऑर्डिनेंस बनाकर लागू किया गया।

और बन्द दीवारो के पीछे, सजाये मौत मुकर्रर की गई। भगत, राजगुरु, सुखदेव शहीद हुए।
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बटुकेश्वर दत्त 1937-38 में रिहा हो गए। 1942 के आंदोलन में भाग भी लिया।

वे, और भगतसिंह वगैरह सब कम्युनिस्ट थे। तो बटुकेश्वर दत्त आगे चलकर कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य हो गए।

60 के दशक में सरकार ने उन्हें उत्तर प्रदेश विधानपरिषद का मेम्बर बनाया। पर वे त्यागी जीवन जिये, गरीबी में ही मरे।
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आसफ अली आजाद हिंद फौज के प्रकरण में भी डिफेन्स टीम में रहे। ये मामला POW और इंटरनेशनल लॉ से जुड़ा था, जिसमे नेहरू तगड़े वक्ता थे। तो INA केस में नेहरू भी करिया कोट डालकर गए।

मगर जिरह, आसफ अली और भूलाभाई देसाई ने अधिक की।
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उनकी पत्नी अरुणा आसफ अली 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन की स्टार थी। जो अरेस्ट ऑर्डर के बाद अंडर ग्राउंड होकर भी आंदोलन चलाती थी, और पुलिस को छकाती रहीं। जो अंत तक गिरफ्तार न कर सकी।

आने वाले समय मे आसफ अली नेहरू की अंतरिम कैबिनेट में रहने के बाद, अमरीका में भारत के प्रथम राजदूत नियुक्त हुए।

इसके बाद स्विट्जरलैंड के राजदूत रहते हुए 1953 में उनकी मृत्यु हुई।
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आसफ अली साहब बिजनौर के रहने वाले थे।

✍️ manish

23/11/2023

मैं एक सीधी लड़की हूँ, मैं नही चाहती मेरा बॉयफ्रेंड सिगरेट पीये,

लेकिन मैं तो पीता ही नही हूँ.

तो क्या हुआ, तुम नही पीते, तुम्हे ये कहना चाहिए, मैं तुम्हारे लिए सिगरेट छोड़ दूंगा।

मगर मैं क्यो कहूँ जब मैं नही पीता.

तुम्हे ये ज़िद की आदत भी बदलना होगा। जो पीता है उसको कहने में दिक्कत हो सकती है.. तुम तो पीते ही नही हो, फिर तुम्हे कहने में इतनी दिक्क्त क्यो हो रही, अगर तुम वाक़ई पीते होते, तो फिर तो कभी भी न कहते,

ओफ्फो! मैं छोड़ देता हूँ।

अब ये पैर ज़मीन में क्यो रगड़ रहे हो

जो इमैजिनेशन वाली जली हुई सिगरेट है उसे तो बुझा दूँ

अब तुम मेरा मज़ाक उड़ाओगे?

मैं भला तुम्हारा कैसे मज़ाक उड़ा सकता हूँ

ओह तो तुम मुझे इतना सख़्त समझते हो, मैं तुमपर इतना दबाव बनाती हूँ कि तुम मेरा मज़ाक तक नही उड़ा सकते,

तुम समझ नही रही हो,

हाँ हाँ मैं पागल हूँ मुझे तो कुछ समझ नही आता, मैंने तो इंजीनियरिंग बस यूँही हवा हवाई कर ली है, मुझे तो बस यूँ ही बेस्ट स्टूडेंट का अवार्ड मिलता रहा है

देखो मैं तुम्हारे टैलेंट पर सवाल नही कर रहा तुम हर फ़ील्ड में मुझसे तेज़ हो,

ये हर फ़ील्ड में तेज़ होने का क्या मतलब है? तुम्हे लगता है लड़ाई झगड़े में तेज़ हूँ, तुम कभी मुझे समझ नही सकते

हम्म।।

(फ़ायक इन मूड) रिपोस्ट

𝘗𝘢𝘱𝘢 𝘬𝘦𝘩𝘵𝘦 𝘵𝘩𝘦, 𝘣𝘢𝘥𝘢 𝘯𝘢𝘢𝘮 𝘬𝘢𝘳𝘦𝘨𝘢 🎵🇮🇳
17/09/2023

𝘗𝘢𝘱𝘢 𝘬𝘦𝘩𝘵𝘦 𝘵𝘩𝘦, 𝘣𝘢𝘥𝘢 𝘯𝘢𝘢𝘮 𝘬𝘢𝘳𝘦𝘨𝘢 🎵🇮🇳

What A Sight In ODI Cricket 🤩
17/09/2023

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If there is one man who should be credited for Siraj’s success apart from his hard work, it should be Virat Kohli.- When...
17/09/2023

If there is one man who should be credited for Siraj’s success apart from his hard work, it should be Virat Kohli.

- When Sunrisers Hyderabad sidelined Siraj in IPL, Virat Kohli picked him in RCB

- Kohli made Siraj debut in T20I under his captaincy

- Kohli made Siraj debut in ODI under his captaincy

- Once Siraj invited Kohli for Eid dawat in Hyd, Kohli went to his house and celebrated Eid when every other player was hesitant to go to his house in this new India.

If we want our Bharat to go stronger. We need secular players like Kohli and Siraj who follow their dharma and respect other dharmas too ❤️

This is Mohammed Ghaus, Father of Mohammed Siraj. He drove an auto rickshaw, struggled with poverty but did everything h...
17/09/2023

This is Mohammed Ghaus, Father of Mohammed Siraj.

He drove an auto rickshaw, struggled with poverty but did everything he could to make his son realise his dream.

Today, when Mohammed Siraj has become a star, he is not around.

How cruel life can be 💔

He is happy for you Siraj, wherever he is 🪽

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