शब्दो की झनझनाहट - राज कुमार काव

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शब्दो की झनझनाहट - राज कुमार काव Poetry & Writer
(1)

08/08/2026

------------जिन्दगी
हम अपने वतन में क्या क्या भुगत चुके हैं।
दोस्त कहने से गले सूख,आंखों से आंसू बहते हैं।
हम कश्मीरी हिन्दुओं को हमारे पुशतैनी कश्मीर के घरों से खदेड़ निकाला गया है।
हम अपने वतन में खानाबदोश की सी जिन्दगी जीने पर मजबूर किये गये हैं।
हमारे आदमी जो गोलियों से भूनें गये हैं, उन्हें अपने वतन में इन्साफ नहीं मिला है।
गाजर ,मूली की कीमत तो होती हैं,पर हमारी जान की कीमत कुछ भी नहीं थी।
इसे जुल्म ,जबर करने वालों के होसले बुलंद हूये हैं।
हमारा कसूर कुछ भी नही था,देश प्रेम, हमारा धर्म, हमारा पाप कर्म बना था।
तुझे क्या बताएं ऐ दोस्त कैसी बेचारगी की सी जिन्दगी हम जिये हैं।
हम हमारे भव्य घर होकर सड़कों के किनारे शिवरों में गुजर बसर करने पर अपने धर्मनिरपेक्ष देश में, मजबूरी मे अपने आंसू पी जिये हैं।
ऐसी दुर्दशा की गई हमारी, कि हमें अपनों की खबर रही नही है,कोई उस १९९० की कश्मीरी हिन्दुओं की त्रासदी में कहाँ जा बसा है, हमें आज भी अपनों की खबर नही है।
तू बता दोस्त कोई गलती हमारी होकर भी, हम अपने वतन में शरणार्थी से बने, जी रहें हैं।
ये जिन्दगी भी कोई जिन्दगी है जहां सांसें चल रही हो,पर सांसों में जिन्दगी नही है।राज कुमार काव

08/08/2026

------------जिन्दगी
ये यादें न जाने मुझे क्यूं आ सता रही है।
ये चिनार के पत्ते मुझे अपने पुश्तैनी घर कश्मीर बुला रहें हैं।
जैसे कह रहे हों, कि कहां तक जन्म भूमि का बिछोह सहोगे।
ये बिछोह जन्म भूमि का याद आकर मेरी आंखें अश्क बहा रही है।
मुझे अपने घर के आंगन का चिनार याद आ रहा है।
जिसके छावो में, मैं पला, खेला, बड़ा हुवा हुँ।
जब भी में कही काम से घर विश्राम करने को आता था।
आंगन का किवाड़ खोलते ही, आंगन में चिनार के पेड़ के पत्ते हिल डुल मुझे लगता था, मेरा स्वागत अपनी ठंडी हवा दे करते थे।
में उसके साये में हरी बिछी घास पर बैठ हवा का लुत्फ ले प्रफुल्लित हो जाता था।
न जाने किसकी नज़र लगी गई मेरे प्राकृतिक ऐश्वर्य को।
कि में यहाँ असाहाय, लाचार सा महसूस कर रहा हूँ।
दोस्त कहते हैं सांसे तेरी चल रही है,तुझे और क्या चाहिये।
सांसें तो चल रही है,पर दोस्त समझते नही कि इन सांसों में जिन्दगी नहीं है।राज कुमार काव

04/08/2026

---------वसुन्धरा
हम हर जान की कद्र करते हैं,हम भारतीय हैं भारत माता की सन्तान हर प्राणी को समझते हैं।
जीवन को जीव समझ हम झुक कर प्रणाम जीव को करते हैं।
हम पाशान काल से सुर्य देव,और पेड़ो की पूजा करते आये हैं।
जीवन को सरंक्षन देना हम अपना कर्तव्य समझते हैं।
जिन्दगी हर प्राणी को प्यारी है, इसीलिए हम हर प्राणी से प्रेम करते हैं।
जियो और जीने दो में विश्वास हमारा है, इसीलिए वसुन्धरा पर सब का अधिकार हम समझते हैं।

26/07/2026

----------श्रद्धांजलि
न याद दिलाओ, न याद दिलाओ।
हम रो पड़ेंगे श्रद्धांजलि तो हर देश के खातिर विदा होने वाले को हम देते हैं।
पर हम अपनी वेदना शब्दों में व्यक्त कर सकते नही हैं।
हम श्रद्धांजलि दुखी दिल से देते हैं,हमने आंसू अपनी पलकों में छुपाये होते हैं।
हम जय हिन्द भी गर विदा देश के खातिर होने वाले को कहते हैं।
तुम यकीन करो हम दिल पर पत्थर रखकर देते हैं।
हमें उनके परिवारों की छवि दिल के पटल पर आ रुलाती है।
वह देश के लिए प्राणों की बाजी लगाने वाले अपने देश की मिट्टी का कर्ज चुकाते हैं। राज कुमार काव

