24/08/2026
क्या बाली बुरी शक्तियों से डरता है?
यह सवाल मेरे मन में बाली पहुँचने के बाद कई बार उठा।
जिस द्वीप को दुनिया उसकी सुंदरता, समुद्र, झरनों, फूलों, झूलों और नीले आसमान के लिए जानती है, वहाँ मुझे एक चीज़ लगभग हर जगह दिखाई दी—बुरी शक्तियों से बचने की एक अद्भुत सजगता।
घर के दरवाज़े पर दो भव्य और कभी-कभी भयावने चेहरे वाले द्वारपाल।
मंदिरों में रक्षक आकृतियाँ।
एयरपोर्ट से लेकर बड़े-बड़े शोरूम तक पौराणिक और डरावने मुखाकृतियों वाली मूर्तियाँ।
और फिर हर सुबह फूल, चावल, धूप और कहीं-कहीं सिगरेट तक का अर्पण!
पहली नज़र में लगा—क्या बालीनीज़ लोग इतने वहमी होते हैं?
लेकिन छह दिन बाली में रहने के बाद मुझे लगा, शायद इसे वहम कहना बहुत जल्दबाज़ी होगी। यह उनके लिए डर से अधिक आस्था, संतुलन और अपने परिवेश के प्रति सजग रहने की एक सांस्कृतिक परंपरा है। यहाँ शुभ और अशुभ दोनों शक्तियों की उपस्थिति को स्वीकार किया जाता है और जीवन में दोनों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश दिखाई देती है।
बाली सचमुच मूर्तियों का द्वीप है।
हर घर, दुकान या परिसर के प्रवेश पर दो द्वारपाल दिखाई देना यहाँ की सबसे विशिष्ट चीज़ों में से एक है। मान्यता है कि ये प्रहरी उस स्थान की रक्षा करते हैं और नकारात्मक शक्तियों को भीतर आने से रोकते हैं। उनके चेहरे कई बार इतने प्रभावशाली और भयावने होते हैं कि आप उन्हें देखकर ठिठक जाएँ। मुझे तो एयरपोर्ट पर भी ऐसे चेहरों और पौराणिक आकृतियों की भरमार देखकर लगा कि बाली अपने मेहमानों का स्वागत भी अपने देवताओं और प्रहरियों के साथ करता है।
और फिर यहाँ की रोज़मर्रा की पूजा ने मुझे सबसे अधिक आकर्षित किया।
सुबह का दिन जैसे ईश्वर को अर्पण किए बिना शुरू ही नहीं होता। नारियल या पाम के पत्तों से बनी छोटी-सी टोकरियों में अलग-अलग रंगों के फूल, चावल और धूप रखी जाती है। इसे चनंग सारी कहा जाता है। फूलों के रंगों का भी अपना धार्मिक अर्थ है।
और हाँ, मैंने कई जगह इसमें सिगरेट भी रखी हुई देखी।
यह मेरे लिए सचमुच पहली बार का अनुभव था। कुछ स्थानीय अर्पणों में तंबाकू या सिगरेट का प्रयोग भी परंपरा का हिस्सा है। हर पूजा में यह अनिवार्य नहीं है, लेकिन इसे देखकर मेरे भीतर स्वाभाविक जिज्ञासा उठी—हमारे यहाँ जहाँ धूप, दीप और नैवेद्य की अपनी परंपराएँ हैं, वहाँ बाली में ईश्वर के सामने सिगरेट भी रखी जा सकती है!
यही तो किसी देश को जानने का आनंद है—जो अपने यहाँ असामान्य लगता है, वह किसी दूसरी संस्कृति में सदियों पुरानी परंपरा हो सकता है।
बाली में हिंदू धर्म का प्रभाव भी हर कदम पर दिखाई देता है। गणेश जी की मूर्तियाँ, ब्रह्मा, विष्णु, महेश और अनेक पौराणिक पात्रों के रूप—घर के बाहर, मंदिरों में, सड़क किनारे और सार्वजनिक स्थानों पर दिखाई देते हैं। भारतीय संस्कृति से इतनी दूर होकर भी रामायण और हिंदू दर्शन की अनेक छवियाँ यहाँ के जीवन में गहरे पैठी हुई हैं।उलुवातु मंदिर में तो कैचक डांस ने रोमांचित कर दिया।रामायण का इतना सुंदर प्रस्तुतीकरण।
लेकिन बाली की एक और बात ने मुझे उतना ही प्रभावित किया—इस द्वीप की सहज सुरक्षा।
छह दिनों की यात्रा में मुझे एक भी पुलिसकर्मी या सुरक्षा से जुड़ा कोई प्रशासनिक व्यक्ति दिखाई नहीं दिया। यह अपने आप में सुरक्षा का प्रमाण तो नहीं है, लेकिन एक यात्री के रूप में पूरे समय जो सहज और सुरक्षित वातावरण महसूस हुआ, वह उल्लेखनीय था।
और यह सब उस जगह पर, जहाँ मैंने कल्पना भी नहीं की थी कि इतनी भीड़ होगी!
