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15/06/2026
ज्ञान बिंदु कोचिंग से जुड़े रौशन आनंद के छोटे भाई प्रिंस यादव की नेपाल में हुई मौतकोचिंग विवाद में नेपाल में प्रिंस यादव...
14/06/2026

ज्ञान बिंदु कोचिंग से जुड़े रौशन आनंद के छोटे भाई प्रिंस यादव की नेपाल में हुई मौत

कोचिंग विवाद में नेपाल में प्रिंस यादव की मौत से उठा कई सवालों का धुंधलका, जांच के बाद ही सामने आएगी पूरी सच्चाई**

पटना के चर्चित कोचिंग विवाद के बीच एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने पूरे बिहार को स्तब्ध कर दिया है। ज्ञान बिंदु कोचिंग से जुड़े रौशन आनंद के छोटे भाई प्रिंस यादव की नेपाल में हुई मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि प्रिंस नेपाल के एक होटल में ठहरे हुए थे, जहां उनकी तबीयत बिगड़ने अथवा संदिग्ध परिस्थितियों में मौत होने की सूचना मिली। इस घटना के बाद नेपाल पुलिस ने तत्काल जांच शुरू कर दी है और उस समय उनके साथ मौजूद लोगों से पूछताछ की जा रही है।

प्रिंस यादव का नाम हाल ही में पटना में हुए चर्चित कोचिंग विवाद और खान ग्लोबल स्टडीज पर हमले से जुड़े मामले में सामने आया था। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद वह सार्वजनिक रूप से दिखाई नहीं दे रहे थे। इसी बीच नेपाल से आई उनकी मौत की खबर ने पूरे घटनाक्रम को और अधिक संवेदनशील बना दिया है।

इस दुखद घटना ने एक बार फिर यह याद दिलाया है कि विवाद, प्रतिस्पर्धा और संघर्ष की राह अंततः केवल तनाव और पीड़ा ही छोड़ जाती है। शिक्षा का क्षेत्र समाज को दिशा देने का माध्यम माना जाता है, जहां युवाओं के सपनों का निर्माण होता है। ऐसे में किसी भी प्रकार का टकराव न केवल संबंधित लोगों को प्रभावित करता है बल्कि हजारों विद्यार्थियों और उनके परिवारों की भावनाओं को भी झकझोर देता है।

फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जांच एजेंसियों को निष्पक्ष और स्वतंत्र रूप से अपना काम करने दिया जाए। अफवाहों, अटकलों और अपुष्ट दावों से बचते हुए सभी को आधिकारिक जांच रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए। सच्चाई चाहे जो भी हो, एक युवा जीवन का असमय समाप्त होना अत्यंत दुखद है और यह घटना सभी पक्षों के लिए आत्ममंथन का अवसर भी है।

अब सबकी निगाहें नेपाल पुलिस की जांच पर टिकी हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि जांच पूरी पारदर्शिता के साथ होगी और जो भी तथ्य सामने आएंगे, वे इस रहस्य से पर्दा उठाने का काम करेंगे। तब तक संवेदनशीलता, संयम और सत्य के प्रति सम्मान ही सबसे उचित मार्ग है।




जब अदालत के बाहर जीत गया इंसानियत का रिश्तादिल्ली की तीस हजारी कोर्ट के बाहर उस दिन लोगों की भीड़ हमेशा की तरह थी। वकील ...
12/06/2026

जब अदालत के बाहर जीत गया इंसानियत का रिश्ता

दिल्ली की तीस हजारी कोर्ट के बाहर उस दिन लोगों की भीड़ हमेशा की तरह थी। वकील अपनी फाइलों में व्यस्त थे, मुवक्किल अपनी-अपनी चिंताओं में डूबे हुए थे और अदालत की सीढ़ियों पर जिंदगी के अनगिनत मुकदमे चल रहे थे। लेकिन उसी भीड़ के बीच एक ऐसी कहानी लिखी जाने वाली थी, जिसने कानून की मोटी किताबों से कहीं अधिक इंसानियत की ताकत को साबित कर दिया।

