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महाशिवरात्रि पर दियरखा टीम के ओर से रउआ सभे के आनघा बधाई आ शुभकामना। भगवान शिव के आशीर्वाद से सब कुशल आ मंगल रहे। हर हर ...
15/02/2026

महाशिवरात्रि पर दियरखा टीम के ओर से रउआ सभे के आनघा बधाई आ शुभकामना। भगवान शिव के आशीर्वाद से सब कुशल आ मंगल रहे।

हर हर महादेव 🔱

साँझ के 5 बजे बेटी बिदाई गीत पोसल चिरइया के टीज़र आई। कुछ टेक्निकल दिक्कत के चलते प्रोजेक्ट में देरी हो गइल रहे। YouTube...
02/02/2026

साँझ के 5 बजे बेटी बिदाई गीत पोसल चिरइया के टीज़र आई। कुछ टेक्निकल दिक्कत के चलते प्रोजेक्ट में देरी हो गइल रहे।

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बेटी सन के जिनगी के एगो लमहर पड़ाव पार कइला के बाद जब बियाह शादी के बात आवेला आ ओहमें बिदाई के बात आवेला त ओ घरी बेटियन ...
23/01/2026

बेटी सन के जिनगी के एगो लमहर पड़ाव पार कइला के बाद जब बियाह शादी के बात आवेला आ ओहमें बिदाई के बात आवेला त ओ घरी बेटियन के भीतर का चलेला उ का महसूस करेली ई बेटिए जानेले। हमनी के संस्कृति के सबसे मार्मिक जवन परंपरा बा उ बिदाई ह। जहाँ से ऐगो नया जीवन के शुरुआत त होला बाकिर ओकरा पीछे बहुत कुछ छूट जाला।

एही सिलसिला में दियरखा के ओर से प्रस्तुत बा एगो बिदाई गीत। दियरखा के इहे पर्यास बा कि उ अपना लोक आ लोग के ध्यान में राख के आपन काम करे। त बनल रहीं बहुत जल्दी दियरखा के ओर से आ रहल बा एह साल के पहिला गीत, जवन कि बिदाई गीत ह।

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28/12/2025

भोजपुरी लोक संस्कृति अत्यंत समृद्ध और जीवन से गहराई से जुड़ी हुई रही है। इस संस्कृति में मनुष्य के जन्म से लेकर मरण तक, पर्व-त्योहारों, सोलह संस्कारों तथा श्रम से जुड़े प्रत्येक कार्य के लिए गीतों की परंपरा मिलती है। कृषि-प्रधान भोजपुरी समाज में खेती और गृहस्थ जीवन के हर चरण के लिए गीत रचे गए, जिनकी रचनाकार मुख्यतः स्त्रियाँ रही हैं।

इन गीतों की एक विशेष शैली श्रमगीत कहलाती है, जिनमें रोपनी, कटनी, ढेकसार आदि के साथ-साथ जंतसार भी शामिल है। जंतसार उन गीतों को कहा जाता है जो जांता या चकरी पर अनाज पीसते समय गाए जाते थे। विद्युत चालित चक्कियों के अभाव में महिलाएँ ब्रह्म मुहूर्त में उठकर कठोर श्रम करती थीं और उसी परिश्रम को सहज बनाने के लिए गीतों का सहारा लेती थीं।

जंतसार गीतों में प्रायः विरह और करुण रस की प्रधानता मिलती है। कम उम्र में विवाह, अत्यधिक श्रम, पारिवारिक जिम्मेदारियाँ और पुरुषों का पलायन- इन सबने स्त्रियों के जीवन को पीड़ा से भर दिया। अपनी व्यथा को वे सीधे व्यक्त नहीं कर पाती थीं, इसलिए एकांत की उन सुबहों में, जब पूरा गाँव सोया रहता था, महिलाएँ अपने दुख और वेदना को जंतसार गीतों के माध्यम से स्वर देती थीं। यही गीत उनके मौन दुःख की सबसे सशक्त अभिव्यक्ति बने।

लेख - Anshuman Kumar
विशेष धन्यवाद - Rameshwar Gop जी

04/12/2025

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27/11/2025

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