मुझे न जाने क्यों लगता था कि बाली बहुत शांत, कम भीड़ वाला कोई सुंदर-सा द्वीप होगा—कुछ समुद्र, कुछ हरियाली, कुछ झूले और बस प्रकृति।
लेकिन वास्तविक बाली तो काफी अलग निकला।एक तरफ़ फिन्स बीच क्लब की रौनक तो दूसरी ओर सुंदरतम मंदिरों की शान्ति।
यहाँ मैंने दिल्ली और मुंबई से भी कम नहीं, बल्कि कई जगहों पर वैसा ही ज़बरदस्त ट्रैफिक देखा। वाहन, पर्यटक, दुकानें, बाज़ार—हर तरफ़ चहल-पहल।
उबुद और कुटा के बाज़ार तो जैसे खत्म होने का नाम ही नहीं लेते। एक दुकान के बाद दूसरी और दूसरी के बाद तीसरी। मैंने सोचा भी नहीं था कि बाली के बाज़ार इतने विशाल और इतने जीवंत होंगे।
लेकिन इतनी भीड़ के बीच भी एक चीज़ मुझे बहुत अच्छी लगी—गंदगी दिखाई नहीं दी।
हम भारत में अक्सर बढ़ती जनसंख्या को गंदगी से जोड़कर देखते हैं और कहते हैं कि इतने लोगों के बीच व्यवस्था बनाए रखना कठिन है। बाली में इतनी भीड़ और इतने पर्यटकों के बावजूद सार्वजनिक स्थानों की साफ़-सफ़ाई ने मुझे प्रभावित किया। यह उनके अपने देश और परिवेश के प्रति सामूहिक जिम्मेदारी और अनुशासन का एक सुंदर उदाहरण हो सकता है।
फिर बाली का मौसम!
हमारे वाहन में छतरियाँ रखी थीं। जिन-जिन रिज़ॉर्ट्स में हम ठहरे, वहाँ भी छतरियों का प्रबंध था और गेट के बाहर उन्हें टाँगने के लिए बाकायदा खूंटियाँ लगी थीं। यहाँ बारिश जैसे जीवन का हिस्सा है—अचानक आती है, कुछ देर बरसती है और फिर प्रकृति को और धो-पोंछकर चमका देती है।
अगस्त में जब हम गए, मौसम इतना सुहाना था कि गर्मी का नामोनिशान नहीं। जैसे हमारे यहाँ अक्टूबर-नवंबर की कोई प्यारी सुबह हो।
और फिर आते हैं बाली के घरों पर।
उनके दरवाज़े भी साधारण दरवाज़े नहीं होते—नक्काशीदार, भारी, कलात्मक और पौराणिक आकृतियों से सजे हुए। लगता है जैसे घर में प्रवेश करने से पहले ही आपको उस परिवार की संस्कृति से परिचित करा दिया गया हो।
स्पा, फूल, वहाँ की बोलचाल, लोगों की सहज मुस्कान…
और फूल तो पूछिए मत।
फूल ही फूल।
हमने भी उन्हें अपने बालों में खूब सजाया।
बाली को देखकर मुझे लगा कि शायद प्रकृति ने इस छोटे-से द्वीप को सुंदरता की कोई कमी रहने ही नहीं दी। समुद्र दे दिया, झरने दे दिए, हरियाली दे दी, फूल दे दिए, नीला आसमान दे दिया और फिर मनुष्य को ऐसी संस्कृति दे दी, जिसमें सुबह का पहला काम भी प्रकृति और ईश्वर के प्रति कृतज्ञता से जुड़ जाता है।
इसलिए बाली मेरे लिए केवल एक सुंदर पर्यटन-स्थल नहीं रहा।
यह एक ऐसा द्वीप बन गया, जहाँ सौंदर्य के साथ आस्था चलती है, आस्था के साथ अनुशासन और अनुशासन के साथ जीवन की अपनी छोटी-छोटी खुशियाँ।
और शायद इसी वजह से बाली इतना सुंदर दिखाई देता है—
क्योंकि यहाँ सुंदरता केवल देखी नहीं जाती, रोज़ जानी और जी भी जाती है।
~ सोनरूपा
बाली (इंडोनेशिया)
अगस्त