24/07/2026

--------हिम पर्वतों
काश्मीर में काश्मीर की, हर चट्टान पर विश्व महेश्वर ऊँ शिव शंकर मेने अंकित देखा है।
काश्मीर के हिम पर्वतों से मेने ऊँ शिव शंकर का गर्जन होते सुना है।
अमरीश्वर के पर्वतों से भी मेंने जय शिव शंकर की आवाजें आते सुनी है।
अमरनाथ के अमर कबूतर भी शिव शंकर की उपासना करते मेने सुने हैं।
काश्मीर की शीतल हवा भी चलते चलते शिवम, शिवम का ही गायन करती है।
काश्मीर के शंकराचार्य मंदिर की पोड़ी, पोड़ी चढ़ शिव भक्त हर हर महादेव कह, शक्ति अर्जित कर आगे बढ़ते मेने देखें हैं।
काश्मीर के कण,कण से जय शिव शंकर की आवाजें आती रहती है।
काश्मीर के विश्व-विख्यात संत, स्वामी, तपस्वी लक्ष्मनजू , इश्बर, निशात काश्मीर वासी के आश्रम से भी मैने शिव महिमा का गायन होते सुना है।
पर काश्मीर की ऋषी , संतों की धरा आज कश्मीरी पंडित से वहीन है।
जिसने रंगा था काश्मीर की धरा के हर चप्पे, चप्पे को आध्यात्मिक रंगों से।राज कुमार काव

05/07/2026

इन्सान का श्मशान की राख में हुयी देह का कोई परिचय नही होता।राज कुमार काव

05/07/2026

मुकद्दर याद आती है जब इन्सान प्रयास भी करता है।
पर कामयाबी हाथ भी नहीं आती, तब माथे पे हाथ रख इन्सान कहता है,कि मेरी मुकद्दर में कामयाबी लिखी नही है। राज कुमार काव

14/06/2026

---------भख्चेगी
उसी भवानी, उसी माराज्ञिनी की कृपया हम पर है,जिसका जिष्टा अष्टमी को क्षीरभवानी,तुलमुला कशमीर वासिनी भवानी का मेला लगता है।
वही हमारी भख्चनहार हमें हमारे पाप कर्मों से हमें मुक्त करेगी।
हम उस महेश्वरी, विश्वेश्वरी के याचक झोलियां फेलाये उसके भवनों में हर जिष्टा अष्टमी के पावन पर्व पर ,प्राता उपस्थित होते थे।
पहले सिन्दू नदी में स्नान करते थे,फिर प्रवेश द्वार से पंपोश, पुष्प, प्रवेश द्वार पर ले ही अन्दर जाते थे।
मंदिर के प्रांगण में खड़े चिनार के वृक्ष लगता था, जैसे भक्तों का आवभग्त करते थे।
हम जय माता का गुंजन करते रहते थे,भवानी के मंदिरों में आ जयकारा लगा मंदिरों की प्रदक्षिणा करते थे।
हम आरती कर कहते थे।
माँ विश्व का कल्याण कर, प्राणियों को सद्बुद्धि दे।
यही अर्चना कर हम धूप,दीप,नवीद,कंद अर्पन करते थे,मन प्रफुल्लित होता था ये सब करके।
फिर देर शाम को अपने घरों की और प्रस्थान करते थे, में उन्ही सकून के दिनों को ढूंढ रहा हूँ।
राज कुमार काव पर भी भवानी माँ,कृपया करेगी,बहूत सहा है अब माँ भख्चेगी।

14/06/2026

-----------------अंकित
इतने काबिल नही कि पानी पर लिखी तहरीरें पड़ सके हम।
पर किस्मत की लकीरें जो हाथों,माथे पर अंकित होती है,उसे भविष्य के इशारे समझते हैं।
हाँ हम ब्रह्ममन हैं, विश्वेश्वर की लिखी किस्मत की लकीरों का अनुमान लगाते हैं।
हमने आजमाया है जिसकी क़िस्मत में जितनी लिखी होती है,उतना ही वह खा पाता है।
इन्सान दूसरे इन्सान पर ज़ुल्म करके अर्जित जो दोवलत करता है।
वह उसमें उतना ही खा पाता है,जितनी सर्वेश्वर ने उसकी किस्मत में लिखी होती है।
इसीलिए महादेव के मंदिरों में लोगों की लाइनें लगी रहती है।
उसे लोग क्षमा याचना कर कहते हैं, भखचो है महादेव तुमही भख्चनहार हो हमारे पाप कर्मों के।
राज कुमार काव साक्षी है इन सब बातों का मंदिरों में ये सब होते देखा है।

04/06/2026

ऊंआसमान भी चांद को देख आशकी के अफसाने लिखता होगा।
पर‌ बदकिस्मती यह कि आसमान का दिल कोई पढ़ नहीं सकता।राज कुमार काव

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