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गबन की पूरी कहानी मुंशी प्रेमचंद ने मध्यवर्गीय भारतीय समाज की वास्तविकता, स्त्री की इच्छाओं और पति-पत्नी के संबंधों की ज...
08/10/2025

गबन की पूरी कहानी मुंशी प्रेमचंद ने मध्यवर्गीय भारतीय समाज की वास्तविकता, स्त्री की इच्छाओं और पति-पत्नी के संबंधों की जटिलता को केंद्र में रखकर लिखी है। यह कहानी प्रयाग के एक छोटे से गाँव के जमींदार के मुख्तार दीनदयाल और उनकी इकलौती पुत्री जालपा से शुरू होती है। जालपा को बचपन से ही आभूषणों, विशेषकर चन्द्रहार की लालसा थी। वह स्वप्न देखती थी कि विवाह के समय उसके लिए चन्द्रहार ज़रूर चढ़ेगा। जब उसका विवाह कचहरी में नौकर मुंशी दयानाथ के बेकार पुत्र रमानाथ से हुआ तो चढ़ावे में और गहने तो थे, चन्द्रहार न था। इससे जालपा को घोर निराशा हुई.

रमानाथ एक साधारण क्लर्क है, लेकिन अपनी पत्नी जालपा को खुश करने के लिए खुद को अमीर दिखाता है। जालपा को गहनों का बहुत शौक है, खासकर चन्द्रहार का। रमानाथ अपनी सीमित आय के बावजूद जालपा की इच्छाओं को पूरा करने के लिए कर्ज लेता है और अंततः गबन (चोरी) करने के लिए मजबूर हो जाता है। रतन नामक महिला अपने कंगनों के लिए रमानाथ को 600 रुपये देती है, लेकिन सर्राफ इन रुपयों को कर्ज खाते में जमा कर देता है और कंगन देने से इंकार कर देता है। रतन अपने रुपये वापस मांगती है, तो रमानाथ चुंगी के रुपये घर ले आता है। जालपा उन्हीं रुपयों को रतन को दे देती है। रमानाथ को गबन के मामले में सजा हो सकती थी, इसलिए वह घर छोड़कर कलकत्ता भाग जाता है.

कलकत्ता में रमानाथ देवीदीन खटिक के यहाँ कुछ दिनों तक गुप्त रूप से रहता है और चाय की दुकान खोल लेता है। एक दिन पुलिस उसे पकड़ लेती है और क्रांतिकारियों के मुकदमे में गवाह बना देती है। जालपा अपने गहने बेचकर चुंगी के रुपये लौटा देती है और रमानाथ को खोजते हुए कलकत्ता पहुँचती है। रतन भी कलकत्ता आती है और जालपा की मदद करती है। रमानाथ पुलिस के दबाव में गवाही देता है, लेकिन जालपा के पत्र से उसका मन बदल जाता है और वह जज के सामने सारी सच्चाई बता देता है। अंत में जज उसे निर्दोष मानता है और रमानाथ, जालपा, जोहरा आदि वापस प्रयाग के समीप रहने लगते हैं.

इस उपन्यास में प्रेमचंद ने दिखाया है कि कैसे स्त्री की इच्छाएं और पति की झूठी शान एक साधारण परिवार को संकट में डाल देती हैं। साथ ही, समाज की नैतिकता, पुलिस की तानाशाही और जन-जागृति के चित्रण के माध्यम से यह उपन्यास जीवन की असलियत को उजागर करता है.

आज मुंशी प्रेमचंद की पुण्यतिथि है—एक ऐसा दिन जब साहित्य प्रेमी उनकी यादों में डूब जाते हैं, और उनकी कहानियों की रोशनी फि...
08/10/2025

आज मुंशी प्रेमचंद की पुण्यतिथि है—एक ऐसा दिन जब साहित्य प्रेमी उनकी यादों में डूब जाते हैं, और उनकी कहानियों की रोशनी फिर से दिलों में जगमगाने लगती है.

