Vats Devotional Bhajan Offical

Vats Devotional Bhajan Offical जय श्री श्याम

27/05/2026
| मेरा सर्वेश्वर मेरा श्याम ||जय श्री श्याम जी 🙏🌸बाबा श्याम के भव्य संध्या श्रृंगार श्री श्याम दर्शन13 दिसम्बर 2025 शनिव...
13/12/2025

| मेरा सर्वेश्वर मेरा श्याम ||

जय श्री श्याम जी 🙏🌸

बाबा श्याम के भव्य संध्या श्रृंगार श्री श्याम दर्शन

13 दिसम्बर 2025 शनिवार
पौष, कृष्ण पक्ष, नवमी।, विक्रम सम्वत 2082




#मेरा_सर्वेश्वर_मेरा_श्याम

रमा  एकादशी व्रत कथाॐ श्री श्याम देवाय नमः मेरा सर्वेश्वर मेरा श्याम  धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! कार्तिक कृ...
28/10/2024

रमा एकादशी व्रत कथा

ॐ श्री श्याम देवाय नमः
मेरा सर्वेश्वर मेरा श्याम

धर्मराज युधिष्ठिर कहने लगे कि हे भगवान! कार्तिक कृष्ण एकादशी का क्या नाम है? इसकी विधि क्या है? इसके करने से क्या फल मिलता है। सो आप विस्तारपूर्वक बताइए। भगवान श्रीकृष्ण बोले कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम रमा है। यह बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली है। इसका माहात्म्य मैं तुमसे कहता हूँ, ध्यानपूर्वक सुनो।
हे राजन! प्राचीनकाल में मुचुकुंद नाम का एक राजा था। उसकी इंद्र के साथ मित्रता थी और साथ ही यम, कुबेर, वरुण और विभीषण भी उसके मित्र थे। यह राजा बड़ा धर्मात्मा, विष्णुभक्त और न्याय के साथ राज करता था। उस राजा की एक कन्या थी, जिसका नाम चंद्रभागा था। उस कन्या का विवाह चंद्रसेन के पुत्र शोभन के साथ हुआ था। एक समय वह शोभन ससुराल आया। उन्हीं दिनों जल्दी ही पुण्यदायिनी एकादशी (रमा) भी आने वाली थी।
जब व्रत का दिन समीप आ गया तो चंद्रभागा के मन में अत्यंत सोच उत्पन्न हुआ कि मेरे पति अत्यंत दुर्बल हैं और मेरे पिता की आज्ञा अति कठोर है। दशमी को राजा ने ढोल बजवाकर सारे राज्य में यह घोषणा करवा दी कि एकादशी को भोजन नहीं करना चाहिए। ढोल की घोषणा सुनते ही शोभन को अत्यंत चिंता हुई औ अपनी पत्नी से कहा कि हे प्रिये! अब क्या करना चाहिए, मैं किसी प्रकार भी भूख सहन नहीं कर सकूँगा। ऐसा उपाय बतलाओ कि जिससे मेरे प्राण बच सकें, अन्यथा मेरे प्राण अवश्य चले जाएँगे।
चंद्रभागा कहने लगी कि हे स्वामी! मेरे पिता के राज में एकादशी के दिन कोई भी भोजन नहीं करता। हाथी, घोड़ा, ऊँट, बिल्ली, गौ आदि भी तृण, अन्न, जल आदि ग्रहण नहीं कर सकते, फिर मनुष्य का तो कहना ही क्या है। यदि आप भोजन करना चाहते हैं तो किसी दूसरे स्थान पर चले जाइए, क्योंकि यदि आप यहीं रहना चाहते हैं तो आपको अवश्य व्रत करना पड़ेगा। ऐसा सुनकर शोभन कहने लगा कि हे प्रिये! मैं अवश्य व्रत करूँगा, जो भाग्य में होगा, वह देखा जाएगा।
धर्मराज युधिष्ठिर द्वारा कार्तिक कृष्ण एकादशी का नाम, इसकी विधि, उसका फल कैसे मिलता हैं यह मिलता है यह विस्तारपूर्वक बताइए। ऐसा पूछने पर भगवान श्रीकृष्ण बोले कि कार्तिक कृष्ण पक्ष की एकादशी का नाम रमा है। यह बड़े-बड़े पापों का नाश करने वाली है।
इस प्रकार से विचार कर शोभन ने व्रत रख लिया और वह भूख व प्यास से अत्यंत पीडि़त होने लगा। जब सूर्य नारायण अस्त हो गए और रात्रि को जागरण का समय आया जो वैष्णवों को अत्यंत हर्ष देने वाला था, परंतु शोभन के लिए अत्यंत दु:खदायी हुआ। प्रात:काल होते शोभन के प्राण निकल गए। तब राजा ने सुगंधित काष्ठ से उसका दाह संस्कार करवाया। परंतु चंद्रभागा ने अपने पिता की आज्ञा से अपने शरीर को दग्ध नहीं किया और शोभन की अंत्येष्टि क्रिया के बाद अपने पिता के घर में ही रहने लगी।
