26/12/2025
यह दृश्य किसी भीड़ भरे मंच का नहीं है, न ही किसी बड़े आयोजन का। यह एक साधारण-सा मंदिर है, और उसके बाहर सर्दियों में इकहरे कपड़ों में अकेले बैठे एक बाबाजी। हाथों में चिमटा, होठों पर भजन। न माइक, न श्रोता, न कैमरे की परवाह। बस स्वर, श्रद्धा और साधना।
इन बाबाजी के लिए इनका संगीत और चिमटा किसी रोजगार का साधन नहीं बल्कि साधना है। सड़कों, मंदिरों और चौपालों पर बैठकर गाए गए ये लोक-भजन कभी समाज की आत्मा हुआ करते थे। आज डिजिटल शोर में उनकी आवाज़ धीमी पड़ गई है।
यह शायद आख़िरी पीढ़ी है जो इस तरह खुले में, बिना किसी अपेक्षा के लोक, संस्कृति और भक्ति को ज़िंदा रखे हुए है। इनके जाने के साथ सिर्फ़ लोग नहीं जाएंगे, एक पूरी परंपरा, एक पूरा मौखिक इतिहास भी खामोश हो जाएगा।
जब भी ऐसे किसी दृश्य से सामना हो, ठहरकर सुनिए। क्योंकि सड़कों पर गूंजती शायद ये आख़िरी आवाज़ें हैं।
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