19/03/2024
जीवनी श्री श्याम सुंदर शर्मा (पालम वाले)
19 मार्च 1948 से 23 अक्टूबर 2013
"जननी जने तो भक्तजन, या दाता या शूर
नहीं तो जननी बांझ रहे, काहे गवाएं नूर"
महान है वह माँ (गोमती देवी) जिसने श्याम सुंदर जैसे लाल को जन्म देकर श्याम जगत को कृतार्थ किया। ऐसी माँ को शत शत नमन।
हरियाणा के भिवानी शहर में श्री श्याम सुंदर शर्मा जी का जन्म 19 मार्च 1948 को हुआ। इनके दादा जी वैद्य मात्तृदत्त शर्मा जी श्याम बाबा के अनन्य भक्त रहे और श्री श्याम बहादुर जी एवं श्री आलू सिंह जी महाराज जैसे अनन्य भक्तों के साथ मिलकर इनके दादा जी ने श्याम बाबा के प्रचार प्रसार में अपना अमूल्य योगदान दिया। वैद्य मात्तृदत्त जी वैद्य होने के साथ-साथ श्री श्याम प्रभु खाटू वाले के भजनों के रचयिता भी थे। ऐसे श्याम भक्तों की शरण में रहकर श्री श्याम सुंदर शर्मा जी को भी श्याम नाम की ऐसी लगन लगी कि इन्होंने अपना सारा जीवन श्याम भक्ति और श्याम बाबा के प्रचार प्रसार में समर्पित कर दिया।
श्री श्याम प्रभु की श्री श्याम सुंदर शर्मा जी पर असीम कृपा थी और इसी कृपा के चलते 16 साल की उम्र से ही इन्होंने श्याम भजनों की रचना करना एवं उन्हें गा करके श्याम प्रभु का प्रचार करना शुरू कर दिया था। अपने शहर भिवानी ही नहीं अपितु दिल्ली,अमृतसर,भटिंडा,बीकानेर, फतेहाबाद,हिसार,हांसी, हैदराबाद,कोलकाता, मुंबई, बेंगलुरु, बिहार, चरखी दादरी,सासरोली झज्जर,बहादूरगढ़,आसनसोल,खलीलाबाद, अहमदाबाद,महेंद्रगढ़,गुड़गांव,सिलीगुड़ी, बस्ती,नागपुर, कानपुर, छत्तीसगढ़, विराटनगर, धौलाबाड़ी,काठमांडू नेपाल, बंगाल और ना जाने कितने ही गांव में देहात और विदेशों में भी बाबा श्याम नाम का डंका इन्होंने बनवाया। आज भी देश ही नहीं बल्कि विदेशों में भी इनके द्वारा स्थापित किए गए श्याम मंडल श्री श्याम प्रभु के प्रचार प्रसार में अग्रसर है।
श्री श्याम सुंदर शर्मा जी को लेख लिखने में ऐसी महारत हासिल थी कि वह अकस्मात चलते-चलते या उठते बैठते ही श्याम भजनों की रचना कर डालते थे। इनकी लेखनी में ऐसा जादू था कि इनके द्वारा रचित भजनों को सुन कर श्याम बाबा को न जानने वाले भी श्याम प्रेमी बन जाते थे। इन्होंने अपने भजनों में ना सिर्फ हिंदी भाषा बल्कि बंगाली, हरियाणवी, मारवाड़ी एवं पंजाबी जैसी भाषाओं का प्रयोग भी किया। श्री श्याम सुंदर शर्मा जी ने लगभग 3000 से भी ज्यादा श्याम भजनों की रचना की।
इन्होंने ना सिर्फ श्याम भजनों की रचना की इसके अलावा भी अन्य सामाजिक कुरीतियों के खिलाफ एवं देशभक्ति के गीतों की भी रचना की जिन्हें सुनकर आज के युवा वर्ग को भी देश सेवा और देश भक्ति करने की प्रेरणा मिलती है।
इनके दादा वैद्य मातृदत्त जी के द्वारा श्याम प्रभु को प्रतिवर्ष "श्री श्याम गीत पुष्पांजलि पुस्तक स्वरूप भेंट करने की परंपरा को भी इन्होंने जीवित रखा और प्रतिवर्ष अपने दादाजी की तर्ज पर बाबा श्याम को श्री श्याम गीत पुष्पांजली पुस्तक के रूप में समर्पित करते रहे एवं अंततः सभी श्याम गीत पुष्पांजलिओं को एक ग्रंथ के रूप में सलंग्न किया।