शिखा सिंह और सौरभ सिंह कभी एक-दूसरे के जीवनसाथी थे। साथ जीने-मरने की कसमें खाने वाले ये दो लोग अब अदालत में आमने-सामने खड़े थे। दहेज, घरेलू हिंसा और मानसिक उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोपों ने उनके रिश्ते को अदालत की चौखट तक पहुंचा दिया था। महीनों से मुकदमे चल रहे थे। तारीख पर तारीख पड़ रही थी। दोनों परिवार आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक रूप से टूटते जा रहे थे।

सबसे ज्यादा चिंता शिखा के पिता को थी। बेटी का बिखरता घर और अदालतों के चक्कर उनकी उम्र और सेहत पर भारी पड़ रहे थे। कहते हैं कि एक पिता अपनी बेटी के दुख को सबसे ज्यादा महसूस करता है। शायद यही चिंता धीरे-धीरे उनके दिल पर बोझ बनती चली गई।

फिर एक दिन अचानक उन्हें दिल का दौरा पड़ा।

परिवार उन्हें सरकारी अस्पताल लेकर पहुंचा। हालत गंभीर थी। शिखा अपने पिता के बिस्तर के पास बैठी थी, लेकिन उसके मन में वर्षों की कड़वाहट, टूटे रिश्तों का दर्द और भविष्य की अनिश्चितता भी साथ बैठी थी।

उसी दौरान यह खबर सौरभ तक पहुंची।

जिस व्यक्ति पर आरोप थे, जो अदालत में विरोधी पक्ष बन चुका था, उसने उस पल कोई कानूनी पक्ष नहीं देखा। उसने केवल अपने बीमार ससुर को देखा, जो कभी उसे बेटे की तरह प्यार करते थे।

बताया जाता है कि सौरभ तुरंत अस्पताल पहुंचे। उन्होंने इलाज की बेहतर व्यवस्था कराई और अपने ससुर को गुरुग्राम के मेदांता अस्पताल में भर्ती कराया। डॉक्टरों की देखरेख में इलाज शुरू हुआ। कुछ दिनों बाद उनकी हालत में सुधार होने लगा।

शायद अस्पताल के उस कमरे में केवल एक मरीज का इलाज नहीं हो रहा था। वहां एक टूटे हुए रिश्ते की सांसें भी धीरे-धीरे लौट रही थीं।

समय बीता और अदालत में अगली सुनवाई का दिन आ गया।

तीस हजारी कोर्ट के बाहर दोनों फिर आमने-सामने थे। लेकिन इस बार माहौल अलग था। महीनों की नाराजगी के पीछे कहीं इंसानियत की एक किरण दिखाई देने लगी थी। शिखा के सामने वह व्यक्ति खड़ा था, जिसे वह अदालत में कटघरे में देख रही थी, लेकिन जिसने उसके पिता की जान बचाने के लिए हर संभव प्रयास किया था।

कुछ क्षणों की खामोशी के बाद शिखा ने अपने हाथ में मौजूद मुकदमे और तलाक से जुड़े कागजात देखे। उन कागजों में आरोप थे, शिकायतें थीं, गुस्सा था और बीते हुए दर्द की पूरी कहानी थी।

फिर अचानक उन्होंने वह कर दिया, जिसकी किसी ने कल्पना नहीं की थी।

उन्होंने उन कागजों को फाड़ दिया।

चारों तरफ खड़े लोग स्तब्ध रह गए। अगले ही पल शिखा आगे बढ़ीं और सौरभ को गले लगा लिया। महीनों की दूरियां कुछ सेकंड में सिमट गईं। अदालत के बाहर खड़े लोगों की आंखों में नमी थी। वहां मौजूद कई लोगों ने पहली बार देखा कि कभी-कभी रिश्तों के सबसे कठिन मुकदमे अदालत नहीं, बल्कि दिल हल करते हैं।

