23/04/2020
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Song out now!
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बोल एवं रचयिता: गिरीश चन्द्र तिवारी ( गिरदा )
स्वर: नैना,कौशिक,विनितेश
संगीत : विनितेश जोशी
गिरदा के व्यक्तित्व के अनेक आयाम थे। एक कलाकार, एक आन्दोलनकारी और एक रंगकर्मी। उत्तराखण्ड में नाट्य परम्परा को बनाए रखने में वह तन, मन और धन से समर्पित वरिष्ठ रंगकर्मी थे।
गिरदा भौतिक रूप से आज हमारे बीच नहीं है। एक शरीर चला गया लेकिन उनका संघर्ष, उनकी बात, उनके गीत, उनकी कविता, उनके लोक नाटकों में उठाए गये मुद्दे और जो कुछ वह समाज को दे गये वह सारा कुछ हमेशा जनसंघर्षो को ऊर्जा देता रहेगा। गिरदा आम जन की हर लड़ाई में संघर्ष के गीत गाते रहेंगे। जनता के पक्ष के कवि की आवाज हमेशा जिन्दा रहेगी।
गिरदा की अन्दाज़े बयानी का भी जवाब नहीं था। गिरदा कविता को इस दरजा बेहतर ढंग से परफॉर्म करते थे कि उनकी वाणी से निकला एक-एक लफ्ज सुनने वाले के दिल में उतर जाता था। कविता या गीत की एक-एक पंक्ति, शब्द और उनके व्यापक अर्थों को वह अपनी अन्दाज़े बयानी और हाव-भाव में चित्र रूप में साकार कर देते थे। अपनी जादुई बुलन्द आवाज़ में सुर-लय-ताल के साथ उनके शरीर का एक-एक अंग बोलता था। कविता चाहे मंच पर हो या सड़क पर, उनकी प्रस्तुति हर जगह ज़िन्दा और बोलती हुई होती थी जो श्रोताओं को अपने साथ बहा ले जाती थी।
उत्तराखण्ड आन्दोलन जब अपने पूरे शबाब पर था और सभी सांस्कृतिक संस्थाएँ, कलाकार, रंगकर्मी, कवि आदि अपनी सामर्थ्य के अनुसार अपने गीत, संगीत, नाटक के जरिये आन्दोलन को तेल-पानी दे रहे थे और पूरा जनमानस इस ऊर्जा से चार्ज था। गौर्दा के वृक्षन को विलाप- ‘आज हिमाल तुमन के धत्यूँछ, जागो-जागो हो मेरा लाल’ की तर्ज पर हर दिन नये हरूफ लिखकर गिरदा अपनी ओजस्वी वाणी में सुनाते थे।
गिरदा एक प्रतिबद्व सांस्कृतिक व्यक्तित्व और रचनाधर्मी थे । गीत, कविता, नाटक, लेख, पत्रकारिता, गायन, संगीत, निर्देशन, अभिनय आदि, यानी संस्कृति का कोई आयाम गिरदा से छूटा नहीं था। मंच से लेकर फिल्मों तक में लोगों ने गिरदा की क्षमता का लोहा माना। उन्होंने ‘धनुष यज्ञ’ और ‘नगाड़े खामोश हैं’ जैसे कई नाटक लिखे, जिससे उनकी राजनीतिक दृष्टि का भी पता चलता है। नाट्य मंचन में भी प्रतिबद्ध और व्यापक दृष्टि का दर्शन होता है। गिरदा ने नाटकों में लोक और आधुनिकता के अदभुत सामंजस्य के साथ अभिनव प्रयोग किये और नाटकों का अपना एक पहाड़ी मुहावरा गढ़ने की कोशिश की। पहाड़ी (पारम्परिक) होलियों को भी गिरदा ने न केवल एक नया आयाम दिया, बल्कि इस गौरवशाली परम्परा को और व्यापक फलक तथा दृष्टि दी और कई नये प्रयोग भी किये । होली गीतों को भी अपनी प्रयोगधर्मी दृष्टि से सामयिकता दी।
‘झुकी आयो शहर में व्योपारी…….पेप्सी कोला की गोद में बैठी,
