02/10/2026
ज़रूर 🙏 यहाँ जीवित्पुत्रिका (जितिया/जिउतिया) व्रत की बड़ी और सरल कथा है। इस व्रत से जुड़ी परंपराओं में राजा जीमूतवाहन और चिल्हो-सियारो की कथा प्रमुख रूप से सुनाई जाती है।
🌺 जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा
बहुत समय पहले की बात है। एक धर्मात्मा और दयालु राजा थे, जिनका नाम जीमूतवाहन था। वे दूसरों के दुख को अपना दुख समझते थे। एक दिन वन में घूमते हुए उन्हें एक नाग माता बहुत दुखी दिखाई दी। पूछने पर उसने बताया कि उसका पुत्र नागों की परंपरा के अनुसार गरुड़ के भोजन के लिए जाने वाला है।
जीमूतवाहन को यह सुनकर बहुत दुख हुआ। उन्होंने नाग माता से कहा कि वे उसके पुत्र के स्थान पर स्वयं जाएंगे। वे अपने प्राणों की चिंता किए बिना उस स्थान पर पहुंच गए।
जब गरुड़ वहां आए तो उन्होंने जीमूतवाहन को देखा। जीमूतवाहन ने बताया कि वे किसी निर्दोष नाग के बजाय स्वयं अपने प्राण देने के लिए आए हैं। उनके त्याग और करुणा से गरुड़ अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और नागों को भी भय से मुक्त करने का वचन दिया।
इसी त्याग और संतान की रक्षा की भावना से जीवित्पुत्रिका व्रत की धार्मिक मान्यता जुड़ी मानी जाती है। माताएं अपनी संतान के दीर्घ जीवन, स्वास्थ्य और सुख-समृद्धि की कामना से यह व्रत करती हैं।
🦅 चिल्हो-सियारो की कथा
एक जंगल में एक पेड़ पर चिल्हो (चील) और पास की झाड़ी में सियारो (सियारिन) रहती थीं। दोनों बहुत अच्छी सहेलियां थीं। एक दिन उन्होंने गांव की महिलाओं को जितिया व्रत की तैयारी करते देखा और उन्होंने भी व्रत करने का निश्चय किया।
चिल्हो ने पूरे नियम और श्रद्धा से व्रत रखा, लेकिन सियारो को रात में बहुत भूख लगी और उसने व्रत का नियम तोड़ दिया। लोककथा में आगे बताया जाता है कि दोनों को उनके कर्मों के अनुसार अलग-अलग फल मिला। इस कथा के माध्यम से व्रत में श्रद्धा, संयम और नियम का महत्व बताया जाता है।
जय भगवान जीमूतवाहन 🙏
जितिया माता की जय 🌺 ゚viralシ