08/08/2026
------------जिन्दगी
हम अपने वतन में क्या क्या भुगत चुके हैं।
दोस्त कहने से गले सूख,आंखों से आंसू बहते हैं।
हम कश्मीरी हिन्दुओं को हमारे पुशतैनी कश्मीर के घरों से खदेड़ निकाला गया है।
हम अपने वतन में खानाबदोश की सी जिन्दगी जीने पर मजबूर किये गये हैं।
हमारे आदमी जो गोलियों से भूनें गये हैं, उन्हें अपने वतन में इन्साफ नहीं मिला है।
गाजर ,मूली की कीमत तो होती हैं,पर हमारी जान की कीमत कुछ भी नहीं थी।
इसे जुल्म ,जबर करने वालों के होसले बुलंद हूये हैं।
हमारा कसूर कुछ भी नही था,देश प्रेम, हमारा धर्म, हमारा पाप कर्म बना था।
तुझे क्या बताएं ऐ दोस्त कैसी बेचारगी की सी जिन्दगी हम जिये हैं।
हम हमारे भव्य घर होकर सड़कों के किनारे शिवरों में गुजर बसर करने पर अपने धर्मनिरपेक्ष देश में, मजबूरी मे अपने आंसू पी जिये हैं।
ऐसी दुर्दशा की गई हमारी, कि हमें अपनों की खबर रही नही है,कोई उस १९९० की कश्मीरी हिन्दुओं की त्रासदी में कहाँ जा बसा है, हमें आज भी अपनों की खबर नही है।
तू बता दोस्त कोई गलती हमारी होकर भी, हम अपने वतन में शरणार्थी से बने, जी रहें हैं।
ये जिन्दगी भी कोई जिन्दगी है जहां सांसें चल रही हो,पर सांसों में जिन्दगी नही है।राज कुमार काव