उस दिन कोई फैसला जज ने नहीं सुनाया था।

फैसला इंसानियत ने सुनाया था।

और शायद यही कारण है कि उस दिन तीस हजारी कोर्ट के बाहर मौजूद लोगों को कानून की ताकत से ज्यादा प्रेम, क्षमा और रिश्तों की कीमत महसूस हुई।

क्योंकि कुछ रिश्ते मुकदमों से नहीं, एक अच्छे इंसानी व्यवहार से बच जाते हैं।

राजेश प्रियम




दीदी मैं इमोशनली गलत हूँ, पर राजनीतिक रूप से सही : टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय का छलका दर्द टीएमसी में बड़ी बगावत! 20 सांसद...
11/06/2026

दीदी मैं इमोशनली गलत हूँ, पर राजनीतिक रूप से सही : टीएमसी सांसद शताब्दी रॉय का छलका दर्द

टीएमसी में बड़ी बगावत! 20 सांसदों ने एनडीए को समर्थन देने का किया दावा, शताब्दी रॉय बोलीं- राजनीतिक रूप से सही, लेकिन नैतिक रूप से गलत

पश्चिम बंगाल की सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) में असंतोष अब खुलकर सामने आ गया है। पार्टी के लगभग 20 लोकसभा सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को पत्र लिखकर एनडीए का समर्थन करने की इच्छा जताई है। इस घटनाक्रम ने मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पार्टी नेतृत्व के सामने एक बड़ा राजनीतिक संकट खड़ा कर दिया है।

सूत्रों के अनुसार, बागी सांसदों ने दावा किया है कि उनके साथ पार्टी के दो-तिहाई से अधिक सांसद हैं। इसी आधार पर उन्होंने अलग संसदीय समूह के रूप में मान्यता देने की मांग की है। यदि यह दावा सही साबित होता है, तो दल-बदल कानून के तहत उन्हें कानूनी सुरक्षा भी मिल सकती है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच टीएमसी सांसद और टॉलीवुड की चर्चित अभिनेत्री शताब्दी रॉय का बयान सुर्खियों में है। ममता बनर्जी के राजनीतिक संरक्षण में सार्वजनिक जीवन में आईं शताब्दी रॉय ने बागी सांसदों के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि राजनीतिक दृष्टि से उन्हें यह निर्णय सही लगता है, लेकिन भावनात्मक और नैतिक रूप से वे स्वयं को गलत महसूस करती हैं।

एक समाचार चैनल को दिए साक्षात्कार में शताब्दी रॉय ने कहा कि राजनीति में उनकी पहचान और सफर ममता बनर्जी के कारण संभव हुआ। ऐसे में पार्टी से अलग राह चुनना उनके लिए आसान नहीं है। उन्होंने स्वीकार किया कि यह फैसला उनके मन में भावनात्मक द्वंद्व पैदा कर रहा है।

उधर, टीएमसी नेतृत्व ने बागी सांसदों के दावों पर सवाल उठाए हैं। पार्टी नेताओं ने कहा है कि यह स्पष्ट नहीं है कि वास्तव में 20 सांसद उनके साथ हैं या नहीं। टीएमसी का दावा है कि पार्टी अभी भी एकजुट है और कुछ नेताओं द्वारा स्थिति को बढ़ा-चढ़ाकर प्रस्तुत किया जा रहा है।

राजनीतिक गलियारों में चर्चा है कि बागी सांसद फिलहाल सीधे भाजपा में शामिल होने के बजाय एनडीए को समर्थन देने की रणनीति पर काम कर रहे हैं। बताया जा रहा है कि इस संबंध में दिल्ली में कई दौर की बैठकों का आयोजन भी हुआ है।