श्याम प्रभु के अनेकों चमत्कारों का वर्णन वे अपने भजनों ( मोर छड़ी का झाड़ा तू लगवा कर देख ले ) के माध्यम से भक्तों के समक्ष किया करते थे। इनके जीवन में श्याम प्रभु ने इतने चमत्कार किए हैं कि उनको बताने के लिए शायद हमारे पास वह शब्द नहीं है जिस प्रकार से वह स्वयं बाबा श्याम के चमत्कारों का वर्णन किया करते थे। हां हम इतना जरूर कह सकते हैं कि श्री श्याम सुंदर शर्मा जी जैसे व्यक्तित्व का जन्म बाबा श्याम के प्रचार और गुणगान करने के लिए होना ही किसी चमत्कार से कम नहीं था।
"ॐ श्री श्याम देवाय नमः"
इस महामंत्र को सुनकर श्याम बाबा के भक्तों को जिस शक्ति एवं सुकून का अनुभव होता है उसका आनंद तो श्याम का एक सच्चा प्रेमी ही बता सकता है परंतु ऐसे भक्तों की संख्या बहुत ही कम है जो यह जानते हैं कि इस मंत्र की रचना भी श्री श्याम सुंदर शर्मा जी (पालम वाले) के द्वारा ही की गई थी। इस मंत्र को श्री श्याम सुंदर शर्मा जी ने अपने जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि भी माना।
"ॐ श्री श्याम देवाय नमः" महामंत्र श्याम जगत को श्री श्याम सुंदर शर्मा जी की ओर से अमूल्य देन है जिसका जाप करके अनेकों भक्तों ने अपनी बिगड़ी बात बाबा श्याम से मनवाई है।
श्री श्याम सुंदर शर्मा जी ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा हरियाणा के भिवानी शहर से शुरू की। बाद में वे भिवानी शहर को छोड़कर सन 1954 में दिल्ली शहर के दिल्ली छावनी कॉलोनी में आकर रहे और अंततः पालम में सन 1967 में आकर बसे। इसी स्थान पर रहकर इन्होंने बाबा श्याम के नाम का इतना प्रचार प्रसार किया कि लोग इन्हें श्याम सुंदर शर्मा जी (पालम वाले) के नाम से जानने लगे।
अपनी शिक्षा इन्होंने भिवानी, रेवाड़ी, गुड़गांव एवं दिल्ली से प्राप्त की। हिंदी विषय पर डबल एम ए करने के पश्चात इन्होंने आयुर्वेदाचार्य की डिग्री भी हासिल की।
बाबा श्याम की कृपा से इन्हें ना सिर्फ दिल्ली सरकार में क्लर्क के पद पर नियुक्त किया गया बल्कि इन्होंने जीवन में आगे बढ़ते हुए असिस्टेंट अससेर एंड कलेक्टर के पद तक पदोन्नति को भी प्राप्त किया। जीवन के इस प्रकरण को भी वे सिर्फ और सिर्फ श्याम प्रभु की ही कृपा मानते थे।
जीवन में आने वाली सामाजिक, पारिवारिक, आर्थिक एवं शारीरिक कठिनाइयों के बावजूद भी इन्होंने कभी भी श्याम प्रभु का गुणगान नहीं छोड़ा। मधुमेह एवं उच्च रक्तचाप एवं दोनों गुर्दे खराब होने के बाद भी इन्होंने अपने भजनों से बाबा श्याम को खूब रिझाया। श्याम बाबा को ही इन्होंने अपना सब कुछ माना और श्याम प्रभु से ही इन्हें ऐसी अनूठी शक्ति मिलती रही जिसके चलते इन्होंने श्याम जगत को श्याम बाबा की सेवा करने और इनसे जुड़े रहने की प्रेरणा दी।
आज के दौर में न जाने कितने लोग श्याम बाबा के नाम से अपना जीवन यापन कर रहे हैं। कोई माने चाहे ना माने कहीं ना कहीं हमें मानना पड़ेगा की आज के इस दौर में जितने भी लोग श्याम प्रभु के नाम से कमाई करके खा रहे हैं तथा इतने सारे लोगों को रोजगार मिलना कहीं ना कहीं श्री श्याम सुंदर शर्मा जी (पालम वाले) की ही कोशिशों का नतीजा है।
"श्याम तुम्हारो नाम है और श्याम है मेरो नाम
श्याम श्याम रटता रहूं तो श्याम है जीवन प्राण"
श्री श्याम सुंदर शर्मा जी पालम वाले द्वारा रचित इस दोहे को विरले ही श्याम जगत कभी भुला पाएगा।
श्री श्याम सुंदर शर्मा जी ने दिन-रात श्याम प्रभु का गुणगान करके दिल्ली के जनकपुरी डी ब्लॉक में भव्य श्री श्याम मंदिर का निर्माण करवाया जिसे "श्री चौरसिया ब्राह्मण सभा प्रबंधक समिति रजिस्टर्ड" द्वारा सुचारू रूप से चलाया जा रहा है एवं श्री खाटू श्याम जी में "श्री श्याम सरकार चैरिटेबल ट्रस्ट रजिस्टर्ड पालम" के नाम से धर्मशाला का निर्माण भी करवाया।
