Kahlil Sanaz

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13/09/2022
01/01/2021

कैलेंडर तारीख बदलता रहता है और फिर एक तारीख ऐसी भी आती है जो कैलेंडर बदल देती है, आज वही एक तारीख है.....
*ks*

08/10/2019

Attitude तो रावण का देखिए
हर साल पुतले में जलना मंजूर है मगर भाजपा ज्वाइन नहीं कर रहा है!
😂😂

रावण आज खुद को जलने से बचा सकता है....बशर्ते वो BJP join  कर ले
08/10/2019

रावण आज खुद को जलने से बचा सकता है....बशर्ते वो BJP join कर ले

30/08/2018

खाना खाने बैठे पति ने पत्नि को आवाज लगाई -
"अरी सुनती हो...भाग्यवान...! ये जो तुमने सब्जी बनाई है इसे क्या कहते हैं ?? "

पत्नि :- क्यों किसलिये पूछ रहे हो ?😳

पति :- "मुझसे भी तो स्वर्ग में पूछा जायेगा...क्या खा के मरे थे !!
😜😜

30/08/2018

Student - Sir, what is the difference between FINE and TAX ???
- FINE is a tax for doing wrong.
And TAX is a fine for doing right.
🤔😄🤣

01/07/2017

मेरी खामोशी को मेरी कमज़ोरी मत समझना,
दबे ना घोड़ा जब तक बंदूक भी खिलौना होती है।
*ks*

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11/07/2016

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01/07/2016

बहुत समय पहले की बात है , एक राजा को उपहार में किसी ने बाज के दो बच्चे भेंट किये । वे बड़ी ही अच्छी नस्ल के थे , और राजा ने कभी इससे पहले इतने शानदार बाज नहीं देखे थे।

राजा ने उनकी देखभाल के लिए एक अनुभवी आदमी को नियुक्त कर दिया।

जब कुछ महीने बीत गए तो राजा ने बाजों को देखने का मन बनाया , और उस जगह पहुँच गए जहाँ उन्हें पाला जा रहा था। राजा ने देखा कि दोनों बाज काफी बड़े हो चुके थे और अब पहले से भी शानदार लग रहे थे ।

राजा ने बाजों की देखभाल कर रहे आदमी से कहा,” मैं इनकी उड़ान देखना चाहता हूँ , तुम इन्हे उड़ने का इशारा करो । “

आदमी ने ऐसा ही किया। इशारा मिलते ही दोनों बाज उड़ान भरने लगे , पर जहाँ एक बाज आसमान की ऊंचाइयों को छू रहा था , वहीँ दूसरा , कुछ ऊपर जाकर वापस उसी डाल पर आकर बैठ गया जिससे वो उड़ा था।

ये देख , राजा को कुछ अजीब लगा.“क्या बात है जहाँ एक बाज इतनी अच्छी उड़ान भर रहा है वहीँ ये दूसरा बाज उड़ना ही नहीं चाह रहा ?”, राजा ने सवाल किया।

” जी हुजूर , इस बाज के साथ शुरू से यही समस्या है , वो इस डाल को छोड़ता ही नहीं।”

राजा को दोनों ही बाज प्रिय थे , और वो दुसरे बाज को भी उसी तरह उड़ना देखना चाहते थे।

अगले दिन पूरे राज्य में ऐलान करा दिया गया कि जो व्यक्ति इस बाज को ऊँचा उड़ाने में कामयाब होगा उसे ढेरों इनाम दिया जाएगा।

फिर क्या था , एक से एक विद्वान् आये और बाज को उड़ाने का प्रयास करने लगे , पर हफ़्तों बीत जाने के बाद भी बाज का वही हाल था, वो थोडा सा उड़ता और वापस डाल पर आकर बैठ जाता।

फिर एक दिन कुछ अनोखा हुआ , राजा ने देखा कि उसके दोनों बाज आसमान में उड़ रहे हैं। उन्हें अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ और उन्होंने तुरंत उस व्यक्ति का पता लगाने को कहा जिसने ये कारनामा कर दिखाया था। वह व्यक्ति एक किसान था।

अगले दिन वह दरबार में हाजिर हुआ। उसे इनाम में स्वर्ण मुद्राएं भेंट करने के बाद राजा ने कहा , ” मैं तुमसे बहुत प्रसन्न हूँ , बस तुम इतना बताओ कि जो काम बड़े-बड़े विद्वान् नहीं कर पाये वो तुमने कैसे कर दिखाया। “

“मालिक ! मैं तो एक साधारण सा किसान हूँ , मैं ज्ञान की ज्यादा बातें नहीं जानता , मैंने तो बस वो डाल काट दी जिस पर बैठने का बाज आदि हो चुका था, और जब वो डाल ही नहीं रही तो वो भी अपने साथी के साथ ऊपर उड़ने लगा। “

दोस्तों, हम सभी ऊँचा उड़ने के लिए ही बने हैं।लेकिन कई बार हम जो कर रहे होते है उसके इतने आदि हो जाते हैं कि अपनी ऊँची उड़ान भरने की , कुछ बड़ा करने की काबिलियत को भूल जाते हैं। यदि आप भी सालों से किसी ऐसे ही काम में लगे हैं जो आपके सही potential के मुताबिक नहीं है तो एक बार ज़रूर सोचिये कि कहीं आपको भी उस डाल को काटने की ज़रुरत तो नहीं जिस पर आप बैठे हुए हैं ?