विश्लेषकों का मानना है कि यदि बागी गुट अपने दावे के अनुसार सांसदों का समर्थन जुटाने में सफल रहता है, तो यह तृणमूल कांग्रेस के इतिहास का सबसे बड़ा संसदीय विभाजन साबित हो सकता है। साथ ही इसका प्रभाव पश्चिम बंगाल की राजनीति और राष्ट्रीय स्तर पर विपक्षी गठबंधन की रणनीति पर भी पड़ सकता है।

फिलहाल सभी की निगाहें लोकसभा अध्यक्ष के निर्णय और टीएमसी नेतृत्व की अगली राजनीतिक चाल पर टिकी हुई हैं। आने वाले दिनों में यह स्पष्ट होगा कि यह असंतोष एक बड़े राजनीतिक बदलाव का रूप लेता है या फिर पार्टी नेतृत्व इसे नियंत्रित करने में सफल रहता है।




45 वर्षीय पांच बच्चों की माँ को हुआ बेटे के उम्र के लड़के से प्यारप्यार, धर्म परिवर्तन और उम्र के बड़े फासले की अनोखी कह...
07/06/2026

45 वर्षीय पांच बच्चों की माँ को हुआ बेटे के उम्र के लड़के से प्यार

प्यार, धर्म परिवर्तन और उम्र के बड़े फासले की अनोखी कहानी: 45 वर्षीय पांच बच्चों की मां ने 19 वर्षीय युवक से रचाई शादी

बिहार से प्रेम प्रसंग, धर्म परिवर्तन और उम्र के बड़े अंतर से जुड़ा एक ऐसा मामला सामने आया है, जिसने लोगों को हैरान कर दिया है। 45 वर्षीय एक महिला, जो पांच बच्चों की मां है, ने अपने से 26 वर्ष छोटे 19 वर्षीय युवक से विवाह कर लिया है। इस रिश्ते की सबसे चर्चित बात यह है कि महिला ने शादी के लिए अपने जीवन में दूसरी बार धर्म परिवर्तन किया है।

जानकारी के अनुसार, महिला का मूल नाम बिंदू था। लगभग दस वर्ष पूर्व उसे पूर्णिया निवासी मनन आलम से प्रेम हुआ था। इसके बाद उसने हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया और उसका नाम सीमा परवीन हो गया। दोनों ने निकाह किया और उनके परिवार में पांच बच्चे भी हुए।

लेकिन अब सीमा परवीन की जिंदगी ने एक नया मोड़ ले लिया। बताया जा रहा है कि करीब दो वर्ष पहले एक रॉन्ग नंबर के जरिए उसकी बातचीत जमुई जिले के खैरा थाना क्षेत्र के खडुई बरियारपुर गांव निवासी महावीर ठाकुर से शुरू हुई। फोन पर हुई बातचीत धीरे-धीरे दोस्ती और फिर प्रेम संबंध में बदल गई।

प्रेम इतना गहरा हुआ कि सीमा अपने पति और बच्चों को छोड़कर कोलकाता पहुंच गई। वहां उसने महावीर ठाकुर के साथ एक मंदिर में हिंदू रीति-रिवाज से विवाह कर लिया। शादी के बाद दोनों ने एक वीडियो भी जारी किया, जो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो गया।

महावीर ठाकुर ने बताया कि दोनों के बीच पिछले दो वर्षों से बातचीत चल रही थी और इसी दौरान उनका रिश्ता मजबूत हुआ। उन्होंने कहा कि उन्हें सीमा के अतीत या उसकी उम्र से कोई फर्क नहीं पड़ता और वह उसके साथ ही जीवन बिताना चाहते हैं।

वहीं, सीमा उर्फ बिंदू ने अपने पूर्व पति मनन आलम पर प्रताड़ना का आरोप लगाया है। उसका कहना है कि वैवाहिक जीवन में लगातार परेशानियों के कारण उसने नया जीवन शुरू करने का फैसला किया।