एक गाँव के छोटे से घर में जन्मा धनपत राय, जिसे दुनिया मुंशी प्रेमचंद के नाम से जानती है, बचपन से ही संघर्षों से जूझता रहा। माँ-बाप का साया जल्दी उठ गया, लेकिन कलम का जादू उनके भीतर पलने लगा। गरीबी, समाज की कड़वी सच्चाई, और इंसानियत की तलाश—यही उनके जीवन की कहानी थी।

शुरुआत में “नवाब राय” नाम से लिखना शुरू किया, लेकिन अंग्रेजी हुकूमत ने उनकी पहली किताब जला दी। तब उन्होंने “प्रेमचंद” नाम अपनाया और हिंदी-उर्दू साहित्य को नई दिशा दी। उनकी कहानियाँ—गोदान, कफन, ईदगाह, गबन—हर आम आदमी की आवाज़ बन गईं। किसान की पीड़ा, औरत की मजबूरी, जाति का दर्द—प्रेमचंद ने सबको अपनी कलम से जिया।

उनकी आखिरी साँस तक साहित्य के लिए संघर्ष जारी रहा। आज, उनकी पुण्यतिथि पर, उनकी विरासत को सलाम करते हैं। प्रेमचंद ने सिखाया कि कहानी सिर्फ मनोरंजन नहीं, समाज को बदलने का हथियार है। उनकी रचनाएँ आज भी उतनी ही जीवंत हैं, जितनी उनके समय में थीं।

“कलम के जादूगर” को श्रद्धांजलि—उनकी कहानियाँ हमारे दिलों में हमेशा जिंदा रहेंगी.

08/10/2025

सुप्रभात।

आज आप कितने बजे उठे?!

07/10/2025

नालंदा विश्वविद्यालय: विश्व का सबसे पुराना विश्वविद्यालय

५वीं शताब्दी में, लगभग ४२७ ईस्वी में, बिहार के नालंदा में विश्व का पहला आवासीय विश्वविद्यालय स्थापित हुआ। इसे सम्राट कुमारगुप्त प्रथम ने बनवाया था। यह विश्वविद्यालय महायान बौद्ध धर्म और अनेक विषयों जैसे दर्शन, ज्योतिष, दर्शनशास्त्र, चिकित्सा, और साहित्य का केंद्र था। इस विश्वविद्यालय में १०,००० से अधिक विद्यार्थी और २००० से ज्यादा शिक्षक पढ़ते और पढ़ाते थे।

यहाँ चीन, कोरिया, तिब्बत, श्रीलंका और फारस जैसे दूर-दूर के देशों से विद्वान यहाँ शिक्षा लेने आते थे। ज्ञानी ह्वेनसांग और इत्सिंग जैसे चीनी यात्री ने इस विश्वविद्यालय की महानता और ठाठ-बाट का बखान किया है।

#नालंदा की महत्ता और ज्ञान का केंद्र
- यहाँ बौद्ध धर्म के साथ-साथ वेद, तर्कशास्त्र, भारतीय ग्रंथ, और संस्कृत भाषा की शिक्षा भी दी जाती थी।
- छात्रों में तीव्र वाद-विवाद और शोध की परंपरा थी।
- नालंदा विश्वविद्यालय को 'विश्व का ज्ञान मंदिर' कहा जाता था।

पुनर्जागरण और आधुनिक नालंदा
२०१० में भारत सरकार ने इस विश्वविद्यालय को पुनः स्थापित किया और इसे एक अंतरराष्ट्रीय शिक्षा केंद्र के रूप में विकसित किया।
२०१६ में नालंदा विश्वविद्यालय को यूनेस्को विश्व धरोहर स्थल घोषित किया गया।

#नालंदा #प्राचीनविश्वविद्यालय #इतिहास

05/10/2025

05/10/2025

#हिंदू धर्म में कौन सी लकड़ी को जलाया नहीं जाता?

कमेंट में बताएं।

05/10/2025

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