01/07/2016

मेरे पास करोड़ रू० है नहीं फिर भी मैं अपने को करोड़ पति कहता हुँ ! और अपने को करोड़ पति सिद्ध करने के लिय एक करोड़ में १०० रू० के नोट कितने होते हैं यह याद कर लेता हुँ ताकि अगर कोई पूछ ले तो बता दुँ ! अब अगर कोई यह पूछ ले कि एक करोड़ में १० हज़ार की कितनी गडियाँ होती हैं तो वह भी मैं याद कर लेता हुँ !
यहाँ तक मैं कहीं किसी के सामने अपने को करोड़ पति सिद्ध न कर पाऊँ उस के लिय एक करोड़ में दस के , बीस के , पचास के , पाँच के कितने नोट होते हैं सब याद कर लेता हुँ ! मैंने करोड़ पति के वह सारे लक्षण जो उस में होते हैं याद कर रखे हैं जो कि मेरे को कोई प्रश्न करके फ़ेल न कर सके !
अगर कोई मुझ से यह कह कि अपने को करोड़ पति कहता है तो दिखा तेरे पास वह एक करोड़ रू० कहाँ है ! उस का उतर भी मेरे पास है कि रू० और औरत दिखाने के लिय नहीं पर्दे में रखने के लिय है ! इसलिय मैं करोड़ रू० दिखा नहीं सकता क्यों कि वह तो सदा पर्दे में ही रहता है ! उस को मेरे सिवा और कोई नहीं देख सकता !
अब मैंने अपने को सब के सामने सिद्ध तो कर दिया कि मैं करोड़ पति हुँ ! लोगों में नाम भी हो गया तथा लोग मुझे मान भी देने लग गए लेकिन मेरे पास करोड़ रू० है नहीं केवल करोड़ पति के लक्षण याद कर रखे हैं ! जब मुझे कभी रू० की आवश्यकता पड़े गी तो केवल याद किय हुए लक्षण काम नहीं आए गें ! उस समय अगर मेरे पास रू० होंगें तो ही मेरी आवश्यकता पूरी होगी ! केवल याद मात्र से मैं उस रू० के न होने की वजह से होने वाले दुख को दूर नहीं कर पाऊँ गा !
ऐसे ही मैं ब्रह्म हुँ ज्ञान के लक्षण याद कर लेने से लोगों में अपने को बड़ा ब्रह्म ज्ञानी दिखाने में तो सिद्ध कर लुँ गा और लोगों से मान भी लेने लग जाऊँ गा ! हो सकता है लोग मुझे ब्रह्म ज्ञानी समझ कर पूजने भी लग जाएँ ! लेकिन जिस समय मुझे कोई दुख होगा तो उस दुख को दूर करने के लिय मेरे याद किय हुए ब्रह्म ज्ञान के लक्षण मेरे काम नहीं आएँ गे !
मेरे को इस देह की होने वाली मृत्यु के दुख से मुक्ति मेरे ब्रह्म ज्ञान के याद किय हुए लक्षण नहीं दिलाएँ गे ! बल्कि ब्रह्म ज्ञान के लक्षण मेरे सव्यम के उपर घटित भी होने चहिय ! मुझे सव्यम को ही लगना चहिय कि मैं ब्रह्म हुँ ! मेरा न तो जन्म होता है और न ही मृत्यु होती है ! जब मैं सव्यम अपने में यह लक्षण अनुभव कर लुँ गा तो ही देह की होने वाली मृत्यु के दुख से मुक्त हो पाऊँ गा ! इस अनुभव के बिना मृत्यु का दुख जन्मों जन्मों तक स्माप्त होने वाला नहीं !