दूसरी ओर, मनन आलम ने फोन पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए पत्नी के आरोपों को खारिज किया। उन्होंने दावा किया कि सीमा का व्यवहार शुरू से ही ठीक नहीं था और वह अब उसके साथ कोई संबंध नहीं रखना चाहते। मनन के अनुसार, उनके पांचों बच्चे फिलहाल उनके साथ ही रह रहे हैं।

मामले की जानकारी मिलने के बाद महावीर के गांव के कुछ लोगों ने खैरा थाने में शिकायत दर्ज कराई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने दोनों को पूछताछ के लिए बुलाया। पूछताछ के दौरान दोनों ने बालिग होने और अपनी इच्छा से साथ रहने की बात कही। इसके बाद पुलिस ने उन्हें वापस भेज दिया।

खैरा थाना अध्यक्ष मिंटू कुमार सिंह ने बताया कि ग्रामीणों की शिकायत पर दोनों से पूछताछ की गई थी। हालांकि, विवाह और धर्म परिवर्तन से जुड़े विभिन्न दावों की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।

यह मामला प्रेम, धर्म परिवर्तन, पारिवारिक रिश्तों और सामाजिक मान्यताओं को लेकर क्षेत्र में चर्चा का विषय बना हुआ है।



यह घटना केवल एक हादसे की कहानी नहीं, बल्कि मानवता, साहस और निस्वार्थ सेवा का ऐसा उदाहरण है जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएग...
02/06/2026

यह घटना केवल एक हादसे की कहानी नहीं, बल्कि मानवता, साहस और निस्वार्थ सेवा का ऐसा उदाहरण है जिसे लंबे समय तक याद रखा जाएगा।

दिल्ली के साकेत-मेहरौली क्षेत्र में इमारत गिरने की घटना के दौरान पार्वती ओझा, जिन्हें छात्र प्यार से "पार्वती आंटी" कहते थे, स्वयं सुरक्षित बाहर निकल आई थीं। लेकिन जब उन्हें याद आया कि अंदर अभी भी कई छात्र और ग्राहक मौजूद हैं, तो उन्होंने अपनी जान की परवाह किए बिना दोबारा अंदर जाकर लोगों को बाहर निकलने के लिए चेतावनी दी। दुर्भाग्यवश, उसी दौरान मलबा उनकी कैंटीन पर आ गिरा और उन्होंने अपने प्राण गंवा दिए। कई समाचार रिपोर्टों और प्रत्यक्षदर्शियों ने इस बात की पुष्टि की है कि वे छात्रों को बचाने के लिए वापस अंदर गई थीं।

नेपाल मूल की पार्वती ओझा की छोटी-सी कैंटीन छात्रों के लिए केवल भोजनालय नहीं थी, बल्कि घर से दूर रहने वाले युवाओं के लिए एक परिवार जैसी जगह थी। छात्र उन्हें मां समान मानते थे और उनकी सादगी, स्नेह तथा मददगार स्वभाव को हमेशा याद करेंगे।

उनकी स्मृति को नमन करते हुए एक श्रद्धांजलि—

"कुछ लोग जीवन जीते हैं, और कुछ लोग जीवन का अर्थ बन जाते हैं।
पार्वती आंटी उन्हीं महान आत्माओं में से एक थीं।
उन्होंने अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए जीना चुना और अंततः दूसरों को बचाने के प्रयास में अपने प्राण न्यौछावर कर दिए।
ऐसे लोग शरीर से भले ही विदा हो जाएं, लेकिन उनके कर्म सदैव अमर रहते हैं।
ईश्वर दिवंगत आत्मा को अपने श्रीचरणों में स्थान दें और शोकाकुल परिवार को यह असहनीय दुःख सहने की शक्ति प्रदान करें।
भावपूर्ण श्रद्धांजलि। 🌹🙏"