रमा एकादशी के प्रभाव से शोभन को मंदराचल पर्वत पर धन-धान्य से युक्त तथा शत्रुओं से रहित एक सुंदर देवपुर प्राप्त हुआ। वह अत्यंत सुंदर रत्न और वैदुर्यमणि जटित स्वर्ण के खंभों पर निर्मित अनेक प्रकार की स्फटिक मणियों से सुशोभित भवन में बहुमूल्य वस्त्राभूषणों तथा छत्र व चँवर से विभूषित, गंधर्व और अप्सराअओं से युक्त सिंहासन पर आरूढ़ ऐसा शोभायमान होता था मानो दूसरा इंद्र विराजमान हो।
एक समय मुचुकुंद नगर में रहने वाले एक सोम शर्मा नामक ब्राह्मण तीर्थयात्रा करता हुआ घूमता-घूमता उधर जा निकला और उसने शोभन को पहचान कर कि यह तो राजा का जमाई शोभन है, उसके निकट गया। शोभन भी उसे पहचान कर अपने आसन से उठकर उसके पास आया और प्रणामादि करके कुशल प्रश्न किया। ब्राह्मण ने कहा कि राजा मुचुकुंद और आपकी पत्नी कुशल से हैं। नगर में भी सब प्रकार से कुशल हैं, परंतु हे राजन! हमें आश्चर्य हो रहा है। आप अपना वृत्तांत कहिए कि ऐसा सुंदर नगर जो न कभी देखा, न सुना, आपको कैसे प्राप्त हुआ।
तब शोभन बोला कि कार्तिक कृष्ण की रमा एकादशी का व्रत करने से मुझे यह नगर प्राप्त हुआ, परंतु यह अस्थिर है। यह स्थिर हो जाए ऐसा उपाय कीजिए। ब्राह्मण कहने लगा कि हे राजन! यह स्थिर क्यों नहीं है और कैसे स्थिर हो सकता है आप बताइए, फिर मैं अवश्यमेव वह उपाय करूँगा। मेरी इस बात को आप मिथ्या न समझिए। शोभन ने कहा कि मैंने इस व्रत को श्रद्धारहित होकर किया है। अत: यह सब कुछ अस्थिर है। यदि आप मुचुकुंद की कन्या चंद्रभागा को यह सब वृत्तांत कहें तो यह स्थिर हो सकता है।
ऐसा सुनकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने अपने नगर लौटकर चंद्रभागा से सब वृत्तांत कह सुनाया। ब्राह्मण के वचन सुनकर चंद्रभागा बड़ी प्रसन्नता से ब्राह्मण से कहने लगी कि हे ब्राह्मण! ये सब बातें आपने प्रत्यक्ष देखी हैं या स्वप्न की बातें कर रहे हैं। ब्राह्मण कहने लगा कि हे पुत्री! मैंने महावन में तुम्हारे पति को प्रत्यक्ष देखा है। साथ ही किसी से विजय न हो ऐसा देवताओं के नगर के समान उनका नगर भी देखा है। उन्होंने यह भी कहा कि यह स्थिर नहीं है। जिस प्रकार वह स्थिर रह सके सो उपाय करना चाहिए।
चंद्रभागा कहने लगी हे विप्र! तुम मुझे वहाँ ले चलो, मुझे पतिदेव के दर्शन की तीव्र लालसा है। मैं अपने किए हुए पुण्य से उस नगर को स्थिर बना दूँगी। आप ऐसा कार्य कीजिए जिससे उनका हमारा संयोग हो क्योंकि वियोगी को मिला देना महान पु्ण्य है। सोम शर्मा यह बात सुनकर चंद्रभागा को लेकर मंदराचल पर्वत के समीप वामदेव ऋषि के आश्रम पर गया। वामदेवजी ने सारी बात सुनकर वेद मंत्रों के उच्चारण से चंद्रभागा का अभिषेक कर दिया। तब ऋषि के मंत्र के प्रभाव और एकादशी के व्रत से चंद्रभागा का शरीर दिव्य हो गया और वह दिव्य गति को प्राप्त हुई।
इसके बाद बड़ी प्रसन्नता के साथ अपने पति के निकट गई। अपनी प्रिय पत्नी को आते देखकर शोभन अति प्रसन्न हुआ। और उसे बुलाकर अपनी बाईं तरफ बिठा लिया। चंद्रभागा कहने लगी कि हे प्राणनाथ! आप मेरे पुण्य को ग्रहण कीजिए। अपने पिता के घर जब मैं आठ वर्ष की थी तब से विधिपूर्वक एकादशी के व्रत को श्रद्धापूर्वक करती आ रही हूँ। इस पुण्य के प्रताप से आपका यह नगर स्थिर हो जाएगा तथा समस्त कर्मों से युक्त होकर प्रलय के अंत तक रहेगा। इस प्रकार चंद्रभागा ने दिव्य आभू‍षणों और वस्त्रों से सुसज्जित होकर अपने पति के साथ आनंदपूर्वक रहने लगी।
हे राजन! यह मैंने रमा एकादशी का माहात्म्य कहा है, जो मनुष्य इस व्रत को करते हैं, उनके ब्रह्म हत्यादि समस्त पाप नष्ट हो जाते हैं। कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष दोनों की एका‍दशियाँ समान हैं, इनमें कोई भेदभाव नहीं है। दोनों समान फल देती हैं। जो मनुष्य इस माहात्म्य को पढ़ते अथवा सुनते हैं, वे समस्त पापों से छूटकर विष्णुलोक को प्राप्त होता हैं।