19/06/2016

एक गांव में एक जमींदार था। उसके कई नौकरों में जग्गू भी था। गांव से लगी बस्ती में, बाकी मजदूरों के साथ जग्गू भी अपने पांच लड़कों के साथ रहता था। जग्गू की पत्नी बहुत पहले गुजर गई थी। एक झोंपड़े में वह बच्चों को पाल रहा था। बच्चे बड़े होते गये और जमींदार के घर
नौकरी में लगते गये।
सब मजदूरों को शाम को मजूरी मिलती। जग्गू और उसके लड़के चना और गुड़ लेते थे। चना भून कर गुड़ के साथ खा लेते थे।
बस्ती वालों ने जग्गू को बड़े लड़के की शादी कर देने की सलाह दी।
उसकी शादी हो गई और कुछ दिन बाद गौना भी आ गया। उस दिन जग्गू की झोंपड़ी के सामने बड़ी बमचक मची। बहुत लोग इकठ्ठा हुये नई बहू देखने को। फिर धीरे धीरे भीड़ छंटी। आदमी काम पर चले गये। औरतें अपने अपने घर। जाते जाते एक बुढ़िया बहू से कहती गई – पास ही घर है। किसी चीज की जरूरत हो तो संकोच मत करना, आ जाना लेने। सबके जाने के बाद बहू ने घूंघट उठा कर अपनी ससुराल को देखा तो उसका कलेजा मुंह को आ गया।जर्जर सी झोंपड़ी, खूंटी पर टंगी कुछ पोटलियां और झोंपड़ी के बाहर बने छः चूल्हे (जग्गू और उसके सभी बच्चे अलग अलग चना भूनते थे)। बहू का मन हुआ कि उठे और सरपट अपने गांव भाग चले। पर अचानक उसे सोच कर धचका लगा– वहां कौन से नूर गड़े हैं। मां है नहीं। भाई भौजाई के राज में नौकरानी जैसी जिंदगी ही तो गुजारनी होगी। यह सोचते हुये वह बुक्का फाड़ रोने लगी। रोते-रोते थक कर शान्त हुई। मन में कुछ सोचा। पड़ोसन के घर जा कर पूछा –
अम्मां एक झाड़ू मिलेगा? बुढ़िया अम्मा ने झाड़ू, गोबर और मिट्टी दी।साथ मेंअपनी पोती को भेज दिया।वापस आ कर बहू ने
एक चूल्हा छोड़ बाकी फोड़ दिये।सफाई कर गोबर-मिट्टी से झोंपड़ीऔर दुआर लीपा।फिर उसने सभी पोटलियों के चने
एक साथ किये और अम्मा के घर जा कर चना पीसा।अम्मा ने उसे सागऔर चटनी भी दी। वापस आ कर बहू ने चने के आटे की रोटियां बनाई और इन्तजार करने लगी।जग्गू और उसके लड़के जब लौटे तो एक ही चूल्हा देख भड़क गये।चिल्लाने
लगे कि इसने तो आते ही सत्यानाश कर दिया। अपने आदमी का छोड़ बाकी सब का चूल्हा फोड़ दिया। झगड़े की आवाज सुन बहू झोंपड़ी से निकली। बोली –आप लोग हाथ मुंह धो कर बैठिये, मैं खाना
निकालती हूं। सब अचकचा गये! हाथ मुंह धो कर बैठे। बहू ने पत्तल पर खाना परोसा – रोटी, साग, चटनी। मुद्दत बाद उन्हें ऐसा खाना मिला था। खा कर अपनी अपनी कथरी ले वे सोने चले गये।
सुबह काम पर जाते समय बहू ने उन्हें एक एक रोटी और गुड़ दिया।चलते समय जग्गू से उसने पूछा – बाबूजी, मालिक आप लोगों को चना और गुड़ ही देता है क्या? जग्गू ने बताया कि मिलता तो सभी अन्न है पर वे चना-गुड़ ही लेते हैं।आसान रहता है खाने में। बहू ने समझाया कि सब
अलग अलग प्रकार का अनाज लिया करें। देवर ने बताया कि उसका काम लकड़ी चीरना है। बहू ने उसे घर के ईंधन के लिये भी कुछ लकड़ी लाने को कहा।बहू सब की मजदूरी के अनाज से एक- एक मुठ्ठी अन्न अलग रखती। उससे बनिये की दुकान से बाकी जरूरत की चीजें लाती। जग्गू की गृहस्थी धड़ल्ले से चल पड़ी। एक दिन सभी भाइयों और बाप ने तालाब की मिट्टी से झोंपड़ी के आगे बाड़ बनाया। बहू के गुण गांव में चर्चित होने लगे।जमींदार तक यह बात पंहुची। वह कभी कभी बस्ती में आया करता था।
आज वह जग्गू के घर उसकी बहू को आशीर्वाद देने आया। बहू ने पैर छू
प्रणाम किया तो जमींदार ने उसे एक हार दिया। हार माथे से लगा बहू ने कहा कि मालिक यह हमारे किस काम आयेगा। इससे अच्छा होता कि मालिक हमें चार लाठी जमीन दिये होते झोंपड़ी के दायें - बायें,तो एक कोठरी बन जाती। बहू की चतुराई पर जमींदार हंस पड़ा। बोला –
ठीक, जमीन तो जग्गू को मिलेगी ही। यह हार तो तुम्हारा हुआ।यह कहानी हमें सीख देती है–औरत चाहे घर को स्वर्ग बना दे, चाहे नर्क! मुझे लगता है कि देश, समाज, और
आदमी को औरत ही गढ़ती है।

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