26/04/2020
Beautiful penned by :-
अब सवाल उठे महबूब तो दफ़नाए कैसे?
ये चिंगारियां बुझाए कैसे?
तुम जहां मेरे, जहां से खुद को बचाए कैसे?
सब कुछ जानकर भी जान से जान छुड़ाएं कैसे?
मेरे महबूब, यों बार-बार यादों में मत आया कर,
यूं चेहरे मत छुपाया कर,
तुम जाने वाले थे तो आखिर गए क्यों नहीं अभी पूरी तलक,
मैं पागल हूं, मेरे हश्र् पर झूठे आंसू मत बहाया कर।
अरसा बीत चुका है यादों को- बातों को,
पर यूँ दर्द का क्या ही कीजै?
देखी महबूब की हँसती तस्वीर,
अच्छा लगा,
अच्छा लगा, जलन हुई,
दिल एकाएक टूटा फिर से,
आंसू निकले फिर से,
शरीर थम गया फिर से,
दिमाग बौखला गया फिर से,
पर महबूब की तस्वीर में महबूब हँस रहा था,
देख कर अच्छा लगा।
बहुत अजीब है तेरा-मेरा मिलना,
कुछ खास नहीं, कुछ आम नहीं,
बहुत याद रह कर भी कुछ याद नहीं,
मेरे महबूब, तड़प रहा हूं आज फिर,
लेकिन तुम्हें पता चलेगा नहीं,
क्योंकि...... पता नहीं क्यों?
बस पता चलेगा नहीं, तुम्हें कभी।
मेरे महबूब, काश और शायद बहुत सारे हैं,
सितारे टूटते बहुत सारे हैं,
यूँ सवालात करना तनिक ठीक नहीं होगा,
अब फर्क क्या की पसंद की बात थी भी या नहीं कभी,
यूँ सर-सरी रूप में खुद को रोकर खोना अब ठीक नहीं होगा।।
मेरे महबूब, क्या पसंद भी था तुझे मैं कभी,
क्या यूं ही रहते तुम दुनियावी लोगों से दूर कभी।
मुझे ग़म है जिंदगी भर के-मेरी मोहब्बत के नतीजे,
यों छू जाना मेरे होठों को हमेशा दूर जाने के लिए ही कभी।।
~कौशल
🌻❤🌻 ✨