जय श्री श्याम जी
Radhey Shyam Vats

पुत्रदा एकादशी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।🙏
16/08/2024

पुत्रदा एकादशी की आप सभी को हार्दिक शुभकामनाएं।🙏

जीवनी श्री श्याम सुंदर शर्मा (पालम वाले)19 मार्च 1948 से 23 अक्टूबर 2013"जननी जने तो भक्तजन, या दाता या शूरनहीं तो जननी ...
19/03/2024

जीवनी श्री श्याम सुंदर शर्मा (पालम वाले)
19 मार्च 1948 से 23 अक्टूबर 2013

"जननी जने तो भक्तजन, या दाता या शूर
नहीं तो जननी बांझ रहे, काहे गवाएं नूर"

महान है वह माँ (गोमती देवी) जिसने श्याम सुंदर जैसे लाल को जन्म देकर श्याम जगत को कृतार्थ किया। ऐसी माँ को शत शत नमन।

हरियाणा के भिवानी शहर में श्री श्याम सुंदर शर्मा जी का जन्म 19 मार्च 1948 को हुआ। इनके दादा जी वैद्य मात्तृदत्त शर्मा जी श्याम बाबा के अनन्य भक्त रहे और श्री श्याम बहादुर जी एवं श्री आलू सिंह जी महाराज जैसे अनन्य भक्तों के साथ मिलकर इनके दादा जी ने श्याम बाबा के प्रचार प्रसार में अपना अमूल्य योगदान दिया। वैद्य मात्तृदत्त जी वैद्य होने के साथ-साथ श्री श्याम प्रभु खाटू वाले के भजनों के रचयिता भी थे। ऐसे श्याम भक्तों की शरण में रहकर श्री श्याम सुंदर शर्मा जी को भी श्याम नाम की ऐसी लगन लगी कि इन्होंने अपना सारा जीवन श्याम भक्ति और श्याम बाबा के प्रचार प्रसार में समर्पित कर दिया।