संसद मारे पिचकारी, दिल्ली शहर में लूट मची है। आयो विदेशी व्योपारी।’
गिरदा ने हमेशा जनता के दुख-दर्दों को आवाज दी और लड़ने का साहस जगाया, आशावाद की प्रेरणा दी। जैसा कि हम सभी की और गिरदा की भी चाहना है कि आएँगे उजले दिन जरूर। इसीलिए गिरदा ने साहिर और विश्व महाकवि फैज के साथ अपने को एकाकार कर लिया था।
‘ततुक की लगा उदेख, घुनन मुनइ नि टेक, जैंता एक दिन तो आलो, ऊ दिन यो दुनी में।’
उन्होंने फैज की कई रचनाओं का कुमाउँनी में, लेकिन यहीं के मूल मुहावरों और खुशबू के साथ ऐसा सुन्दर भावानुवाद किया, जिसकी मिसाल दुर्लभ है। विश्वदृष्टि के साथ गिरदा अपनी मिट्टी की खुशबू, यहाँ के लोगों, पहाडों, नदियों, पेड़ों और हिमालय को कभी नहीं भूले। यहाँ का वातावरण उनकी साँसो में बसता था। ‘उत्तराखण्ड मेरी मातृभूमि, मातृभूमि मेरी पितृभूमि, भूमि, तेरी जय जय कारा, म्यर हिमाला।’
“उत्तराखंड मेरी मातृभूमि,
मातृभूमि यो मेरी पितृभूमि ,
ओ भूमि तेरी जय जय कारा।
म्यर हिमाला ,
हिमाला तेरी जय जय कारा।
म्यर हिमाला”-२
ख्वार में कूट तेरो ह्युं झलको -२ ,
छलकी गाड़ गंगा की धारा
म्यर हिमाला
हिमाला
म्यर हिमाला
“तली-२ तराई कुनि ” -२
ओ कुनि , मली-मली भाभरा
म्यर हिमाला
हिमाला मली-मली भाभरा ।।म्यर हिमाला
बद्री केदारा का द्वार छाना -२
म्यर कानखला हरिदवरा -२
म्यर हिमाला
हिमाला कानखला हरिदवरा,,म्यर हिमाला
काली धौली का बलि छाना जानी -२ ।।।।
बाटा नान ठुला कैलाशा ।।। म्यर हिमाला
हिमाला नान ठुला कैलाशा
म्यर हिमाला
पार्वती को मेरो मैत ये छा,-२
ओ यों छा शिवज्यू को सौराशा
म्यर हिमाला-२
धन में मेरो यों जनम ….
ओ भयो तेरी कोखि महान …. म्यर हिमाला…..
मरी जुलो … तो तारी जुलो …
ओ ईजू एले त्यार बाना… म्यर हिमाला.–२
हिमाला एले त्यार बाना ,,म्यर हिमाला
Girda ki kavita "Myar Himala"
O bhumi teri jai jaikara.. Myer Himalaa....
Khwar mukoot tero hyu jhalako....
Chhalaki gaad ganga ki dhara.... Myar Himalaa.....
Uttarakhand meri matra bhoomi.... Matra bhoomi meri pitr bhoomi...
O bhoomi.. teri jai jaikara... Myar himala...
Tali Tali Taraai kuni ...
O kuni .. mel kuni bhabara.... myar himala...
Badri kedara ka dwara chhana...
Myara kankhala haridwara.... myar himala...
Kali dhauli ka bali chhana jani....
Bata naan thula kailasha... Myar himala...
Parbati ko myar mait yo chho....
O ye chho.... shiv jyu ko saurasa... Myar himala...
Dhan me mero yo janam....
Bhayo teri kokhi mahaana.... Myar himalaa.....
Mari juno... to taari juno...
O iju aele tera bana... Myar himala..
बोल एवं रचयिता: गिरीश चन्द्र तिवारी ( गिरदा ) स्वर: नैना,कौशिक,विनितेश संगीत : विनितेश जोशी गिरदा के व्यक्तित्व के अन....