इनका मानना था कि श्याम बाबा और श्याम बाबा के भक्तों की सेवा निरंतर होती रहे और शायद इसी के चलते श्री खाटू श्याम जी में "श्री श्याम सरकार चैरिटेबल ट्रस्ट रजिस्टर्ड पालम" का निर्माण अनेकों श्री श्याम के दानी भक्तों के सहयोग से किया गया जिसे श्याम सुंदर शर्मा जी से जुड़े अन्य दानी भक्तजन एवं अन्य सदस्य साथ मिलकर बड़ी ही निष्ठा लगन की भावना से सुचारू रूप से चला रहे हैं।
इनके पिताजी डॉक्टर जगदीश चंद्र शर्मा जी पहले निगम पार्षद एवं बाद में दिल्ली सरकार के हेल्थ डिपार्टमेंट में चेयरमैन रहे एवं इन्होंने भी बाबा श्याम के रंग में खुद को रंग कर श्याम प्रभु का प्रचार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
श्री श्याम सुंदर जी का विवाह सन 1966 में सुमित्रा रानी शर्मा निवासी (चांदनी चौक) से हुआ इनकी धर्मपत्नी ने अपने घर की जिम्मेदारियों को निभाते हुए और इनकी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का ध्यान रखते हुए श्याम प्रभु के प्रचार करने में इनका पूर्ण रूप से सहयोग किया तथा कभी भी श्री श्याम सुंदर शर्मा जी को घर की तरफ से चिंतित नहीं होने दिया। यह भी बाबा श्याम का ही आशीर्वाद था कि उन्हें ऐसी धर्मपत्नी मिली जो धार्मिक विचारों से ओतप्रोत थी एवं जिन्होंने बाबा श्याम की और हम सबके प्यारे श्री श्याम सुंदर शर्मा जी की दिन-रात सेवा की।
श्री श्याम प्रभु के आशीर्वाद से इनके परिवार में धर्मपत्नी सुमित्रा रानी शर्मा 3 पुत्र दीपक शर्मा संजू शर्मा एवं कुलदीप शर्मा तीन पुत्रवधू तथा पांच पोतिया एवं दो पोत्र हैं।
अपने अंतिम समय तक श्री श्याम नाम का गुणगान करते हुए एवं श्याम बाबा से दुख सुख की घड़ियों में भी जुड़े रहने की प्रेरणा देकर हम सबके प्यारे श्री श्याम सुंदर शर्मा जी 23 अक्टूबर 2013 को हमेशा हमेशा के लिए अपने प्यारे बाबा श्याम की शरण में चले गए। ऐसे महान व्यक्तित्व वाले श्री श्याम सुंदर शर्मा जी पालम वाले की कमी को श्याम जगत शायद ही कभी पूरा कर पाएगा।
श्याम बाबा के अनन्य भक्तों में शामिल श्री श्याम सुंदर शर्मा जी सुंदर थे, सुंदर है और श्याम भक्तों के दिलों में हमेशा सुंदर रहेंगे।
श्री श्याम सुंदर शर्मा जी के बाबा श्याम की शरण में जाने के बाद अब उनके पुत्र दीपक शर्मा संजू शर्मा कुलदीप शर्मा पुत्रवधु शोभा शर्मा इनकी पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही श्याम बाबा के प्रचार एवं गुणगान करने की परंपरा को आगे बढ़ाने में योगदान कर रहे हैं। और हर एक एकादशी को खाटू में जाकर अपनी हाजिरी बाबा श्याम के दरबार में भरते हैं। हम सभी श्याम भक्तों और श्याम जगत की ओर से बाबा से प्रार्थना करते हैं कि जिस निष्ठा और लगन की भावना से श्री श्याम सुंदर शर्मा जी श्याम भक्तों के साथ मिलकर बाबा श्याम को मनाते थे गुणगान करते थे और सेवा करते थे तथा उन्हें श्याम प्रभु का आशीर्वाद मिलता था ठीक उसी प्रकार से श्याम प्रभु उनके बच्चों पर भी अपनी कृपा बनाए रखें और उन्हें श्याम बाबा की सेवा करने का सौभाग्य प्राप्त करें।
ॐ श्री श्याम देवाय नमः
जय श्री श्याम