श्री श्याम प्रभु की श्री श्याम सुंदर शर्मा जी पर असीम कृपा थी और इसी कृपा के चलते 16 साल की उम्र से ही इन्होंने श्याम भजनों की रचना करना एवं उन्हें गा करके श्याम प्रभु का प्रचार करना शुरू कर दिया था। अपने शहर भिवानी ही नहीं अपितु दिल्ली,अमृतसर,भटिंडा,बीकानेर, फतेहाबाद,हिसार,हांसी, हैदराबाद,कोलकाता, मुंबई, बेंगलुरु, बिहार, चरखी दादरी,सासरोली झज्जर,बहादूरगढ़,आसनसोल,खलीलाबाद, अहमदाबाद,महेंद्रगढ़,गुड़गांव,सिलीगुड़ी, बस्ती,नागपुर, कानपुर, छत्तीसगढ़, विराटनगर, धौलाबाड़ी,काठमांडू नेपाल, बंगाल और ना जाने कितने ही गांव में देहात और विदेशों में भी बाबा श्याम नाम का डंका इन्होंने बनवाया। आज भी देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी इनके द्वारा स्थापित किए गए श्याम मंडल श्री श्याम प्रभु के प्रचार प्रसार में अग्रसर है।

श्री श्याम सुंदर शर्मा जी को लेख लिखने में ऐसी महारत हासिल थी कि वह अकस्मात चलते-चलते या उठते बैठते ही श्याम भजनों की रचना कर डालते थे। इनकी लेखनी में ऐसा जादू था कि इनके द्वारा रचित भजनों को सुन कर श्याम बाबा को न जानने वाले भी श्याम प्रेमी बन जाते थे। इन्होंने अपने भजनों में ना सिर्फ हिंदी भाषा बल्कि बंगाली, हरियाणवी, मारवाड़ी एवं पंजाबी जैसी भाषाओं का प्रयोग भी किया। श्री श्याम सुंदर शर्मा जी ने लगभग 3000 से भी ज्यादा श्याम भजनों की रचना की।

इन्होंने ना सिर्फ श्याम भजनों की रचना की इसके अलावा भी अन्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एवं देशभक्ति के गीतों की भी रचना की जिन्हें सुनकर आज के युवा वर्ग को भी देश सेवा और देश भक्ति करने की प्रेरणा मिलती है।

इनके दादा वैद्य मातृदत्त जी के द्वारा श्याम प्रभु को प्रतिवर्ष "श्री श्याम गीत पुष्पांजलि पुस्तक स्वरूप भेंट करने की परंपरा को भी इन्होंने जीवित रखा और प्रतिवर्ष अपने दादाजी की तर्ज पर बाबा श्याम को श्री श्याम गीत पुष्पांजली पुस्तक के रूप में समर्पित करते रहे एवं अंततः सभी श्याम गीत पुष्पांजलिओं को एक ग्रंथ के रूप में सलंग्न किया।

श्याम प्रभु के अनेकों चमत्कारों का वर्णन वे अपने भजनों ( मोर छड़ी का झाड़ा तू लगवा कर देख ले ) के माध्यम से भक्तों के समक्ष किया करते थे। इनके जीवन में श्याम प्रभु ने इतने चमत्कार किए हैं कि उनको बताने के लिए शायद हमारे पास वह शब्द नहीं है जिस प्रकार से वह स्वयं बाबा श्याम के चमत्कारों का वर्णन किया करते थे। हां हम इतना जरूर कह सकते हैं कि श्री श्याम सुंदर शर्मा जी जैसे व्यक्तित्व का जन्म बाबा श्याम के प्रचार और गुणगान करने के लिए होना ही किसी चमत्कार से कम नहीं था।

"ॐ श्री श्याम देवाय नमः"