पार्वती आंटी अमर रहें।🌹

बिहार की धरती हमेशा से संघर्ष, संवेदना और समाजसेवा की मिसाल रही है। इसी धरती पर आज एक ऐसा नाम तेजी से लोगों के बीच विश्व...
21/05/2026

बिहार की धरती हमेशा से संघर्ष, संवेदना और समाजसेवा की मिसाल रही है। इसी धरती पर आज एक ऐसा नाम तेजी से लोगों के बीच विश्वास का पर्याय बनता जा रहा है — गुड़िया कुमारी।

वह केवल एक नाम नहीं, बल्कि उन बेबस, पीड़ित और जरूरतमंद महिलाओं की उम्मीद हैं, जिनकी आवाज अक्सर समाज की भीड़ में दब जाती है।

जहां आज कई लोग केवल मंचों और भाषणों तक सीमित रह जाते हैं, वहीं गुड़िया कुमारी जमीन पर उतरकर महिलाओं की समस्याओं को समझने और उनके समाधान के लिए निरंतर संघर्ष करती दिखाई देती हैं। उनके कार्यों में दिखावा नहीं, बल्कि सेवा की सच्ची भावना झलकती है। शायद यही कारण है कि महिला कल्याण मंच, बिहार से जुड़ी मातृशक्ति आज समाज में सकारात्मक परिवर्तन की मिसाल बन रही है।

गुड़िया कुमारी का मानना है कि जीवन केवल बड़ी-बड़ी बातें करने का नाम नहीं, बल्कि छोटी-छोटी संवेदनाओं को समझने का नाम है। किसी गरीब महिला की पीड़ा सुन लेना, किसी असहाय मां को न्याय दिलाने के लिए आगे आना, किसी बेटी के आत्मसम्मान की रक्षा के लिए आवाज उठाना — यही उनके जीवन का वास्तविक उद्देश्य प्रतीत होता है।

पिछले कुछ समय में जिस प्रकार महिला कल्याण मंच ने बिहार के विभिन्न क्षेत्रों में महिलाओं के हक, सम्मान और सुरक्षा के लिए सक्रिय भूमिका निभाई है, वह समाज के लिए प्रेरणादायक है। हर कार्यक्रम में गुड़िया कुमारी की सक्रियता, उनकी सहजता और महिलाओं के प्रति समर्पण साफ दिखाई देता है। वे केवल नेतृत्व नहीं करतीं, बल्कि हर पीड़ित महिला के दुख को अपना समझकर उसके साथ खड़ी भी नजर आती हैं।

समाजसेवा का रास्ता कभी आसान नहीं होता। इस मार्ग में आलोचनाएं भी मिलती हैं, नकारात्मक टिप्पणियां भी सुननी पड़ती हैं। लेकिन मजबूत इरादों वाले लोग इन्हीं चुनौतियों को अपनी ताकत बना लेते हैं। गुड़िया कुमारी भी उन्हीं व्यक्तित्वों में शामिल हैं, जो विरोध और कठिनाइयों के बावजूद अपने लक्ष्य से पीछे नहीं हटतीं।

आज जरूरत इस बात की है कि समाज ऐसी मातृशक्ति का मनोबल बढ़ाए। क्योंकि जब कोई महिला दूसरी महिलाओं की सुरक्षा, सम्मान और अधिकारों के लिए खड़ी होती है, तब वह केवल एक व्यक्ति नहीं रहती, बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाती है।

निश्चित रूप से आने वाले समय में महिला कल्याण मंच, बिहार और गुड़िया कुमारी का यह प्रयास हजारों महिलाओं के जीवन में नई रोशनी, नया आत्मविश्वास और नई उम्मीद लेकर आएगा।
उनकी यह सेवा भावना समाज के लिए एक जीवंत संदेश है —
“सच्ची ताकत दूसरों को दबाने में नहीं, बल्कि टूटे हुए मन को सहारा देने में होती है।”

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