इस महामंत्र को सुनकर श्याम बाबा के भक्तों को जिस शक्ति एवं सुकून का अनुभव होता है उसका आनंद तो श्याम का एक सच्चा प्रेमी ही बता सकता है परंतु ऐसे भक्तों की संख्या बहुत ही कम है जो यह जानते हैं कि इस मंत्र की रचना भी श्री श्याम सुंदर शर्मा जी (पालम वाले) के द्वारा ही की गई थी। इस मंत्र को श्री श्याम सुंदर शर्मा जी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि भी माना।

"ॐ श्री श्याम देवाय नमः" महामंत्र श्याम जगत को श्री श्याम सुंदर शर्मा जी की ओर से अमूल्य देन है जिसका जाप करके अनेकों भक्तों ने अपनी बिगड़ी बात बाबा श्याम से मनवाई है।

श्री श्याम सुंदर शर्मा जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हरियाणा के भिवानी शहर से शुरू की। बाद में वे भिवानी शहर को छोड़कर सन 1954 में दिल्ली शहर के दिल्ली छावनी कॉलोनी में आकर रहे और अंततः पालम में सन 1967 में आकर बसे। इसी स्थान पर रहकर इन्होंने बाबा श्याम के नाम का इतना प्रचार प्रसार किया कि लोग इन्हें श्याम सुंदर शर्मा जी (पालम वाले) के नाम से जानने लगे।

अपनी शिक्षा इन्होंने भिवानी, रेवाड़ी, गुड़गांव एवं दिल्ली से प्राप्त की। हिंदी विषय पर डबल एम ए करने के पश्चात इन्होंने आयुर्वेदाचार्य की डिग्री भी हासिल की।

बाबा श्याम की कृपा से इन्हें ना सिर्फ दिल्ली सरकार में क्लर्क के पद पर नियुक्त किया गया बल्कि इन्होंने जीवन में आगे बढ़ते हुए असिस्टेंट अससेर एंड कलेक्टर के पद तक पदोन्नति को भी प्राप्त किया। जीवन के इस प्रकरण को भी वे सिर्फ और सिर्फ श्याम प्रभु की ही कृपा मानते थे।

जीवन में आने वाली सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक एवं शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद भी इन्होंने कभी भी श्याम प्रभु का गुणगान नहीं छोड़ा। मधुमेह एवं उच्च रक्तचाप एवं दोनों गुर्दे खराब होने के बाद भी इन्होंने अपने भजनों से बाबा श्याम को खूब रिझाया। श्याम बाबा को ही इन्होंने अपना सब कुछ माना और श्याम प्रभु से ही इन्हें ऐसी अनूठी शक्ति मिलती रही जिसके चलते इन्होंने श्याम जगत को श्याम बाबा की सेवा करने और इनसे जुड़े रहने की प्रेरणा दी।

आज के दौर में न जाने कितने लोग श्याम बाबा के नाम से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। कोई माने चाहे ना माने कहीं ना कहीं हमें मानना पड़ेगा की आज के इस दौर में जितने भी लोग श्याम प्रभु के नाम से कमाई करके खा रहे हैं तथा इतने सारे लोगों को रोजगार मिलना कहीं ना कहीं श्री श्याम सुंदर शर्मा जी (पालम वाले) की ही कोशिशों का नतीजा है।

"श्याम तुम्हारो नाम है और श्याम है मेरो नाम
श्याम श्याम रटता रहूं तो श्याम है जीवन प्राण"

श्री श्याम सुंदर शर्मा जी पालम वाले द्वारा रचित इस दोहे को विरले ही श्याम जगत कभी भुला पाएगा।

श्री श्याम सुंदर शर्मा जी ने दिन-रात श्याम प्रभु का गुणगान करके दिल्ली के जनकपुरी डी ब्लॉक में भव्य श्री श्याम मंदिर का निर्माण करवाया जिसे "श्री चौरसिया ब्राह्मण सभा प्रबंधक समिति रजिस्टर्ड" द्वारा सुचारू रूप से चलाया जा रहा है एवं श्री खाटू श्याम जी में "श्री श्याम सरकार चैरिटेबल ट्रस्ट रजिस्टर्ड पालम" के नाम से धर्मशाला का निर्माण भी करवाया।

इनका मानना था कि श्याम बाबा और श्याम बाबा के भक्तों की सेवा निरंतर होती रहे और शायद इसी के चलते श्री खाटू श्याम जी में "श्री श्याम सरकार चैरिटेबल ट्रस्ट रजिस्टर्ड पालम" का निर्माण अनेकों श्री श्याम के दानी भक्तों के सहयोग से किया गया जिसे श्याम सुंदर शर्मा जी से जुड़े अन्य दानी भक्तजन एवं अन्य सदस्य साथ मिलकर बड़ी ही निष्ठा लगन की भावना से सुचारू रूप से चला रहे हैं।

इनके पिताजी डॉक्टर जगदीश चंद्र शर्मा जी पहले निगम पार्षद एवं बाद में दिल्ली सरकार के हेल्थ डिपार्टमेंट में चेयरमैन रहे एवं इन्होंने भी बाबा श्याम के रंग में खुद को रंग कर श्याम प्रभु का प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।

श्री श्याम सुंदर जी का विवाह सन 1966 में सुमित्रा रानी शर्मा निवासी (चांदनी चौक) से हुआ इनकी धर्मपत्नी ने अपने घर की जिम्मेदारियों को निभाते हुए और इनकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का ध्यान रखते हुए श्याम प्रभु के प्रचार करने में इनका पूर्ण रूप से सहयोग किया तथा कभी भी श्री श्याम सुंदर शर्मा जी को घर की तरफ से चिंतित नहीं होने दिया। यह भी बाबा श्याम का ही आशीर्वाद था कि उन्हें ऐसी धर्मपत्नी मिली जो धार्मिक विचारों से ओतप्रोत थी एवं जिन्होंने बाबा श्याम की और हम सबके प्यारे श्री श्याम सुंदर शर्मा जी की दिन-रात सेवा की।

श्री श्याम प्रभु के आशीर्वाद से इनके परिवार में धर्मपत्नी सुमित्रा रानी शर्मा 3 पुत्र दीपक शर्मा संजू शर्मा एवं कुलदीप शर्मा तीन पुत्रवधू तथा पांच पोतिया एवं दो पोत्र हैं।

अपने अंतिम समय तक श्री श्याम नाम का गुणगान करते हुए एवं श्याम बाबा से दुख सुख की घड़ियों में भी जुड़े रहने की प्रेरणा देकर हम सबके प्यारे श्री श्याम सुंदर शर्मा जी 23 अक्टूबर 2013 को हमेशा हमेशा के लिए अपने प्यारे बाबा श्याम की शरण में चले गए। ऐसे महान व्यक्तित्व वाले श्री श्याम सुंदर शर्मा जी पालम वाले की कमी को श्याम जगत शायद ही कभी पूरा कर पाएगा।

श्याम बाबा के अनन्य भक्तों में शामिल श्री श्याम सुंदर शर्मा जी सुंदर थे, सुंदर है और श्याम भक्तों के दिलों में हमेशा सुंदर रहेंगे।

श्री श्याम सुंदर शर्मा जी के बाबा श्याम की शरण में जाने के बाद अब उनके पुत्र दीपक शर्मा संजू शर्मा कुलदीप शर्मा पुत्रवधु शोभा शर्मा इनकी पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही श्याम बाबा के प्रचार एवं गुणगान करने की परंपरा को आगे बढ़ाने में योगदान कर रहे हैं। और हर एक एकादशी को खाटू में जाकर अपनी हाजिरी बाबा श्याम के दरबार में भरते हैं। हम सभी श्याम भक्तों और श्याम जगत की ओर से बाबा से प्रार्थना करते हैं कि जिस निष्ठा और लगन की भावना से श्री श्याम सुंदर शर्मा जी श्याम भक्तों के साथ मिलकर बाबा श्याम को मनाते थे गुणगान करते थे और सेवा करते थे तथा उन्हें श्याम प्रभु का आशीर्वाद मिलता था ठीक उसी प्रकार से श्याम प्रभु उनके बच्चों पर भी अपनी कृपा बनाए रखें और उन्हें श्याम बाबा की सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त करें।

ॐ श्री श्याम देवाय नमः

जय श्री श्याम

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